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14/09/2026
पीएचसी नग्गर को मिली दो नई डेंटल चेयर, अब दांतों के उपचार की सुविधा होगी और बेहतरपीएचसी नग्गर को मिली दो नई डेंटल चेयर, ...
09/09/2026

पीएचसी नग्गर को मिली दो नई डेंटल चेयर, अब दांतों के उपचार की सुविधा होगी और बेहतर
पीएचसी नग्गर को मिली दो नई डेंटल चेयर, अब दांतों के उपचार की सुविधा होगी और बेहतर
विधायक भुवनेश्वर गौड़ ने किया उद्घाटन, करीब सात लाख की दोनों डेंटल चेयर; जर्जर चिकित्सक आवास के पुनर्निर्माण का मामला सरकार के समक्ष उठाने का दिया भरोसा
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) नग्गर में दंत चिकित्सा सेवाओं को और मजबूत करने की दिशा में बुधवार को दो नई डेंटल चेयर की सुविधा जुड़ गई। मनाली विधानसभा क्षेत्र के विधायक भुवनेश्वर गौड़ ने दोनों डेंटल चेयर का विधिवत उद्घाटन किया। आधुनिक डेंटल चेयर उपलब्ध होने से नग्गर सहित आसपास की पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को स्थानीय स्तर पर दांतों के उपचार की बेहतर सुविधा मिल सकेगी। इससे सामान्य दंत उपचार के लिए मरीजों को दूर के स्वास्थ्य संस्थानों का रुख करने की जरूरत भी कम होगी।
पीएचसी नग्गर में स्थापित प्रत्येक डेंटल चेयर की कीमत करीब 3.50 लाख रुपये बताई गई है। इस तरह दोनों डेंटल चेयर की कीमत करीब सात लाख रुपये है। इनमें एक डेंटल चेयर विधायक भुवनेश्वर गौड़ की ओर से उपलब्ध करवाई गई है, जबकि दूसरी डेंटल चेयर प्रदेश सरकार की ओर से स्वास्थ्य केंद्र को प्रदान की गई है।
इस अवसर पर बीएमओ डॉ. करण ने बताया कि पीएचसी में दो नई डेंटल चेयर स्थापित होने से दंत चिकित्सा सेवाओं में सुधार आएगा। उन्होंने कहा कि नग्गर तथा आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पीएचसी पहुंचते हैं। अब दांतों से संबंधित समस्याओं के उपचार के लिए उपलब्ध संसाधनों में बढ़ोतरी होने से मरीजों को बेहतर सुविधा प्रदान करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी भी दी।
विधायक भुवनेश्वर गौड़ ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रही है। सरकार का प्रयास है कि लोगों को उनके घर-द्वार के नजदीक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हों और सामान्य उपचार के लिए उन्हें दूर न जाना पड़े। उन्होंने कहा कि मनाली विधानसभा क्षेत्र में भी स्वास्थ्य संस्थानों की सुविधाओं को चरणबद्ध तरीके से बेहतर किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मनाली, पतलीकूहल, रायसन और नग्गर सहित विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में आवश्यक सुविधाओं को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विधायक ने कहा कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मनाली में पहली बार स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ की तैनाती की गई है। इससे मनाली और आसपास के क्षेत्रों की महिलाओं को विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने में मदद मिली है।
उन्होंने सीएचसी पतलीकूहल का जिक्र करते हुए कहा कि यहां दिन की नियमित ओपीडी सेवाओं के साथ रात के समय भी 24 घंटे आपातकालीन चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवाई जा रही है। उन्होंने कहा कि आपात स्थिति में रात के समय लोगों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है और इस व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
विधायक भुवनेश्वर गौड़ ने पूर्व भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सीएचसी पतलीकूहल का भवन तो तैयार कर दिया गया, लेकिन स्वास्थ्य संस्थान का वास्तविक लाभ तभी है जब वहां मरीजों के उपचार के लिए आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं और पर्याप्त व्यवस्था भी उपलब्ध हो। उन्होंने कहा कि केवल भवन तैयार कर देने से स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य पूरा नहीं होता। स्वास्थ्य संस्थान में चिकित्सकीय सेवाएं, उपकरण और आवश्यक संसाधन उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रदेश सरकार का प्रयास केवल स्वास्थ्य संस्थानों के भवन खड़े करना नहीं, बल्कि मौजूदा संस्थानों को आवश्यक सुविधाओं से सुदृढ़ करना भी है। पीएचसी नग्गर में दो नई डेंटल चेयर की उपलब्धता इसी दिशा में उठाया गया कदम है।
उद्घाटन के बाद विधायक ने पीएचसी नग्गर का निरीक्षण भी किया। इस दौरान उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध सुविधाओं और आवश्यकताओं की जानकारी ली। अस्पताल परिसर में स्थित पुराने एवं जर्जर चिकित्सक आवास की स्थिति का भी जायजा लिया गया। विधायक ने चिकित्सक आवास के पुनर्निर्माण की आवश्यकता को देखते हुए इसका मामला प्रदेश सरकार के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाए रखने के लिए चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को उचित आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाना भी जरूरी है।
स्थानीय स्तर पर दो नई डेंटल चेयर मिलने से लोगों को दंत चिकित्सा के क्षेत्र में बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद है। विशेष रूप से नग्गर और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए यह सुविधा उपयोगी साबित होगी। स्वास्थ्य केंद्र में संसाधनों के विस्तार से मरीजों को उपचार के लिए दूसरे क्षेत्रों की ओर जाने की परेशानी कम करने में भी मदद मिलेगी।
इस अवसर पर डॉ. ज्योति, डॉ. रोहित महंत, उत्तम, स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों सहित स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी और क्षेत्र के अन्य लोग उपस्थित रहे।

