Mohit Raman Mishra

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27/05/2026

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यामाराध्य विरिञ्चिरस्य जगतः स्त्रष्टा हरिः पालकः
संहर्ता गिरिशः स्वयं समभवद्धयेया च या योगिभिः ।
यामाद्यां प्रकृतिं वदन्ति मुनयस्तत्त्वार्थविज्ञाः परां
तां देवीं प्रणमामि विश्वजननीं स्वर्गापवर्गप्रदाम् ॥

❝जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत्‌के सृजनकर्ता हुए, भगवान् विष्णु पालनकर्ता हुए तथा भगवान् शिव संहार करनेवाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और तत्त्वार्थ जाननेवाले मुनिगण जिन्हें मूल प्रकृति कहते हैं— स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली उन जगज्जननी भगवतीको मैं प्रणाम करता हूँ।❞

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Mohit Raman Mishra

“भक्त गोराजी कुम्हार”पंढ़रपुर में विट्ठलनाथजी के परम् भक्त गोराजी कुम्हार अपनी पत्नी तथा दो वर्ष के बच्चें के साथ रहते थ...
25/05/2026

“भक्त गोराजी कुम्हार”
पंढ़रपुर में विट्ठलनाथजी के परम् भक्त गोराजी कुम्हार अपनी पत्नी तथा दो वर्ष के बच्चें के साथ रहते थे। गोराजी मन में प्रभु का सुमिरन करते तथा मिट्टी के बर्तन बनाते।

एक दिन उनकी पत्नी पानी भरने गई तथा बालक को गोराजी के पास छोड़ गई। पहले पानी दूर-दूर से लाना होता था। बच्चे को खेलता देखकर गोराजी ने सोचा की कुछ काम कर लेना चाहिये। वे मिट्टी के ढ़ेर पर पानी छिड़ककर पैरों से मिट्टी कुचलने लगे तथा मुँह से विट्ठल-विट्ठल नाम का जप करने लगे। पैरों से मिट्टी कुचलते-कुचलते उनकी आँखे बन्द हो गई तथा वह परमात्मा में स्थिर हो गये। पैर से मिट्टी कुचलने का कार्य चालू था और उनकी समाधि सी लग गई थी।

उनके बालक की नजर खेलते-खेलते पिता पर पड़ी तो वह उनकी ओर आया सोचा पिता उनसे प्यार करेंगे परन्तु बालक जैसे ही पास आया गोराजी का पैर बालक पर पड़ा और बालक मिट्टी में दब गया बालक चीखा परन्तु गोराजी तो भक्ति में मग्न थे। बालक की आवाज उनके कानों तक नहीं पहुँची तथा बालक मिट्टी में मिल गया उनके पैरों से कुचला गया व हड्डियाँ निकल आयीं और बालक मर गया।

पत्नी पानी लेकर आई तो बालक नहीं दिखा, हर जगह ढुढने लगी, उसके रोने पर आस-पास के लोग इकठ्ठे हो गये। गोराजी तो भक्ति में मग्न थे उन्हें कोई होश नहीं था। परन्तु जब पत्नी ने उन्हें स्पर्श किया व हिलाया तो उनकी समाधि टुट गई जब उन्होंने पड़ोसियों व गाँव वालों को देखा तो पुछने लगे की क्या हुआ तो पत्नी ने पुछा की बालक को आपके पास छोड़ कर गई थी, वह बालक कहाँ है बालक मिल नहीं रहा है। तभी अचानक पत्नी की दृष्टि मिट्टी पर पड़ी तो देखा कि बालक कि हड्डियाँ निकल गई है तथा मिट्टी में मरा पड़ा है जब यह दृश्य देखा तो उनकी पत्नी जोर-जोर से रोने लगी।

पड़ोसी भी गोराजी को कहने लगे कि ऐसी भक्ति किस काम की, बालक पैरों में कुचला गया फिर भी पता न लगा ; तथा गोराजी को भला-बुरा कहने लगे। उनकी पत्नी के ममुख से भी पुत्र मोह में गोराजी को ईश्वर भक्ति के विरूद्ध बुरे शब्द निकल गये। जब पत्नी ने कहा तो गोराजी को बुरा लगा तथा कहने लगे कि बालक का समय आ गया होगा, इसलिए चला गया ये जीवन स्वप्न है इसलिए चिंता न कर प्रभु जो करता है अच्छा ही करता है अत: शोक न कर।

