20/07/2026
ये जो लाल घेरे में देख रहे हो ना!! यहां भी कर दी घाल घुसेड़। सच क्या है सुनो।।
पुरोहिताई करने वाले वर्ग और नाथ योगियों के मध्य एक अघोषित वैमनष्यता रही है ये तथ्य अनेक घटनाओं से सिद्ध व प्रमाणित है। हिंगवा मठ में सैंकड़ों वर्षों से रखा ये रथ भी ऐसी ही घटना का मौन साक्षी है। हुआ ये था कि राज महल में मंगल कार्य के लिये आमंत्रित संत महंतों को उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप आने—जाने के लिये सवारी की व्यवस्था की जाती थी। हिंगुवा मठ के तत्कालीन सिद्ध योगी महंत किशननाथजी महाराज को भी ऐसे ही कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाने पर रथ भेजा गया। किंतु वापसी के समय वे रथ में बैठ गये तब पुरोहितों ने उन्हें लज्जित करने के लिये कहा कि रथों में जुतने वाले सारे बळद गधे, खच्चर, घोड़े, बैल, चुक गये।
सिद्ध योगी महंत किशननाथजी समझ गये किंतु हंसते हुए बोले कोई बात नहीं, बिना बळद के ही जाएंगे। रथ को हाथ से इशारा करते हुए कहा 'चलो' और रथ चल पड़ा। वही रथ हिंगुवा मठ में आज भी विद्यमान है।
अब संशयवादी कहेंगे ... ऐसा कैसे हो सकता है? और कोई दस्तावेजी प्रमाण?
ऐसा कैसे हो सकता है का उत्तर केवल इतना सा है कि श्रीमद्भ्गवद्गगीता में कहा है कि ''प्रकृतिं स्वांधिष्ठाय संभाव्यामात्ममायया'' अर्थात प्रकृति को अपने अधीन कर के मैं माया से प्रकट होता हूं। सिद्ध योगी भी पृकृति के अधीन नहीं रह जाते बल्की प्रकृति न केवल उनके अधीन हो जाती है बल्की वे प्रकृति के नियमों को उलट देने में समर्थ होते हैं। परकाया प्रवेश, मुर्दे को जीवित कर देना, टूटे हुए फल को वापस शाखा पे स्थापित कर देना, धूणी के अंगारों को कपड़े की झोली में भरकर चल देना ... ऐसे कितने किस्से नाथयोगियों का इतिहास हर गांव, ढाणी में सुनने को मिल जाते हैं।
इस आधुनिक समय में भी हाल ही दिवंगत हुए लुणियावास जयपुर के संत बालकनाथजी के बारे में ये बताने वाले जीवित हैं कि वे एक ही समय में जयपुर, अलवर और इटली में देखे गये। प्रतिबंधित हथियारों की सूचना का सत्यापन करने के लिये पिताजी साहब के साथ मैं उनके आश्रम में पहुंचा तो जो मैंने देखा वो अविश्सनीय था।
आप सम्मोहन कह सकते हैं लेकिन मेरे एक बेचमेट बाड़मेर निवासी धीरेन्द्र रामावत ने बाड़मेर के किसी सागरनाथजी के बारे में बताया था कि वे एक बार अपनी कुटिया में भक्तों के साथ हथाई करते—करते अचानक तख्त के साइड में हाथ नीचे से किसी चीज को उठाने का उपक्रम ... अरे कठे मर रह्यो है, चाल बाहर आ जा। भक्तों ने देखा उनकी बांह गीली हो गयी थी। पूछने पर उन्होंने कहा कोई खास बात नहीं है। अगले दिन एक व्यक्ति जो जोधपुर गया हुआ था वापस आ कर सागरनाथजी के चरण पकड़ कर रोने लगा। लोगों के पूछने पर उसने बताया कि वह मंड़ोर में नागादड़ी में गिर गया था तब नाथजी ने हाथ पकड़कर निकाला। लोगों के समझ आ गयी थी कि एक दिन पहले सागरनाथजी की बांह कैसे गीली हुई होगी।
दूसरा प्रश्न कि दस्तावेजी प्रमाण?
दस्तावेजी प्रमाण तो ये भी नहीं है कि रणथम्भौर के काला—गोरा भैरव मंदिर में रखी हुई नौबत और डोला अलाउद्दी खिलजी की बेगम का है जिसे उसने नाथजी की 'सेवा' में भेजा था। प्रमाण तो यह भी नहीं है कि आमेर नरेश पृथ्वीराज (1503—1527) और उनकी रानी बालाबाई का एक पुत्र नाथपंथ में दीक्षित हो कर रतननाथ नाम से आसन विजय महल बंध की घाटी जयपुर में समाधीष्ठ है। प्रमाण तो यह भी नहीं है कि महाराजा सवाई मानसिंह को मानसागर के निर्माण के लिये इसी आसन के महंत गंगानाथजी ने सौ बीघा ज़मीन दान में दी। प्रमाण तो यह भी नहीं है कि जयपुर की स्थापना हथरोई गढ़ी में स्थित गोरक्षनाथजी के चौतीसा यंत्र के आधार पर हुई थी और वो चौतीसा यंत्र 1995 में एक बड़ी राजनीतिक हस्ती ने हस्तगत कर लिया।
प्रमाण बहुत सारे नहीं है लेकिन ऐसे रथ, नौबत और डोले डीएनए रूप में तो है। Hukam Singh ...✍️