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शिकायत निवारण: उपभोक्ता अपनी बिजली सम्बन्धी शिकायतें हमारी वेबसाइट पर दर्ज कर सकते हैं।

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25 हजार संविदा कर्मियों की ‘बलि’ पर खड़ी की जा रही है निजीकरण की इमारत?ऊर्जा मंत्री के आदेश बनाम कॉरपोरेशन की मनमानी — आ...
03/06/2026

25 हजार संविदा कर्मियों की ‘बलि’ पर खड़ी की जा रही है निजीकरण की इमारत?

ऊर्जा मंत्री के आदेश बनाम कॉरपोरेशन की मनमानी — आखिर जनता किस पर भरोसा करे?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था में इन दिनों एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने हजारों परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली है और अब पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि बिना कारण किसी भी कर्मचारी को सेवा से नहीं हटाया जाएगा, वहीं दूसरी तरफ पिछले ढाई वर्षों में लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सवाल यह है कि आखिर मंत्री का आदेश बड़ा है या कॉरपोरेशन की मनमानी?

संघर्ष समिति का आरोप है कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि निजीकरण की जमीन तैयार करने का सुनियोजित अभियान है। पहले कर्मचारियों की संख्या घटाओ, फिर व्यवस्था को कमजोर बताओ और उसके बाद निजी हाथों में सौंपने की दलील तैयार कर लो। यदि ऐसा नहीं है तो फिर 2017 में निर्धारित मानवबल मानकों को अचानक कूड़ेदान में क्यों फेंक दिया गया?

जिस व्यवस्था में शहरी उपकेंद्र पर 36 और ग्रामीण उपकेंद्र पर 20 संविदा कर्मी जरूरी माने गए थे, उसी व्यवस्था में आज आधे से भी कम कर्मचारी रखे जा रहे हैं। कुछ जगहों पर तो संख्या इतनी घटा दी गई है कि ऐसा लगता है जैसे बिजली व्यवस्था नहीं, बल्कि किसी दुकान का स्टाफ कम किया जा रहा हो।

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिन कर्मचारियों ने अपनी जवानी बिजली व्यवस्था को दी, जो तूफान, बारिश, गर्मी और हादसों के बीच खंभों पर चढ़कर जनता को रोशनी देते रहे, आज वही कर्मचारी सिस्टम की नजर में बोझ बन गए हैं। कई ऐसे कर्मी, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान अपने हाथ-पैर तक गंवाए, उन्हें भी बेरहमी से बाहर कर दिया गया।

यदि कॉरपोरेशन के पास मानवबल की कोई कमी नहीं है, तो फिर प्रदेश के लाखों उपभोक्ता घंटों फॉल्ट और बिजली कटौती से क्यों जूझ रहे हैं? यदि सब कुछ सामान्य है, तो फील्ड में काम करने वाले कर्मचारी लगातार अतिरिक्त कार्यभार और संसाधनों की कमी की शिकायत क्यों कर रहे हैं?

सबसे बड़ा सवाल पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन से है। क्या 25 हजार संविदा कर्मियों को हटाने से पहले किसी ने यह आकलन किया था कि इसका असर बिजली व्यवस्था पर क्या पड़ेगा? या फिर पूरा ध्यान केवल खर्च घटाने और निजीकरण के लिए रास्ता साफ करने पर था?

अब ऊर्जा मंत्री के सामने भी परीक्षा की घड़ी है। यदि उनके स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हटाए गए हजारों संविदा कर्मियों की बहाली नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि विभाग में आदेश मंत्री के नहीं, बल्कि कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और सलाहकारों के चलते हैं।

यूपीपीसीएल मीडिया का मानना है कि जब बिजली व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 25 हजार संविदा कर्मियों को एक झटके में किनारे किया जा सकता है, तो फिर "मानव संसाधन सुधार" और "निजीकरण" के नाम पर आगे कौन निशाने पर होगा?

क्या यह बिजली व्यवस्था को मजबूत करने की नीति है या कर्मचारियों को हटाकर निजी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाने की तैयारी?