प्रभु ने जब देखा तो भक्त की परेशानी दूर करने के लिए भगवान योगी का रूप धर कर गोराजी के द्वार पर आये तथा अलख जगाई। गोराजी की पत्नी का नियम था कि घर आये अतिथि को भोजन कराये बिना कभी भी जाने नहीं देती थीं। द्वार पर साधु को आया देखकर उसने पुत्र को वस्त्र से ढँक दिया तथा योगी को आसन देकर भोजन बनाने रसोइघर में गयी। भोजन बनाने के बाद योगी को जीमने की प्रार्थना की तब योगी ने कहा कि तेरे पुत्र को बुला और जब तक तेरा पुत्र नहीं आयेगा, मैं भोजन नहीं करूँगा।

तब गोराजी की पत्नी कहने लगी कि बालक तो खेलने गया है, आप भोजन कर लें बालक बाद में खा लेगा। परन्तु योगी ज़िद करने लगे कि तुम्हारे पुत्र के बिना में नहीं खाऊँगा। तो गोराजी की पत्नी ने कहा कि बालक मेहमान गया है। यह कहकर रोने लगी। तब योगी ने पुत्र की लाश पर से कपड़ा खींचा ओर बोले कि झुठ क्यों बोल रही है, तुम्हारा लड़का तो यह रहा। जैसे ही कपड़ा खींचा बालक उठ बैठा। मृत्यु को प्राप्त हुआ बालक जीवित हो गया।

जब गोराजी को पुत्र के जीवित होने का समाचार सुनाने उनकी पत्नी पहुँची तो गोराजी अपनी पत्नी पर गुस्सा हुए तथा कहा कि तुम्हारे कारण मेरे प्रभु को इस पृथ्वी पर वैकुण्ठ छोड़कर आना पड़ा। यदि तुमने मेरी प्रभु भक्ति के बारे में भला बुरा न कहा होता तो आज मेरे प्रभु को कष्ट न होता। तेरे कारण मेरे प्रभु को दु:ख सहना पड़ा है, इसलिए आज से तुम मेरी पत्नी नहीं हो, आज से तुम मेरी माता के समान हो जैसे ही उनकी पत्नी ने यह सुना वो बेहोश होकर गिर गई।

जब होश आया तब सोचने लगी की कोई दूसरी स्त्री विवाह करके आयेगी तो पति को तकलीफ होगी क्यों न इनके साथ मेरी बहन की ही शादी करवा दूँ, जिससे ठीक रहेगा। ऐसा सोचकर वह अपने पीहर गई तथा मॉ से बोली कि तुम्हारे जमाई को फिर से शादी करने की इच्छा है अत: मेरी छोटी बहन की शादी इनके साथ करवा दो। माँ ने सोचा की बड़ी बेटी सुखी है, जमाई जी भी अच्छे हैं। अत: उन्होंने छोटी बेटी का सम्बन्ध करने में तनिक भी नहीं सोचा, तथा ब्राह्मण से नारियल विवाह के लिए भिजवाया, और पत्नी के आग्रह के कारण गोराजी ने विवाह करना स्वीकार कर लिया

विवाह के बाद विदाई के वक्त सासुजी ने जमाई से कहा कि जैसे तुम मेरी बड़ी बेटी को अच्छा रखते हो वैसे ही मेरी छोटी बेटी को अच्छा रखना। तब गोराजी ने कहा कि बड़ी माँ तो छोटी बहन। शादी के बाद भक्त जी घर के कार्यों मे लग गये। थोड़े दिनों तक जब पत्नी की बहन को पति सुख नहीं मिला, तो वह लोगो से बातें करने लगी कि उसे पति सुख नहीं मिला, तथा बड़ी बहन के कारण मेरी ज़िन्दगी खराब हो गई।

धीरे-धीरे जब यह बात बड़ी बहन ने सुनी कि गोराजी उसकी छोटी बहन के साथ पत्नी का सम्बन्ध नहीं रखते हैं तो उसे बड़ा दु:ख हुआ तथा उसने दोनों में प्रेम हो ऐसी युक्ति सोची। जब गोराजी सो रहे थे तब एकांत में अपनी बहन को ले जाकर गोराजी के पास सुला दिया। जब रात को गोराजी का हाथ का स्पर्श स्त्री से हुआ तो गोराजी जग गये। तथा अपने आपको धिक्कारने लगे कि जिसे बहन माना उसको इन हाथों ने स्पर्श किया ऐसा सोचकर गोराजी ने अपने हाथों को काट डाला। ऐसा होते देखकर पत्नी भयभीत हो गई तथा रोने लगी। गोराजी के हाथ कट जाने से बर्तन नहीं बनने की वजह से परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई।

