16/03/2026
15 मार्च को राजस्थान में आयोजित आकाश आनंद की रैली को लेकर भी राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा देखने को मिली। यह रैली पार्टी के लिए शक्ति प्रदर्शन का अवसर मानी जा रही थी, लेकिन कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ नजर नहीं आई। जिस तरह की भीड़ की उम्मीद की जा रही थी, उसके मुकाबले लोगों की संख्या काफी कम रही, जिससे पार्टी की जमीनी स्थिति पर सवाल उठने लगे। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कम भीड़ केवल एक कार्यक्रम की कमजोरी नहीं बल्कि संगठन के भीतर लंबे समय से चल रही समस्याओं का परिणाम भी हो सकती है।
राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी का जनाधार पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमजोर होता दिखाई दे रहा है। खासतौर पर पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट वितरण को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि उस समय पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भगवान सिंह बाबा के कार्यकाल में कई सीटों पर दो-दो टिकट जारी कर दिए गए, जिससे पार्टी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भारी भ्रम की स्थिति बन गई। जब एक ही सीट पर पार्टी की ओर से अलग-अलग लोगों को टिकट देने की बातें सामने आईं तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता असमंजस में पड़ गए और चुनावी रणनीति भी कमजोर हो गई।
इसके साथ ही कई स्थानों पर पहले से मजबूत और वर्षों से मेहनत कर रहे प्रत्याशियों का टिकट काट दिया गया। जिन नेताओं ने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया और जिनकी क्षेत्र में मजबूत पकड़ मानी जाती थी, उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। इसके स्थान पर ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया जिनकी जमीनी पकड़ उतनी मजबूत नहीं थी। इसी कारण यह आरोप भी लगाए जाते रहे कि इन फैसलों से कांग्रेस और बीजेपी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिला।
इन घटनाओं का असर सीधे तौर पर पार्टी के ईमानदार पदाधिकारियों और समर्पित कार्यकर्ताओं पर पड़ा। कई लोगों का विश्वास संगठन की कार्यप्रणाली से कमजोर हो गया और वे धीरे-धीरे निष्क्रिय होते चले गए। जब कार्यकर्ता ही सक्रिय नहीं रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से पार्टी की पकड़ भी जनता के बीच कमजोर हो जाती है। यही कारण है कि राजस्थान में बसपा का जनाधार लगातार गिरता हुआ नजर आ रहा है।
कई कार्यकर्ताओं और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी को राजस्थान में फिर से मजबूत बनाना है तो संगठन के भीतर जवाबदेही तय करना जरूरी होगा। जिन फैसलों के कारण पार्टी को नुकसान हुआ है उनकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। साथ ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भगवान सिंह बाबा की भूमिका की भी गंभीर जांच की मांग की जा रही है। इसके अलावा प्रदेश कार्यकारिणी में बैठे उन पदाधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई की जरूरत बताई जा रही है जिन पर बेईमानी या पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। जब तक ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पार्टी का जनाधार और कमजोर होता हुआ ही दिखाई देगा। यदि संगठन में पारदर्शिता, ईमानदारी और जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया जाए, तभी बसपा राजस्थान में दोबारा मजबूत होकर जनता का विश्वास हासिल कर सकती है।