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शिमला का उपायुक्त कार्यालय भवन : दो शताब्दियों की प्रशासनिक विरासत-----------------शिमला का वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भव...
14/08/2026

शिमला का उपायुक्त कार्यालय भवन : दो शताब्दियों की प्रशासनिक विरासत
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शिमला का वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन केवल जिला प्रशासन का एक सरकारी कार्यालय नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था, ब्रिटिशकालीन शिमला और स्वतंत्र भारत के बीच लगभग दो शताब्दियों से चले आ रहे संस्थागत परिवर्तन का एक जीवंत साक्षी है। आज जिस भवन में शिमला जिले का उपायुक्त कार्यालय कार्य करता है, उसके साथ जुड़ी कहानी केवल एक भवन के निर्माण की कहानी नहीं है। इसके पीछे 1815 में आरम्भ हुई ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था, पहाड़ी रियासतों के साथ ब्रिटिश संबंध, शिमला के एक छोटे पहाड़ी गांव से ब्रिटिश भारत के महत्वपूर्ण ग्रीष्मकालीन मुख्यालय बनने की प्रक्रिया, औपनिवेशिक वास्तुकला, स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के बाद जिला प्रशासन के पुनर्गठन की लंबी यात्रा छिपी हुई है।
सबसे पहले एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है। शिमला के उपायुक्त कार्यालय की प्रशासनिक परंपरा का आरम्भ 1815 से माना जाता है, लेकिन वर्तमान पत्थर और ईंट का कलेक्टरेट भवन 1815 का नहीं है। 1815 उस प्रशासनिक संस्था की शुरुआत का वर्ष है, जबकि वर्तमान भवन का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में हुआ माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक एवं विरासत संबंधी स्रोतों से इतना स्पष्ट है कि 1904 तक वर्तमान कचहरी भवन अस्तित्व में था। इसलिए 1815 को वर्तमान भवन का निर्माण-वर्ष बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

▪️1815 : शिमला प्रशासन की आरंभिक पृष्ठभूमि
शिमला और उसके आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासनिक प्रभाव का विस्तार आंग्ल-गोरखा युद्ध (1814–1816) के बाद हुआ। गोरखा शक्ति की पराजय के पश्चात सतलुज और यमुना के बीच स्थित अनेक पहाड़ी रियासतें ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में आ गईं। ब्रिटिश सरकार को इन रियासतों के साथ राजनीतिक संबंध बनाए रखने, उनके मामलों की निगरानी करने तथा क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए अधिकारियों की आवश्यकता थी।
जिला शिमला प्रशासन के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार लेफ्टिनेंट आर. रॉस ने 1815 में Assistant Agent of the Governor General के रूप में कार्यभार संभाला। उन्हें शिमला प्रशासन की इस प्रारंभिक संस्थागत परंपरा का पहला अधिकारी माना जाता है। उस समय न तो आज जैसा शिमला जिला अस्तित्व में था और न ही वर्तमान कलेक्टरेट भवन। यह एक व्यापक राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसके अंतर्गत ब्रिटिश सरकार पहाड़ी रियासतों के साथ अपने संबंधों को संचालित करती थी।
शिमला में ब्रिटिश उपस्थिति भी धीरे-धीरे मजबूत हुई। जिला प्रशासन के इतिहास के अनुसार 1819 में लेफ्टिनेंट रॉस ने शिमला में एक साधारण लकड़ी की कुटिया बनवाई, जिसे शिमला में शुरुआती ब्रिटिश आवासों में माना जाता है। इसके कुछ वर्षों बाद शिमला में स्थायी यूरोपीय भवनों का निर्माण शुरू हुआ और नगर का स्वरूप बदलने लगा।

▪️कैनेडी और शिमला में ब्रिटिश प्रशासन की स्थापना
19 जनवरी 1822 को कैप्टन चार्ल्स प्रैट कैनेडी ने Principal Assistant of Sabathu के रूप में पदभार संभाला। कैनेडी का शिमला के इतिहास में विशेष महत्व है। 1822 में उन्होंने यहां कैनेडी हाउस का निर्माण करवाया, जिसे शिमला का पहला पक्का यूरोपीय आवास माना जाता है। कैनेडी के समय से शिमला केवल एक पहाड़ी पड़ाव न रहकर ब्रिटिश अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बनने लगा। 1832 में कैनेडी का पदनाम Political Agent कर दिया गया। इसके बाद इस पद पर कार्य करने वाले अधिकारियों का दायरा पहाड़ी रियासतों के प्रशासन और राजनीतिक मामलों से संबंधित होता गया।
अगले कुछ दशकों में इस प्रशासनिक पद की प्रकृति बदलती रही। राजनीतिक एजेंट, सुपरिंटेंडेंट और सब-कमिश्नर जैसे पदनामों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहाड़ी राज्यों और क्षेत्रों पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया। जनवरी 1859 में पहली बार आधिकारिक अभिलेखों में “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States” पदनाम दर्ज मिलता है। इस प्रकार आधुनिक उपायुक्त संस्था की स्पष्ट प्रशासनिक पहचान उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में स्थापित हो चुकी थी।