जब भगवान ने देखा की भक्त की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है, तो भक्त की परेशानियों को दूर करने के लिए भगवान विट्ठलनाथ ने कमलानाथ नामक कुम्हार का वेश धरा, गरूड़ को गधा बनाया तथा लक्ष्मी जी को कुम्हारन बनाया और गोराजी के घर पर आकर कहने लगे। भगत जी मेरे देश में अकाल पड़ा है अत: हम इधर आ गये हैं, हमें नौकरी पर रख लो। गोराजी ने कहा मैं गरीब हूँ, भला मैं तुम्हे क्या दे सकता हूँ। तुम किसी ओर के पास जाकर नौकरी कर लो। तब भगवान बोले कि मुझे पैसा नहीं चाहिये केवल दो वक्त का भोजन दे देना। गोराजी ने हामी भर दी। भगवान सुन्दर बर्तन बनाने लगे जिससे गोराजी की आय भी बढ़ गई।

एक बार संत नामदेव जी विट्ठलनाथजी के दर्शन को मन्दिर में गये तो उन्हें मूर्ति में भगवान का तेज नहीं दिखा तो भगवान का दर्शन करने के लिए नामदेवजी ने जैसे ही ध्यान लगाया तब पता चला कि भगवान तो गोराजी कुम्हार के यहाँ नौकरी कर रहे हैं। तो नामदेवजी गोराजी के घर पर गये। भक्त नामदेवजी को आता देखकर गोराजी प्रसन्न हुए तथा आसन दिया। तभी भगवान नामदेवजी को आता देखकर मिट्टी के पीछे छिप गये, तथा बाद में मन्दिर चले गये।

जब नामदेवजी ने गोराजी को बताया कि तुमने भगवान को तकलीफ दी है। तुम्हारे यहाँ भगवान नौकरी कर रहे हैं। तो गोराजी पश्चाताप करने लगे। फिर अपनी पत्नी व पुत्र के साथ भगवान के पास गये तथा भगवान से क्षमायाचना करने लगे। तब भगवान ने पूछा कि तुम अपनी पत्नी के साथ संबंध क्यों नहीं रखते हो। तब गोराजी ने बताया की सासुजी के वचन के कारण में सम्बन्ध नहीं रख रहा हूँ।

भगवान ने कहा कि पहली पत्नी का त्याग किया उसका भी निमित्त तुमने मुझे बनाया है अत: आज से मेरी आज्ञा है कि तुम दोनों स्त्रियों के साथ प्रसन्न रहो। तभी गोराजी के हाथ भी ठीक हो गये। भक्त गोराजी अच्छे से अपनी दोनों पत्नी व बच्चे के साथ अच्छे से रहने लगे।

❤🙏❤ जय जय श्री राधे ❤️🙏❤️

Mohit Raman Mishra

नामदेव जी गोरा कुम्हार जी के यहाँ बैठे हुए थे। बड़े-बड़े महापुरुष भी वहाँ थे। मुक्ताबाई जी भी वहाँ थीं।उन्होंने गोरा जी ...
24/05/2026

नामदेव जी गोरा कुम्हार जी के यहाँ बैठे हुए थे। बड़े-बड़े महापुरुष भी वहाँ थे। मुक्ताबाई जी भी वहाँ थीं।
उन्होंने गोरा जी से कहा काका इन मटकियों में से कौन सी मटकी कच्ची है, मैं अभी बताती हूँ। बड़े-बड़े संत वहाँ बैठे थे, सब मुस्कुरा दिये।

उन्होंने नामदेव जी के सर पर मारा (जैसे एक कुम्हार मटकी को ठोक कर देखता है कि वो कच्ची है या पक्की), तो उन्होंने कहा हटिए, ये क्या कर रहीं हैं आप?

मुक्ताबाई जी ने कहा काका ये मटकी कच्ची है, बोल जो पड़ी। सब संतों ने भी हँस कर कह दिया कि हाँ, सच में कच्ची है।

नामदेव जी ने सोचा कि ठाकुर जी का दर्शन और साक्षात्कार ही एक मात्र सत्य है, और ठाकुर जी तो रोज़ मेरे साथ खेलते हैं और खाते हैं, फिर मैं कैसे कच्चा हूँ?

वो सीधा भगवान विठ्ठल जी के पास गए और कहा कि सबसे बड़ी सिद्ध अवस्था यही है कि भगवान भक्त से बात करें और आप तो मेरे साथ खेलते हो, फिर उन संतों ने ऐसा क्यों कहा कि मैं कच्चा हूँ, क्या में सच में कच्चा हूँ?

ठाकुर जी ने भी बोल दिया कि हाँ आप अभी कच्चे हैं। नामदेव जी ने पूछा फिर पक्का होना क्या होता है?