09/09/2026

सत्ता बदलते ही विकास की दिशा क्यों बदल जाती है?
जनता का सवाल—सरकारें पांच साल के लिए आती-जाती हैं, फिर अधूरे विकास कार्यों और खर्च हुए सरकारी धन का जिम्मेदार कौन?
कार्यालय संवाददाता, पतलीकूहल
लोकतंत्र में सरकारें बदलना सामान्य प्रक्रिया है। जनता अपने मताधिकार से किसी सरकार को सत्ता सौंपती है और पांच वर्ष बाद उसके कामकाज का आकलन कर दोबारा फैसला करती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता परिवर्तन के साथ विकास की प्राथमिकताएं भी इस हद तक बदल जानी चाहिए कि पहले से शुरू किए गए जनहित के कार्य अधर में लटक जाएं? एक सरकार जिस परियोजना को जरूरी मानकर लाखों या करोड़ों रुपये खर्च कर शुरू करती है, सत्ता बदलने के बाद वही परियोजना धीमी पड़ जाए, उसका स्वरूप बदल दिया जाए या काम ही बंद हो जाए तो इसका सीधा नुकसान आखिर किसका होता है?
इसका जवाब साफ है—नुकसान जनता और सरकारी खजाने का होता है।
प्रदेश में अक्सर देखने को मिलता है कि सरकार बदलने के साथ कई विकास योजनाओं की दोबारा समीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं नए संस्थानों को लेकर निर्णय बदलते हैं तो कहीं भवन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, पर्यटन या दूसरी आधारभूत परियोजनाओं की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। नई सरकार को योजनाओं की समीक्षा करने का अधिकार है और यदि किसी परियोजना में तकनीकी, वित्तीय या प्रशासनिक कमी है तो उसमें सुधार भी होना चाहिए। लेकिन केवल इसलिए किसी जनहित की योजना को रोकना कि उसे पिछली सरकार ने शुरू किया था, विकास की निरंतरता के लिहाज से उचित नहीं माना जा सकता।
आम आदमी के लिए सड़क, अस्पताल, स्कूल, पुल, पेयजल योजना या कोई सरकारी कार्यालय किसी राजनीतिक दल का नहीं होता। जनता के लिए वह सरकार की व्यवस्था और उसकी अपनी सुविधा होती है। इन परियोजनाओं पर खर्च होने वाला पैसा भी किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन होता है। इसलिए सत्ता परिवर्तन के बाद पहले से स्वीकृत और शुरू हो चुकी उपयोगी परियोजनाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी नई सरकार की भी उतनी ही होनी चाहिए।
सबसे गंभीर स्थिति उन परियोजनाओं में बनती है जिन पर पहले ही बड़ी धनराशि खर्च हो चुकी होती है। जमीन का चयन हो गया, सर्वेक्षण और डीपीआर तैयार हुई, बजट स्वीकृत हुआ, निर्माण शुरू हुआ और उसके बाद सरकार बदलने पर काम रुक गया तो पहले खर्च हुई राशि का लाभ जनता को नहीं मिल पाता। कई बार वर्षों तक अधूरे भवन और दूसरी संरचनाएं खड़ी रहती हैं। समय बीतने के साथ उनकी लागत भी बढ़ती जाती है। जिस परियोजना को एक निश्चित राशि में पूरा किया जा सकता था, वही बाद में संशोधित लागत के कारण सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डालती है।
यही कारण है कि अब विकास को राजनीति से ऊपर रखने की जरूरत महसूस की जा रही है। सरकार किसी भी दल की हो, जनहित में शुरू किए गए कार्यों की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। यदि पिछली सरकार की किसी योजना में वास्तव में खामी है तो उसे तथ्य और तकनीकी आधार पर जनता के सामने रखा जाना चाहिए। योजना बंद करने या उसका स्वरूप बदलने की ठोस वजह भी स्पष्ट होनी चाहिए। इससे व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और लोगों को भी पता चलेगा कि आखिर उनके क्षेत्र का काम क्यों रोका गया या बदला गया।