▪️गैस्टन हॉल से रोसना हॉल तक
वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर उपेक्षित अध्याय उस स्थान पर मौजूद पुराने भवन से जुड़ा है। वर्तमान कलेक्टरेट के स्थान पर पहले एक भवन था जिसे Gaston Hall (गैस्टन हॉल) कहा जाता था। बाद में इसका नाम Rosna Hall (रोसना हॉल) कर दिया गया। शिमला की विरासत संबंधी रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है कि पुराने भवन को बाद में हटा दिया गया और उसके स्थान पर उपायुक्त की कचहरी तथा प्रशासनिक भवन का निर्माण किया गया। इसलिए गैस्टन हॉल और वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन को एक ही भवन मानना सही नहीं होगा। दोनों एक ही स्थान की ऐतिहासिक निरंतरता से जुड़े हुए हैं, लेकिन वास्तुशिल्पीय दृष्टि से वे अलग-अलग संरचनाएं थीं। पुराने अभिलेखों में नाम को लेकर कुछ भिन्नताएं भी मिलती हैं। कुछ बाद के लेखों में इसे “Caston Hall” लिखा गया है, लेकिन ऐतिहासिक स्रोतों में Gaston Hall नाम अधिक विश्वसनीय रूप से मिलता है। इसी तरह बाद में इसका नाम Rosna Hall किया गया था।

▪️वर्तमान कलेक्टरेट भवन का निर्माण
आज दिखाई देने वाला विशाल पत्थर और ईंट का भवन उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों का है। उपलब्ध स्रोत वर्तमान भवन का कोई सर्वसम्मत और अभिलेखीय रूप से प्रमाणित एकल निर्माण-वर्ष नहीं देते। हालांकि 1904 में प्रकाशित ई. जे. बक की प्रसिद्ध पुस्तक Simla, Past and Present में यह भवन पहले से ही अस्तित्व में मिलता है और इसे तारघर के नीचे स्थित “Court House or Kutcherry” के रूप में वर्णित किया गया है। 2015 में प्रकाशित समाचार और विरासत संबंधी सामग्री में भवन को लगभग 120 वर्ष से अधिक पुराना बताया गया था। इस आधार पर इसका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक, अर्थात लगभग 1890 के दशक, में हुआ माना जा सकता है। हालांकि मूल लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभिलेख उपलब्ध हुए बिना किसी एक निश्चित वर्ष—जैसे 1890 या 1895—को इसका आधिकारिक निर्माण-वर्ष घोषित करना उचित नहीं होगा। इस तथ्य का विशेष महत्व है क्योंकि शिमला के इतिहास में कई बार 1815 की प्रशासनिक स्थापना और वर्तमान भवन के निर्माण को एक ही घटना समझ लिया जाता है। वास्तव में दोनों के बीच लगभग आठ दशकों का अंतर है।

▪️एक भवन, अनेक कार्यालय
अपने शुरुआती काल में यह भवन केवल उपायुक्त का कार्यालय नहीं था। ई. जे. बक के 1904 के विवरण तथा शिमला की विरासत संबंधी रिपोर्टों से पता चलता है कि इस परिसर का उपयोग कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों के लिए किया जाता था। यहां Deputy Commissioner's Court and Office, जिला न्यायाधीश का न्यायालय, Small Cause Court, जिला कोषागार तथा पुलिस से संबंधित कार्यालय आदि कार्यरत थे। इस कारण यह भवन तत्कालीन शिमला के प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक केंद्रों में से एक था। उस समय “कलेक्टर” और “डिप्टी कमिश्नर” की भूमिका आज की तुलना में कहीं अधिक व्यापक थी। राजस्व प्रशासन, भूमि संबंधी मामले, दंडाधिकारी शक्तियां, कानून-व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और सरकार के विभिन्न निर्देशों का क्रियान्वयन जिला अधिकारी के महत्वपूर्ण दायित्वों में शामिल था। पहाड़ी रियासतों के संदर्भ में उसकी भूमिका और भी व्यापक थी। इसलिए वर्तमान कलेक्टरेट भवन को केवल एक कार्यालय भवन के रूप में देखना उसके वास्तविक ऐतिहासिक महत्व को कम करके आंकना होगा। यह औपनिवेशिक शिमला में राजस्व, न्याय, प्रशासन और कानून-व्यवस्था की संस्थाओं के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हुआ था।

▪️नॉर्मन-बैरनियल स्थापत्य की विशिष्ट मिसाल
भवन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी वास्तुशैली है। शिमला की विरासत रिपोर्ट इसे Norman-Baronial (नॉर्मन-बैरनियल) शैली से जोड़ती है। यह शैली मध्यकालीन यूरोपीय किलों और सामंती आवासीय भवनों की स्थापत्य परंपराओं से प्रेरित थी। शिमला में ब्रिटिश वास्तुकला की कई शैलियां देखने को मिलती हैं—गॉथिक रिवाइवल, ट्यूडर, स्विस-बवेरियन, स्कॉटिश बैरनियल आदि। लेकिन उपायुक्त कार्यालय का भवन अपनी भारी, दुर्गनुमा और अपेक्षाकृत कठोर संरचना के कारण अलग पहचान बनाता है। इसमें मोटी पत्थर की दीवारें, विशाल मेहराब, मजबूत पत्थर की चिनाई, उभरे हुए बुर्जनुमा हिस्से और घुमावदार अथवा सर्पिल सीढ़ियों जैसे स्थापत्य तत्व दिखाई देते हैं। भवन की बनावट में सजावट की अपेक्षा मजबूती और प्रभावशीलता पर अधिक जोर दिखाई देता है। यह वास्तुशैली केवल सौंदर्य के लिए नहीं थी। ब्रिटिश औपनिवेशिक वास्तुकला में प्रशासनिक भवनों को अक्सर ऐसी शैली में बनाया जाता था जिससे वे स्थायित्व, अधिकार और संस्थागत शक्ति का प्रतीक दिखाई दें। शिमला का कलेक्टरेट भवन भी इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है।
2015 में INTACH से जुड़े विशेषज्ञों ने इस भवन को भारतीय औपनिवेशिक वास्तुकला में नॉर्मन-बैरनियल शैली का अत्यंत दुर्लभ उदाहरण बताया था। यह दावा विशेषज्ञ मत के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि शिमला के ऐतिहासिक सरकारी भवनों में इसकी स्थापत्य पहचान विशिष्ट है।