विठ्ठल जी ने कहा जंगल में एक शंकर जी का मंदिर है, वहाँ एक विसोबा खेचर नाम के संत हैं, आप उनके चरणों में बैठें और वो जो उपदेश करें, उसका पालन कीजिए, फिर आप पक्के हो जाएँगे।

नामदेव जी भगवान विठ्ठल के कहने पर विसोबा खेचर जी के पास गये। विसोबा जी शंकर जी के शिवलिंग पर पैर रख कर आराम से सोए हुए थे।

नामदेव जी ने सोचा कि कोई साधारण आस्तिक इंसान भी ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन भगवान ने मुझे इनको गुरु बनाना को कहा, बात समझ नहीं आई।

नामदेव जी ने विसोबा जी से कहा पैर हटाइए महाराज, आप शंकर जी के ऊपर पैर रख कर क्यों सो रहे हैं? विसोबा जी ने कहा, बेटा जहाँ शंकर जी ना हों, वहाँ मेरे पैर रख दीजिए।

नामदेव जी ने उनके पैर पकड़े और जहाँ-जहाँ रखे वहाँ शिवलिंग प्रकट हो गया। नामदेव जी समझ गये कि यह तो कोई सिद्ध पुरुष हैं।

नामदेव जी ने विसोबा जी से कहा प्रभु, मैं आपकी महिमा को जान नहीं पाया, आप उपदेश कीजिए। विसोबा जी ने कहा बेटा बस इतनी बात समझनी है कि कोई ऐसा कण नहीं है जहाँ विठ्ठल ना हों। सब जगह विठ्ठल, सबमें विठ्ठल। नामदेव जी ने इस गुरु उपदेश को अपने हृदय में धारण कर लिया।

एक दिन नामदेव जी विठ्ठल जी के लिए रोटी बना रहे थे। वो रोटी रख कर घी गर्म करने गये। इतने में एक कुत्ता आया और विठ्ठल जी के लिए बनाई हुई रोटी को खाने लगा।

नामदेव जी ने कुत्ते से कहा, प्रभु ऐसे रूखी रोटी मत खाओ, मुझे इस पर घी लगा लेने दो पहले, और उस कुत्ते के पीछे दौड़ने लगे। उस कुत्ते से भगवान विठ्ठल प्रकट हो गये।

विठ्ठल जी ने कहा देखा, तुमने मुझे पहचान लिया ना। जब तुम्हें कच्ची मटकी कहा गया था तो तुम मंदिर में मुझ से शिकायत करने आये थे, और आज जब गुरु कृपा हो गई और आप पक्के हो गए तो आपने कुत्ते में भी मुझे ढूँढ लिया।

एक दिन नामदेव जी ने भगवान विठ्ठल जी से कहा कि अब आप कितना भी छुपो, मैं आपको पहचान लूँगा। विठ्ठल जी ने कहा अच्छा ठीक है, देखते हैं!

एकदम से नामदेव जी के मन में आया कि मंदिर में बड़ा कोलाहल हो रहा है, मंदिर के पीछे जाकर बैठते हैं, और शांति से प्रभु का ध्यान करते हैं।

पीछे बैठे तो कुछ लड़के वहाँ आकर खेलने लगे। उनके भजन में विक्षेप पड़ा, उन्होंने सोचा नदी किनारे चलते हैं। नदी किनारे जाकर बैठे तो वहाँ बैलगाड़ियाँ आकर रुकने लगी, नामदेव जी ने कहा शोर मत मचाओ, मैं यहाँ भजन कर रहा हूँ।

एक बैलगाड़ी से एक पुरुष और स्त्री गड़ासा (तेज धार वाला ब्लेड) लेकर निकले। वो आपस में बात करने लगे कि बड़ी भूख लगी है, आज कोई शिकार तो मिला नहीं, ये आदमी मिला है, इसी को मारकर खा लेते हैं।

दोनों नामदेव जी के पीछे भागने लगे। नामदेव जी ने भी अपनी धोती पकड़ी और भागने लगे।

नामदेव जी भागकर विठ्ठल जी के मंदिर में पहुँचे और हाँफने लगे। विठ्ठल जी ने पूछा कहाँ से भागते हुए आ रहे हो?

नामदेव जी ने कहा, बच गया प्रभु, एक स्त्री और पुरुष मुझे काट कर खाने की कोशिश कर रहे थे। विठ्ठल जी ने कहा, पहचान नहीं पाए ना, मैं ही तो था! * राधे राधे।

Mohit Raman Mishra

आरंभ और वैराग्यश्री त्रिपुरदास जी का जन्म ब्रजमंडल के शेरगढ़ में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता राज्य के मंत्री ...
23/05/2026

आरंभ और वैराग्य
श्री त्रिपुरदास जी का जन्म ब्रजमंडल के शेरगढ़ में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता राज्य के मंत्री थे। बचपन से ही उनके हृदय में भक्ति के अंकुर विद्यमान थे। एक बार अपने पिता के साथ आगरा से गोवर्धन आए, जहाँ श्रीनाथजी के अलौकिक सौंदर्य को देखकर उनका मन प्रभु के चरणों में ऐसा अटका कि उन्होंने वापस न जाने का संकल्प कर लिया। इसी बीच एक दुखद घटना घटी—उनके पिता की शत्रुओं द्वारा हत्या कर दी गई। इस वियोग में उन्होंने सांसारिक रिश्तों की निस्सारता को समझा और श्रीनाथजी को ही अपना माता, पिता और सखा स्वीकार कर लिया।