सवाल यह भी है कि जब किसी परियोजना को मंजूरी देने से पहले विभागीय अधिकारी, विशेषज्ञ और सरकार के स्तर पर पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है तो सत्ता बदलने मात्र से उसकी उपयोगिता कैसे समाप्त हो सकती है? यदि योजना वास्तव में जनहित में थी तो उसे आगे बढ़ना चाहिए और यदि वह गलत थी तो उसे स्वीकृति देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
विकास की असली कसौटी शिलान्यास और उद्घाटन की पट्टिकाएं नहीं, बल्कि जनता को मिलने वाली सुविधा है। किसी कार्य की शुरुआत किस सरकार ने की और उसका उद्घाटन किस सरकार ने किया, यह राजनीतिक चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन आम नागरिक के लिए महत्वपूर्ण यह है कि काम समय पर पूरा हुआ या नहीं।
लोगों का मानना है कि प्रदेश में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सरकार बदलने के बावजूद स्वीकृत और निर्माणाधीन जनहित परियोजनाओं को निर्धारित समय में पूरा करना प्राथमिकता रहे। नई सरकार बेहतर योजना ला सकती है, कमियों को सुधार सकती है और नई प्राथमिकताएं भी तय कर सकती है, लेकिन पहले से खर्च हुए सार्वजनिक धन और अधूरे कार्यों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन विकास की प्रक्रिया निरंतर होनी चाहिए। सरकारें आती-जाती रहेंगी, मगर सड़कें, अस्पताल, स्कूल, पुल और दूसरी सार्वजनिक सुविधाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए होती हैं। इसलिए विकास को सत्ता परिवर्तन की राजनीति से अलग रखकर देखने की जरूरत है। आखिर जनता का सबसे सीधा सवाल यही है—सरकार बदल सकती है, लेकिन जनहित में शुरू हुआ विकास का काम क्यों बदले या रुके?

60 की रफ्तार पर ऑटोमेटिक चालान, दुआड़ा चौक पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा का कौन रखेगा ध्यान?          पांच सड़कों के संग...
09/09/2026

60 की रफ्तार पर ऑटोमेटिक चालान, दुआड़ा चौक पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा का कौन रखेगा ध्यान?
पांच सड़कों के संगम पर तेज रफ्तार बनी चिंता, बुजुर्गों-महिलाओं की प्रशासन से गुहार—चालान के साथ इंसानी जिंदगी की सुरक्षा भी हो प्राथमिकता
कुल्लू-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर 60 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक की रफ्तार वाहन चालक की जेब पर भारी पड़ सकती है और ऑटोमेटिक चालान का प्रावधान वाहन चालकों को यातायात नियमों का पालन करने का संदेश देता है। मगर इसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित दुआड़ा चौक पर एक बड़ा सवाल स्थानीय लोगों को परेशान कर रहा है। पांच सड़कों के संगम और आबादी के बीच स्थित इस व्यस्त चौक पर पैदल चलने वाले बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और अन्य राहगीर सुरक्षित तरीके से सड़क कैसे पार करें? यहां लोगों की मांग है कि चालान की व्यवस्था के साथ-साथ संवेदनशील चौक और बाजार क्षेत्रों में वाहनों की गति नियंत्रित करने के लिए भी प्रभावी कदम उठाए जाएं।

