Prakhar Kranti Chakra

Prakhar Kranti Chakra a weakly news paper publish at Mathura.

22/04/2020

गजब की बात ये है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने बिना राशन कार्ड वालों के लिये जो राशन सामग्री देने का ऐलान किया है, वह राशन की दुकानों से नही दी जायेगी । कहाँ से मिलेगी, इसका पता बताने वाला भी कोई नही है ।

दो साल पहले 2015 में इन्हीं दिनों संत रमेश बाबा के नैतृत्व में यमुना मुक्तिकरण अभियान की द्वितीय पदयात्रा दिल्ली कूच कर ...
17/03/2017

दो साल पहले 2015 में इन्हीं दिनों संत रमेश बाबा के नैतृत्व में यमुना मुक्तिकरण अभियान की द्वितीय पदयात्रा दिल्ली कूच कर रही थी । कोटवन र्बाडर आ चुका था लेकिन केन्द्र का कोई प्रतिनिधि यमुना यात्रियों की व्यथा सुनने नहीं पहुँचा था । पहली बार वृन्दावन का समस्त संत समाज इस यात्रा में सबसे आगे एक साथ चल रहा था । इसी सन्दर्भ में एक और यमुनायात्रा को लेकर जयकृष्ण दास जी भी दिल्ली जमे थे । यमुना यात्री भले ही दो खेमों में बटें थे लेकिन माँग दोनो की एक ही थी । किसी भी गुट को इसके पूरी होने का श्रेय जाय लेकिन यमुना वापस ब्रज में आ जाये यही ब्रजवासियों की इच्छा थी । दो यात्राओं के बावजूद अन्त में परिणाम ढाक के तीन पात रहा । केन्द्र में अपनी सरकार का भरोषा लेकर सड़क पर उतरे संत समाज से मिलने उमा भारती पहुॅंची लेकिन पूर्व की भांति वे सचल मंच पर नहीं चढ़ सकीं । यमुना जल को कई राज्यों का मामला बताकर उन्होने यात्रियों से और समय मांगा और इसे लेकर आगामी बैठक की दुहाई दी । राजनीति से कड़वा सबक ले चुके यमुना भक्त नहीं माने और उमा को सड़क पर बैठा छोड़कर यात्रा आगे बढ़ गयी । बाद में ना उमा की बैठक का नतीजा निकला और ना ही उन यात्राओं से यमुना का भला हुआ । दिल्ली पहुॅंचे यमुना यात्री फिर छलावे में आ गये । यात्रा के अन्तिम पढ़ाव से पूर्व एक स्थान पर संतसमाज की महापंचायत हुई । प्राण आहुतियाॅं देने की घोषणा तक हो गयीं लेकिन सरकार का हदृय परिवर्तन नहीं हुआ । कई पहुॅंचे हुये संत-विद्वान मोबायल लेकर बैठे रहे लेकिन सरकार से किसी ख्ुाशखबरी का संदेश नहीं मिला । जंतर-मंतर पहुॅचें इन यमुना भक्तों को आश्वासन का मंतर देकर यात्रा समाप्त करा दी गयी । एक साल में धरातल पर यमुना उद्धार और पर्याप्त यमुना जल को ब्रज में भेजने का झूठा वरदान प्राप्त कर यमुना यात्रा समाप्त हो गयी थी । उधर दूसरे गुट के साथ समाजवादी पार्टी ने यमुना किनारे नाले र्निमाण जैसे बुनियादी घोषणा करके ब्रजवासियों का दिल जीतने की कोशिश की । लेकिन यह योजना भी धरातल पर आने से पहले ही कागजी कश्ती में गोते खाती रही । कुल मिलाकर यमुना के लिये कोई कार्य एैसा नहीं हुआ जिससे यह यात्रायें सफल कही जा सके । हर बार राजीनति के आगे यमुना भक्ति हार जाती है । यमुना साफ करने वाली योजनाओं के आगे भ्रष्टाचार का कचरा आता है और यमुना मैली ही रहती है । इससे भी पूर्व 2013 की यात्रा में जब केन्द्र में काॅंग्रेस की सरकार थी तब भाजपा ने यमुना यात्रियों को यकीन दिलाया था कि अगर केन्द्र में भाजपा की सरकार आयी तो यमुना का शुद्ध और निर्बाध जल ब्रजवासियों को जरूर मिलेगा । देर बस केन्द्र में केसरिया सरकार बनने की है । शुषमा स्वराज की वह रिकार्डिंग यमुना यात्रियों ने अब भी सम्भालकर रखी है जिसमें वे पूरे जोश से कांग्रेसी सरकार को ललकारते हुये तुरन्त यमुना यात्रियों की मांग पूरी करने की दुहाई दे रही हैं । तब भाजपा मंत्रियों ने केन्द्र के आगे इस समस्या के तमाम समाधान सुझाये थे । जल बंटवारा तब भी राज्यों का मामला था लेकिन शायद इसका पता केन्द्र में सरकार बनने पर ही लगता है । हरियाणा में भाजपा की सरकार पहले से है, दिल्ली में केजरीवाल ने अभी तक कोई रोढ़ा नहीं अटकाया है, उत्तर प्रदेश में यमुना भक्तों ने सपा की बजाय भाजपा पर भरोषा जताकर बहुमत से सरकार बनवा दी है, मथुरा में सांसद, विधायक, पालिकाध्यक्ष तक भाजपा के हो गये हैं । अगर अब राष्ट्रपति की कसर बाकी रह गयी हो तो वो भी पूरी हो जायगी । तब क्या इस बार यमुना भक्तों को उसकी यमुना मैया का निर्मल जल ब्रज में प्राप्त हो सकता है? या फिर इस बार भी यमुना से भी ज्यादा मैली इस राजनीति के आगे यमुना भक्ति हार जायेगी ? अनुभव कहता है कि राजनीति को आस्था और भक्ति से तब तक मतलब रहता है जब तक की उसके नाम पर वोट ना मिल जायें । इसके बावजूद भी आस है कि शायद इस बार ब्रज को उसका अधिकार मिल जाये । भक्तों को उनकी यमुना मैया मिल जायें । तब शायद वास्तव में लोग कहें ‘‘हर हर मोदी-हर हर यमुना’’ । -जगदीश वर्मा ‘समन्दर’

