17/09/2025
#हनुमान_पोद्दार जी एक भूला-बिसरा संकल्पना-नायक, जिसने भारत का आध्यात्मिक #भूगोल बदल दिया
आज जब हम ' #गीता_प्रेस, #गोरखपुर' का नाम सुनते हैं, तो हमारी आँखों के सामने एक ऐसा #प्रकाशन #संस्थान उभरता है जो सदियों से चली आ रही भारतीय ज्ञान-परंपरा का अविचल प्रहरी है। करोड़ों हिंदू परिवारों की पूजा-अर्चना, आचार-विचार और नैतिकता की नींव इसी प्रेस द्वारा प्रकाशित सस्ते और सुलभ धार्मिक ग्रंथों पर टिकी है। किंतु, इस विशालतम व्यक्तित्व के पीछे जिस एक व्यक्ति की तपस्या, दूरदर्शिता और निस्वार्थ भावना काम कर रही थी, वे हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, जिन्हें सभी ' #भाईजी' के नाम से जानते थे।
आधुनिक भारत के #इतिहास में भाईजी एक ऐसे विरल व्यक्तित्व हैं जिन्होंने पूँजी, प्रसिद्धि या सत्ता के बल पर नहीं, बल्कि सेवा, साधना और सत्य के बल पर एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जो आज भी अटल है। उनका जन्म 1892 में राजस्थान के एक छोटे से गाँव में हुआ था। व्यवसायिक जीवन की शुरुआत की, किंतु भाग्य ने उन्हें कोलकाता लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ वे सेठ घनश्यामदास बिरला के निकट came। यहीं उनकी मुलाकात महान राष्ट्रवादी संत स्वामी करपात्री जी और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक महामना मदन मोहन मालवीय जैसे विभूतियों से हुई।
लेकिन भाईजी की असली पहचान एक ' #साधक' की थी। उन्होंने देखा कि अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिकता की अंधी दौड़ में भारत का समाज अपने मूल्यों और आध्यात्मिक धरोहर से दूर होता जा रहा है। धर्मग्रंथ महंगे और दुर्लभ थे, सामान्य जनता की पहुँच से बाहर। उस समय की यह एक सांस्कृतिक #आपातकालीन स्थिति थी। भाईजी ने इस चुनौती को एक अवसर में बदला।
1923 में, मात्र 500 रुपये की पूँजी से, उन्होंने गीता #प्रेस की नींव रखी। उद्देश्य स्पष्ट और पवित्र था: "हिंदू धर्म के मूल ग्रंथों को न्यूनतम मूल्य पर, सर्वोत्तम गुणवत्ता में, आम जनता तक पहुँचाना।" यह व्यवसाय नहीं, एक #धर्मयुद्ध था। उन्होंने ' #कल्याण' #पत्रिका की शुरुआत की, जो केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन, नैतिकता और #साहित्य का एक जीवंत विश्वकोश बन गई। आज भी लाखों परिवारों में इसकी प्रतीक्षा की जाती है।
भाईजी की महानता के तीन स्तंभ थे:
1. निस्वार्थ #सेवा: उन्होंने गीता प्रेस से कभी एक पैसा भी वेतन के रूप में नहीं लिया। उल्टे, अपनी निजी संपत्ति को भी इसी कार्य में लगा दिया। उनका जीवन सादगी और त्याग की मिसाल था।
2. गुणवत्ता पर अटल विश्वास: कम कीमत का मतलब खराब छपाई या कागज नहीं था। #श्रीमद्भगवद्गीता, #रामचरितमानस, #पुराण—हर किताब श्रेष्ठ कागज और सटीकता के साथ छपती थी।
3. सर्व-स्पर्शीय दृष्टिकोण: उनकी दृष्टि में कोई ऊँच-नीच नहीं थी। उन्होंने धर्मग्रंथों को जन-जन की भाषा ( #हिंदी) में, उनकी जेब के भीतर पहुँचाया, जिससे एक साधारण किसान से लेकर एक विद्वान तक सभी लाभान्वित हुए।
आज के दौर में, जब प्रकाशन उद्योग मुनाफे के चक्कर में भाग रहा है और सनसनीखेज सामग्री को बढ़ावा दिया जा रहा है, गीता प्रेस और भाईजी का आदर्श और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने हमें सिखाया कि व्यवसाय का उद्देश्य केवल पूँजी का संचय नहीं, बल्कि समाज के चरित्र-निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण का दायित्व भी हो सकता है।
हनुमान पोद्दार कोई साधारण #संपादक या #उद्योगपति नहीं थे। वे एक सांस्कृतिक क्रांतिकारी, एक धर्म-दूत और एक ऐसे दूरदर्शी थे, जिन्होंने अपनी छपाई मशीनों के माध्यम से भारत की आत्मा को बचाए रखने का काम किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति का निस्वार्थ #संकल्प इतिहास की धारा को मोड़ सकता है और करोड़ों लोगों के जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकता है। उनकी विरासत न केवल गोरखपुर में, बल्कि देश के कोने-कोने में उस लाखों पाठकों के हृदय में बसी है, जो आज भी गीता प्रेस की पुस्तकों से प्रकाश और शांति प्राप्त करते हैं।