14/08/2026
शिमला का उपायुक्त कार्यालय भवन : दो शताब्दियों की प्रशासनिक विरासत
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शिमला का वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन केवल जिला प्रशासन का एक सरकारी कार्यालय नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था, ब्रिटिशकालीन शिमला और स्वतंत्र भारत के बीच लगभग दो शताब्दियों से चले आ रहे संस्थागत परिवर्तन का एक जीवंत साक्षी है। आज जिस भवन में शिमला जिले का उपायुक्त कार्यालय कार्य करता है, उसके साथ जुड़ी कहानी केवल एक भवन के निर्माण की कहानी नहीं है। इसके पीछे 1815 में आरम्भ हुई ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था, पहाड़ी रियासतों के साथ ब्रिटिश संबंध, शिमला के एक छोटे पहाड़ी गांव से ब्रिटिश भारत के महत्वपूर्ण ग्रीष्मकालीन मुख्यालय बनने की प्रक्रिया, औपनिवेशिक वास्तुकला, स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के बाद जिला प्रशासन के पुनर्गठन की लंबी यात्रा छिपी हुई है।
सबसे पहले एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। शिमला के उपायुक्त कार्यालय की प्रशासनिक परंपरा का आरम्भ 1815 से माना जाता है, लेकिन वर्तमान पत्थर और ईंट का कलेक्टरेट भवन 1815 का नहीं है। 1815 उस प्रशासनिक संस्था की शुरुआत का वर्ष है, जबकि वर्तमान भवन का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में हुआ माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक एवं विरासत संबंधी स्रोतों से इतना स्पष्ट है कि 1904 तक वर्तमान कचहरी भवन अस्तित्व में था। इसलिए 1815 को वर्तमान भवन का निर्माण-वर्ष बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
▪️1815 : शिमला प्रशासन की आरंभिक पृष्ठभूमि
शिमला और उसके आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासनिक प्रभाव का विस्तार आंग्ल-गोरखा युद्ध (1814–1816) के बाद हुआ। गोरखा शक्ति की पराजय के पश्चात सतलुज और यमुना के बीच स्थित अनेक पहाड़ी रियासतें ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में आ गईं। ब्रिटिश सरकार को इन रियासतों के साथ राजनीतिक संबंध बनाए रखने, उनके मामलों की निगरानी करने तथा क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए अधिकारियों की आवश्यकता थी।
जिला शिमला प्रशासन के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार लेफ्टिनेंट आर. रॉस ने 1815 में Assistant Agent of the Governor General के रूप में कार्यभार संभाला। उन्हें शिमला प्रशासन की इस प्रारंभिक संस्थागत परंपरा का पहला अधिकारी माना जाता है। उस समय न तो आज जैसा शिमला जिला अस्तित्व में था और न ही वर्तमान कलेक्टरेट भवन। यह एक व्यापक राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार पहाड़ी रियासतों के साथ अपने संबंधों को संचालित करती थी।
शिमला में ब्रिटिश उपस्थिति भी धीरे-धीरे मजबूत हुई। जिला प्रशासन के इतिहास के अनुसार 1819 में लेफ्टिनेंट रॉस ने शिमला में एक साधारण लकड़ी की कुटिया बनवाई, जिसे शिमला में शुरुआती ब्रिटिश आवासों में माना जाता है। इसके कुछ वर्षों बाद शिमला में स्थायी यूरोपीय भवनों का निर्माण शुरू हुआ और नगर का स्वरूप बदलने लगा।
▪️कैनेडी और शिमला में ब्रिटिश प्रशासन की स्थापना
19 जनवरी 1822 को कैप्टन चार्ल्स प्रैट कैनेडी ने Principal Assistant of Sabathu के रूप में पदभार संभाला। कैनेडी का शिमला के इतिहास में विशेष महत्व है। 1822 में उन्होंने यहां कैनेडी हाउस का निर्माण करवाया, जिसे शिमला का पहला पक्का यूरोपीय आवास माना जाता है। कैनेडी के समय से शिमला केवल एक पहाड़ी पड़ाव न रहकर ब्रिटिश अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बनने लगा। 1832 में कैनेडी का पदनाम Political Agent कर दिया गया। इसके बाद इस पद पर कार्य करने वाले अधिकारियों का दायरा पहाड़ी रियासतों के प्रशासन और राजनीतिक मामलों से संबंधित होता गया।