▪️तारघर के नीचे स्थित कचहरी
भवन की भौगोलिक स्थिति भी इसके इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ई. जे. बक ने 1904 में इसे तारघर के नीचे स्थित Court House अथवा Kutcherry के रूप में वर्णित किया था। यह स्थिति उस समय के शिमला के प्रशासनिक भूगोल को समझने में मदद करती है। ऊपरी शिमला में ब्रिटिश अधिकारियों और प्रमुख सरकारी संस्थानों के भवन विकसित हो रहे थे, जबकि नीचे की ओर बाजार और स्थानीय आबादी का क्षेत्र था। कचहरी और कोषागार जैसे कार्यालयों को स्थानीय व्यापारिक एवं जनसंख्या केंद्रों के अपेक्षाकृत निकट रखना प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक था। आज भी कलेक्टरेट भवन के ऊपर स्थित पुराना तारघर/टेलीग्राफ परिसर शिमला के औपनिवेशिक संचार तंत्र की याद दिलाता है। इस प्रकार एक ही क्षेत्र में प्रशासन और संचार की दो महत्वपूर्ण औपनिवेशिक संस्थाओं का विकास हुआ था।

▪️स्वतंत्रता की दहलीज पर कलेक्टरेट
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब यह भवन ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कई दशकों का इतिहास अपने भीतर समेट चुका था। जिला शिमला के आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार केवल सिंह चौधरी, आई.सी.एस. ने 5 जुलाई 1947 को शिमला के उपायुक्त का पद संभाला और 17 अप्रैल 1948 तक इस पद पर रहे। इस प्रकार उन्होंने ब्रिटिश भारत के अंतिम सप्ताहों और स्वतंत्र भारत के आरंभिक महीनों—दोनों को इस कार्यालय से देखा। 15 अगस्त 1947 के बाद भवन का प्रशासनिक चरित्र समाप्त नहीं हुआ; बल्कि इसकी भूमिका एक नए राष्ट्र के जिला प्रशासन के केंद्र के रूप में परिवर्तित हो गई। ब्रिटिश शासन के स्थान पर भारतीय शासन आया, लेकिन जिला प्रशासन की अनेक संस्थागत व्यवस्थाएं निरंतरता के साथ आगे बढ़ती रहीं।

▪️स्वतंत्र भारत में बदलती भूमिका
स्वतंत्रता के बाद हिमाचल और शिमला की प्रशासनिक स्थिति में कई परिवर्तन हुए। पहाड़ी रियासतों के एकीकरण, हिमाचल प्रदेश के गठन और बाद के प्रशासनिक पुनर्गठन के साथ जिला प्रशासन की संरचना भी बदलती रही।
शिमला के वर्तमान जिले का स्वरूप 1 सितंबर 1972 को हुए प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद स्थापित हुआ। पुराने महासू जिले का पुनर्गठन किया गया और वर्तमान शिमला जिले की प्रशासनिक संरचना अस्तित्व में आई। इसके बाद ऐतिहासिक कलेक्टरेट भवन ने नए शिमला जिले के प्रशासनिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी। इस तरह भवन ने औपनिवेशिक “Political Agency” से लेकर “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States”, स्वतंत्र भारत के जिला प्रशासन और अंततः वर्तमान हिमाचल प्रदेश के जिला कलेक्टरेट तक की पूरी प्रशासनिक यात्रा देखी है।

▪️1815 से 2015 : दो सौ वर्ष की संस्थागत यात्रा
2015 में उपायुक्त कार्यालय की प्रशासनिक संस्था ने अपने 200 वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर शिमला में विशेष समारोह आयोजित किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने The Deputy Commissioner, Shimla: Two Centuries of an Institution, 1815–2015 नामक पुस्तक का विमोचन किया। पुस्तक का संपादन इतिहासकार राजा भसीन ने किया था। इस प्रकाशन में शिमला के उपायुक्त संस्थान के दो शताब्दियों के इतिहास को दस्तावेजी रूप में प्रस्तुत किया गया। इसमें पुराने चित्रों, रेखाचित्रों और प्रशासनिक इतिहास से संबंधित सामग्री को शामिल किया गया था। इस अवसर पर स्मारक डाक आवरण और विशेष डाक-चिह्न भी जारी किए गए थे। यह द्विशताब्दी समारोह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह बात औपचारिक रूप से सामने आई कि शिमला के उपायुक्त कार्यालय की विरासत केवल वर्तमान प्रशासनिक भवन तक सीमित नहीं है। इसकी संस्थागत जड़ें 1815 तक जाती हैं।