प्रदेश की जनता जवाब चाहती है, कर्मचारी न्याय चाहते हैं और अब नजरें इस बात पर हैं कि ऊर्जा मंत्री का आदेश लागू होता है या फिर फाइलों में दफन होकर रह जाता है।


















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03/06/2026

UPPCL MEDIA EXCLUSIVE

कर्नलगंज बिजली विभाग में ‘टेंट विवाद’ या प्रशासनिक अहंकार की लड़ाई?

गोंडा के कर्नलगंज विद्युत वितरण खंड में एक मामूली टेंट व्यवस्था को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हुआ कि मामला सीधे मुख्य अभियंता तक पहुंच गया। आरोप है कि कैंप में टेंट न लगने से नाराज़ कार्यकारी अभियंता (ExEn) ने बड़े बाबू को फोन पर जमकर खरी-खोटी सुनाई, हड़काया और कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। पीड़ित कर्मचारी ने इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों से करते हुए न्याय न मिलने पर आत्मदाह तक की चेतावनी दे डाली। मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई है, जो तीन दिन में अपनी रिपोर्ट सौंपने वाली बताई जा रही है।

"UPPCL MEDIA" के अहम सवाल

👉🏽 क्या बिजली विभाग में कर्मचारियों का सम्मान अब अधिकारियों के मूड पर निर्भर करेगा?

👉🏽 क्या टेंट न लगने जैसी व्यवस्था संबंधी कमी पर किसी कर्मचारी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना उचित है?

👉🏽 यदि आरोप सही हैं तो विभागीय अनुशासन का पालन कौन कराएगा?

👉🏽 जांच टीम सिर्फ औपचारिकता निभाएगी या जिम्मेदारी तय होगी?

मामला सिर्फ टेंट का नहीं, कार्यसंस्कृति का है

यदि एक बड़े बाबू को कथित रूप से धमकाया और अपमानित किया जा सकता है, तो आम कर्मचारी किस माहौल में काम कर रहे होंगे? विभागीय गरिमा और मानव सम्मान दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारी संगठनों और विभागीय अधिकारियों की निगाहें अब जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।

UPPCL MEDIA की अहम मांग

👉🏽 जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
👉🏽 यदि आरोप सिद्ध हों तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
👉🏽 कर्मचारियों के सम्मान और सुरक्षा के लिए स्पष्ट आचार संहिता लागू हो।
👉🏽 शिकायतकर्ता को प्रताड़ना से संरक्षण दिया जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल — क्या जांच से सच बाहर आएगा या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?

UPPCL MEDIA इस प्रकरण की हर परत पर नजर बनाए हुए है।





















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बांदा में बिजली व्यवस्था ध्वस्त! तिंदवारी के जसईपुर गांव में हफ्ते भर से अंधेरा, जनता त्राहिमामभीषण गर्मी में ग्रामीणों ...
02/06/2026

बांदा में बिजली व्यवस्था ध्वस्त! तिंदवारी के जसईपुर गांव में हफ्ते भर से अंधेरा, जनता त्राहिमाम

भीषण गर्मी में ग्रामीणों का सब्र टूटा, तिंदवारी पावर हाउस और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल

बांदा। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के निर्बाध बिजली आपूर्ति के दावों की हकीकत बांदा जनपद के तिंदवारी क्षेत्र के ग्राम जसईपुर में देखने को मिल रही है। ग्रामीणों के अनुसार पूरे गांव की बिजली आपूर्ति पिछले लगभग एक सप्ताह से ठप पड़ी है, जिससे हजारों लोग भीषण गर्मी में भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

गांव में पंखे, कूलर और पानी की व्यवस्थाएं प्रभावित हो चुकी हैं। दिन की तपती गर्मी और रात की उमस ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को हो रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद विभाग की ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि तिंदवारी पावर हाउस के अंतर्गत कार्यरत अवर अभियंता मोहित यादव के कार्यकाल में समस्याओं के समाधान के बजाय मनमाने ढंग से काम कराया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जिसके कारण बिजली संकट लगातार बना हुआ है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी गांव की विद्युत आपूर्ति लगातार एक सप्ताह तक बाधित रहती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही आखिर क्यों तय नहीं होती? करोड़ों रुपये के बजट, आधुनिक उपकरणों और तमाम दावों के बावजूद जसईपुर के लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों ने उच्च अधिकारियों से मांग की है कि मामले की तत्काल जांच कराई जाए, बिजली आपूर्ति बहाल की जाए और यदि लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। भीषण गर्मी में जनता को अंधेरे के हवाले छोड़ना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सवाल यह है कि आखिर जसईपुर की जनता को राहत कब मिलेगी और हफ्ते भर से ठप पड़ी बिजली व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है?🔥

