09/09/2026
सत्ता बदलते ही विकास की दिशा क्यों बदल जाती है?
जनता का सवाल—सरकारें पांच साल के लिए आती-जाती हैं, फिर अधूरे विकास कार्यों और खर्च हुए सरकारी धन का जिम्मेदार कौन?
कार्यालय संवाददाता, पतलीकूहल
लोकतंत्र में सरकारें बदलना सामान्य प्रक्रिया है। जनता अपने मताधिकार से किसी सरकार को सत्ता सौंपती है और पांच वर्ष बाद उसके कामकाज का आकलन कर दोबारा फैसला करती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता परिवर्तन के साथ विकास की प्राथमिकताएं भी इस हद तक बदल जानी चाहिए कि पहले से शुरू किए गए जनहित के कार्य अधर में लटक जाएं? एक सरकार जिस परियोजना को जरूरी मानकर लाखों या करोड़ों रुपये खर्च कर शुरू करती है, सत्ता बदलने के बाद वही परियोजना धीमी पड़ जाए, उसका स्वरूप बदल दिया जाए या काम ही बंद हो जाए तो इसका सीधा नुकसान आखिर किसका होता है?
इसका जवाब साफ है—नुकसान जनता और सरकारी खजाने का होता है।
प्रदेश में अक्सर देखने को मिलता है कि सरकार बदलने के साथ कई विकास योजनाओं की दोबारा समीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं नए संस्थानों को लेकर निर्णय बदलते हैं तो कहीं भवन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पर्यटन या दूसरी आधारभूत परियोजनाओं की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। नई सरकार को योजनाओं की समीक्षा करने का अधिकार है और यदि किसी परियोजना में तकनीकी, वित्तीय या प्रशासनिक कमी है तो उसमें सुधार भी होना चाहिए। लेकिन केवल इसलिए किसी जनहित की योजना को रोकना कि उसे पिछली सरकार ने शुरू किया था, विकास की निरंतरता के लिहाज से उचित नहीं माना जा सकता।
आम आदमी के लिए सड़क, अस्पताल, स्कूल, पुल, पेयजल योजना या कोई सरकारी कार्यालय किसी राजनीतिक दल का नहीं होता। जनता के लिए वह सरकार की व्यवस्था और उसकी अपनी सुविधा होती है। इन परियोजनाओं पर खर्च होने वाला पैसा भी किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन होता है। इसलिए सत्ता परिवर्तन के बाद पहले से स्वीकृत और शुरू हो चुकी उपयोगी परियोजनाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी नई सरकार की भी उतनी ही होनी चाहिए।
सबसे गंभीर स्थिति उन परियोजनाओं में बनती है जिन पर पहले ही बड़ी धनराशि खर्च हो चुकी होती है। जमीन का चयन हो गया, सर्वेक्षण और डीपीआर तैयार हुई, बजट स्वीकृत हुआ, निर्माण शुरू हुआ और उसके बाद सरकार बदलने पर काम रुक गया तो पहले खर्च हुई राशि का लाभ जनता को नहीं मिल पाता। कई बार वर्षों तक अधूरे भवन और दूसरी संरचनाएं खड़ी रहती हैं। समय बीतने के साथ उनकी लागत भी बढ़ती जाती है। जिस परियोजना को एक निश्चित राशि में पूरा किया जा सकता था, वही बाद में संशोधित लागत के कारण सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डालती है।
यही कारण है कि अब विकास को राजनीति से ऊपर रखने की जरूरत महसूस की जा रही है। सरकार किसी भी दल की हो, जनहित में शुरू किए गए कार्यों की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। यदि पिछली सरकार की किसी योजना में वास्तव में खामी है तो उसे तथ्य और तकनीकी आधार पर जनता के सामने रखा जाना चाहिए। योजना बंद करने या उसका स्वरूप बदलने की ठोस वजह भी स्पष्ट होनी चाहिए। इससे व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और लोगों को भी पता चलेगा कि आखिर उनके क्षेत्र का काम क्यों रोका गया या बदला गया।
सवाल यह भी है कि जब किसी परियोजना को मंजूरी देने से पहले विभागीय अधिकारी, विशेषज्ञ और सरकार के स्तर पर पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है तो सत्ता बदलने मात्र से उसकी उपयोगिता कैसे समाप्त हो सकती है? यदि योजना वास्तव में जनहित में थी तो उसे आगे बढ़ना चाहिए और यदि वह गलत थी तो उसे स्वीकृति देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
विकास की असली कसौटी शिलान्यास और उद्घाटन की पट्टिकाएं नहीं, बल्कि जनता को मिलने वाली सुविधा है। किसी कार्य की शुरुआत किस सरकार ने की और उसका उद्घाटन किस सरकार ने किया, यह राजनीतिक चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन आम नागरिक के लिए महत्वपूर्ण यह है कि काम समय पर पूरा हुआ या नहीं।
लोगों का मानना है कि प्रदेश में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सरकार बदलने के बावजूद स्वीकृत और निर्माणाधीन जनहित परियोजनाओं को निर्धारित समय में पूरा करना प्राथमिकता रहे। नई सरकार बेहतर योजना ला सकती है, कमियों को सुधार सकती है और नई प्राथमिकताएं भी तय कर सकती है, लेकिन पहले से खर्च हुए सार्वजनिक धन और अधूरे कार्यों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन विकास की प्रक्रिया निरंतर होनी चाहिए। सरकारें आती-जाती रहेंगी, मगर सड़कें, अस्पताल, स्कूल, पुल और दूसरी सार्वजनिक सुविधाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए होती हैं। इसलिए विकास को सत्ता परिवर्तन की राजनीति से अलग रखकर देखने की जरूरत है। आखिर जनता का सबसे सीधा सवाल यही है—सरकार बदल सकती है, लेकिन जनहित में शुरू हुआ विकास का काम क्यों बदले या रुके?