गुरु कृपा और राजसेवा
उनकी अनन्य भक्ति को देखकर महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने उन्हें शरण में लिया और दीक्षा दी। गुरु की आज्ञा से वे वापस अपने नगर लौटे और पिता के बाद स्वयं राजमंत्री का पद संभाला। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था—"धन की सार्थकता भगवद्-सेवा और संत-सेवा में है।" वे अपने वेतन का अधिकांश भाग साधु-सेवा और श्रीनाथजी की सेवा में व्यतीत करते थे। उनका नियम था कि वे हर साल सर्दियों में प्रभु के लिए अत्यंत कीमती, रत्नजड़ित पोशाक भेजते थे।

भक्ति की कठिन परीक्षा
त्रिपुरदास जी की बढ़ती कीर्ति और दानशीलता से ईर्ष्या करने वालों ने राजा के कान भरे कि वे राजकोष का दुरुपयोग कर रहे हैं। परिणामतः, राजा ने उनकी सारी संपत्ति ज़ब्त कर ली। वे रातों-रात महलों से झोपड़ी में आ गए। घर में खाने को दाना न बचा और बर्तन तक छिन गए, परंतु उनका प्रभु पर विश्वास अडिग रहा। वे घोर दरिद्रता में भी प्रसन्न थे, पर उन्हें पीड़ा केवल एक बात की थी—"इस वर्ष प्रभु को शीतकाल (सर्दी) की पोशाक कैसे भेंट करूँगा?"

भाव की पराकाष्ठा: पीतल की दवात
पोशाक भेजने का समय आया तो उन्हें घर में एक पुरानी पीतल की दवात मिली। उसे बेचकर उन्हें मात्र एक रुपया मिला। उस एक रुपये से उन्होंने एक मोटा साधारण कपड़ा खरीदा और अपने आंसुओं से भिगोते हुए उसे लाल रंग में रंगा। उन्हें संकोच था कि प्रभु इतने वैभवशाली हैं, वे यह मोटा कपड़ा कैसे पहनेंगे? उन्होंने चुपके से एक सेवक के माध्यम से वह कपड़ा मंदिर के भंडार में भिजवा दिया और संदेश दिया कि इसे केवल 'पोशाक लपेटने' के काम में लिया जाए।

प्रभु का रीझना और निष्कर्ष
मंदिर में श्रीनाथजी ने बड़े-बड़े राजाओं की कीमती पोशाकें स्वीकार नहीं कीं और सर्दी से काँपने का स्वांग किया। जब श्री विठ्ठलनाथ जी ने त्रिपुरदास जी का वह साधारण लाल कपड़ा उन्हें पहनाया, तब प्रभु मंद-मंद मुस्कुराए और उनकी ठंड दूर हुई।

कथा का संदेश:
यह चरित्र हमें सिखाता है कि भक्ति किसी धन या वैभव की मोहताज नहीं है। भगवान 'छप्पन भोग' से नहीं, बल्कि भक्त के 'भाव' से तृप्त होते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने नियम और भजन को न छोड़ना ही वास्तविक शरणागति है।

🌼🌹 राधे राधे 🌹🌼

Mohit Raman Mishra

// श्रीराधा स्तोत्रम् //उद्धव उवाच -वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुर वन्दितम्। यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम्॥ नम...
22/05/2026

// श्रीराधा स्तोत्रम् //

उद्धव उवाच -

वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुर वन्दितम्।
यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम्॥

नमो गोलोकवासिन्यै राधिकायै नमो नमः।
शतश्रृङ्गनिवासिन्यै चन्द्रवत्यै नमो नमः॥

तुलसीवनवासिन्यै वृन्दारण्यै नमो नमः।
रासमण्डलवासिन्यै रासेश्वर्यै नमो नमः॥

विरजातीरवासिन्यै वृन्दायै च नमो नमः।
वृन्दावनविलासिन्यै कृष्णायै च नमो नमः॥

नमः कृष्णप्रियायै च शान्तायै च नमो नमः।
कृष्णवक्षः स्थितायै च तत्प्रियायै नमो नमः॥

नमो वैकुण्ठवासिन्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः।
विद्याधिष्ठातृदेव्यै च सरस्वत्यै नमो नमः॥

सर्वैश्वर्याधिदेव्यै च कमलायै नमो नमः।
पद्मनाभप्रियायै च पद्मायै च नमो नमः॥

महाविष्णोश्च मात्रे च पराद्यायै नमो नमः।
नमः सिन्धुसुतायै च मर्त्यलक्ष्म्यै नमो नमः॥

