29/05/2026
#જયદ્વારકાધીશ
बूझत श्याम — कौन तू गोरी?
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज-खोरी ॥
काहे कौं हम ब्रज-तन आवतिं,
खेलति रहतिं आपनी पौरी ।
सुनत रहतिं श्रवण नंद-ढोटा,
करत फिरत माखन-दधि चोरी ॥
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैं?
चलौ संग मिलि लेखन जोरी ।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमणि,
बातनि भुरई राधिका भोरी ॥
२
प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ ।
नैन-नैन कीन्हीं सब बातें,
गुप्त प्रीति प्रगटान्यौ ॥
खेलन कबहुँ हमरैं आवहु,
नंद-सदन ब्रज-गाउँ ।
द्वारैं आइ टेरि मोहिं लीजौ,
“कान्ह” हमारौ नाउँ ॥
जौ कहियै घर दूरि तुम्हारौ,
बोलत सुनियै टेरि ।
तुमहिं सौंह वृषभानु-बाबा की,
प्रात-साँझ इक फेरि ॥
सूधी निपट देखियत तुमकौं,
तातैं करियत साथ ।
सूर श्याम नागर-उत नागरि,
राधा-दोउ मिलि गाथ ॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹बूझत श्याम — “कौन तू गोरी?”
यह केवल प्रश्न नहीं, प्रथम मिलन की मधुर चंचलता है।
राधा और श्याम दोनों एक-दूसरे से अपरिचित हैं, किन्तु नेत्रों में अनजाना अपनापन जाग उठा है।
सूरदासजी ने इस पद में प्रथम-दर्शन के उसी कोमल, लज्जामय और मधुर स्नेह को अत्यन्त रसपूर्ण रीति से प्रकट किया है।
जब श्रीश्याम पहली बार वृषभानु-दुलारी को देखते हैं, तब उनके मन में कौतूहल, आकर्षण और छेड़-छाड़ मिश्रित प्रेम उमड़ पड़ता है। वे मुस्कुराकर पूछते हैं—
“हे गोरी! तुम कौन हो? कहाँ रहती हो? किसकी बेटी हो? मैंने तुम्हें ब्रज की गलियों में पहले कभी नहीं देखा।”
श्रीराधा भी भीतर से मोहित हो चुकी हैं, पर बाह्य रूप से सरलता और संकोच धारण कर उत्तर देती हैं—
“हम तो अपनी ही पौरी में खेलती रहती हैं, ब्रज में घूमने नहीं आतीं।
हाँ, तुम्हारे विषय में इतना अवश्य सुन रखा है कि नन्द का एक छोरा है, जो घर-घर माखन-दधि की चोरी करता फिरता है।”
यह सुनकर श्रीकृष्ण हँस पड़ते हैं और कहते हैं—
“हम तुम्हारी क्या चोरी करेंगे? यदि कुछ लेना ही होगा तो तुम्हारे साथ मिलकर ही लेंगे।”
यहीं से प्रेम की पहली डोरी बँध जाती है।
बातें तो सामान्य हैं, पर नेत्रों के भीतर गुप्त प्रीति प्रकट होने लगती है।
“नैन नैन कीन्ही सब बातें” — बिना कहे ही दोनों एक-दूसरे के हृदय को जान लेते हैं।
फिर श्रीकृष्ण निमन्त्रण देते हैं—
“कभी हमारे नन्दभवन खेलने आना। द्वार पर आकर मेरा नाम पुकार लेना — ‘कान्ह!’ ”
राधाजी भी अब भीतर से आकृष्ट हो चुकी हैं। वे कहती हैं—
“यदि तुम्हारा घर दूर होगा तो हम पुकार कैसे सुनेंगे?”
श्याम उत्तर देते हैं—
“तुम्हें वृषभानु बाबा की सौगन्ध! प्रातः और सायं एक बार अवश्य आना।”
अन्त में सूरदासजी कहते हैं —
दोनों अत्यन्त चतुर नागर हैं, पर प्रथम मिलन में सरल बालभाव से प्रेम की ऐसी मधुर गाथा रचते हैं कि सम्पूर्ण ब्रज-रस उसमें उमड़ पड़ता है।
यह प्रथम स्नेह केवल आकर्षण नहीं, अनादि नित्य प्रेम की प्रथम झलक है —
जहाँ परिचय से पहले ही हृदय एक-दूसरे को पहचान लेता है।