31/12/2016

राष्ट्र के नाम सम्बोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रमुख बातें-
घर बनाने के लिये लोन पर नयी छूट-
9 लाख तक के लोन पर ब्याज दर में 4 प्रतिशत की छूट
12 लाख तक के लोन पर ब्याजदर में 3 प्रतिशत की छूट
गाॅंवों में घर मरम्मत के लिये 2 लाख तक के लोन में 3 प्रतिशत की छूट
गर्भवती महिलाओं के खाते में आयगें 6000 रूपये, मातृ मृत्युदर में कमी के लिये योजना
वरिष्ठ नागरिकों के बैंक में जमा 7.5 लाख रूपये पर 10 साल तक नहीं होगी ब्याज में कमी, न्यूनतम 8 प्रतिशत मिलेगी ब्याज, महीने पर ले सकेगें भुगतान ।
किसानों का क्रेडिट कार्ड रूपये कार्ड में बदलेगा, कर सकेगें कहीं भी उपयोग
व्यापारियों के लोन में गारंटी राशि हुई दुगनी 2 करोड़ तक के लोन में गारन्टी लेगी केन्द्र सरकार ।
मुद्रा लोन में दुगनी होगी मात्रा ।
सभी प्रकार के चुनाव एक साथ कराये जाने पर की जायेगी चर्चा,
राजनीतिक दलों को भी ईमानदारी और जवाबदारी के दायरे में लाने की जताई जरूरत

एक बार फिर ट्रैन हादसा । कानपुर देहात में अजमेर-सियालदा एैक्सप्रैस दुर्घटनाग्रस्त, 15 डिब्बे पटरी से उतरे । कानुपर स्टेश...
28/12/2016

एक बार फिर ट्रैन हादसा । कानपुर देहात में अजमेर-सियालदा एैक्सप्रैस दुर्घटनाग्रस्त, 15 डिब्बे पटरी से उतरे । कानुपर स्टेशन से 50 किमी दूर रूरा नामक स्थान पर हुआ हादसा । नहर में गिरी दो बोगी । सुबह 5 बजे के बाद की घटना । 40 से ज्यादा घायल, 2 की मौत की खबर । रेलवे अधिकारी मौके पर । राहत कार्य जारी..................