नारायणप्रियायै च नारायण्यै नमो नमः।
नमोऽस्तु विष्णुमायायै वैष्णव्यै च नमो नमः॥

महामायास्वरूपायै सम्पदायै नमो नमः।
नमः कल्याणरूपिण्यै शुभायै च नमो नमः॥

मात्रे चतुर्णा वेदानां सावित्र्यै च नमो नमः।
नमो दुर्गविनाशिन्यै दुर्गादेव्यै नमो नमः॥

तेजत्सु सर्वदेवानां पुरा कृतयुगे मुदा।
अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यै च नमो नमः॥

नमस्त्रिपुरहारिण्यै त्रिपुरायै नमो नमः।
सुन्दरीषु च रम्यायै निर्गुणायै नमो नमः॥

नमो निद्रास्वरूपायै निर्गुणायै नमो नमः।
नमो दक्षसुतायै च नमः सत्यै नमो नमः॥

नमः शैलसुतायै च पार्वत्यै च नमो नमः।
नमो नमस्तपरिवन्यै ह्युमायै च नमो नमः॥

निराहारस्वरूपायै ह्यपर्णायै नमो नमः।
गौरीलोकविलासिन्यै नमो गौर्यै नमो नमः॥

नमः कैलासवासिन्यै माहेश्वर्यै नमो नमः।
निद्रायै च दयायै च श्रृद्धायै च नमो नमः॥

नमो धृत्यै क्षमायै च लज्जायै च नमो नमः।
तृष्णायै क्षुत्स्वरूपायै स्थितिकर्यै नमो नमः॥

नमः संहाररूपिण्यै महामार्यै नमो नमः।
भयायै चाभयायै च मुक्तिदायै नमो नमः॥

नमः स्वधायै स्वाहायै शान्त्यै कान्त्यै नमो नमः।
नमस्तुष्टयै च पुष्टयै च दयायै च नमो नमः॥

नमो निद्रास्वरूपायै श्रृद्धायै च नमो नमः।
क्षुत्पिपासास्वरूपायै लज्जायै च नमो नमः॥

नमो धृत्यै क्षमायै च चेतनायै नमो नमः।
सर्वशक्तिस्वरूपिण्यै सर्वमात्रे नमो नमः॥

अन्नो दाहस्वरूपायै भद्रायै च नमो नमः।
शोभायै पूर्णचन्द्रे च शरत्पद्ये नमो नमः॥

नास्ति भेदो यथा देवि दुग्धधा वल्ययोः सदा।
यथैव गन्धभूम्योश्च यथैव जल शैत्ययोः॥

यथैव शब्दनभसोर्ज्योतिः सूर्यक योर्यथा।
लोके वेदे पुराणे च राधामाधव योस्तथा॥

चेतनं कुरु कल्याणि देहि मामुत्तरं सति।
इत्युक्त्वा चोद्धवस्तत्र प्रणनाम पुनः पुनः॥

इत्युद्धवकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिपूर्वकम्।
इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते हरिमन्दिरम्॥

न भवेद् बन्धुविच्छेदो रोगः शोकः सुदारुणः।
प्रोषिता स्त्री लभेत् कान्तं भार्यामेदी लभेत् प्रियाम्॥

अपुत्रों लभते पुत्रान् निर्धनो लभते धनम्।
निर्मूमिर्लभते भूमि प्रजाहीनो लभेत् प्रजाम्॥

रोगाद् विमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः॥
अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः॥

इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे उद्धवकृतं श्रीराधास्तोत्रं सम्पूर्णं ।।

Mohit Raman Mishra

*सकल धर्म कौ राज, राज बृजराज कौ**रास विलास कौ राज, धर्म सुख साज कौ**श्री विपुल बिहारिन दास ,धर्म यह आस कौ**हरि हां सब धर...
10/05/2026

*सकल धर्म कौ राज, राज बृजराज कौ*
*रास विलास कौ राज, धर्म सुख साज कौ*
*श्री विपुल बिहारिन दास ,धर्म यह आस कौ*
*हरि हां सब धर्मन कौ राज, धर्म श्री हरिदास कौ*

श्री स्वामी हरिदास जू महाराज का रसिक अनन्य धर्म सब भावो उपासनाओ व संप्रदायो का सम्राट है यह अनन्य धर्म समस्त बृज लीला रास विलास वृंदावन कुंज निकुंज लीलाओं का भी मूल धर्म है। श्री स्वामी जी महाराज द्वारा प्रकट किए विशुद्ध नित्यविहार धर्म को प्राप्त करने की ही कामना श्री बिठलविपुल देव जू एवं श्री बिहारिन देव जू आदि आदि समस्त रसिकाचार्यों ने करी है। सब अवतारीन के अवतारी श्री कुंजबिहारी लाल इस धर्म के अनन्य है क्योंकि श्री स्वामी हरिदास जू महाराज का रस धर्म ही सब धर्मों का मूल राजा स्वरूप श्री कुंजबिहारी लाल जू को समस्त सुख प्रदान करने वाला है।
*सदा रटो श्री हरिदास श्री हरिदास श्री हरिदास*