दुआड़ा चौक कोई सामान्य चौराहा नहीं है। यहां पांच दिशाओं से सड़कें आकर मिलती हैं और कुल्लू-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर दिनभर छोटे-बड़े वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। आसपास आबादी और दुकानें होने के कारण स्थानीय लोगों को रोजमर्रा के काम के लिए बार-बार राष्ट्रीय राजमार्ग पार करना पड़ता है। पर्यटन सीजन में वाहनों का दबाव बढ़ने पर स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

ग्रामीणों का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के खुले हिस्से और किसी व्यस्त बाजार अथवा चौराहे की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हो सकतीं। दुआड़ा जैसे आबादी वाले चौक पर वाहन चालक को स्वयं अपनी गति इतनी कम कर देनी चाहिए कि अचानक किसी पैदल यात्री के सामने आने पर वाहन को सुरक्षित तरीके से रोका जा सके। लोगों का कहना है कि बाजार, स्कूल और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में 20 किलोमीटर प्रति घंटा की गति भी कई बार अधिक महसूस होती है। यहां नियम से पहले चालक की जिम्मेदारी और समझदारी जरूरी है।

सबसे अधिक चिंता बुजुर्गों को लेकर है। उम्र के इस पड़ाव पर हर व्यक्ति तेजी से सड़क पार नहीं कर सकता। कई बुजुर्ग धीरे-धीरे चलते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग पार करते हैं, लेकिन कई बार पीछे से आने वाले वाहन चालक गति कम करने के बजाय लगातार हॉर्न बजाना शुरू कर देते हैं। इससे बुजुर्ग घबरा जाते हैं और दुर्घटना की आशंका और बढ़ जाती है।

दुआड़ा गांव के बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं का कहना है कि तेज रफ्तार और तेज हॉर्न किसी चालक की शान नहीं, बल्कि सड़क पर उसकी जिम्मेदारी की परीक्षा है। कुछ सेकंड बचाने के लिए किसी बुजुर्ग, बच्चे या महिला को भयभीत करना उचित नहीं है। चालक को यह सोचना चाहिए कि सड़क पार कर रहा व्यक्ति भी किसी का पिता, मां, बेटा, बेटी या परिवार का सदस्य है।

ग्रामीणों का कहना है कि जिंदगी की कीमत किसी चालान से नहीं आंकी जा सकती। चालान यातायात नियमों का पालन करवाने का माध्यम जरूर है, लेकिन सड़क सुरक्षा का असली उद्देश्य हादसे को होने से पहले रोकना होना चाहिए। तेज रफ्तार में कुछ मिनट बचाए जा सकते हैं, मगर एक पल की लापरवाही किसी की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर सकती है और एक परिवार को ऐसा दर्द दे सकती है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन, पुलिस और राष्ट्रीय राजमार्ग से संबंधित विभाग से विनम्र आग्रह किया है कि दुआड़ा चौक की परिस्थितियों का मौके पर निरीक्षण किया जाए। यहां वाहनों की गति नियंत्रित करने के लिए उचित संकेतक, चेतावनी बोर्ड और अन्य जरूरी यातायात सुरक्षा उपाय किए जाएं। आवश्यकता के अनुसार ऐसे उपाय किए जाएं कि चौक पर पहुंचते ही चालक स्वतः वाहन की गति कम करने को मजबूर हो।

दुआड़ा चौक पर पैदल यात्रियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए फुट ओवर ब्रिज की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पांच सड़कों के संगम और लगातार बढ़ते यातायात को देखते हुए अब इस मांग को केवल मांग मानकर छोड़ने के बजाय धरातल पर समाधान तलाशने का समय आ गया है। जब तक फुट ओवर ब्रिज अथवा कोई स्थायी व्यवस्था नहीं बनती, तब तक पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग सहित वैकल्पिक यातायात व्यवस्था की जानी चाहिए।