पाँच साल के इन्तजार बाद बन रही हैं गलियाँ, उसमें भी गोलमालन्यू शांति नगर कालोनी में नाली-खड़जों में लगाई जा रही है घटिया ...
22/12/2016

पाँच साल के इन्तजार बाद बन रही हैं गलियाँ, उसमें भी गोलमाल
न्यू शांति नगर कालोनी में नाली-खड़जों में लगाई जा रही है घटिया सामग्री, नागरिकों में रोष
जेई के सामने उखाड़कर दिखायी ईटें

मथुरा । जनता वर्षों उम्मीद रखती है जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटती है, निहोरे करती है तब कहीं जाकर कालोनी की एक सड़क बनने का समय आता है । उसमें भी ठेकेदार और सम्बन्धित अधिकारियों की मिलीभगत से र्निमाण कार्य में मानक की बजाय घटिया सामग्री लगाकर जनता पर एहसान किया जाता है । कुछ एैसा ही हो रहा है मालगोदाम रोड किनारे बसी वार्ड नम्बर 39 की न्यू शांति नगर कालोनी में ।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि सभासद से कई वर्षों की मनुहार और नगर पालिकाध्यक्षा को कई प्रार्थना पत्र देने के बाद जैसे-तैसे इस कालोनी की गलियों में नाली र्निमाण और टाइल्स लगने का कार्य स्वीकृत हुआ है । लेकिन उसमें भी अब ठेकेदार मानक विपरीत कार्य कर रहा है । नाली बनाने में घटिया ईटों का प्रयोग किया गया है तो वहीं बदरपुट के स्थान पर स्तरहीन क्रेशर प्रयोग की जा रही है । न्यू शांति नगर निवासी नारायणी देवी ने आरोप लगाया कि ठेकेदार के आदमी मनमर्जी तरीके से मसाला तैयार करते हैं जिसमें एक परात सीमेंट के साथ 10 से 12 परात क्रेशर डाली जा रही है । वहीं पीरा ईंट का प्रयोग नालियों के बनाने में किया गया है । जबकि मानकानुसार अब्बल ईंट का प्रयोग होना चाहिये । पाॅंच दिन पूर्व लगायी गयीं ईंटे अभी से उखड़ रही हैं ।
गुरूवार को इस शिकायत पर पालिका के जेई शुशील निगम कालोनी में पहुॅचें तो आक्रोशित लोगों ने अपने भवनों के सामने लगी हुईं ईंटों का उखाड़कर दिखाया। भगवत शरण, टीकाराम, श्री राम शर्मा आदि निवासियों ने कहा कि जब नगर पालिका पर्याप्त धन दे रही है तो काॅलोनी में स्तरहीन कार्य क्यूँ करवाया जा रहा है । क्या स्थानीय सभासद का इस कार्य की निगरानी करने का कर्तव्य नहीं बनता है । आरोप है कि नालियों में लगाई गयीं खराब ईंटे सभासद की सहमति से ही आ रही हैं । जीवन सिंह, अजीत, विनोद, कृष्णमुरारी, छीतरमल शर्मा, रमेश खण्डेलवाल, सुमन वर्मा, आदि निवासियों ने विरोध जताते हुये नालियों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री प्रयोग कराये जाने की मांग की है ।

षिकायत का निस्तारण किया जायेगा। मसाले में बदरफुट और सीमेन्ट 4ः1 के अनुपात में होना चाहिये । कालोनीवासी अपने सामने खड़े होकर मसाला बनवायें ।
- शुषील निगम, जेई,

