01/02/2026
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#रैदास_पर_ओशो
"रैदास ने वही कहा है जो बुद्ध ने कहा है। बुद्ध की भाषा बहुत मंजी हुई है, शब्द नपे-तुले हैं, लेकिन बुद्ध को भी तर्क का तूफान सहना पड़ा और बुद्ध की भी जड़े उखड़ गई भारत से।
रविदास ने बुद्ध की बातें ही कही है पुनः लेकिन भाषा बदल दी। नया रंग डाला, पात्र वही था, बात वही थी अत: रविदास को नहीं उखाड़ा जा सका।
यह जानकर तुम हैरान होओगे कि चमार मूलतः बौद्ध हैं, जब भारत से बौद्ध धर्म उखाड़ डाला गया और बौद्ध भिक्षुओं को जिंदा जलाया गया और बौद्ध दार्शनिकों को खदेड़ कर देश के बाहर कर दिया गया तो एक लिहाज से तो यह अच्छा हुआ क्योंकि इसी कारण पूरा एशिया बौद्ध हुआ। कभी-कभी बुरे में भी अच्छा छिपा होता है।
जैन नहीं फैल सके क्योंकि जैनों ने समझौते कर लिए। बच गए, लेकिन क्या बचना! आज कुल 30-35 लाख की संख्या है 5000 साल के इतिहास में 30-35 लाख की संख्या कोई संख्या होती है। किसी तरह अपने को बचा लिया मगर बचाने में सब गंवा दिया।
बौद्धों ने समझौता नहीं किया, उखड़ गए, टूट गए, मगर झुके नहीं। उसका फायदा हुआ, सारा एशिया बौद्ध हो गया क्योंकि जहां भी बौद्ध दार्शनिक और मनीषी गए वहीं उनकी प्रकाश किरणे फैली, वहीं उनका रस बहा, वहीं लोग तृप्त हुए। चीन कोरिया....दूर-दूर तक बौद्ध धर्म फैलता गया। इसका श्रेय हिंदू पंडितो को है। जो भाग सकते थे भाग गए। भागने के लिए सुविधा चाहिए, धन चाहिए जो नहीं भाग सकते थे-इतने दीन थे, इतने दरिद्र थे-वे हिंदू जमात में सम्मिलित हो गए। लेकिन हिंदू जमात में अगर सम्मिलित होना हो तो सिर्फ शुद्रों में सम्मिलित हो सकते हो। क्योंकि ब्राह्मण तो जन्म से ब्राह्मण होता है। क्षत्रिय और वैश्य भी। सिर्फ एक ही जगह रह जाती है शुद्र, अछूत। वह असल में हिंदू धर्म के बाहर ही है। हो जाओ शूद्र अगर बचना है।
तो जो बौद्ध बच गए और नहीं भाग सके, मजबूरी में सम्मिलित हुए हिंदू धर्म में, वे ही बौद्ध चमार हैं। कारण-कभी किसी ने सोचा भी ना होगा बुद्ध के समय में कि वह कारण इतना बड़ा परिणाम लाएगा। जिंदगी बड़ी रहस्यपूर्ण है। बुद्ध ने कहा मांसाहार पाप है लेकिन अगर कोई जानवर मर ही गया हो तो उसके मांसाहार में क्या पाप हो सकता है। चमार भारत में अकेली जाती है जो मरे हुए जानवर का मांस खाती है और यही प्रमाण है उनका कि वे बौद्ध थे कभी। दूसरे प्रमाण भी है लेकिन यह प्रमाण बहुत बड़ा प्रमाण है। इसी आधार पर डॉ अंबेडकर ने यह निर्णय किया कि चमारों को कम से कम और संभव हो तो सभी शूद्रों को पुनः बौद्ध हो जाना चाहिए क्योंकि मूलत: हम बौद्ध थे।
रैदास के अंतस्तल में बुद्ध गूंज रहे हैं, वही आग। लेकिन रविदास ने उस आग को आग नहीं बऩने दिया, रोशनी बना लिया। आग जला भी सकती है और प्रकाश भी दे सकती है। बुद्ध के वचन अंगारो जैसे हैं। बडा साहस चाहिए उन्हें पचाने का। रैदास के वचन फूल जैसे हैं। पचा जाओगे तब पता चलेगा कि आग लगा गए।
आज दुनिया में अगर भारत की कोई प्रतिष्ठा है तो उस प्रतिष्ठा में 50% हाथ तो बुद्ध का है। अगर लोग भारत को बुद्ध के कारण याद करते हैं। सारा एशिया भारत कोे सम्मान से देखता है, भारत को तीर्थ मानता है तो बुद्ध के कारण। जैसे सारे मुसलमान मक्का की यात्रा करते हैं, ऐसे ही सारे बौद्धों के मन में, करोड़ों करोड़ों बौद्धों के मन में एक ही अभीप्सा होती है कि कभी बुद्धगया, कभी भारत की भूमि पर पैर पड़ जाएं। भारत ने इतना बड़ा दूसरा बेटा पैदा नहीं किया जितना बुद्ध।