दुआड़ा के बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं की प्रशासन से कोई टकराव की मांग नहीं, बल्कि एक विनम्र गुहार है—ऐसा समाधान निकाला जाए कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहन भी चलते रहें और गांव का बुजुर्ग, महिला तथा बच्चा भी बिना भय के सड़क पार कर सके।

ग्रामीणों का सवाल व्यवस्था से सीधा है—यदि 60 की रफ्तार पार करने पर मशीन वाहन का चालान कर सकती है, तो पांच सड़कों के संगम दुआड़ा चौक पर इंसानी जिंदगी की सुरक्षा के लिए रफ्तार को नियंत्रित करने की ठोस व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

लाहौल में फूलगोभी का सीजन चरम पर, नेपाली उत्पादक भर रहे अपनी और जमीन मालिकों की जेबलाहौल में फूलगोभी का सीजन चरम पर, नेप...
09/09/2026

लाहौल में फूलगोभी का सीजन चरम पर, नेपाली उत्पादक भर रहे अपनी और जमीन मालिकों की जेब
लाहौल में फूलगोभी का सीजन चरम पर, नेपाली उत्पादक भर रहे अपनी और जमीन मालिकों की जेब
छह महीने कड़ी मेहनत कर उगा रहे फूलगोभी, मटर, ब्रोकली और आलू; स्थानीय लोगों की जमीन किराये पर लेकर बने सफल उत्पादक

लाहौल घाटी में इन दिनों फूलगोभी का सीजन चरम पर पहुंच गया है। खेतों में तैयार फूलगोभी की कटाई से लेकर उसे मंडियों तक पहुंचाने का काम तेज हो गया है। इस पूरे सब्जी सीजन की सबसे अहम कड़ी पड़ोसी देश नेपाल से आने वाले मेहनतकश लोग बने हुए हैं। कभी मजदूर के रूप में लाहौल पहुंचने वाले नेपाली अब बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की जमीन किराये पर लेकर खुद सब्जी उत्पादक बन गए हैं। छह महीने तक खेतों में पसीना बहाकर ये जहां अपनी अच्छी कमाई कर रहे हैं, वहीं जमीन मालिकों को भी किराये के रूप में आय दे रहे हैं।
लाहौल में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी के कारण खेती का सीजन सीमित रहता है। गर्मियों की दस्तक के साथ ही घाटी में कृषि गतिविधियां तेज हो जाती हैं। इसी दौरान बड़ी संख्या में नेपाली कामगार भी लाहौल पहुंचते हैं। ये फूलगोभी के अलावा मटर, ब्रोकली, आलू और अन्य नकदी एवं अंग्रेजी सब्जियों की खेती में जुट जाते हैं। खेत तैयार करने, बीज लगाने, निराई-गुड़ाई, खाद डालने, दवाइयों का छिड़काव करने से लेकर तैयार फसल की कटाई और पैकिंग तक अधिकांश काम में नेपाली कामगारों की अहम भूमिका रहती है।
पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदली है। लंबे समय तक मजदूरी करने और खेती की बारीकियां सीखने के बाद कई नेपाली कामगार अब स्वयं उत्पादक बन गए हैं। वे स्थानीय लोगों से छह महीने या पूरे कृषि सीजन के लिए जमीन किराये पर लेते हैं और अपने खर्च पर सब्जियों की खेती करते हैं। फसल अच्छी होने और बाजार में बेहतर भाव मिलने पर उनकी मेहनत रंग लाती है। इससे जमीन मालिकों को बिना स्वयं खेती किए किराये के रूप में निश्चित आमदनी मिल जाती है, जबकि नेपाली उत्पादक अपनी मेहनत के दम पर कमाई करते हैं।
इन दिनों फूलगोभी की फसल तैयार होने के कारण घाटी के खेतों में सुबह से शाम तक चहल-पहल दिखाई दे रही है। कहीं फूलगोभी काटी जा रही है तो कहीं उसकी ग्रेडिंग और पैकिंग कर मंडियों के लिए भेजने की तैयारी चल रही है। सीजन अच्छा रहने पर नेपाली उत्पादक छह महीने की मेहनत की कमाई लेकर सर्दियों से पहले अपने घर नेपाल लौटते हैं और अगले कृषि सीजन में फिर लाहौल का रुख करते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश की कृषि और बागवानी व्यवस्था में नेपाली कामगारों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण हो चुका है। कुल्लू-मनाली में सेब सीजन हो या लाहौल में सब्जियों का उत्पादन, खेत-बगीचों से लेकर मंडियों तक नेपाली कामगार बड़ी जिम्मेदारी निभाते हैं। सेब की तुड़ान, ढुलाई और पैकिंग में भी उनकी बड़ी भूमिका रहती है।
लाहौल के लोगों का कहना है कि यदि नेपाली कामगार और उत्पादक न हों तो घाटी में बड़े स्तर पर सब्जियों की खेती करना आसान नहीं होगा। श्रमिकों की कमी के दौर में यही मेहनतकश हाथ हिमाचल के सेब और लाहौल की सब्जियों को खेत-बगीचों से निकालकर बाजार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही कारण है कि आज नेपाली कामगार केवल मजदूर नहीं, बल्कि लाहौल की कृषि अर्थव्यवस्था के मजबूत साझेदार के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।