#हिन्दीन्यूज़

जांच या लीपापोती?शिकायतकर्ता को जानकारी नहीं, भ्रष्ट तंत्र को संरक्षण क्यों?गोमती नगर जोन के मुख्य अभियंता सुशील गर्ग द्...
01/06/2026

जांच या लीपापोती?

शिकायतकर्ता को जानकारी नहीं, भ्रष्ट तंत्र को संरक्षण क्यों?

गोमती नगर जोन के मुख्य अभियंता सुशील गर्ग द्वारा दिए गए बयान ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्य अभियंता महोदय का कहना है कि “हमारा काम सिर्फ जांच करके रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज देना है, यदि शिकायतकर्ता को कुछ जानना है तो वह उच्च अधिकारियों से संपर्क करे।”

अब सवाल यह है कि आखिर वह “उच्च अधिकारी” कौन है?
निदेशक? कौन सा निदेशक? प्रबंध निदेशक? चेयरमैन?
क्या एक आम उपभोक्ता, जिसने विभागीय भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत की, वह हर टेबल पर घूमता रहे?
क्या शिकायतकर्ता को यह जानने का अधिकार नहीं कि उसकी शिकायत पर क्या जांच हुई, क्या तथ्य सामने आए और क्या कार्रवाई हुई?

यह रवैया केवल गैर-जिम्मेदाराना नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और पारदर्शिता की भावना का खुला अपमान है।

आज स्थिति यह हो चुकी है कि शिकायतकर्ता महीनों तक अपनी शिकायत की स्थिति जानने के लिए भटकता रहता है, जबकि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत की जाती है, वे उसी दबंगई और संरक्षण के साथ उपभोक्ताओं का शोषण करते रहते हैं।
मुख्य अभियंता कार्यालय की भूमिका कई मामलों में “निष्पक्ष जांच एजेंसी” से ज्यादा “अपने अधीनस्थों को बचाने वाली ढाल” जैसी दिखाई देती है।

सबसे बड़ा उदाहरण अवर अभियंता वरुण पटेल का मामला है।
अवैध फोन लगाने और लाइन शिफ्टिंग के आरोप में बिना जांच रिपोर्ट आए, बिना स्पष्टीकरण लिए, बिना पक्ष सुने सीधे निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई कर दी जाती है।
जबकि दूसरी ओर समान प्रकृति के आरोपों में अभियंता रमेश सिंह को केवल स्थानांतरण देकर मामला शांत कर दिया जाता है।
और मुख्य अभियंता स्वयं कहते हैं कि “स्थानांतरण कोई सजा नहीं होती।”

फिर प्रश्न उठता है —
एक ही तरह के आरोपों में दो अलग-अलग मापदंड क्यों?

यूपीपीसीएल मीडिया द्वारा लगातार फॉलोअप किए जाने के लगभग चार महीने बाद जांच रिपोर्ट सामने आती है और रमेश सिंह को क्लीन चिट दे दी जाती है।
ऐसे अधिकारी को क्लीन चिट, जिसके संबंध और संरक्षण की चर्चा विभाग के अंदर खुलेआम होती रही हो।
जिस अधिकारी के बारे में विभागीय गलियारों में यह तक कहा जाता रहा कि वह वरिष्ठ अधिकारियों के निजी कार्यों तक में सक्रिय रहा।
ऐसी स्थिति में जांच की निष्पक्षता स्वयं कठघरे में खड़ी हो जाती है।