▪️संरक्षण की आवश्यकता
समय के साथ शिमला के ऐतिहासिक भवनों पर मौसम, नमी, भारी वर्षा, बर्फ, भूकंपीय जोखिम, बढ़ते शहरी दबाव और निरंतर उपयोग का प्रभाव पड़ा है। उपायुक्त कार्यालय भवन भी इससे अछूता नहीं रहा। 2015 के आसपास INTACH ने इस ऐतिहासिक भवन के संरक्षण और पुनरुद्धार की आवश्यकता पर जोर दिया था। विशेषज्ञों ने भवन की मूल पत्थरकारी, मेहराबों, सीढ़ियों और अन्य ऐतिहासिक स्थापत्य तत्वों को संरक्षित करने की आवश्यकता बताई थी। ऐसे भवनों का संरक्षण केवल पुराने पत्थरों और दीवारों को बचाना नहीं होता। इनका महत्व उस प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में भी है जो इन दीवारों के भीतर घटित हुआ। शिमला का उपायुक्त कार्यालय इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह भवन लगातार बदलती प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बावजूद अपने मूल कार्य—जिला प्रशासन—से जुड़ा रहा है।

▪️आज का कलेक्टरेट
आज शिमला का उपायुक्त कार्यालय जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। उपायुक्त के अतिरिक्त यहां अतिरिक्त उपायुक्त, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, सहायक आयुक्त, जिला राजस्व अधिकारी तथा विभिन्न प्रशासनिक शाखाएं कार्य करती हैं। राजस्व प्रशासन, कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, निर्वाचन, राहत एवं पुनर्वास, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और नागरिक प्रशासन से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण कार्य इसी संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से संचालित होते हैं। इस प्रकार भवन का मूल प्रशासनिक चरित्र आज भी कायम है, यद्यपि उसके भीतर कार्य करने वाली संस्थाएं और शासन प्रणाली ब्रिटिश काल से पूरी तरह बदल चुकी हैं।

▪️इतिहास का जीवंत दस्तावेज
शिमला का वर्तमान उपायुक्त कार्यालय भवन इसलिए विशेष है क्योंकि इसके इतिहास को केवल उसकी दीवारों की उम्र से नहीं मापा जा सकता। इसकी संस्थागत उम्र 1815 से, जबकि वर्तमान भवन की वास्तुशिल्पीय उम्र उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से जुड़ती है। 1815 में आर. रॉस से शुरू हुई प्रशासनिक परंपरा 1822 में कैनेडी के दौर से गुजरी, 1859 में “Deputy Commissioner and Superintendent, Hill States” के रूप में स्पष्ट हुई, गैस्टन हॉल और रोसना हॉल के दौर को पार करते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में वर्तमान कचहरी भवन तक पहुंची। 1904 में ई. जे. बक ने इसे कचहरी के रूप में दर्ज किया। 1947 में इसने ब्रिटिश शासन से भारतीय शासन में संक्रमण देखा और 1972 में पुनर्गठित शिमला जिले के प्रशासनिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका जारी रखी। 2015 में इसकी प्रशासनिक संस्था ने दो सौ वर्ष पूरे किए। इसलिए शिमला का कलेक्टरेट भवन वास्तव में एक भवन से कहीं अधिक—हिमाचल के आधुनिक प्रशासनिक इतिहास का पत्थरों में लिखा हुआ दस्तावेज है। इसकी दीवारों ने ब्रिटिश राजनीतिक एजेंसी का दौर देखा, पहाड़ी रियासतों के साथ बदलते संबंध देखे, औपनिवेशिक न्याय और राजस्व व्यवस्था को देखा, स्वतंत्रता का संक्रमण देखा और स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक जिला प्रशासन को विकसित होते देखा।
आज जब कोई व्यक्ति इस भवन में उपायुक्त कार्यालय के किसी कार्य से प्रवेश करता है, तो वह अनजाने में ही उस प्रशासनिक परंपरा की उसी धारा में प्रवेश करता है जिसकी शुरुआत दो शताब्दी से अधिक पहले हुई थी। DC Shimla
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संदर्भ एवं स्रोत
1. District Administration, Shimla, Government of Himachal Pradesh, History of Shimla — शिमला में ब्रिटिश प्रशासन की शुरुआत, 1815, लेफ्टिनेंट रॉस, कैनेडी हाउस तथा 1972 के प्रशासनिक पुनर्गठन की जानकारी। District Administration Shimla – History

2. District Administration, Shimla, Deputy Collectors Before 1946 — 1815 से उपायुक्त संस्था के पूर्ववर्ती पदों और अधिकारियों का आधिकारिक विवरण। Deputy Collectors Before 1946

3. District Administration, Shimla, Deputy Collectors After 1946 and Ahead — स्वतंत्रता के आसपास से आगे तक शिमला के उपायुक्तों की आधिकारिक सूची। Deputy Collectors After 1946 and Ahead

4. E. J. Buck, Simla, Past and Present, 1904 — औपनिवेशिक शिमला की इमारतों, कचहरी, तारघर तथा प्रशासनिक संस्थानों का समकालीन विवरण। Simla, Past and Present – Internet Archive

5. Town & Country Planning Department, Himachal Pradesh, Heritage of Shimla – Revised Heritage Report — गैस्टन हॉल/रोसना हॉल, वर्तमान कलेक्टरेट भवन तथा उसकी वास्तुशैली संबंधी जानकारी।

6. Raaja Bhasin (Ed.), The Deputy Commissioner, Shimla: Two Centuries of an Institution, 1815–2015, Government of Himachal Pradesh, 2015 — उपायुक्त संस्था के 200 वर्षों का विस्तृत संस्थागत इतिहास।

7. Government of Himachal Pradesh, 2015 — उपायुक्त कार्यालय, शिमला के द्विशताब्दी समारोह संबंधी आधिकारिक सामग्री।

8. The Times of India, “INTACH proposes to restore colonial era DC office building”, 2015 — भवन की आयु, वास्तुशिल्पीय महत्व और संरक्षण प्रस्ताव से संबंधित समकालीन रिपोर्ट। The Times of India – INTACH proposes to restore colonial era DC office building

