16/01/2015
आराजकता और दहशतगर्दी की औकात
धर्म के नाम पर अराजकता फैलाना, बे-कसूर लोंगों की हत्या करना और धर्मान्तरण पर अपनी तीखी टिप्पणी करना अराजकता फैलाने वालो की एक शान की पहचान है। जो लोग दूसरो की जान लेकर अपने आन्दोलनो या फिर जिहाद को जायज ठहराते है, वह पूरे विश्व की समाज में आतंकवादी के रूप में है। जिनकी पहली दलील यह सुनने को मिलती है कि उनके विचारो से भिन्न और उन पर टिप्पणी करने वालो तथा उनको नेस्तनाबूद करने वालो की जान लेने मे जरा सा भी उन्हें संकोच नही है। अपनी घटनाओं को अंजाम देने के बाद यह भी साबित करने के लिए स्वीकार करते है कि विरोधियों को इससे भी अधिक बुरे परिणागमो को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। यानी वह समय-समय पर देश व विदेशों में दहशत का माहौल बनाया करते है। जिन धार्मिक मामलों के सहारे यह दहशतगर्दी लोग दरिन्दगी को पेश करते है उनसे एक प्रश्न है जिस धर्म को वह मानते है क्या वह धर्म इस बात की इजाजत देता हैं कि उन लोगों का खुले आम कत्ल कर दो जो उनके घर्म को ना मानते हो या फिर जो धर्म के बारे में एक अपनी निजी राय देने की ताकत पैदा करे उनका सरेआम कत्ल कर दो।
मेरा एक निजी अनुभव है कि धर्म की, वह चारो पवित्र किताबे भी इस बात की इजाजत नही देती है कि एक दूसरे धर्म के प्रति घृणा रखनी चाहिए। फिर विश्व में वह कौन लोग है जो धर्म की आड़ में अराजकता और दहशतगर्दी फैलाने का काम करने का प्रयास कर रहे हैं।
मै इस बात से सहमत हॅू कि दहशत का माहौल पैदा करने वाले केवल शक्ति प्रदर्शन के सहारे लोकतत्र के मनसूबो पर पानी फेरना चाहते है, या फिर उनका इरादा इतना होता है कि देश की सरकार उनकी बंदूक की नोक पर चले। इसके लिए अराजकता और दहशत फैलाने वाले लोग अपने-अपने धर्मो के सहारे अपने ही लोगों का लहू पीने का काम करते है। जिनके एजेण्ट धर्म के वह ठग है जो अपने आप को धर्मगुरू कहलवाने का डंका पिटवाते रहते है देश-विदेश की अवाम अज्ञानता से भरी, कूप मण्डूक की भाॅति, रूढि़वादी विचारों से चलने वाली, भोली भाली है जो उनके आयोजनो को सफल बनाती हैे। सबसे बड़ी दुःखद बात यह है इन आयोजनों में देश विदेश की राजनीतिक पार्टियों के सफेदपोश लोग इन पर अपना सहयोगी हाथ बनाये रखते है।
हम अपनी बात की बानगी इसी बात से देना चाहते है कि अभी हाल में ही फाॅ्रस की शार्ली एबदो की एक पत्रिका के संपादक सहित पत्रकारो पर आतंकवादियों ने हमला किया था जिसमें लगभग 12 लोगों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी यह लोग अपने धर्म का नारा लगाते हुए हत्या करके फरार हो गये थे। इस काण्ड को लेकर भारत के उत्तर प्रदेश के बसपा समर्थित नेता हाजी याकूब कुरैशी के द्वारा मीडिया के सामने बयान दिया गया कि फ्रांस में जो मीडिया के ऊपर कातिलाना हमला हुआ था, वह ठीक था, यदि कातिल उन्हें मिल जाये तो वह 51 करोड का पुरस्कार उन्हें देंगे। इस बात से यह लगता है वह अपने आप को एक ओर सेक्यूलरवादी नेता कहते हैं तो दूसरी ओर अराजकता फैलाना उनकी पहली प्राथमिकता भी देखने को मिली।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने माना कि पाकिस्तान आतंकवादियों का गढ़ बन चुका है। जहाॅ एक नही कई आतंकवाद के गुरू छुपे रहे और अभी छुपे होने की संभावनाएं भी है। यह तभी संभव जब तक पाकिस्तान उन्हें पनाह दिये हुए है। ओसामा बिन लादेन की हत्या जिस प्रकार से अमेरिकी सैनिको द्वारा पाकिस्तान में की गई उससे पाकिस्तान की झूठ का पिटारा खुल चुका है। यानी वह आंतंकवादियों को छुपाने का कार्य करता है। धर्म के आधार पर कानून चलाने वालो में से पाकिस्तान भी उनमें से एक है जहाॅ बात तो धर्म की जाती है। लेकिन वास्तव में यदि वह धर्म के नाम पर चले तो वहाॅ अमन-चैन हो, भविष्य में पेशावर जैसी धटना ही न घटित होती। परन्तु पाकिस्तान को यह कब समझ में आयेगा कि उसके अपने 40,000 लोग इस आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके है।
हम अब ध्यान भारत की ओर आकर्षित कराना चाह रहे है यहाॅ भी विदेशों से अराजकता की हवा के झोके आते रहते है। केन्द्र में वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी के नेतृत्व करने वाले व्यक्ति की लोकप्रियता जम्मू से कन्याकुमारी तक बढ़ती जा रही है। इस बात से हैरान यहाॅ की विपक्षी राजनीतिक पार्टियों के मुखियाओ की नींद हराम हो चुकी, वह हैरान है, जबकि ऐसे समय उन्हें लोकतंत्र को और बेहतर मजबूत बनाने के लिए धीरज से काम लेना चाहिए। परन्तु वह धर्मान्तरण पर अपनी बयानबाजी करते हैं। जो इस बात का प्रमाण है कि वह सेक्यूलर नही है क्योकि सेक्यूलर वही है जो विवादो को हवा न दे। धर्मान्तरण करना कोई नही बात नही है यह होता आया है और होता रहेगा। धर्मान्तरण पर मुझे आज भी याद है कि हरियाणा के एक राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखने वाले ही नही अपितु सरकार में थे जिन्होने इस्लाम धर्म स्वीकार करके शादी कर ली थी तब धर्मान्तरण का मुद्दा क्यो नही बना, हालाॅकि फिर उनकी घर वापसी भी हुई लेकिन फिर भी धर्मन्तरण का मुद्दा नही बना तो फिर अब क्यो? यानी धर्मान्तरण पर जो भी लोग अपनी-अपनी बयान बाजी कर रहे है। यदि राजनीतिक तौर पर जनता का प्रतिनिधित्व करता हैं तो वह जनता में अराजकता का माहौल बना रहा है। इसे रोकना शासन और प्रशासन का काम तो हैं लेकिन उसे और अधिक हवा देने का काम नही।
हम सत्ता में रहे या फिर विपक्ष में यह सभी को ध्यान देना होगा कि वह ऐसी बयानबजी न करे जिससे अराजकता का माहौल बने, बल्कि ऐसे बयानों को मीडिया में कहे जिससे देश की जनता में प्रेम का व्यवहार बने। क्योकि चुनाव जीतने के बाद हर एक वह जनप्रतिनिधि सभी लोगों का शुभचिन्तक होकर सदन में कार्य करता हैं भले ही उस प्रतिनिधि के लिए व्यक्ति ने अपने मत का प्रयोग किया हो या फिर न किया हो। यही लोकतंत्र की ताकत है। जिसमें आवाम में सुख मिलता।