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 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #यात्रा_वृतांत      यात्राओं का जिक्र - संपादक प्रियंकर पालीवाल …………………………………….देश के बाह...
20/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #यात्रा_वृतांत

यात्राओं का जिक्र - संपादक प्रियंकर पालीवाल
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देश के बाहर निकलें तो समय उलट-पुलट जाता है । घड़ी कहती है - सुबह हो चुकी है । आँखें कहती हैं - रात अभी बाकी है । स्रोत स्थान से लक्ष्य स्थान के समय को देखते हुए मैंने घड़ी मिला ली । दिल्ली में समय है रात के बारह बजकर पांच मिनट । एयरक्राफ्ट के स्कीन पर सूचना तैरती है । थाइलैंड में अभी समय है एक बज कर तीस मिनट । मैं घड़ी मिला लेती हूँ । सोचती हूँ चार घंटे सो जाऊँ । कहते हैं - घोड़े खड़े-खड़े सोते हैं । हम जैसे जहाज के दैनिक यात्रियों को बैठे-बैठे सोने की आदत डालनी पड़ती है । वह भी मुश्किल से मुहाल होती है । पहली बार विदेश गई थी तो मन में कितनी धुकधुकी थी । पासपोर्ट, वीसा, डॉलर पाउण्ड, फ्रैंक, लौरा, येन, क्राउन, भाट, यूरो सब पहेली-सा लगता था । अब यात्राओं का ऐसा अभ्यास हो गया है कि अजनबी, अनजान और अचीन्ही भाषा वाले देशों में जाने के पहले किसी प्रकार की मानसिक प्रस्तुति की भी आवश्यकता नहीं होती । इधर मलेशिया के बारे में काफी कुछ सुना-पढ़ा था और हठात् जब मुझे कुआलालंपुर में होनेवाली कमस में हिंसारहित' समाज पर अपने विचार रखने का आमंत्रण मिला तो पसंदीदा विषय देखकर मैं इसपर बोलने का प्रलोभन नहीं रोक पाई ।

पढ़िए चन्द्रकला पाण्डेय का आलेख मलेशिया: जहाँ तारे जमीं पर चलते हैं

यह अंक एक आमंत्रण था, देश-विदेश की यात्राओं की स्मृति को खंगालने और उन्हें सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का । हम ...

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #पत्रिका  #रंगभूमि_शताब्दी  #विशेषांक          प्रेमचंद पथ अक्टूबर - दिसंबर ’25…………………………...
19/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका #रंगभूमि_शताब्दी #विशेषांक

प्रेमचंद पथ अक्टूबर - दिसंबर ’25
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‘रंगभूमि’ भारत के आम जनमानस की गाथा है. मानवीय भावना और समय के अनंत विस्तार तक जाती , प्रेमचंद की रचनाएँ इतिहास, सीमाओं को तोड़ती हैं. और कालजयी कृतियों में गिनी जाती है. ‘रंगभूमि’ (1924-1925) उपन्यास ऐसी ही कृति है। नौकरशाही तथा पूंजीवादी के साथ जनसंघर्ष का तांडव, सत्य, निष्ठा और अहिंसा के प्रति आग्रह, ग्रामीण जीवन तथा स्त्री दुर्दशा का भयावह चित्र यहाँ अंकित है।

पढ़िए नेहा उपाध्याय का आलेख रंगभूमि और सूरदास

रंगभूमि शताब्दी विशेषांक

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #उपन्यास      बहुत लंबी राह - कर्मेंदु शिशिर…………………………………….‘बैठो, बैठो ना फुआ ! इतनी हड़ब...
19/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #उपन्यास

बहुत लंबी राह - कर्मेंदु शिशिर
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‘बैठो, बैठो ना फुआ ! इतनी हड़बड़ी क्यों है ? थोड़ा तू भी मुँह जुठिया लो । भाग से तो आयी हो ।’ मोहना की माई उठकर अंदर जाते हुए बोली । तेतरी चुपचाप बैठ गई थी । ... वही तो, भला किसी चीज पर उसका आतम आ जाय और वह ऐसे ही लौट जाय ? ऐसा कभी हुआ है- जो आज होता ? ... लेकिन तेतरी कुछ देर के लिए निराश जरूर हो गई थी। मोहना की माई बड़ी कठकरेज है । जल्दी पसीज नहीं रही थी। बावजूद उसे पूरा भरोसा था - वह घर भी लौट जाती, तो भतार को भेज कर बुलवाती । ... वह भी कम पहुँची हुई नहीं थी, जो इतनी आसानी से घर लौट जाती । अभी यहाँ से निकल भी जाती, तो आखिरी दावँ परसा के पास चलती ।