जीव ब्रह्म की युति  अनहोनी , सायुज्य भक्त और  भगवान lधारा  बहे प्रीति  की  बरबस , कृष्ण धरे राधा पग  हाँथ llबिंब  धरे प्...
09/05/2026

जीव ब्रह्म की युति अनहोनी ,
सायुज्य भक्त और भगवान l
धारा बहे प्रीति की बरबस ,
कृष्ण धरे राधा पग हाँथ ll
बिंब धरे प्रतिबिंब नयन द्वय ,
प्रेमास्पद है दृष्य प्रमाण l
भाव धरे भगवान मिलत हैं ,
ज्यों राधा संग कृष्ण स्वनाम ll
नयनन आकुलता झलकी फिर ,
बहे नीर ह्वै अश्रु अमान l
नाथ सनाथ कियो अबहीं ,
कबहीं की रही यह प्रीति पुरान ll
रीति नीति सब भूलि परी ,
और मन दीख परत शुचिता सुधि प्राण l
मनोकामना मदन मोहन मन ,
बनी मेटि संशय अभिमान ll
नात सनेह सनाथ भयी ,
राधा निज वल्लभ संग प्रतिमान l
देर सबेर देत सब के हित ,
अनुकम्पा यह कृष्ण सुजान ll
!! हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!
ll सुधि प्रभात ll

अष्टमङ्गलम्🕉️मङ्गलं भगवान्विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः ।मङ्गलं पुण्डरी काक्षः मङ्गलाय तनो हरिः ॥मङ्गलं लक्ष्मण भ्राता मङ्गलं...
07/05/2026

अष्टमङ्गलम्🕉️
मङ्गलं भगवान्विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः ।
मङ्गलं पुण्डरी काक्षः मङ्गलाय तनो हरिः ॥
मङ्गलं लक्ष्मण भ्राता मङ्गलं जानकीश्वरः ।
मङ्गलं शुभदो रामः मङ्गलं हनुमत्प्रियः ॥
मङ्गलं परमानन्दो मङ्गलं परमेश्वरः ।
मङ्गलं श्री पद्मनाभो मङ्गलं पद्मलोचनः ॥
मङ्गलं करुणा सिन्धुः मङ्गलं विश्वपालकः ।
मङ्गलं सच्चिदानन्दो मङ्गलं जगदीश्वरः ।।
मङ्गलं श्री रंगनाथो मङ्गलं पुरुषोत्तमः ।
मङ्गलं कमलाकान्तो मङ्गलं भक्तवत्सलः ।।
मङ्गलं भगवान कृष्णो मङ्गलं विश्वजीवनः ।
मङ्गलं माधवे धीरो मङ्गलं धरणीधरः ।।
मङ्गलं राधिकाकान्तो मङ्गलं देवकीसुतः ।
मङ्गलं देवदेवेशः मङ्गलं भक्तपालकः ॥
मङ्गलं बदरीनाथः मङ्गलं करुणाकरः ।
मङ्गलं श्री मुक्तिनाथः मङ्गलं सर्वनायकः ।।

पनघट को पद:-सोने की गागर लैके पनियां भरन चली                यमुना के नीर तीर धुन सुन अटकी।नंद को दुलारौ प्यारौ मुरली बजा...
05/05/2026

पनघट को पद:-
सोने की गागर लैके पनियां भरन चली
यमुना के नीर तीर धुन सुन अटकी।
नंद को दुलारौ प्यारौ मुरली बजावैं ठाड़ौ
दृगन की चोट मेरे हिय मांझ खटकी ।।
एक घरी व्है जू,भई तन की सुधि न रही
ठगोरी सी ठाड़ी भई देखन रूप चटकी।
"धोंधी"के प्रभु, प्रेम को प्रवाह चाल्यौ
लोक कुल लाज काज सब दियौ पटकी।।

मान धर्यो मनमोहिनी प्यारी, घन-निभृत निकुंज अँधियारी।विटप-वितान बिलसत छाया, झरति सुधा ससि रजनी प्यारी॥बैठी राधा तिरछे दृग...
01/05/2026