अगले कुछ दशकों में इस प्रशासनिक पद की प्रकृति बदलती रही। राजनीतिक एजेंट, सुपरिंटेंडेंट और सब-कमिश्नर जैसे पदनामों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहाड़ी राज्यों और क्षेत्रों पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया। जनवरी 1859 में पहली बार आधिकारिक अभिलेखों में “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States” पदनाम दर्ज मिलता है। इस प्रकार आधुनिक उपायुक्त संस्था की स्पष्ट प्रशासनिक पहचान उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में स्थापित हो चुकी थी।
▪️गैस्टन हॉल से रोसना हॉल तक
वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर उपेक्षित अध्याय उस स्थान पर मौजूद पुराने भवन से जुड़ा है। वर्तमान कलेक्टरेट के स्थान पर पहले एक भवन था जिसे Gaston Hall (गैस्टन हॉल) कहा जाता था। बाद में इसका नाम Rosna Hall (रोसना हॉल) कर दिया गया। शिमला की विरासत संबंधी रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है कि पुराने भवन को बाद में हटा दिया गया और उसके स्थान पर उपायुक्त की कचहरी तथा प्रशासनिक भवन का निर्माण किया गया। इसलिए गैस्टन हॉल और वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन को एक ही भवन मानना सही नहीं होगा। दोनों एक ही स्थान की ऐतिहासिक निरंतरता से जुड़े हुए हैं, लेकिन वास्तुशिल्पीय दृष्टि से वे अलग-अलग संरचनाएं थीं। पुराने अभिलेखों में नाम को लेकर कुछ भिन्नताएं भी मिलती हैं। कुछ बाद के लेखों में इसे “Caston Hall” लिखा गया है, लेकिन ऐतिहासिक स्रोतों में Gaston Hall नाम अधिक विश्वसनीय रूप से मिलता है। इसी तरह बाद में इसका नाम Rosna Hall किया गया था।
▪️वर्तमान कलेक्टरेट भवन का निर्माण
आज दिखाई देने वाला विशाल पत्थर और ईंट का भवन उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों का है। उपलब्ध स्रोत वर्तमान भवन का कोई सर्वसम्मत और अभिलेखीय रूप से प्रमाणित एकल निर्माण-वर्ष नहीं देते। हालांकि 1904 में प्रकाशित ई. जे. बक की प्रसिद्ध पुस्तक Simla, Past and Present में यह भवन पहले से ही अस्तित्व में मिलता है और इसे तारघर के नीचे स्थित “Court House or Kutcherry” के रूप में वर्णित किया गया है। 2015 में प्रकाशित समाचार और विरासत संबंधी सामग्री में भवन को लगभग 120 वर्ष से अधिक पुराना बताया गया था। इस आधार पर इसका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक, अर्थात लगभग 1890 के दशक, में हुआ माना जा सकता है। हालांकि मूल लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभिलेख उपलब्ध हुए बिना किसी एक निश्चित वर्ष—जैसे 1890 या 1895—को इसका आधिकारिक निर्माण-वर्ष घोषित करना उचित नहीं होगा। इस तथ्य का विशेष महत्व है क्योंकि शिमला के इतिहास में कई बार 1815 की प्रशासनिक स्थापना और वर्तमान भवन के निर्माण को एक ही घटना समझ लिया जाता है। वास्तव में दोनों के बीच लगभग आठ दशकों का अंतर है।
▪️एक भवन, अनेक कार्यालय
अपने शुरुआती काल में यह भवन केवल उपायुक्त का कार्यालय नहीं था। ई. जे. बक के 1904 के विवरण तथा शिमला की विरासत संबंधी रिपोर्टों से पता चलता है कि इस परिसर का उपयोग कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों के लिए किया जाता था। यहां Deputy Commissioner's Court and Office, जिला न्यायाधीश का न्यायालय, Small Cause Court, जिला कोषागार तथा पुलिस से संबंधित कार्यालय आदि कार्यरत थे। इस कारण यह भवन तत्कालीन शिमला के प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक केंद्रों में से एक था। उस समय “कलेक्टर” और “डिप्टी कमिश्नर” की भूमिका आज की तुलना में कहीं अधिक व्यापक थी। राजस्व प्रशासन, भूमि संबंधी मामले, दंडाधिकारी शक्तियां, कानून-व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और सरकार के विभिन्न निर्देशों का क्रियान्वयन जिला अधिकारी के महत्वपूर्ण दायित्वों में शामिल था। पहाड़ी रियासतों के संदर्भ में उसकी भूमिका और भी व्यापक थी। इसलिए वर्तमान कलेक्टरेट भवन को केवल एक कार्यालय भवन के रूप में देखना उसके वास्तविक ऐतिहासिक महत्व को कम करके आंकना होगा। यह औपनिवेशिक शिमला में राजस्व, न्याय, प्रशासन और कानून-व्यवस्था की संस्थाओं के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हुआ था।