उपन्यास

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #पत्रिका    चाणक्य वार्ता 1 - 15 दिसंबर ’25…………………………………….हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न...
18/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका

चाणक्य वार्ता 1 - 15 दिसंबर ’25
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हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो, कोई दुखी या लाचार न हो। जो लोग कि सी कारण से मंदिर नहीं आ पाते और दूर से मंदिर के ध्वज को प्रणाम कर लेते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाता है। ये धर्म ध्वज भी इस मंदिर के ध्येय का प्रतीक है। ये ध्वज दूर से ही रामलला की जन्म भूमि के दर्शन कराएगा। युगों युगों तक श्री राम के आदर्शों और प्रेरणाओं को मानव मात्र तक पहुंचाएगा। संपूर्ण विश्व के करोड़ों राम भक्तों को इस अद्वितीय अवसर की शुभकामनाएं देता हूं।

पढ़िए आर. पी. तोमर का आलेख श्री राम मंदिर पर लहराया धर्मध्वज, पूरी दुनिया हुई राममय

राजभाषा हिंदी की सम्पूर्ण अंतराष्ट्रीय पत्रिका

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #पत्रिका  #श्रीपत_राय  #केंद्रित        लमही अप्रैल - सितंबर ’18…………………………………….एक शाम मैं...
18/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका #श्रीपत_राय #केंद्रित

लमही अप्रैल - सितंबर ’18
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एक शाम मैं श्रीपत जी के निवास स्थान पर पहुंची। एक लड़की ने मेरा स्वागत किया जो उनकी बहन की बेटी थी और मुझे काफी पढ़ चुकी थी। उसकी हंसी और उत्साह से साफ़ झलक रहा था। वह मुझे घुमावदार सीढ़ियों से ऊपरी मंज़िल में ले गई जहां श्रीपत जी सोफे पर बैठे किसी फाइल को देख रहे थे। लंबा खुला हवादार कमरा था। आदाब करने के बाद मैं बैठ गई। उन्होंने मेरी कहानी के बारे में बात की, अपनी तारीफ सुन कर मेरे अन्दर गहरा विश्वास जागा। जाने से पहले मैं उनकी बड़ी बहन से मिली जो नीचे के कमरे में किसी किताब में गुम थीं। उस समय तक मैंने जो भी लिखा था वह सब उन्होंने पढ़ रखा था और जिस तरह वह घुलमिल कर मुझ से बात कर रही थी। उसमें अपनाइयत की अजीब कशिश थी मानो हम बरसों से एक दूसरे को जानते हों।

पढ़िए नासिरा शर्मा का आलेख बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

श्रीपत राय पर केन्द्रित विशेषांक

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है       साहित्य और साहित्येतर - गोपाल प्रधान…………………………………….उपन्यास की सबसे बड़ी कलात्मक खूबी...
18/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है

साहित्य और साहित्येतर - गोपाल प्रधान
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उपन्यास की सबसे बड़ी कलात्मक खूबी विभाजन के माहौल का चित्रण है । उपन्यास में देश का विभाजन हुआ नहीं है लेकिन उसके आधार पुख्ता हो चुके हैं । देशों के बीच सरहद की दीवार उठने से पहले विभाजन सामाजिक ताने बाने को बदलता है । इसका बेहद जीवंत चित्रण करते हुए लेखक ने दर्ज किया है ‘मुहल्लों के बीच लीकें खिंच गयी थीं, हिन्दुओं के मुहल्ले में मुसलमान को जाने की अब हिम्मत नहीं थी, और मुसलमानों के मुहल्ले में हिन्दू-सिख अब नहीं आ-जा सकते थे’ । माहौल को जिंदा कर देने में सक्षम इस बिम्बात्मक भाषा को गाहे बगाहे पूरे उपन्यास में देखा जा सकता है । यह भाषा आबादियों के बीच के उस बंटवारे को जीवंत कर देती है जिसके बिना भारत का बंटवारा सम्भव नहीं था । अचरज नहीं कि विभाजन के पहले उपन्यास के ऐसे पात्र, जरनैल की हत्या हो जाती है जो विभाजन के विरोध में गांधी के निश्चय का साकार रूप है । उसकी हत्या मानो गांधी की हत्या का पूर्वाभास है । भीष्म साहनी ने इस पात्र को अतिशय समर्पण के साथ खड़ा किया है । जरनैल उन सभी लोगों का प्रतिनिधि बन जाता है जो पागलपन के उस वातावरण में भी मनुष्यता की जीत का सपना पाले हुए थे । इनकी हत्या के बिना देश का विभाजन सम्भव नहीं था ।

पढ़िए तमस: भीष्म साहनी की सर्वोत्तम उपलब्धि

साहित्य को कभी साहित्येतर से अलग नहीं किया जा सकता । निरर्थक ध्वनियां भी मानव कंठ से ही निकलती हैं और उन्हें सुनने ....

