03/06/2026
25 हजार संविदा कर्मियों की ‘बलि’ पर खड़ी की जा रही है निजीकरण की इमारत?
ऊर्जा मंत्री के आदेश बनाम कॉरपोरेशन की मनमानी — आखिर जनता किस पर भरोसा करे?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था में इन दिनों एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने हजारों परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली है और अब पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि बिना कारण किसी भी कर्मचारी को सेवा से नहीं हटाया जाएगा, वहीं दूसरी तरफ पिछले ढाई वर्षों में लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सवाल यह है कि आखिर मंत्री का आदेश बड़ा है या कॉरपोरेशन की मनमानी?
संघर्ष समिति का आरोप है कि यह कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि निजीकरण की जमीन तैयार करने का सुनियोजित अभियान है। पहले कर्मचारियों की संख्या घटाओ, फिर व्यवस्था को कमजोर बताओ और उसके बाद निजी हाथों में सौंपने की दलील तैयार कर लो। यदि ऐसा नहीं है तो फिर 2017 में निर्धारित मानवबल मानकों को अचानक कूड़ेदान में क्यों फेंक दिया गया?
जिस व्यवस्था में शहरी उपकेंद्र पर 36 और ग्रामीण उपकेंद्र पर 20 संविदा कर्मी जरूरी माने गए थे, उसी व्यवस्था में आज आधे से भी कम कर्मचारी रखे जा रहे हैं। कुछ जगहों पर तो संख्या इतनी घटा दी गई है कि ऐसा लगता है जैसे बिजली व्यवस्था नहीं, बल्कि किसी दुकान का स्टाफ कम किया जा रहा हो।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिन कर्मचारियों ने अपनी जवानी बिजली व्यवस्था को दी, जो तूफान, बारिश, गर्मी और हादसों के बीच खंभों पर चढ़कर जनता को रोशनी देते रहे, आज वही कर्मचारी सिस्टम की नजर में बोझ बन गए हैं। कई ऐसे कर्मी, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान अपने हाथ-पैर तक गंवाए, उन्हें भी बेरहमी से बाहर कर दिया गया।
यदि कॉरपोरेशन के पास मानवबल की कोई कमी नहीं है, तो फिर प्रदेश के लाखों उपभोक्ता घंटों फॉल्ट और बिजली कटौती से क्यों जूझ रहे हैं? यदि सब कुछ सामान्य है, तो फील्ड में काम करने वाले कर्मचारी लगातार अतिरिक्त कार्यभार और संसाधनों की कमी की शिकायत क्यों कर रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल पावर कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन से है। क्या 25 हजार संविदा कर्मियों को हटाने से पहले किसी ने यह आकलन किया था कि इसका असर बिजली व्यवस्था पर क्या पड़ेगा? या फिर पूरा ध्यान केवल खर्च घटाने और निजीकरण के लिए रास्ता साफ करने पर था?
अब ऊर्जा मंत्री के सामने भी परीक्षा की घड़ी है। यदि उनके स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हटाए गए हजारों संविदा कर्मियों की बहाली नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि विभाग में आदेश मंत्री के नहीं, बल्कि कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और सलाहकारों के चलते हैं।
यूपीपीसीएल मीडिया का मानना है कि जब बिजली व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 25 हजार संविदा कर्मियों को एक झटके में किनारे किया जा सकता है, तो फिर "मानव संसाधन सुधार" और "निजीकरण" के नाम पर आगे कौन निशाने पर होगा?
क्या यह बिजली व्यवस्था को मजबूत करने की नीति है या कर्मचारियों को हटाकर निजी कंपनियों के लिए लाल कालीन बिछाने की तैयारी?
प्रदेश की जनता जवाब चाहती है, कर्मचारी न्याय चाहते हैं और अब नजरें इस बात पर हैं कि ऊर्जा मंत्री का आदेश लागू होता है या फिर फाइलों में दफन होकर रह जाता है।
#जनहित_सर्वोपरि
#भ्रष्टाचार_पर_प्रहार
#सवाल_तो_बनता_है
#जवाब_दो_यूपीपीएल
#बिजली_विभाग
#यूपीपीसीएल_मीडिया
#सिस्टम_कटघरे_में
ी_पड़ताल
#जनता_पूछ_रही_है
#भ्रष्टाचार_बेनकाब
#यूपीपीसीएल_खुलासा
#ऊर्जा_विभाग_जवाब_दे
#उत्तरप्रदेश_बिजली