07/09/2026

कटराईं में 12 सितंबर को सजेगी शास्त्रीय संगीत की महफिल
हडिंबा क्लासिकल म्यूजिक सेंटर के 29वें वार्षिक समारोह में रागों और वाद्ययंत्रों की जुगलबंदी दिखाएंगे विद्यार्थी

हडिंबा क्लासिकल म्यूजिक सेंटर मनाली की ओर से भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से 29वां वार्षिक शास्त्रीय संगीत समारोह 12 सितंबर को होटल शुभम, कटराईं में आयोजित किया जाएगा। समारोह में सेंटर के विद्यार्थी विभिन्न शास्त्रीय रागों के साथ तबला, सितार, बांसुरी, वायलिन, हारमोनियम और जाइलोफोन पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। कार्यक्रम में डे स्टार स्कूल मनाली के प्रधानाचार्य योगेश गज्जू बतौर मुख्यातिथि शिरकत करेंगे।
कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर डेढ़ बजे मुख्यातिथि के आगमन के साथ होगी। इसके बाद दीप प्रज्वलन और सेंटर के विद्यार्थियों की ओर से सरस्वती वंदना प्रस्तुत की जाएगी। मुख्यातिथि के स्वागत एवं संबोधन के बाद शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू होगा।
समारोह में विद्यार्थियों द्वारा राग भूपाली, राग देस, राग भैरवी, राग मालकौंस, राग बागेश्वरी और राग तिलक कामोद सहित विभिन्न रागों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। तबला वादन भी समारोह का विशेष आकर्षण रहेगा। इसके अलावा राग भैरव और राग देस पर आधारित वाद्यवृंद की प्रस्तुति में हारमोनियम, सितार, बांसुरी, वायलिन और जाइलोफोन की धुनें सुनने को मिलेंगी।
कार्यक्रम में उर्वांश, रुद्राक्ष, आद्विक, वियाना, यशस्वी, श्रिजा, आरिया, प्रभलीन, शुभांगी, पवन, शुभ, जोगिंदर, छेरिंग, तेजस्वनी, भुवनेश, ऋषभ, सिद्धार्थ, अर्नव, कोमल और गीताशा सहित सेंटर के अनेक विद्यार्थी अपनी संगीत प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। विशेष रूप से सितार पर तेजस्वनी, बांसुरी पर भुवनेश और वायलिन पर ऋषभ की प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
हडिंबा क्लासिकल म्यूजिक सेंटर की ओर से लगातार 29वें वर्ष इस आयोजन को करवाया जा रहा है। सेंटर का प्रयास नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय संगीत से जोड़ने के साथ उनमें गायन और वादन की प्रतिभा को मंच प्रदान करना है। आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच इस तरह के आयोजन बच्चों और युवाओं को भारतीय राग-संगीत की बारीकियों तथा पारंपरिक वाद्ययंत्रों से परिचित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
हडिंबा क्लासिकल म्यूजिक सेंटर मनाली के प्रधानाचार्य चंदर मोहन कपूर तथा पतलीकूहल शाखा के प्रधानाचार्य पंकज मोहन कपूर ने संगीत प्रेमियों से समारोह में पहुंचकर विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि वार्षिक समारोह विद्यार्थियों के लिए वर्षभर के संगीत अभ्यास और साधना को मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण अवसर है।

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