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #पत्रिका  #श्याम_बेनेगल  #विशेषांक         हंस अप्रैल ’25…………………………………….श्याम बेनेगल ने म...
17/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका #श्याम_बेनेगल #विशेषांक

हंस अप्रैल ’25
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श्याम बेनेगल ने मुझे लगातार तीन फ़िल्मों में कास्ट किया ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और ‘भूमिका’ (1977), जिसमें मेरी विशेष अतिथि भूमिका थी. इसके बाद ‘सुसमन’ (1987) तक एक लंबा अंतराल रहा. इस बीच एक बार मेरी उनसे मुलाकात हुई तो मैंने पूछा कि वे मुझे भूल कैसे गए. तभी उन्होंने मुझे ‘सुसमन’ में एक भूमिका दी.
लेकिन यह सब सामान्य है. मैं पुणे में था और वे मुंबई में सत्य देव दुबे उनसे घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे. उनका अपना थिएटर ग्रुप था, जिसमें कई कलाकार थे, जो बाद में श्याम बाबू के साथ काम करने वाले थे.

पढ़िए मोहन आगाशे का आलेख भारतीय सिनेमा के दिग्गज निदेशक

श्याम बेनेगल विशेषांक

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #आलोचना     समकालीन विमर्श और हिंदी कथा साहित्य - रोहिणी अग्रवाल…………………………………….“प्रकृति प...
17/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #आलोचना

समकालीन विमर्श और हिंदी कथा साहित्य - रोहिणी अग्रवाल
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“प्रकृति पर मनुष्य की विजय को लेकर ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि ऐसी हर जीत हमसे अपना बदला लेती है। पहली बार तो हमें वही परिणाम मिलता है जो हमने चाहा था, लेकिन दूसरी और तीसरी दफा इसके अप्रत्याशित प्रभाव दिखाई पड़ते हैं जो पहली बार के प्रत्याशित प्रभाव का प्रायः निषेध कर देते हैं। इस तरह हर कदम पर हमें यह चेतावनी मिलती है कि हम प्रकृति पर शासन नहीं करते, जैसे कोई विजेता विदेशी लोगों पर शासन करता है। हम प्रकृति पर इस तरह शासन नहीं कर सकते जैसे हम उसके बाहर खड़े हों, क्योंकि मांस, रक्त और मस्तिष्क सहित प्रकृति से जुड़े हुए हैं और उसी के बीच हमारा अस्तित्व है। प्रकृति पर हमारी उस्तादी का मतलब सिर्फ इतना है कि दूसरे प्राणियों के मुकाबले प्रकृति को जानने और उसके नियमों को सही ढंग से लागू करने की सामर्थ्‍य हममें ज्यादा है। समय बीतने के साथ-साथ हमारा प्रकृति के इन नियमों के बारे में ज्ञान भी बढ़ता जाता है; और उसी के साथ प्रकृति के पारंपरिक स्वरूप में हस्तक्षेप करने के तात्कालिक और दूरगामी परिणामों के बारे में हमारी समझ भी बढ़ती जाती है।

पढ़िए ‘रहेगी जमीन, रहेगा पानी’: समकालीन हिंदी उपन्यास और पारिस्थितिकी संकट

यह किताब आज के कथा साहित्य में विमर्शों आर ज़रूरी प्रकाश डालती है

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है       नारियों का महाभारत - सुश्री इन्द्रासन सिंह ‘इन्दु’ …………………………………….राजा प्रतीप कुरु व...
16/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है

नारियों का महाभारत - सुश्री इन्द्रासन सिंह ‘इन्दु’
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राजा प्रतीप कुरु वंश के परमप्रतापी राजा थे। इन्हीं के पुत्र शान्तनु थे, जिनका गंगा से विवाह हुआ। परन्तु विवाह गंगा की शर्तों पर हो इसके लिए शान्तनु के पिता प्रतीप की भूमिका महत्वपूर्ण थी। सामान्यतया कोई भी युवक जब किसी युवती के प्रति आकर्षित होता है तो वह यह जानना चाहता है कि वह युवती कौन है? युवती के विषय में बिना जाने उसकी सभी शर्तों को स्वीकार करने की पूर्व पीठिका के रूप में गंगा का प्रतीप से सम्पर्क तब हुआ जब वह हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद जप करते हुए ध्यान मग्न थे। देवनदी को मालूम था कि ध्यानमग्न व्यक्ति राजा प्रतीप हैं। वह राजा प्रतीप की दाहिनी जंघा पर बैठ गयीं। गंगा के स्पर्श से प्रतीप का ध्यान भंग हुआ। उन्होनें देखा एक सुन्दर युवती उनकी जंघा पर बैठी हुई है। मनोहर स्वरूप देदीप्यमान अंगकान्ति। प्रतीप ने पूछा-देवि! मैं तुम्हारा कौन सा प्रिय कार्य कर सकता हूँ। किस इच्छा से तुम मेरे पास आयी हो? गंगा बोलीं-मैं आपको चाहती हूँ, आपके प्रति मेरा अनुराग हो गया है। प्रतीप ने गंगा से कहा-सुन्दरी! तुम मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी हो। यह जंघा पुत्री या पुत्रवधू की है।

