24/05/2026
नामदेव जी गोरा कुम्हार जी के यहाँ बैठे हुए थे। बड़े-बड़े महापुरुष भी वहाँ थे। मुक्ताबाई जी भी वहाँ थीं।
उन्होंने गोरा जी से कहा काका इन मटकियों में से कौन सी मटकी कच्ची है, मैं अभी बताती हूँ। बड़े-बड़े संत वहाँ बैठे थे, सब मुस्कुरा दिये।
उन्होंने नामदेव जी के सर पर मारा (जैसे एक कुम्हार मटकी को ठोक कर देखता है कि वो कच्ची है या पक्की), तो उन्होंने कहा हटिए, ये क्या कर रहीं हैं आप?
मुक्ताबाई जी ने कहा काका ये मटकी कच्ची है, बोल जो पड़ी। सब संतों ने भी हँस कर कह दिया कि हाँ, सच में कच्ची है।
नामदेव जी ने सोचा कि ठाकुर जी का दर्शन और साक्षात्कार ही एक मात्र सत्य है, और ठाकुर जी तो रोज़ मेरे साथ खेलते हैं और खाते हैं, फिर मैं कैसे कच्चा हूँ?
वो सीधा भगवान विठ्ठल जी के पास गए और कहा कि सबसे बड़ी सिद्ध अवस्था यही है कि भगवान भक्त से बात करें और आप तो मेरे साथ खेलते हो, फिर उन संतों ने ऐसा क्यों कहा कि मैं कच्चा हूँ, क्या में सच में कच्चा हूँ?
ठाकुर जी ने भी बोल दिया कि हाँ आप अभी कच्चे हैं। नामदेव जी ने पूछा फिर पक्का होना क्या होता है?
विठ्ठल जी ने कहा जंगल में एक शंकर जी का मंदिर है, वहाँ एक विसोबा खेचर नाम के संत हैं, आप उनके चरणों में बैठें और वो जो उपदेश करें, उसका पालन कीजिए, फिर आप पक्के हो जाएँगे।
नामदेव जी भगवान विठ्ठल के कहने पर विसोबा खेचर जी के पास गये। विसोबा जी शंकर जी के शिवलिंग पर पैर रख कर आराम से सोए हुए थे।
नामदेव जी ने सोचा कि कोई साधारण आस्तिक इंसान भी ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन भगवान ने मुझे इनको गुरु बनाना को कहा, बात समझ नहीं आई।
नामदेव जी ने विसोबा जी से कहा पैर हटाइए महाराज, आप शंकर जी के ऊपर पैर रख कर क्यों सो रहे हैं? विसोबा जी ने कहा, बेटा जहाँ शंकर जी ना हों, वहाँ मेरे पैर रख दीजिए।
नामदेव जी ने उनके पैर पकड़े और जहाँ-जहाँ रखे वहाँ शिवलिंग प्रकट हो गया। नामदेव जी समझ गये कि यह तो कोई सिद्ध पुरुष हैं।
नामदेव जी ने विसोबा जी से कहा प्रभु, मैं आपकी महिमा को जान नहीं पाया, आप उपदेश कीजिए। विसोबा जी ने कहा बेटा बस इतनी बात समझनी है कि कोई ऐसा कण नहीं है जहाँ विठ्ठल ना हों। सब जगह विठ्ठल, सबमें विठ्ठल। नामदेव जी ने इस गुरु उपदेश को अपने हृदय में धारण कर लिया।
एक दिन नामदेव जी विठ्ठल जी के लिए रोटी बना रहे थे। वो रोटी रख कर घी गर्म करने गये। इतने में एक कुत्ता आया और विठ्ठल जी के लिए बनाई हुई रोटी को खाने लगा।
नामदेव जी ने कुत्ते से कहा, प्रभु ऐसे रूखी रोटी मत खाओ, मुझे इस पर घी लगा लेने दो पहले, और उस कुत्ते के पीछे दौड़ने लगे। उस कुत्ते से भगवान विठ्ठल प्रकट हो गये।
विठ्ठल जी ने कहा देखा, तुमने मुझे पहचान लिया ना। जब तुम्हें कच्ची मटकी कहा गया था तो तुम मंदिर में मुझ से शिकायत करने आये थे, और आज जब गुरु कृपा हो गई और आप पक्के हो गए तो आपने कुत्ते में भी मुझे ढूँढ लिया।
एक दिन नामदेव जी ने भगवान विठ्ठल जी से कहा कि अब आप कितना भी छुपो, मैं आपको पहचान लूँगा। विठ्ठल जी ने कहा अच्छा ठीक है, देखते हैं!
एकदम से नामदेव जी के मन में आया कि मंदिर में बड़ा कोलाहल हो रहा है, मंदिर के पीछे जाकर बैठते हैं, और शांति से प्रभु का ध्यान करते हैं।
पीछे बैठे तो कुछ लड़के वहाँ आकर खेलने लगे। उनके भजन में विक्षेप पड़ा, उन्होंने सोचा नदी किनारे चलते हैं। नदी किनारे जाकर बैठे तो वहाँ बैलगाड़ियाँ आकर रुकने लगी, नामदेव जी ने कहा शोर मत मचाओ, मैं यहाँ भजन कर रहा हूँ।
एक बैलगाड़ी से एक पुरुष और स्त्री गड़ासा (तेज धार वाला ब्लेड) लेकर निकले। वो आपस में बात करने लगे कि बड़ी भूख लगी है, आज कोई शिकार तो मिला नहीं, ये आदमी मिला है, इसी को मारकर खा लेते हैं।
दोनों नामदेव जी के पीछे भागने लगे। नामदेव जी ने भी अपनी धोती पकड़ी और भागने लगे।
नामदेव जी भागकर विठ्ठल जी के मंदिर में पहुँचे और हाँफने लगे। विठ्ठल जी ने पूछा कहाँ से भागते हुए आ रहे हो?
नामदेव जी ने कहा, बच गया प्रभु, एक स्त्री और पुरुष मुझे काट कर खाने की कोशिश कर रहे थे। विठ्ठल जी ने कहा, पहचान नहीं पाए ना, मैं ही तो था! * राधे राधे।
Mohit Raman Mishra