पुरानी ईंटे उखड़कर ही नालियों में लगानी थीं लेकिन हम नई ईंटे लगवा रहे हैं। 4200 प्रति हजार की ईंटें मंगाई गयी हैं । एक लाॅट खराब आ गया था, उसे बदलवा दिया गया है । मसाले में अनुपात 6ः1 का रखा जा रहा है ।
- सुमित अग्रवाल, नगरपालिका ठेकेदार

मैं बाहर गया हुआ था, आज ही लौटा हूँ, दोयम ईंट और खराब मसाले की षिकायत आयी थी । अब आकर देखूंॅगा ।
- रामनरेष अग्रवाल, सभासद वार्ड न. 39

12/09/2015

No. 1 Indian Media News Portal... Media ka Baap....

26/08/2015

आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य रूढिवादी भारतीय समाज में में जातिगत आधार पर भेदभाव, छुआछूत, पिछड़ापन एवं आर्थिक रूप से हाशिये पर पड़ी जातियों को मुख्यधारा में लाना था । लेकिन समय के साथ आज आरक्षण के लिये वह लोग भी आन्दोलन कर रहे हैं जो ना तो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, जिन्हें समाज में सम्मान, ओहदा और बड़ी संख्या हांसिल है । गुजरात को आरक्षण की आग में डालने के लिये पटेल समुदाय के जो नवनिर्मित नेता खून बहाने पर उतारू हैं अगर उनकी मागें मान ली जाती हैं तो यह आरक्षण के लिये कल दूसरी कई जातियों के लोग लाईन में खड़े हैं जो वास्तविक रूप से आरक्षण के अधिकारी हो सकते हैं लेकिन अभी इसलिये चुप हैं कि उनके पास पैसा, संगठन, मीडिया और इतना समय नहीं है कि वह अपना काम धन्धा छोड़कर आरक्षण के लिये दूसरे लोगों की जान लेने पर उतारू हो जायें ।
पटेल समुदाय के लोग गुजरात में सम्पन्नता की स्थिति में हैं । गुजरात सरकार में ही पटेल मुख्यमंत्री है तो आधा दर्जन मंत्री, गृहमंत्री हैं तो तीन दर्जन से ज्यादा विधायक हैं । किसी पिछड़ी हुई जाति के इतने लोगों को अगर सरकार में जगह मिल रही है तो समझा जा सकता है कि उस समाज में जागरूकता, सम्पन्नता और उपलब्धता की कितनी मात्रा है । बावजूद इसके हार्दिक पटेल जैसे युवक सभ्य कहे जाने वाले गुजराती समाज को हिंसा की आग में झोंकने के लिये दिशाविहीन युवा शक्ति को यूज कर रहा है तो इसमें केवल उसके निजी स्वार्थों एवं राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की तस्वीर ही सामने आती है । पहले से सम्पन्न व्यक्ति अगर भूखें व्यक्तियों का निवाला छीनने के लिये यह कहे कि हम मांगते नहीं छीन लेते हैं चाहे इसके लिये हिंसा भी क्यों ना करनी पड़े तो उसकी वास्तविक मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है ।
चिन्ताजनक बात यह है कि मीडिया का एक धड़ा लगातार पूरी तरह गैरजिम्मेदार होकर देश में हो रहे ऐसे विभाजन करने वाले मुद्दों को और धार दे रहा है । केवल टीआरपी और तुलनात्मक, विभाजित और सही गलत की तस्वीर बनाते बनाते यह गैर जिम्मेदार मीडियायी धड़ा जनसरोकार से दूर न्यायालय को भी ठेंगा दिखाने हिमाकत किये दे रहा है ।
अगर गुजरात सरकार इस उग्र आन्दोलन के आगे घुटने टेक देती है तो देश को ऐसे कई हिंसक आन्दोलनों और मागों को झेलने के लिये तैयार होना पड़ेगा । जिन मामलों में अदालत ने अपने विधिसम्मत आदेश दे दिये हों उनमें किसी भी दल की सरकार को कदम पीछे नहीं खींचने चाहिये । चाहे इसके लिये हार्दिक पटेल जैसे कितने भी बुलबुलों को क्यूॅं ना फोड़ना पड़े ।