यह पहला मामला नहीं है।
फर्जी अनुबंध के तहत चल रही विजिलेंस टीम की गाड़ी से जुड़ी जांच, जो मुख्यालय स्तर से आदेशित हुई थी, उसका परिणाम भी लीपापोती में दब गया।
ऐसी अनेक जांचें हैं जिनमें मुख्य अभियंता कार्यालय पर तथ्यों को दबाने, दोषियों को बचाने और शिकायतों को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं।

यदि जांच का उद्देश्य सत्य सामने लाना नहीं बल्कि अधीनस्थों को बचाना है, तो फिर ऐसी जांच जनता के साथ धोखा है।

यूपीपीसीएल मीडिया स्पष्ट रूप से यह मानता है कि विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच की उम्मीद लगातार कमजोर होती जा रही है।
इसी कारण अब इन प्रकरणों को विद्युत नियामक आयोग, लोकायुक्त, CBCID तथा STF जैसे स्वतंत्र संस्थानों तक ले जाने का निर्णय लिया गया है।
इस संबंध में शीघ्र ही औपचारिक पत्राचार किया जाएगा और पाठकों को प्रत्येक कार्रवाई से अवगत कराया जाएगा।

मुख्य अभियंता सुशील गर्ग के साथ हुई बातचीत में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
यूपीपीसीएल मीडिया ने पूरे साक्षात्कार को तत्काल सार्वजनिक न कर उसे सुरक्षित साक्ष्य के रूप में संरक्षित रखने का निर्णय लिया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर माननीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।

यह लड़ाई केवल एक शिकायत या एक अधिकारी की नहीं है।
यह लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जहाँ शिकायतकर्ता को जानकारी नहीं मिलती, लेकिन दोषियों को संरक्षण मिलता है।
जहाँ उपभोक्ता लाइन में खड़ा रहता है और भ्रष्ट तंत्र एयरकंडीशन कमरों में “जांच” का नाटक करता है।

यूपीपीसीएल मीडिया इस मुद्दे को अंत तक उठाएगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का है।

#मीडियाइन्वेस्टीगेशन

⚡जय हो “वर्टिकल महाराज” की: बढ़ते लोड, गैस संकट और चरमराती बिजली व्यवस्था के बीच उपभोक्ता पिस रहेऊर्जा विशेषज्ञों के अनु...
29/05/2026

⚡जय हो “वर्टिकल महाराज” की: बढ़ते लोड, गैस संकट और चरमराती बिजली व्यवस्था के बीच उपभोक्ता पिस रहे

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यदि लखनऊ के लगभग 75 प्रतिशत उपभोक्ता नियमित रूप से इंडक्शन चूल्हा और रात में ईवी चार्जिंग का उपयोग करने लगें, तो शहर की दैनिक बिजली खपत में लगभग 65 से 70 लाख यूनिट तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इससे वर्तमान दैनिक खपत 3.5 से 4 करोड़ यूनिट से बढ़कर 4.7 करोड़ यूनिट प्रतिदिन तक पहुंच सकती है।

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28/05/2026

⚡ सीतापुर में बड़ा हादसा — करंट लगने से प्राइवेट बिजली कर्मी की मौत ⚡

जनपद सीतापुर में बिजली कार्य के दौरान करंट लगने से एक प्राइवेट कर्मी की दर्दनाक मौत हो गई। घटना के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने खैराबाद मार्ग पर जाम लगा दिया।

ग्रामीणों का कहना है कि जब तक जिलाधिकारी मौके पर नहीं पहुंचेंगे, तब तक रास्ता खाली नहीं किया जाएगा। मौके पर भारी भीड़ जमा है और क्षेत्र में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है।

⚠️ लगातार हो रही बिजली कर्मियों की मौतों ने सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर कब तक बिजली कर्मी जान जोखिम में डालकर काम करते रहेंगे?