9. The Economic Times, 2015 — INTACH द्वारा शिमला के ऐतिहासिक उपायुक्त कार्यालय भवन के संरक्षण के प्रस्ताव तथा भवन की वास्तुशिल्पीय विशेषताओं संबंधी रिपोर्ट। The Economic Times – INTACH restoration report

हॉली लॉज, शिमला : एक ऐतिहासिक भवन की कहानी, जिसने औपनिवेशिक शिमला से आधुनिक हिमाचल की राजनीति तक का सफर देखाशिमला की पहा...
10/08/2026

हॉली लॉज, शिमला : एक ऐतिहासिक भवन की कहानी, जिसने औपनिवेशिक शिमला से आधुनिक हिमाचल की राजनीति तक का सफर देखा

शिमला की पहाड़ियों में बसे अनेक पुराने भवन केवल ईंट-पत्थर, लकड़ी और स्लेट की छतों से निर्मित संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे अपने भीतर समय के कई अध्यायों को समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक भवन है हॉली लॉज, जो शिमला के जाखू क्षेत्र में स्थित है। आज हॉली लॉज का नाम सबसे अधिक हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बुशहर राजपरिवार के वंशज राजा वीरभद्र सिंह तथा उनके परिवार के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन इसकी कहानी वीरभद्र सिंह के राजनीतिक जीवन से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। लगभग डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय की यात्रा में हॉली लॉज ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शिमला, आधुनिक कन्या शिक्षा, ब्रिटिश भारतीय सेना, बुशहर रियासत और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक राजनीति—इन सभी महत्वपूर्ण दौरों को करीब से देखा है।

हॉली लॉज के निर्माण की सटीक तारीख को लेकर इतिहास में पूर्ण निश्चितता नहीं मिलती। उपलब्ध विरासत दस्तावेज इसे शिमला में बने शुरुआती महत्वपूर्ण मकानों में शामिल करते हैं। अक्सर यह कहा जाता है कि हॉली लॉज का निर्माण 1866 में हुआ था, लेकिन उपलब्ध प्रमाणों से यह दावा पूरी तरह पुष्ट नहीं होता। 1866 का वर्ष वास्तव में हॉली लॉज के इतिहास में इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी वर्ष इस भवन में एक कन्या विद्यालय की शुरुआत हुई थी। इसका अर्थ यह है कि 1866 तक हॉली लॉज एक स्थापित भवन के रूप में अस्तित्व में आ चुका था। इसके निर्माण का वास्तविक वर्ष, मूल वास्तुकार और प्रारंभिक स्वामित्व से संबंधित अधिक विस्तृत जानकारी के लिए पुराने राजस्व और संपत्ति अभिलेखों की आवश्यकता है।

हॉली लॉज के नाम को लेकर भी एक रोचक पहलू है। इसका नाम अंग्रेजी में “Holly Lodge” लिखा जाता है, न कि “Holy Lodge”। Holly एक सदाबहार वृक्ष या झाड़ी का अंग्रेजी नाम है, जिसे ब्रिटिश संस्कृति में विशेष रूप से क्रिसमस से जोड़ा जाता है। औपनिवेशिक शिमला में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा अपने आवासों को पौधों, फूलों, अंग्रेजी स्थानों और सांस्कृतिक प्रतीकों के नाम देने की परंपरा थी। हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख यह निश्चित रूप से नहीं बताते कि हॉली लॉज का नाम किसी विशेष Holly वृक्ष के कारण रखा गया था या इसके पीछे कोई अन्य कारण था। इसलिए नाम को लेकर प्रचलित व्याख्याओं को प्रमाणित इतिहास के बजाय संभावित व्याख्या के रूप में ही देखना उचित होगा।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हॉली लॉज का संबंध मेजर एस. बी. गोएड से मिलता है। मेजर सैमुअल बोइलो गोएड ब्रिटिशकालीन शिमला के प्रमुख संपत्ति मालिकों में गिने जाते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार एडवर्ड जे. बक ने अपनी पुस्तक “Simla Past and Present” में 1870 के आसपास शिमला की संपत्तियों का विवरण देते हुए उल्लेख किया है कि मेजर गोएड के पास बड़ी संख्या में मकान थे और उनसे उन्हें काफी आय प्राप्त होती थी। उनकी संपत्तियों में Barnes Court, Kennedy House, Victoria Place, Tara Hall और Holly Lodge जैसे महत्वपूर्ण भवन शामिल थे। उस समय हॉली लॉज को शिमला की मूल्यवान संपत्तियों में गिना जाता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के सातवें दशक तक हॉली लॉज शिमला के प्रतिष्ठित आवासीय भवनों में अपनी जगह बना चुका था।

हॉली लॉज के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत कम चर्चित अध्याय कन्या शिक्षा से जुड़ा हुआ है। 1860 के दशक में उत्तर भारत में लड़कियों की आधुनिक शिक्षा को लेकर कुछ ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश परिवारों के बीच प्रयास चल रहे थे। इसी क्रम में रेवरेन्ड जे. बी. डी’एक्विलर ने लड़कियों के लिए एक अच्छे विद्यालय की स्थापना का विचार आगे बढ़ाया। प्रारंभिक विचार इस विद्यालय को डलहौजी या धर्मशाला में स्थापित करने का था, लेकिन बाद में शिमला को इसके लिए चुना गया। बिशप कॉटन की पत्नी सोफिया ऐन कॉटन की भूमिका भी इस प्रयास में महत्वपूर्ण बताई जाती है।