पानी भरे गड्डे में गिरे मजदूर की ट्रक का पहिया चढ़ने से दर्दनाक मौतमथुरा । शुक्रवार को हुई वर्षा से शहर की सड़कों पर भरे...
10/07/2015

पानी भरे गड्डे में गिरे मजदूर की ट्रक का पहिया चढ़ने से दर्दनाक मौत

मथुरा । शुक्रवार को हुई वर्षा से शहर की सड़कों पर भरे गड्डों ने एक मजदूर की जान ले ली । मालगोदाम रोड पर मजदूरी कर घर लौट रहा एक मजदूर सड़क पर भरे पानी में गड्डे को नहीं देख पाया और सायकिल सहित गिर गया । पीछे से आ रहे टक्र का पहिया मजदूर के ऊपर से गुजर गया जिससे उसकी वहीं दर्दनाक मौत हो गयी । घटनाक्रम के अनुसार अड़ूकी निवासी 45 वर्षीय मजदूर रघुवीर पुत्र बाबू मालगोदाम रोड पर स्थित रेलवे के गोदाम पर माल उतराई का कार्य करता था । शुक्रवार को गोदाम पर सीमेन्ट के बोरों की खेप आयी थी । दोपहर में हुई वर्षा के बाद रघुवीर अन्य मजदूरों के साथ काम खत्म करके सायकिल से घर लौट रहा था । उसके आगे ट्रक संख्या भ्त् 38 थ्9851 जा रहा था । भारी बारिश से मालगोदाम रोड की सड़क पर पानी भरा हुआ था । रघुवीर सड़क पर भरे पानी में गड्डे को नहीं देख पाया और पास से गुजरते ट्रक के नीचे गिर पड़ा। जब तक आगे चल रहे अन्य मजदूरों ने हल्ला मचाकर ट्रक को रूकवाया रघुवीर की मौत हो चुकी थी । मजदूर के साथियों ने मृतक के घर और पुलिस को फोन से सूचना दी ।

पौन घंटे तक पड़ा रहा शव, नहीं पहुँचा कोई वरिष्ठ अधिकारी
पहिये के नीचे आये मजदूर का शव पौन घन्टें तक सड़क पर पड़ा रहा । पुलिस के नाम पर केवल कुछ सिपाही घटना स्थल पर आये । नजदीक की बागबहादुर चैकी और कृष्णानगर चैकी पर सूचना दी गयी लेकिन बावजूद इसके कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर नहीं पहुॅंचा। सूचना पर मृतक के घर पर कोहराम मच गया । वहाॅं से भी कोई परिवारिजन घटनास्थल पर नहीं पहुँच सका। आखिर में मौजूद सिपाहियों ने अन्य मजदूरों की मदद से शव को टैम्पों में रखकर चीरघर पहुँचवाया ।

खस्ताहाल है सड़क पर भरता है पानी-
बरिश के बाद मालगोदाम रोड की सड़क के कुछ हिस्सों पर गड्डों में पानी भर जाता है । बारिश में सड़क और गड्डों में फर्क नहीं रह जाता जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है । शुक्रवार को यह आशंका सही साबित हुई ।

साथी की अचानक मौत से गमजदा हुये मजदूर-
अपने हसमुख साथी की दर्दनाक मौत से अन्य मजदूर गमजदा नजर आये । एक मजदूर कैलाश ने बताया कि रघुवीर हसमुख स्वभाव का था । रसिया गाकर हमेशा हसांता रहता था । गुरूवार को वह गोवर्धन की परिक्रमा देकर लौटा था । इसके बाद भी काम करने आया था ।

आज सायकिल अच्छी चलेगी-
साथी मजदूर आपस में बात कर बता रहे थे कि बारिश के बाद रघुवीर सायकिल चलाते हुये कह रहा था कि पानी पड़ने से मौसम अच्छा हो गया है । ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ेगा आज सायकिल अच्छी चलेगी, जल्दी गाँव पहुँच जायगें । लेकिन शायद होनी को यह मंजूर नहीं था और वह अचानक काल के गाल में समा गया ।