#सीतापुर #बिजली_कर्मी #करंट_हादसा #उत्तरप्रदेश

28/05/2026

⚡बिजली चोरी, बकाया और अभियंताओं पर हमले ने खोली सिस्टम की पोल

जहां आम उपभोक्ताओं का कनेक्शन ₹3000-₹5000 बकाया पर काट दिया जाता है, वहीं लाखों रुपये बकाया होने के बावजूद यह कनेक्शन आखिर कैसे चलता रहा? न समय पर कनेक्शन कटा, न फोर्स पीडी हुई और न ही बिजली चोरी रोकने की गंभीर कार्रवाई दिखाई दी। मुख्य अभियंता बीपी सिंह का “3 लाख उपभोक्ता हैं, किस-किस पर नजर रखें” वाला बयान विभागीय लापरवाही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सबसे दुखद यह कि अभियंताओं से मारपीट के बाद भी अधिकारी मौके पर पहुंचना जरूरी नहीं समझ सके।

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28/05/2026

⚡ बिजली चोरी रोकने गई टीम पर हमला, लखनऊ में लेसा कर्मियों को पीटा — अभियंता संगठनों में उबाल

अभियंता संगठनों ने सवाल उठाया है कि यदि अपने ही कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो फिर फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों का मनोबल कैसे बना रहेगा? कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि “अगर प्रबंधन सच में अभिभावक होता, तो अपने कर्मचारियों पर हमले पर इतनी खामोशी नहीं रहती।”

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# ⚡ बिजली चोरी रोकने गई टीम पर हमला, लखनऊ में लेसा कर्मियों को पीटा — अभियंता संगठनों में उबाल ⚡

भीषण गर्मी के बीच राजधानी लखनऊ में निर्बाध बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए चलाए जा रहे बिजली चोरी विरोधी अभियान के दौरान चौपटिया विद्युत उपकेंद्र के तंबाकू मंडी क्षेत्र में बड़ा बवाल हो गया। मध्यांचल डिस्कॉम की रेड टीम ने पीक ऑवर्स में सघन चेकिंग अभियान चलाकर मौके पर 05 उपभोक्ताओं को बिजली चोरी करते हुए पकड़ा, जिनके खिलाफ विद्युत अधिनियम की धारा 135 के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया।

लेकिन कार्रवाई के दौरान हालात तब बिगड़ गए जब बिजली चोरी में संलिप्त लोगों ने इकट्ठा होकर पूरी टीम पर हमला बोल दिया। इस हमले में एक लाइनमैन गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि मौके पर मौजूद सहायक अभियंता, जूनियर इंजीनियर और अन्य कर्मचारियों के साथ अभद्रता, गाली-गलौज और मारपीट की गई।

घटना के बाद देर रात थाना सहादतगंज में मेडिकल कराकर सरकारी कार्य में बाधा, मारपीट, जानलेवा हमला, आपराधिक धमकी और दंगा भड़काने समेत 07 गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है।

सूत्रों के अनुसार, मध्य लेसा ज़ोन की रेड टीम और वितरण खंड की संयुक्त टीम चौपतिया बिजलीघर क्षेत्र में रात्रिकालीन विद्युत चोरी रोकथाम अभियान चला रही थी। इसी दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने टीम को घेरकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की।

घटना के बाद अभियंता संघ और जूनियर इंजीनियर संघ में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि लगातार बढ़ते हमलों और फील्ड कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर पावर कॉरपोरेशन और मध्यांचल डिस्कॉम का शीर्ष प्रबंधन मौन बना हुआ है।

कर्मचारियों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि जब विभागीय कर्मचारी जान जोखिम में डालकर बिजली चोरी रोकने और जनता को निर्बाध बिजली देने के लिए मैदान में उतर रहे हैं, तब उनके ऊपर हमले हो रहे हैं और शीर्ष अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।

अभियंता संगठनों ने सवाल उठाया है कि यदि अपने ही कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो फिर फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों का मनोबल कैसे बना रहेगा? कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि “अगर प्रबंधन सच में अभिभावक होता, तो अपने कर्मचारियों पर हमले पर इतनी खामोशी नहीं रहती।”