▪️नॉर्मन-बैरनियल स्थापत्य की विशिष्ट मिसाल
भवन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी वास्तुशैली है। शिमला की विरासत रिपोर्ट इसे Norman-Baronial (नॉर्मन-बैरनियल) शैली से जोड़ती है। यह शैली मध्यकालीन यूरोपीय किलों और सामंती आवासीय भवनों की स्थापत्य परंपराओं से प्रेरित थी। शिमला में ब्रिटिश वास्तुकला की कई शैलियां देखने को मिलती हैं—गॉथिक रिवाइवल, ट्यूडर, स्विस-बवेरियन, स्कॉटिश बैरनियल आदि। लेकिन उपायुक्त कार्यालय का भवन अपनी भारी, दुर्गनुमा और अपेक्षाकृत कठोर संरचना के कारण अलग पहचान बनाता है। इसमें मोटी पत्थर की दीवारें, विशाल मेहराब, मजबूत पत्थर की चिनाई, उभरे हुए बुर्जनुमा हिस्से और घुमावदार अथवा सर्पिल सीढ़ियों जैसे स्थापत्य तत्व दिखाई देते हैं। भवन की बनावट में सजावट की अपेक्षा मजबूती और प्रभावशीलता पर अधिक जोर दिखाई देता है। यह वास्तुशैली केवल सौंदर्य के लिए नहीं थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक वास्तुकला में प्रशासनिक भवनों को अक्सर ऐसी शैली में बनाया जाता था जिससे वे स्थायित्व, अधिकार और संस्थागत शक्ति का प्रतीक दिखाई दें। शिमला का कलेक्टरेट भवन भी इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है।
2015 में INTACH से जुड़े विशेषज्ञों ने इस भवन को भारतीय औपनिवेशिक वास्तुकला में नॉर्मन-बैरनियल शैली का अत्यंत दुर्लभ उदाहरण बताया था। यह दावा विशेषज्ञ मत के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि शिमला के ऐतिहासिक सरकारी भवनों में इसकी स्थापत्य पहचान विशिष्ट है।
▪️तारघर के नीचे स्थित कचहरी
भवन की भौगोलिक स्थिति भी इसके इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ई. जे. बक ने 1904 में इसे तारघर के नीचे स्थित Court House अथवा Kutcherry के रूप में वर्णित किया था। यह स्थिति उस समय के शिमला के प्रशासनिक भूगोल को समझने में मदद करती है। ऊपरी शिमला में ब्रिटिश अधिकारियों और प्रमुख सरकारी संस्थानों के भवन विकसित हो रहे थे, जबकि नीचे की ओर बाजार और स्थानीय आबादी का क्षेत्र था। कचहरी और कोषागार जैसे कार्यालयों को स्थानीय व्यापारिक एवं जनसंख्या केंद्रों के अपेक्षाकृत निकट रखना प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक था। आज भी कलेक्टरेट भवन के ऊपर स्थित पुराना तारघर/टेलीग्राफ परिसर शिमला के औपनिवेशिक संचार तंत्र की याद दिलाता है। इस प्रकार एक ही क्षेत्र में प्रशासन और संचार की दो महत्वपूर्ण औपनिवेशिक संस्थाओं का विकास हुआ था।
▪️स्वतंत्रता की दहलीज पर कलेक्टरेट
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब यह भवन ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कई दशकों का इतिहास अपने भीतर समेट चुका था। जिला शिमला के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार केवल सिंह चौधरी, आई.सी.एस. ने 5 जुलाई 1947 को शिमला के उपायुक्त का पद संभाला और 17 अप्रैल 1948 तक इस पद पर रहे। इस प्रकार उन्होंने ब्रिटिश भारत के अंतिम सप्ताहों और स्वतंत्र भारत के आरंभिक महीनों—दोनों को इस कार्यालय से देखा। 15 अगस्त 1947 के बाद भवन का प्रशासनिक चरित्र समाप्त नहीं हुआ; बल्कि इसकी भूमिका एक नए राष्ट्र के जिला प्रशासन के केंद्र के रूप में परिवर्तित हो गई। ब्रिटिश शासन के स्थान पर भारतीय शासन आया, लेकिन जिला प्रशासन की अनेक संस्थागत व्यवस्थाएं निरंतरता के साथ आगे बढ़ती रहीं।