बचपन में कई हिन्दी फिल्मों में मजबूर आम आदमी, सच के पहरेदारों और ईमानदार चरित्रों को जालिम नोकरशाह, हेवान नेता और बिकी ह...
14/06/2015

बचपन में कई हिन्दी फिल्मों में मजबूर आम आदमी, सच के पहरेदारों और ईमानदार चरित्रों को जालिम नोकरशाह, हेवान नेता और बिकी हुई पुलिस के हाथों मरते देखा है । तब केवल फिल्मों की कहानी समझकर 3 घंटे बाद भूल जाते थे । लेकिन आज हालात दूसरे हैं । फिल्में देखने की जरूरत ही नहीं है । रोजाना अखबारों के पन्ने, टी.वी, मोबायल की स्क्रीन पर नयी फिल्मों के चित्र और पहले से ज्यादा हिला देने वाली स्टोरी दिखायी देती है । बस अन्तर इतना आया है कि फिल्मों में एक हीरो होता था जो अन्त में सब कुछ ठीक कर देता था । गुण्डे, भ्रष्ट नेता मारे जाते थे, पुलिस की वर्दी को दागदार करने वाले लोगों को आम जनता की भीड़ सड़क पर दौड़ा-दोड़ाकर नोच लेती थी । तब फिल्म देखकर लगता था अगर ये शेतान हकीकत में होगें तो इनको मात देने वाली जनता भी अपनी आवाज बुलन्द करेगी । कुछ ईमानदार अफसर भी अपनी ड्यूटी निभाकर हेवान दोषियों को सलाखों के पीछे बन्द कर देगें । कुछ जिन्दा जमीर के नेता अपने होने का मतलब समझेगें ओर मजबूर जनता के बीच सच के लिये आवाज उठाने वाले लोगों के साथ खड़े होकर राजनीति के गन्दे कीड़ों को दूर कर देगें । कुछ न्यायाधिकारी ऐसे भी होगें जो अंधे कानून की पट्टियों को हटाकर खुली आंखों से दिख रहे सबूतों से न्याय की जीत करेगें । और अगर ये भी ना हुये तो मीडिया नाम की एक चिडि़या होगी जो दूध में से पानी को अलग कर देगी । जनता की आवाज दबेगी नहीं, नोटो के बण्डलों पर भी चढ़कर कैमरा चलेगा और सच्चाई सामने आयेगी................................
मगर अफसोस.......... कि ये सब उन पुरानी हिन्दी फिल्मों की कहानियों में ही होता था । हकीकत की फिल्म उनसे बहुत अलग है । यहाँ वो खून पीते, अत्याचार करते खूंखार विलेन तो हैं लेकिन उनसे लड़ने वाले हीरों नहीं हैं...... भ्रष्ट, बदमाशों, अत्याचारियों से आक्रोशित होने वाली निडर जनता नहीं है.................. निर्दोष की गर्दन कुचलकर मंत्री जी को खुश करने वालों से लेकर अपराधियों से भी बड़े अपराध करने वाले पुलिस अफसर तो हैं लेकिन खून देकर वर्दी की लाज रखने वाले नही हैं । कमजोर कानून और पैसे की पैरवी से छूटते बड़े नेता-अभिनेताओं के चरित्र तो आज भी हैं लेकिन न्याय के लिये आखें बन्द करने वाले वो लोग नहीं है जिन्हें विद्वान कहते हुये गर्व से मस्तक ऊपर हो जाये । अफसोस इस पर भी ज्यादा है कि सच्चाई की पहरूआ वो आखें भी बन्द सी हैं जो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले बेकसूरों पर हुई यातनाओं और दौलत के चश्में बांटते नेताओं, अफसरों की कारस्तानी पर दो शब्द लिख-बोल सकें। रोज बिगड़ते हालातों से टूटती उम्मीद बस इत्ता सा सवाल पूछती है कि जिन कन्धों पर आवाज उठाने की जिम्मेदारी है वो अपने एक साथी की मौत पर भी खामोशी कैसे ओढ़ लेते हैं ।
उ.प्र. में हिन्दी फिल्में सच साबित हो रही हैं । अमरीश पुरी जैसे खलनायक, डाॅन, मक्कार मंत्री, भष्ट पुलिस, आतंक, हत्या, मारकाट, षड़यंत्र, सबकुछ तो है । जनता में शरीफ और पर्दे के पीछे क्रूर पशु सरीखे समाजसेवकों की हरकतों ने फिल्मों के विलेनों को भी पीछे छोड़ दिया है । मुख्यमंत्री जी सही कहते हैं उ. प्र. में फिल्म उघोग के लिये भारी संभावनायें हैं । कहानी की तो टंेशन ही नहीं है । समाज में यहाॅं-वहाॅं बिखरी पड़ी हैं । बदायंू रेप काण्ड से लेकर मोहनलालगंज की निर्वस्त्र महिला की लाश की कहानी चीख-चीखकर बड़े पर्दे पर छाने को हाजिर हैं ।