मान धर्यो मनमोहिनी प्यारी, घन-निभृत निकुंज अँधियारी।
विटप-वितान बिलसत छाया, झरति सुधा ससि रजनी प्यारी॥
बैठी राधा तिरछे दृग धारि, अधर अरुण, उर अंतर भारी।
कुंचित भ्रुकुटि, कुटिल मुसुकानि, आगम पिय को निहारी॥
आवत श्याम सरस सुघराई,
मृदु मनुहार करत बनवारी॥
कसुम्बी पाग सिर, चंद्रिका सुँहारी,
कटि पट सोहत श्याम मुरारी॥
अंतर हास, बहिरंग रोष, यह प्रणय-मान गति अति न्यारी।
कहै ‘दास’ मिलि हँसि दुहुँ मुख, बरसै प्रेम सुधा सुखकारी॥

भावार्थ :------
रात्रि का दूसरा प्रहर है। वृन्दावन के भीतर एक घना, एकांत कुंज—चारों ओर लताओं की गहन छाया, ऊपर से झरती चाँदनी, वातावरण में गहरी शांति और मधुरता व्याप्त है। उसी निर्भृत कुंज में राधाजी विराजी हैं।
आज वे मानिनी हैं—रूठी हुई।
उनकी आँखें तिरछी हैं, भौंहें कुछ तनी हुई, अधरों पर हल्की अरुणिमा है। बाहर से वे उदासीन और अप्रसन्न दिखाई देती हैं, पर भीतर हृदय प्रेम से भरा हुआ है। उनके मुख पर एक हल्की, छिपी हुई मुस्कान भी है, जिसे वे प्रकट नहीं होने देना चाहतीं।
उसी समय उन्हें अनुभव होता है—प्रिय आ रहे हैं।
वे सीधे उनकी ओर नहीं देखतीं, पर भीतर ही भीतर उनके आगमन को निहारती हैं—आगम पिय को निहारी।
मान बना रहता है, पर हृदय में आनंद की लहर उठती है।
तभी श्री कृष्ण वहाँ पधारते हैं।
सिर पर कसुम्बी पाग है, जिसमें चंद्रिका सजी है; कटि पर पट सुशोभित है, और नील-वर्ण देह चाँदनी में अत्यंत मनोहर लग रही है।
परंतु आज उनके श्रृंगार से अधिक उनकी विनम्रता शोभित है—वे अपनी प्रिया को मनाने आए हैं।
वे समीप आकर अत्यंत कोमल वचनों से मनुहार करने लगते हैं।
न कोई गर्व, न कोई आग्रह—केवल प्रेम और विनय।
राधाजी बाहर से अब भी रूठी हुई हैं। वे मुख फेर लेती हैं, उत्तर नहीं देतीं।
पर भीतर उनका हृदय प्रसन्न है। यही इस लीला का रहस्य है—
अंतर में हर्ष, बाहर मान का आवरण।
कुछ समय तक यही स्थिति बनी रहती है—नयन मिलते हैं, फिर हट जाते हैं।
श्री कृष्ण और अधिक विनय करते हैं, और अंततः वह क्षण आता है जब राधाजी का मान धीरे-धीरे पिघलने लगता है।
दोनों की दृष्टि मिलती है, अधरों पर मुस्कान खिलती है, और उसी क्षण उस कुंज में प्रेम का अमृत बरसने लगता है।

मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले,मेरे श्याम म...
28/04/2026

मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।
मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥
मुझे चरणों से लगा ले,मेरे श्याम मुरली वाले ।।
भक्तों की तुमने कान्हा, विपदा है टारी।
मेरी भी बाह थामो, आ के बांकेबिहारी।
बिगड़े बनाए तुमने,हर काम मुरली वाले॥
मुझे चरणों से लगा ले,मेरे श्याम मुरली वाले।
मेरी सांस सांस में तेरा,है नाम मुरली वाले॥
पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा।
सुन ले पुकार कान्हा, बस एक बार आजा।
बैचैन मन के तुम ही, हो आराम मुरली वाले॥
मुझे चरणों से लगा ले,मेरे श्याम मुरली वाले।
मेरी सांस सांस में तेरा,है नाम मुरली वाले॥
तुम हो दया के सागर, जनमों का मैं हूँ प्यासा।
दे दो जगह मुझे भी, चरणों में बस ज़रा सी।
सुबह तुम ही हो, तुम ही, मेरी शाम मुरली वाले॥
मुझे चरणों से लगा ले,मेरे श्याम मुरली वाले।
मेरी सांस सांस में तेरा,है नाम मुरली वाले॥***************************************
किशोरी सुंदरी श्यामा, तूही सरकार मेरी है।
नहीं है और से मतलब फकत इक आस तेरी है॥
किशोरी सुंदरी श्यामा, मुझे विरहा ने घेरी है।
दर्श की जो कृपा कीजो, की काहे को देरी है॥
🙏 !! राधे राधे !!🙏
🙏जय श्री राधेकृष्णा 🙏

Mohit Raman Mishra

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