▪️स्वतंत्र भारत में बदलती भूमिका
स्वतंत्रता के बाद हिमाचल और शिमला की प्रशासनिक स्थिति में कई परिवर्तन हुए। पहाड़ी रियासतों के एकीकरण, हिमाचल प्रदेश के गठन और बाद के प्रशासनिक पुनर्गठन के साथ जिला प्रशासन की संरचना भी बदलती रही।
शिमला के वर्तमान जिले का स्वरूप 1 सितंबर 1972 को हुए प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद स्थापित हुआ। पुराने महासू जिले का पुनर्गठन किया गया और वर्तमान शिमला जिले की प्रशासनिक संरचना अस्तित्व में आई। इसके बाद ऐतिहासिक कलेक्टरेट भवन ने नए शिमला जिले के प्रशासनिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी। इस तरह भवन ने औपनिवेशिक “Political Agency” से लेकर “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States”, स्वतंत्र भारत के जिला प्रशासन और अंततः वर्तमान हिमाचल प्रदेश के जिला कलेक्टरेट तक की पूरी प्रशासनिक यात्रा देखी है।
▪️1815 से 2015 : दो सौ वर्ष की संस्थागत यात्रा
2015 में उपायुक्त कार्यालय की प्रशासनिक संस्था ने अपने 200 वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर शिमला में विशेष समारोह आयोजित किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने The Deputy Commissioner, Shimla: Two Centuries of an Institution, 1815–2015 नामक पुस्तक का विमोचन किया। पुस्तक का संपादन इतिहासकार राजा भसीन ने किया था। इस प्रकाशन में शिमला के उपायुक्त संस्थान के दो शताब्दियों के इतिहास को दस्तावेजी रूप में प्रस्तुत किया गया। इसमें पुराने चित्रों, रेखाचित्रों और प्रशासनिक इतिहास से संबंधित सामग्री को शामिल किया गया था। इस अवसर पर स्मारक डाक आवरण और विशेष डाक-चिह्न भी जारी किए गए थे। यह द्विशताब्दी समारोह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह बात औपचारिक रूप से सामने आई कि शिमला के उपायुक्त कार्यालय की विरासत केवल वर्तमान प्रशासनिक भवन तक सीमित नहीं है। इसकी संस्थागत जड़ें 1815 तक जाती हैं।
▪️संरक्षण की आवश्यकता
समय के साथ शिमला के ऐतिहासिक भवनों पर मौसम, नमी, भारी वर्षा, बर्फ, भूकंपीय जोखिम, बढ़ते शहरी दबाव और निरंतर उपयोग का प्रभाव पड़ा है। उपायुक्त कार्यालय भवन भी इससे अछूता नहीं रहा। 2015 के आसपास INTACH ने इस ऐतिहासिक भवन के संरक्षण और पुनरुद्धार की आवश्यकता पर जोर दिया था। विशेषज्ञों ने भवन की मूल पत्थरकारी, मेहराबों, सीढ़ियों और अन्य ऐतिहासिक स्थापत्य तत्वों को संरक्षित करने की आवश्यकता बताई थी। ऐसे भवनों का संरक्षण केवल पुराने पत्थरों और दीवारों को बचाना नहीं होता। इनका महत्व उस प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में भी है जो इन दीवारों के भीतर घटित हुआ। शिमला का उपायुक्त कार्यालय इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह भवन लगातार बदलती प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बावजूद अपने मूल कार्य—जिला प्रशासन—से जुड़ा रहा है।
▪️आज का कलेक्टरेट
आज शिमला का उपायुक्त कार्यालय जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। उपायुक्त के अतिरिक्त यहां अतिरिक्त उपायुक्त, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, सहायक आयुक्त, जिला राजस्व अधिकारी तथा विभिन्न प्रशासनिक शाखाएं कार्य करती हैं। राजस्व प्रशासन, कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, निर्वाचन, राहत एवं पुनर्वास, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और नागरिक प्रशासन से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण कार्य इसी संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से संचालित होते हैं। इस प्रकार भवन का मूल प्रशासनिक चरित्र आज भी कायम है, यद्यपि उसके भीतर कार्य करने वाली संस्थाएं और शासन प्रणाली ब्रिटिश काल से पूरी तरह बदल चुकी हैं।