मथुरा । राज्य के किसी हिस्से में राजा के जाने के बाद खुशहाली और सौगातों के पदचिन्ह रह जाते हैं लेकिन अफसोस कि भरी दुपहरी...
29/05/2015

मथुरा । राज्य के किसी हिस्से में राजा के जाने के बाद खुशहाली और सौगातों के पदचिन्ह रह जाते हैं लेकिन अफसोस कि भरी दुपहरी में अपने प्रधामंत्री का इस्तकबाल करने को पहुॅंचे 1 लाख से ज्यादा ब्रजवासियों को अपने ब्रज में एैसा कोई ‘चिन्ह’ दिखायी नहीं दिया। यमुना के लिये दिल्ली नाप आये पदयात्रियों के कान टी.वी. सेटों से यह सुनने को चिपके रहे कि शायद चुनाव से पहले वाले मोदी साहब एक बार बोल दें कि ‘पिछली बार यमुना माँ से सरकार की शक्ति मांगने आया था आज उस शक्ति से यमुना माँ का मैला आॅंचल धोने आया हँू।’’ लेकिन यमुना के हिस्से में मोदी जी का केवल यही वाक्य आया कि ‘गंगा और यमुना मेरी माँ है।’’
मथुरावासियों ने पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री के मथुरा आगमन से बड़ी उम्मीदें पाल ली थीं लेकिन उनकी आशा को कोई ‘मोल’ नहीं मिला । पूरी सभा में ना तो मथुरा के ओला पीडि़त किसानों के जख्मों का जिक्र हुआ ना प्रदुषण की भेंट चढ़ी यमुना को साबरमती की निर्मल जलधारा की याद दिलायी और ना ही शहीद हेमराज के बलिदान को सलाम हुआ । कई योजनाओं और घोषणाओं का गवाह बनने को मथुरा बेताब था लेकिन ‘ब्रज की बात’ नहीं हुई । हाँ प्रधानमंत्री ने जनधन, 12 रूपये दुर्घटना बीमा, 330 जीवन बीमा, स्वप्रमाणन अधिकार और पीएफ एकाउन्ट से लेकर पिछले 1 साल में बढ़े सैलानियों की संख्या तथा यूरीया के लिये कारखानों की क्षमता बढाने की योजना को पूरे जोर शोर से सामने रखा । बीती काॅंग्रेस सरकार की नीतियों पर जहाँ मोदी ने करारी चोट की वहीं यह भी खुलासा किया कि अगर एक साल और कांग्रेस का राज रहता तो पूरा देश डूब जाता । दीनदयाल धाम में भारी भीड़ से भरा मैदान प्रधानमंत्री की हर बात में सुर मिलाता दिखायी दिया लेकिन सभा समाप्त होने पर लौटते जनसमूह में ब्रज की खाली झोली पर सवाल करने वाले बड़ी संख्या में ‘मन की बात’ बोलते नजर आये ।
कुछ शुभचिन्तको का कहना है कि मथुरावासी गलतफहमी के शिकार हुये हैं । असल में विशाल रैली मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल पूरा होने पर आयोजित थी ना कि मथुरा जैसे जनपद के विकास और समस्याओं को लेकर । इस रैली पर देश-विदेश की मीडिया और जनता का ध्यान लगा हुआा था । रैली स्थल के लिये मथुरा में पं. दीनदयाल धाम को चुनकर आमजनता की सरकार होने का सन्देश दिया जाना था ।
