13/08/2026
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध संस्कृति में देवी-देवताओं का स्थान सर्वोच्च है। यहाँ के गाँवों में जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान, मेला या उत्सव आयोजित होता है, तो वह पूरी तरह से स्थानीय देवी-देवताओं की पावन छत्रछाया में ही संपन्न होता है।
इस दौरान माहौल को दर्शनीय और जीवंत बनाने वाली मुख्य परंपराएँ इस प्रकार हैं:
दिव्य देव-रथों का आगमन: उत्सव में आसपास के क्षेत्रों से आए देवी-देवताओं के काष्ठ और धातु (सोने-चांदी) से सुसज्जित भव्य रथों का एक स्थान पर एकत्र होना अत्यंत अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करता है।
पारंपरिक पूजा-अर्चना: कार्यक्रम के प्रारंभ में पूर्ण विधि-विधान, धूप-दीप और मंत्रोच्चार के साथ सभी देव-रथों की विशेष पूजा की जाती है। गूर (देव-प्रतिनिधि) और श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा के साथ नतमस्तक होते हैं।
देव-नृत्य (रथों का नाचना): पूजा-अर्चना समाप्त होते ही पारंपरिक वाद्ययंत्रों—ढोल, नगाड़े, शहनाई और कनाल—की गूँज पर गूर और वाहक देव-रथों को अपने कंधों पर उठाकर नृत्य कराते हैं।
आस्था और लय का तालमेल: वाद्ययंत्रों की तेज़ होती ताल के साथ देव-रथों का लयबद्ध तरीके से झूमना ऐसा प्रतीत कराता है मानो स्वयं देवता प्रसन्न होकर उत्सव में आनंद मना रहे हों।
शहनाई की सुरिली धुन, ढोल-नगाड़ों की थाप और रंग-बिरंगे परिधानों में सजे श्रद्धालुओं का उत्साह मिलकर हिमाचल के इन ग्रामीण आयोजनों को आस्था, कला और लोक-संस्कृति का एक अद्भूत संगम बना देता है। 🏚️🏠🌲👫💥