▪️इतिहास का जीवंत दस्तावेज
शिमला का वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन इसलिए विशेष है क्योंकि इसके इतिहास को केवल उसकी दीवारों की उम्र से नहीं मापा जा सकता। इसकी संस्थागत उम्र 1815 से, जबकि वर्तमान भवन की वास्तुशिल्पीय उम्र उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से जुड़ती है। 1815 में आर. रॉस से शुरू हुई प्रशासनिक परंपरा 1822 में कैनेडी के दौर से गुजरी, 1859 में “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States” के रूप में स्पष्ट हुई, गैस्टन हॉल और रोसना हॉल के दौर को पार करते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में वर्तमान कचहरी भवन तक पहुंची। 1904 में ई. जे. बक ने इसे कचहरी के रूप में दर्ज किया। 1947 में इसने ब्रिटिश शासन से भारतीय शासन में संक्रमण देखा और 1972 में पुनर्गठित शिमला जिले के प्रशासनिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी। 2015 में इसकी प्रशासनिक संस्था ने दो सौ वर्ष पूरे किए। इसलिए शिमला का कलेक्टरेट भवन वास्तव में एक भवन से कहीं अधिक—हिमाचल के आधुनिक प्रशासनिक इतिहास का पत्थरों में लिखा हुआ दस्तावेज है। इसकी दीवारों ने ब्रिटिश राजनीतिक एजेंसी का दौर देखा, पहाड़ी रियासतों के साथ बदलते संबंध देखे, औपनिवेशिक न्याय और राजस्व व्यवस्था को देखा, स्वतंत्रता का संक्रमण देखा और स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक जिला प्रशासन को विकसित होते देखा।
आज जब कोई व्यक्ति इस भवन में उपायुक्त कार्यालय के किसी कार्य से प्रवेश करता है, तो वह अनजाने में ही उस प्रशासनिक परंपरा की उसी धारा में प्रवेश करता है जिसकी शुरुआत दो शताब्दी से अधिक पहले हुई थी। DC Shimla
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संदर्भ एवं स्रोत
1. District Administration, Shimla, Government of Himachal Pradesh, History of Shimla — शिमला में ब्रिटिश प्रशासन की शुरुआत, 1815, लेफ्टिनेंट रॉस, कैनेडी हाउस तथा 1972 के प्रशासनिक पुनर्गठन की जानकारी। District Administration Shimla – History
2. District Administration, Shimla, Deputy Collectors Before 1946 — 1815 से उपायुक्त संस्था के पूर्ववर्ती पदों और अधिकारियों का आधिकारिक विवरण। Deputy Collectors Before 1946
3. District Administration, Shimla, Deputy Collectors After 1946 and Ahead — स्वतंत्रता के आसपास से आगे तक शिमला के उपायुक्तों की आधिकारिक सूची। Deputy Collectors After 1946 and Ahead
4. E. J. Buck, Simla, Past and Present, 1904 — औपनिवेशिक शिमला की इमारतों, कचहरी, तारघर तथा प्रशासनिक संस्थानों का समकालीन विवरण। Simla, Past and Present – Internet Archive
5. Town & Country Planning Department, Himachal Pradesh, Heritage of Shimla – Revised Heritage Report — गैस्टन हॉल/रोसना हॉल, वर्तमान कलेक्टरेट भवन तथा उसकी वास्तुशैली संबंधी जानकारी।
6. Raaja Bhasin (Ed.), The Deputy Commissioner, Shimla: Two Centuries of an Institution, 1815–2015, Government of Himachal Pradesh, 2015 — उपायुक्त संस्था के 200 वर्षों का विस्तृत संस्थागत इतिहास।
7. Government of Himachal Pradesh, 2015 — उपायुक्त कार्यालय, शिमला के द्विशताब्दी समारोह संबंधी आधिकारिक सामग्री।
8. The Times of India, “INTACH proposes to restore colonial era DC office building”, 2015 — भवन की आयु, वास्तुशिल्पीय महत्व और संरक्षण प्रस्ताव से संबंधित समकालीन रिपोर्ट। The Times of India – INTACH proposes to restore colonial era DC office building
9. The Economic Times, 2015 — INTACH द्वारा शिमला के ऐतिहासिक उपायुक्त कार्यालय भवन के संरक्षण के प्रस्ताव तथा भवन की वास्तुशिल्पीय विशेषताओं संबंधी रिपोर्ट। The Economic Times – INTACH restoration report