सन् 1866 में हॉली लॉज में “The Punjab Girls’ School” के नाम से एक कन्या विद्यालय की शुरुआत हुई। विद्यालय में प्रारंभ में लगभग 32 छात्राएं थीं और इसकी पहली प्रधानाध्यापिका मिसेज मैकिनन थीं। उस समय भारत में लड़कियों की संस्थागत शिक्षा आज की तरह सामान्य नहीं थी। विशेष रूप से ब्रिटिश परिवारों की बेटियों के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। प्रारंभिक वर्षों में विद्यालय में यूरोपीय मूल की छात्राओं की संख्या अधिक थी, लेकिन समय के साथ भारतीय छात्राओं के लिए भी शिक्षा के अवसर बढ़े। इस दृष्टि से हॉली लॉज का इतिहास केवल शिमला के किसी पुराने मकान का इतिहास नहीं, बल्कि उत्तर भारत में आधुनिक कन्या शिक्षा के विकास की कहानी का भी हिस्सा है।

इस विद्यालय का इतिहास आगे चलकर प्रसिद्ध Auckland House School से जुड़ गया। विद्यालय के लिए Auckland House की संपत्ति 1868 में खरीदी गई थी। भवन की मरम्मत और आवश्यक विस्तार के बाद विद्यालय का वास्तविक स्थानांतरण 6 नवंबर 1869 को Auckland House में हुआ। इसलिए इतिहास के इस हिस्से में एक महत्वपूर्ण तथ्य को समझना आवश्यक है कि हॉली लॉज और Auckland House एक ही भवन नहीं हैं। हॉली लॉज वह स्थान था जहां विद्यालय ने 1866 में अपनी यात्रा शुरू की थी, जबकि बाद में विद्यालय Auckland House परिसर में स्थानांतरित हुआ और वहीं से उसकी संस्थागत यात्रा आगे बढ़ी। इस प्रकार वर्तमान Auckland House School के इतिहास में हॉली लॉज का स्थान उसके प्रथम परिसर के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विद्यालय के Auckland House चले जाने के बाद हॉली लॉज पुनः एक निजी प्रतिष्ठित आवास के रूप में उपयोग होने लगा। इसके बाद इसका संबंध ब्रिटिश भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से भी रहा। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में लेफ्टिनेंट जनरल सर जेराल्ड डी कर्सी मॉर्टन का नाम हॉली लॉज के प्रमुख निवासियों में आता है। मॉर्टन ब्रिटिश भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी थे और भारत में सैन्य प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उनका हॉली लॉज में निवास इस बात का प्रमाण है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह भवन शिमला के उच्च सैन्य एवं प्रशासनिक वर्ग से जुड़ा हुआ था।

हॉली लॉज की कहानी इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों के दायरे से निकलकर हिमाचल की पहाड़ी रियासतों के इतिहास से जुड़ती है। आगे चलकर यह भवन बुशहर रियासत के राजा सर पदम सिंह के स्वामित्व में आया। बुशहर तत्कालीन हिमालयी क्षेत्र की प्रमुख पहाड़ी रियासतों में से एक थी और रामपुर इसका प्रमुख केंद्र था। बुशहर के शासकों का शिमला से भी गहरा संबंध था। ब्रिटिशकाल में शिमला केवल ब्रिटिश अधिकारियों का शहर नहीं था; यह आसपास की पहाड़ी रियासतों के शासकों, राजपरिवारों और उच्च वर्ग के लिए भी महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक केंद्र बन चुका था। ऐसे में शिमला में बुशहर राजपरिवार की संपत्ति का होना उस समय के सामाजिक-राजनीतिक संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण है।

राजा सर पदम सिंह के स्वामित्व में आने के बाद हॉली लॉज बुशहर राजपरिवार की शिमला स्थित प्रमुख संपत्तियों में शामिल हो गया। हालांकि हॉली लॉज के उनके स्वामित्व में आने की सटीक तारीख को लेकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों में स्पष्ट और सर्वसम्मत प्रमाण नहीं मिलता। कई स्थानों पर अलग-अलग वर्ष बताए जाते हैं, लेकिन मूल बिक्री-विलेख या उस हस्तांतरण का प्रत्यक्ष अभिलेख सार्वजनिक रूप से पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस संबंध में निश्चित वर्ष बताने के बजाय इतना कहना अधिक सुरक्षित है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हॉली लॉज बुशहर राजपरिवार की संपत्ति बन चुका था।

स्वतंत्रता के बाद भारत में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया के साथ बुशहर राजपरिवार की संपत्तियों की स्थिति भी नए प्रशासनिक ढांचे में दर्ज हुई। 27 जून 1950 के भारत सरकार के एक Acceptance Note का उल्लेख बाद के चुनावी हलफनामों में मिलता है। इसमें शिमला स्थित राजपरिवार की संपत्तियों के विवरण में Holly Lodge, Holly Lodge Annexe, Padam Cottage और कर्मचारियों के आवास आदि का उल्लेख मिलता है। यह दस्तावेज इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इससे स्वतंत्रता के बाद हॉली लॉज और उससे संबंधित संपत्ति परिसर की औपचारिक स्थिति का संकेत मिलता है। यहां यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि Holly Lodge और Padam Cottage या Padam Castle को एक ही भवन मानना सही नहीं है। ये अलग-अलग संरचनाएं थीं, हालांकि उनका संबंध एक ही राजपरिवार और संपत्ति-परिसर से रहा।

