08/07/2026
यहाँ मसौढ़ी की वर्तमान दयनीय स्थिति पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है:
मसौढ़ी का बदहाल सचः विकास के नाम पर 'दुर्गति' का दंश
तस्वीरों में दिख रही यह कीचड़ से सनी सड़क और अधूरा पुल किसी युद्ध क्षेत्र का नहीं, बल्कि बिहार के मसौढ़ी का दृश्य है। यह उन लोगों की वास्तविकता है जो वर्षों से बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सवाल सत्ताधारी दल का नहीं है, सवाल उन जन-प्रतिनिधियों का है जिन्होंने बारी-बारी से यहाँ की जनता को सिर्फ आश्वासन दिए।
एक दशक का पुराना दर्द: अंधेरे से कीचड़ तक का सफर
आज जो समस्या एक पुल निर्माण के कारण बनी है, मसौढ़ी की पीड़ा उससे कहीं पुरानी है। एक दशक पहले की बात करें, तो यहाँ की जनता बिजली की भीषण समस्या से जूझ रही थी। बिजली की आँख-मिचौली ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। उस वक्त भी जनता ने संघर्ष किया, आवाज उठाई, लेकिन समाधान नाम मात्र का ही मिला।
गुमटी लाइनः घंटों का इंतज़ार और अंतहीन जाम
बिजली की समस्या से उबरते-उबरते जनता 'गुमटी लाइन' के जाम में फंस गई। रेलवे फाटक पर लगने वाला घंटों का जाम मसौढ़ी के लोगों के लिए रोज़मर्रा का 'अभिषाप' बन गया था। स्कूल जाने वाले बच्चे हों या अस्पताल जाते मरीज़, सब इस जाम में घुटते रहे। तब उम्मीद जगी थी कि चलो, अब पुल बन जाएगा तो शायद ये जाम खत्म होगा और जीवन सुगम होगा।
पुल का निर्माण या आपदा का आमंत्रण?
परंतु, जब पुल का निर्माण शुरू हुआ, तो लगा जैसे विकास नहीं, बल्कि 'आपदा' ने दस्तक दी है। तस्वीरों में स्पष्ट दिख रहा है कि पुल के बगल में आवागमन के लिए कोई सुरक्षित रास्ता तक नहीं है। यह कीचड़ भरा दलदल किसी के भी गिरने और घायल होने के लिए पर्याप्त है। यहाँ से गुज़रना रोज़मर्रा का एक बड़ा जोखिम बन गया है। न पैदल चलने वालों के लिए जगह है, न ही गाड़ियों के लिए।
ठेकेदारों का मनोबल इतना ऊंचा है कि उन्हें जनता की जान-माल की कोई परवाह नहीं। ऐसा लगता है कि इस निर्माण में शामिल अधिकारियों और ठेकेदारों की 'कमीशन' वाली तिजोरी तो भर रही है, लेकिन जनता का खून पसीना इस कीचड़ में बह रहा है।
बदलते चेहरे, वही पुरानी लाचारी
मसौढ़ी की यह त्रासदी सदियों से एक जैसी है। सरकार बदली, विधायक बदले, सांसद भी आए और गए, लेकिन मसौढ़ी की किस्मत कभी नहीं बदली। हर चुनाव में इन समस्याओं के समाधान के बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे वादे भी इन सड़कों के कीचड़ में दब गए।
क्या मसौढ़ी की जनता का हक़ सिर्फ परेशानियाँ उठाना ही है? क्या विकास का पैमाना सिर्फ ऐसी अधूरी परियोजनाएं हैं जो आम आदमी की जान पर बन आएं?
आज ज़रूरत है कि प्रशासन नींद से जागे, ठेकेदारों पर लगाम कसे और निर्माण कार्य में मानकों का पालन सुनिश्चित कराए। मसौढ़ी की जनता को केवल पुल नहीं, बल्कि सम्मान के साथ सुरक्षित जीने का अधिकार भी चाहिए।