हालांकि पार्टी की और से सासंदों को प्रधानमंत्री का सम्बोधन ध्यान से सुनने की हिदायत दी गयी थी जिससे वह विपक्ष के सवालों का मुहॅंतोड़ जवाब दे सकें लेकिन पूरे भाषण में बढ़ती महगांई, रिटेल में एफडीआई पर सरकार की पलटी, क्रूड आयल के मूल्य में कमी के बावजूद पैट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों, चीन तथा पाकिस्तान के बढ़े दुस्साहस, अन्तराष्ट्रीय मंचों पर देश की आन्तरिक राजनीति पर सवाल उठाने, देश के अन्दर लहराये जाने वाले पाकिस्तानी झंण्डों जैसे सवालों का जवाब सुनने गये शुभचिन्तकों को सीधा जवाब नहीं मिला । हाँ अच्छे दिनों जैसे चुनावी जुमले पर सरकार को कोसने वाले विरोधियों को जरूर जवाब मिला है कि उनके अच्छे दिन कभी नहीं आने वाले बल्कि और बुरे दिन आ सकते हैं ।
कुल मिलाकर मथुरा की जनता को चुनाव से पहले आये मोदी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक ही समानता दिखायी दी कि उनके बोलने में आत्मविश्वास और सपने दिखाने का हुनर अभी भी वही पुराना रंग लिये हैं । बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि आशावादी होना लाभदायक ही नहीं बल्कि जरूरी है । सपने देखना भी जरूरी है लेकिन उन्हें पूरा करने के लिये कीमत चुकाते समय आखें ना खोलें । कोई शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के बाद दुनियां में देश को नये नजरिये से देखा जा रहा है । लेकिन इस नजरिये में कमजोर भारत की बजाय शक्तिशाली और जवाबदेय भारत की तस्वीर ही दिखे इसी की कोशिशें होनी चाहियें । हाल ही में कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी झण्डे लहराये जाने और चीन दौरे के समय चीनी मीडिया द्वारा भारत का विवादित नक्शा प्रसारित करने जैसी घटनाओं से देशवासियों का चिन्तित होना लाजिमी है । महंगाई जैसी जिन नितान्त जमीनी समस्याओं से निजात पाने को आम जनता ने मोदी सरकार को चुना है उन अच्छे दिनों की तलाश अभी बाकी है ।

09/04/2015

अखबारों में छपी खबरों पर आम लोगों का कितना विश्वास है ये तो नहीं पता लेकिन ये जरूर है कि मीडिया पर अब सरकार भी भरोषा नहीं कर रही है । तभी तो अखबारों में मोटी-मोटी हेडलाईनों में छपी किसानों के मौत की खबरों को प्रदेश सरकार सच मानने को तैयार नहीं है । मरते किसानों और रोते परिवारीजनों की तस्वीरें भी झूठ बोलती हैं ? पता नहीं, लेकिन भारतीय मीडिया से इतनी आस तो है कि वह मरते इन्सान की सच्चाई को झूठा नहीं दिखायेगा । रही बात राजनीति की तो पक्ष-विपक्ष को अपने तरीके से खबरों को सच-झूठ में बाॅंटने का अधिकार है तो वह इसका प्रयोग क्यूॅं ना करे...... उत्तर प्रदेश में फसली नुकसान से किसानों का मरना जारी है...... मुआवजे के साथ इतनी सहानुभूति भी जरूरी है कि अगली फसल बोने के लिये उनका होंसला बना रहे.........................

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