28/05/2026

⚡ ड्यूटी पर तैनात अवर अभियंता के साथ मारपीट, बिजली कर्मियों में आक्रोश ⚡

आज सुबह जनपद शामली में अवर अभियंता प्रेम सिंह द्वारा परिवर्तक की मरम्मत कार्य कराया जा रहा था। इसी दौरान कुछ ग्रामीणों ने उन्हें बंधक बनाकर मारपीट की।
घटना की सूचना मिलते ही प्रबंध निदेशक पश्चिमांचल ने जिलाधिकारी शामली से दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी को लेकर वार्ता की।
मुख्य अभियंता मुजफ्फरनगर को भी पूरे मामले से अवगत कराया गया, जिन्होंने जिला प्रशासन से संपर्क कर विभागीय अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर आवश्यक सहयोग देने के निर्देश दिए।

बिजली कर्मियों पर लगातार बढ़ते हमले गंभीर चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। फील्ड में कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अब प्रशासन और प्रबंधन दोनों की बड़ी जिम्मेदारी है।
















#विद्युत_दुर्घटना






 # ⚡ मौत बनती बिजली ड्यूटी! # # 31 दिनों में 26 हादसे, 15 आउटसोर्स कर्मचारियों की मौत — आखिर जिम्मेदार कौन?उत्तर प्रदेश ...
28/05/2026

# ⚡ मौत बनती बिजली ड्यूटी!

# # 31 दिनों में 26 हादसे, 15 आउटसोर्स कर्मचारियों की मौत — आखिर जिम्मेदार कौन?

उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट और लापरवाही के दौर से गुजर रही है। भीषण गर्मी और बढ़ती बिजली मांग के बीच बिजली विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी अब जानलेवा साबित हो रही है। पिछले मात्र 31 दिनों में 26 बिजली आउटसोर्स कर्मचारियों के साथ हादसे हुए, जिनमें 15 कर्मचारियों की दर्दनाक मौत हो गई जबकि 11 कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हैं।

बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन प्रबंधन द्वारा अपने ही आदेश दिनांक 15 मई 2017 का उल्लंघन करते हुए लगभग 25 हजार आउटसोर्स कर्मचारियों को कार्य से हटा दिया गया। इसके बाद विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी पैदा हो गई, जिसका सीधा असर फील्ड में कार्यरत कर्मचारियों पर पड़ रहा है।

नियमों के अनुसार 11 केवी आउटगोइंग फीडरों पर एक गैंग में 1 लाइनमैन, 1 पेट्रोलमैन/कुशल श्रमिक और 2 अकुशल श्रमिक तैनात होने चाहिए, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई स्थानों पर केवल एक कर्मचारी के भरोसे पूरा फीडर चलाया जा रहा है। इतना ही नहीं, अकुशल कर्मचारियों से एचटी/एलटी लाइनों, ट्रांसफार्मरों और ब्रेकरों पर खतरनाक कार्य कराया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पावर कार्पोरेशन प्रबंधन स्वयं अपने आदेश दिनांक 28 अगस्त 2025 में स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी स्थिति में अकुशल कर्मचारियों से बिजली लाइनों पर कार्य न कराया जाए, फिर भी अधिकारियों द्वारा दबाव बनाकर उनसे जान जोखिम में डालने वाला कार्य क्यों कराया जा रहा है?

सूत्रों के अनुसार कर्मचारियों की कमी के कारण अवर अभियंता, उपखंड अधिकारी और अधिशासी अभियंता लगातार दबाव बनाकर कम स्टाफ में अधिक कार्य करा रहे हैं। यही वजह है कि दुर्घटनाओं और मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर, हादसों में जान गंवाने वाले कर्मचारियों के परिजनों को आउटसोर्स कंपनियां उचित क्षतिपूर्ति देने में भी आनाकानी कर रही हैं।

बिजली कर्मचारियों की कमी का असर अब केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा। प्रदेशभर में उपभोक्ताओं को बिजली संकट, फॉल्ट, ट्रिपिंग और घंटों कटौती का सामना करना पड़ रहा है। विभाग को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है और सरकार की छवि भी प्रभावित हो रही है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
क्या बिजली व्यवस्था को बचाने वाले कर्मचारियों की जान इतनी सस्ती हो चुकी है कि नियमों को ताक पर रखकर उन्हें मौत के मुंह में धकेला जाता रहेगा?

यूपीपीसीएल मीडिया

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