बुशहर राजपरिवार की अगली पीढ़ी में राजा वीरभद्र सिंह का नाम भारतीय राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण बनकर सामने आया। 23 जून 1934 को जन्मे वीरभद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत में सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना और आगे चलकर हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री बने। वे लंबे समय तक हिमाचल प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे। उनके राजनीतिक जीवन में हॉली लॉज धीरे-धीरे एक सामान्य निजी आवास से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान बन गया।

वीरभद्र सिंह का आधिकारिक मुख्यमंत्री आवास Oakover था, इसलिए हॉली लॉज को सरकारी मुख्यमंत्री आवास कहना सही नहीं होगा। हॉली लॉज उनका पारिवारिक और निजी आवास था। लेकिन उनकी राजनीतिक लोकप्रियता और लंबे सार्वजनिक जीवन के कारण यह निजी आवास धीरे-धीरे हिमाचल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अनौपचारिक राजनीतिक केंद्र बन गया। प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले लोग, कांग्रेस कार्यकर्ता, समर्थक, स्थानीय नेता और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि यहां अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते रहे। समय के साथ “हॉली लॉज” केवल एक भवन का नाम नहीं रहा, बल्कि हिमाचल की राजनीति में एक राजनीतिक प्रभाव-केंद्र के रूप में स्थापित हो गया।

वीरभद्र सिंह की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनका व्यापक जनसंपर्क और हिमाचल के ग्रामीण एवं पहाड़ी क्षेत्रों में मजबूत व्यक्तिगत प्रभाव था। उनकी राजनीति का यह पक्ष हॉली लॉज के वातावरण में भी दिखाई देता था। शिमला के राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह चर्चा होती थी कि प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए लोग अपने नेता से मिलने के लिए हॉली लॉज पहुंचते हैं। यही कारण है कि समय के साथ “हॉली लॉज” शब्द स्वयं एक राजनीतिक पहचान बन गया। यह पहचान किसी सरकारी पद या संवैधानिक अधिकार से नहीं, बल्कि दशकों में निर्मित व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव और बुशहर राजपरिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से बनी थी।

वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान और उसके बाद भी हॉली लॉज हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बना रहा। पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन, नेतृत्व और संगठनात्मक मामलों की चर्चा में कई बार “हॉली लॉज” का उल्लेख एक राजनीतिक धड़े या नेतृत्व-परंपरा के प्रतीक के रूप में किया गया। इस प्रकार एक ऐतिहासिक ब्रिटिशकालीन भवन धीरे-धीरे आधुनिक हिमाचली राजनीति की शब्दावली का हिस्सा बन गया।

हॉली लॉज की राजनीतिक पहचान का सबसे भावनात्मक अध्याय 8 जुलाई 2021 के बाद सामने आया, जब वीरभद्र सिंह का निधन हुआ। उनके निधन के पश्चात उनके पार्थिव शरीर को हॉली लॉज लाया गया। बड़ी संख्या में लोग, राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता और आम नागरिक यहां अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे। इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को शिमला के अन्य सार्वजनिक स्थलों से होते हुए रामपुर स्थित पदम पैलेस ले जाया गया। इस घटना ने एक बार फिर यह दिखाया कि हॉली लॉज वीरभद्र सिंह के लिए केवल उनका निवास नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन की स्मृतियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

वीरभद्र सिंह के निधन के बाद भी हॉली लॉज का राजनीतिक महत्व समाप्त नहीं हुआ। उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और पुत्र विक्रमादित्य सिंह के राजनीतिक जीवन के कारण यह स्थान आज भी हिमाचल की राजनीति में बुशहर परिवार की राजनीतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। हालांकि समय के साथ राजनीति बदलती है, राजनीतिक दलों की संरचना बदलती है और नेतृत्व की नई पीढ़ियां सामने आती हैं, लेकिन कुछ स्थान राजनीतिक स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। हॉली लॉज उन्हीं स्थानों में से एक है।

वास्तु एवं विरासत की दृष्टि से भी हॉली लॉज महत्वपूर्ण है। शिमला की विरासत सूची में इसे “Palace–Residence Holly Lodge” के रूप में दर्ज किया गया है। यह उल्लेख इस बात की पुष्टि करता है कि भवन को शिमला के ऐतिहासिक निर्मित विरासत-संसाधनों में स्थान प्राप्त है। हालांकि इसकी वर्तमान संरचना में समय-समय पर हुए परिवर्तन, मूल निर्माण सामग्री, वास्तुशिल्पीय शैली और बाद के विस्तारों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन अभी भी आवश्यक है। किसी पुराने भवन के इतिहास को केवल उसके वर्तमान स्वरूप के आधार पर समझना कठिन होता है, क्योंकि ब्रिटिशकालीन शिमला के अनेक भवनों में समय के साथ मरम्मत, विस्तार और पुनर्निर्माण होते रहे हैं।

हॉली लॉज के इतिहास की एक विशेषता यह भी है कि इसका महत्व एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। यदि इसके इतिहास को क्रमवार देखा जाए तो इसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक संपत्ति व्यवस्था, शिमला के शुरुआती आवासीय विकास, महिला शिक्षा, ब्रिटिश भारतीय सेना, पहाड़ी रियासतों, स्वतंत्र भारत में राजपरिवारों की स्थिति और आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति—सभी की छाप दिखाई देती है। संभवतः यही कारण है कि शिमला के अन्य पुराने भवनों की तरह हॉली लॉज भी शहर की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।

