19/08/2026
सरकार ने दावा किया था कि पेट्रोल सस्ता होगा। जनता की जेब बचेगी। विदेशी तेल का खर्चा घटेगा। इसी उम्मीद में गन्ने और मक्के से इथेनॉल बनाने का खेल शुरू हुआ।
लेकिन नतीजा क्या निकला? ज़रा ज़मीन पर झांक कर देखिए।
वादा था कि इथेनॉल मिलने से पेट्रोल के दाम गिरेंगे। हुआ इसके उलट। पेट्रोल के दाम कम होने का नाम नहीं ले रहे। जनता आज भी महंगी दरों पर तेल खरीदने को मजबूर है। जेब खाली हो रही है, और सरकार मस्त है।
सस्ते तेल के झूठे सपने के चक्कर में गाड़ियों का बेड़ा गर्क हो रहा है। गाड़ियां जल्दी खराब हो रही हैं। इंजन में खराबी आ रही है। माइलेज लगातार घट रहा है। यानी पेट्रोल पंप पर पैसे भी पूरे दो, और गाड़ी का एवरेज भी कम पाओ। ये कैसी राहत है?
खेती का रुख चीनी से हटाकर इथेनॉल की तरफ मोड़ दिया गया। नतीजा सामने है। बाजार में चीनी की किल्लत शुरू हो गई है। आम आदमी की चाय की मिठास गायब हो रही है। चीनी के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं।
जब एक समस्या को सुलझाने के चक्कर में दो नई समस्याएं खड़ी कर दी जाएं, तो उसे तरक्की नहीं कहते। इसे कुप्रबंधन कहते हैं।
ये सरकार की इकॉनमी है। कागजों पर सब शानदार, लेकिन असल जिंदगी में सिर्फ नाकामी और महंगाई। जनता त्रस्त है, और सिस्टम बेपरवाह।