लेखिका ने प्रस्तुत कृति में महाभारत में उल्लिखित स्त्रीपात्र, तपती, सत्यवती, गंगा, गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, हिडि.....

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है       समकालीन कथा साहित्य (हिंदी) की कथा - वस्तु में और मोटे तौर पर क्या है? वहाँ कैसे और ...
16/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है

समकालीन कथा साहित्य (हिंदी) की कथा - वस्तु में और मोटे तौर पर क्या है? वहाँ कैसे और किस - किस प्रकार के विषय आए हैं और आ रहे हैं?
समकालीन कथा साहित्य का मुख्य सरोकार है - बाज़ार। अर्थात् बीसवीं सदी एक अंतिम दशकों में सोवियत राष्ट्रों के पतन, सूचना क्रांति और वैश्वीकरण - निजीकरण - उदारीकरण के आरंभ होने के कारण बदल गई दुनिया, इसका हमारे जीवन और मन पर पड़ा प्रभाव और तत्संबंधी आशंकाएँ और संभावनाएं।

पढ़िए समकालीन कथा साहित्य और प्रेमचंद का भारत
‘वागर्थ’ पत्रिका के सवाल - जवाब

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 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #पत्रिका  #मधुरेश  #विशेषांक         मुक्तांचल अक्टूबर - दिसंबर ’25…………………………………….हिंदी क...
16/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #पत्रिका #मधुरेश #विशेषांक

मुक्तांचल अक्टूबर - दिसंबर ’25
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हिंदी के जिन आलोचकों ने आलोचना - कर्म को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और वस्तुपरकता के साथ निभाया है उनमें मधुरेश जी का नाम पहली पंक्ति में आयेगा. बिना व्यर्थ के विवादों में फंसे जिस किसी रचना, रचनाकार और आलोचक पर उन्होंने लिखा है, इस बात का ध्यान रखा है कि वे उन पर कोई ऐसी टिपण्णी न करे जिस पर व्यक्तिगत दुराग्रह का आरोप लगे.

पढ़िए जवरीमल्ल पारख का आलेख प्रतिबद्ध और प्रगतिशील आलोचक : मधुरेश

मधुरेश विशेष अंक

 #नॉटनल  #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है  #अवध  #लखनऊ  #पुस्तकमाला             अवध की लखनउआ कहानियाँ - लेखक डॉ योगेश प्रवीण …………………...
15/12/2025

#नॉटनल #पढ़ना_ही_ज़िंदगी_है #अवध #लखनऊ #पुस्तकमाला

अवध की लखनउआ कहानियाँ - लेखक डॉ योगेश प्रवीण
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चन्दनपुर के राजा सुखपाल अपनी रानी चन्द्रलेखा को बहुत चाहते थे। उनके एक सुन्दर बेटी थी। जिसका नाम चौरंगा था। महल के नौकर चाकर उन्हें चौरंगा रानी कहते थे।चन्द्रलेखा अचानक बीमार हो गई और दिन रात पलंग पर पड़ी रहती थी उन्हीं दिनों महल के एक आले में एक कबूतर का जोड़ा रहता था कबूतर की कबूतरी को कोई शिकारी मार ले गया था तो उसके दोनों छोटे बच्चे बड़े बेहाल थे इस बीच कबूतर एक दूसरी कबूतरी ले आया जो अपने बच्चों को तो दाना लाकर देती थी लेकिन पहली कबूतरी के बच्चों को चोंच से घायल करके हटा देती थी। रानी यह सब देखा करती थी। और चौरंगा रानी के भविष्य के बारे में सोचा करती थी। एक दिन उन्होंने रो धोकर राजा से विनती की तुम हमें यह वचन दो कि हमारे मरने के बाद दूसरी शादी नहीं करोगे नहीं तो मेरी चौरंगा की दुर्दशा हो जायेगी और जिसे देख कर मेरा आत्मा कलपती रहेगी। राजा ने उसका हाथ पकड़ कर वचन दे दिया।

पढ़िए चौरंगा रानी

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