हॉली लॉज की कहानी को समझने के लिए इसे केवल “वीरभद्र सिंह का घर” कहना इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा। वीरभद्र सिंह के कारण इसकी राजनीतिक प्रसिद्धि निश्चित रूप से सबसे अधिक हुई, लेकिन इसकी कहानी उनसे लगभग सौ वर्ष पहले शुरू हो चुकी थी। 1866 में यहां शुरू हुआ Punjab Girls’ School इस भवन को भारतीय शिक्षा इतिहास से जोड़ता है। मेजर एस. बी. गोएड का स्वामित्व इसे औपनिवेशिक शिमला की संपत्ति व्यवस्था से जोड़ता है। सर जेराल्ड डी कर्सी मॉर्टन का निवास इसे ब्रिटिश भारतीय सैन्य इतिहास से जोड़ता है। राजा सर पदम सिंह और बुशहर राजपरिवार इसे हिमालयी रियासतों के इतिहास से जोड़ते हैं। और अंततः वीरभद्र सिंह का लंबा राजनीतिक जीवन इसे स्वतंत्र भारत के हिमाचली राजनीतिक इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

इस दृष्टि से हॉली लॉज शिमला के उन चुनिंदा भवनों में है जिनका इतिहास किसी एक कालखंड में बंद नहीं होता। इसकी दीवारों ने औपनिवेशिक भारत की बदलती सत्ता को देखा, एक ऐसे दौर को देखा जब लड़कियों की शिक्षा स्वयं एक सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक थी, ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों के जीवन को देखा, बुशहर राजपरिवार की शिमला उपस्थिति को देखा और स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के विकास के साथ एक राजनीतिक परिवार के उत्थान को भी देखा।

आज जब शिमला की पुरानी इमारतें तेजी से बदलते शहरी दबाव, निर्माण गतिविधियों और आधुनिक आवश्यकताओं के बीच अपनी पहचान बचाने का प्रयास कर रही हैं, तब हॉली लॉज जैसे भवनों का महत्व और बढ़ जाता है। इनका संरक्षण केवल किसी पुराने मकान को बचाना नहीं है, बल्कि शहर की सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखना है। हॉली लॉज की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि इसके इतिहास में शिमला और हिमाचल के व्यापक इतिहास की कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं।

यदि शिमला को केवल ब्रिटिशकालीन ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में देखा जाए तो हॉली लॉज की कहानी अधूरी रह जाएगी। यह भवन उस शिमला का भी प्रतिनिधित्व करता है जो ब्रिटिश सत्ता के बाद भारतीय राजपरिवारों, सामाजिक संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों और लोकतांत्रिक राजनीति का केंद्र बना। यही कारण है कि हॉली लॉज का इतिहास वास्तव में एक भवन का इतिहास नहीं, बल्कि शिमला के बदलते चरित्र और हिमाचल के सामाजिक-राजनीतिक रूपांतरण की एक लंबी कहानी है।

हॉली लॉज की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत इस तथ्य में निहित है कि अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों ने इसे अलग अर्थ दिए। ब्रिटिशकाल में यह एक प्रतिष्ठित निजी आवास था; 1866 से यह कन्या शिक्षा के इतिहास का हिस्सा बना; बाद में यह वरिष्ठ ब्रिटिश सैन्य अधिकारी का निवास रहा; बुशहर राजपरिवार के हाथों में आने के बाद यह पहाड़ी राजसत्ता की शिमला स्थित उपस्थिति का प्रतीक बना; और वीरभद्र सिंह के लंबे राजनीतिक जीवन के दौरान यह हिमाचल की लोकतांत्रिक राजनीति में एक प्रभावशाली नाम बन गया। इस तरह हॉली लॉज ने सत्ता के कई रूपों—औपनिवेशिक सत्ता, सैन्य सत्ता, राजसत्ता और लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रभाव—को बदलते हुए देखा है।

यही बहुस्तरीय इतिहास हॉली लॉज को शिमला की विरासत में विशिष्ट बनाता है। इसकी वास्तविक कहानी केवल इस बात में नहीं है कि इसमें कौन-कौन रहा, बल्कि इस बात में है कि लगभग डेढ़ सौ वर्षों में शिमला और हिमाचल स्वयं कैसे बदलते गए। एक ऐसे भवन के रूप में जिसने औपनिवेशिक युग से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक भारत तक का सफर देखा है, हॉली लॉज आज भी शिमला के इतिहास की एक जीवित कड़ी है—एक ऐसी कड़ी, जिसमें शिक्षा, औपनिवेशिक प्रशासन, सैन्य इतिहास, राजपरंपरा और लोकतांत्रिक राजनीति, सभी एक साथ दिखाई देते हैं।

References...............
🔸Edward J. Buck, Simla Past and Present, 1925.
Shimla Revised Heritage Report — Holly Lodge Heritage Record.
🔸Auckland House School, Shimla — Official History.
🔸INTACH — Shimla Heritage Inventory.
🔸Government of India — Acceptance Note dated 27 June 1950, regarding Bushahr Estate.
Virbhadra Singh — Election Affidavits / MyNeta, property details.
🔸Hindustan Times — Of Auckland House, its ghosts and women trailblazers.
🔸ABP News — वीरभद्र सिंह के घर हॉली लॉज में कभी चलता था अंग्रेजों का स्कूल.
🔸The Tribune — Articles on Holly Lodge, Virbhadra Singh and Bushahr royal family.
🔸Times of India — Reports on Holly Lodge and Virbhadra Singh's political legacy.
🔸Shimla Municipal Corporation / Heritage Conservation documentation.
🔸Auckland House School archival history and institutional records.

Virbhadra Singh Vikramaditya Singh

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