23/05/2026
परमात्मा ने मनुष्य के सारे शत्रु और सारे मित्र तत्व रूप में उसके अंदर ही स्थापित कर दिया है।
मित्र तत्व जो होते हैं वह आपको सदा सत मार्ग की ओर जाने की प्रेरणा देते हैं और जो शत्रु तत्व है वह हमेशा असत मार्ग की ओर जाने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।
मनुष्य यदि मनन करें तो अंतर मन से उठने वाली प्रेरणा के भाव को समझ सकता है यह मुझे किस मार्ग पर जाने की प्रेरणा मिल रही है,, यह मित्रवत है या शत्रुवत है ????
और अपना भला वह स्वयं जानता है कि किस मार्ग पर जाने से मुझे हानि होगी या लाभ होगा ????
अध्यात्म कहता है आपको अपने अंदर छुपे हुए शत्रुओं से अधिक सावधान रहना है। बाहर के दुश्मन तो दिखाई भी देते हैं और समझ में भी आ जाते हैं, परंतु अपने अंदर के शत्रु कभी दिखाई नहीं पड़ते और ना ही इतनी आसानी से समझ में आते हैं,, इसलिए हर मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर के शत्रुओं से ज्यादा सावधान रहे।
जीव को ईश्वर से मिलने के लिए जितनी चाहिए,, सारी सामग्री मनुष्य के अंदर ही परमात्मा ने स्थापित कर दिया है और जीव को ईश्वर तक न पहुंचने देने के लिए ईश्वर की माया ने पूरी व्यवस्था किया है। ईश्वर स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं उनकी बनाई हुई व्यवस्था संपूर्ण ब्रह्मांड में हर जीव में अपना कार्य निरंतर करती रहती है। यह ऐसा रहस्य है जिन्होंने समझा उन्हें बच्चों के खेल के समान ही लगता है और जिन्होंने नहीं समझा उनके लिए स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने जितना कठिन कार्य लगता है,,इसलिए ईश्वर को समझ पाना संसार का सबसे कठिन कार्य माना जाता है और जिन्होंने समझ लिया उनके लिए संसार में इससे आसान कोई कार्य हो ही नहीं सकता!!
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