–ओशो, पुस्तक-मन ही पूजा मन ही धूप (रैदास वाणी)"
मीराबाई लिखती है: “मोहे गुरु मिल्या रैदासा!” मेवाड़ राजघराने की महारानी जो कि मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा के पुत्र महाराणा कुंवर भोजराज की पत्नी महारानी मीराबाई ने सन्त रविदास जी को अपना गुरु बनाया। हालांकि उनकी यह बगावत, संघर्ष और फिर ज़हर देना, मृत्यु तक के किस्से आज भी सुने जा सकते हैं लेकिन सबसे विचित्र बात थी संत रैदास को गुरु चुनना। मेवाड़ की रानियां ही नहीं रैदास के तेज से तो ब्राह्मण हरिराम व्यास, रज्जब मुसलमान, गुरु रामदास और गुरु अर्जन देव जैसे सिख गुरु तक सबने एक स्वर में रैदास को अपना सगा, अपना गुरु और अपने आराध्य तक की श्रेणी में रखा था लेकिन वर्चस्ववादीयों ने उन्हें बहुत ही सीमित रखा।
रैदास/रविदास/रोहदास/रोहिदास नाम अनेक हैं उनके, वे चर्मकार वर्ग में जन्मे बहुत ही तेजस्वी गुरु हुए हैं! कहते हैं कि उनका तेज़ रवि (सूर्य) सामान ही था और इसलिए उनका नाम ही पड़ गया रविदास! तेज़ और ज्ञान ऐसा कि उनपर जब संस्कृत सीखने पर मनाही लगा दी तो उन्होंने एक नयी भाषा और लिपि ही बना डाली: गुरुमुखी! श्री गुरुग्रंथ साहिब में रविदास की वाणी संकलित है और पंजाबी भाषा गुरुमुखी लिपि की भाषा है किन्तु सिखों में भी जातिवाद के चलते उनके साथ पूरा न्याय न हो पाया और रविदासिया पंथ सरकमफ्रेंस पा चला गया! ज़िक्र मिलता है कि वे प्रकाण्ड ज्ञानी तो थे ही और रूपरंग के भी धनी थे, लम्बाई कोई सात हाथ, गोरा रंग, ओजस्वी और अत्यंत प्रभावी छवि।
मध्यकालीन भारत के संतों में एक खास बात यह देखी जाती है कि उन्होंने स्वयं श्रम करते हुए अपना गुजारा किया। लगभग सभी संतों ने अपना पेशा आजीवन जारी रखा। कबीर कपड़ा बुनते रहे, संत सैन ने नाई का पेशा बरकरार रखा, नामदेव ने कपड़े पर छपाई जारी रखी, दादू दयाल ने रुई धुनने का काम नहीं छोड़ा और गुरु नानक ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष खेती करते हुए ही बिताए लेकिन इन सबमें रैदास का पेशा एकदम जुदा था। वे मोची थे। जूते बनाते थे और उसकी मरम्मत भी करते थे। समाज की भाषा में उनकी जाति कथित ‘चमार’ की थी पर कर्मप्रधान वर्णव्यवस्था की बात करने वालों ने उनके कर्म को नीच माना तथा उन्हें हाशिये पर रखा।
तुलसीदास से बहुत पहले जन्में रैदास ने ज्ञानी शुद्र को पूजनीय कहा और दुर्गुण ब्राह्मण को अपूजनीय। "रैदास बांभन मत पूजिए जो होवे गुन हीन। पूजिए चरन चंडाल के जो हो ज्ञान प्रवीन।" वहीं तुलसीदास ने इसी को उलट करके कहा कि शुद्र कभी पूजनीय नहीं हो सकता बशर्ते वह कितना ही ज्ञानी व गुणवान क्यों न हों जबकि ब्राह्मण दुर्गुणी होकर भी पूजनीय है। "पूजिए विप्र शील गुण हीना, शूद्र ना गुण गण ग्यान प्रवीणा।" और हुआ भी वही तुलसीदास पूजनीय बने और रैदास या कबीर वन्दनीय भी न रह सके।
लोगों को पहले यह अपनी सीमित वैचारिक पहचान समाप्त करनी होगी तथा उन्हें बुद्ध, रैदास, कबीर, पलटू राम, दादू दयाल, नानक, बिरसा, गाडगे, फुले, पेरियार, अंबेडकर, भगतसिंह, उधमसिंह आदि के महत्व को बिना जाति, धर्म के समझना होगा। तुलसीदास और रैदास या समकालीन तुलसीदास व कबीरदास जैसे संतों के मध्य की प्रासंगिकता को समझना होगा। तर्क व कुतर्क के अंतर को समझकर तर्कसंगत विचार को बेझिझक स्वीकार करना होगा तभी समाज में कुछ वैचारिक क्रांति का प्रसार होगा। इन्हीं विचारों के साथ संतों के संत यानि संत शिरोमणि रैदास जयंती की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
ी_विशाल