Girls Needs No Comparison

Girls Needs No Comparison This Page is only for expressing the thought for supporting the girls

11/10/2021
30/09/2021

Don't get married....

22/09/2021

ाँ_❣️

लेती नहीं दवाई माँ,
जोड़े पाई पाई माँ,
दुख थे पर्वत, राई माँ
पर हारी नहीं लड़ाई माँ,
बाबूजी तो तनखाह लाये,
लेकिन बरकत लाई माँ,
सभी साड़ियां छीज गई थीं,
लेकिन ना कह पाई माँ,
बाबूजी बीमार पड़े जब,
साथ साथ मुरझाई माँ,
लड़ते लड़ते सहते सहते ,
रह गई एक तिहाई माँ,
दर्द बड़ा हो या छोटा हो,
याद हमेशा आई माँ,
सभी पराये हो जाते हैं,
होती नहीं पराई माँ ।।

09/09/2021

#बिटिया_का_आत्मसम्मान

मैंने कई पिता को अपने दामाद और उसके परिवार से कहते सुना है कि “अब हमारी बेटी आपकी हुई, आपको जैसे ठीक लगे वैसे उसे रखना।” पर नहीं, आप हमेशा याद रखना की मेरी बेटी आज भी मेरी बेटी है और ताउम्र रहेगी।

जैसे आपका बेटा एक अच्छे जीवनसाथी को पाने के लिए शादी के बंधन में बंधा है वैसे ही मेरी बेटी भी एक सच्चे हमसफर को पाने ही चाह लेकर ही आपके बेटे से शादी के बंधन में बंधी है।

जैसे आप चाहते है कि मेरी बेटी आपकी सारी अपेक्षाएं पूर्ण करें ऐसे मैं भी चाहता हूँ कि आपका बेटा भी मेरी अपेक्षाओं में खरा उतरे।

आप जैसे चाहते हैं कि मेरी बेटी आपके बेटे की हर ख़्वाहिश पूरी करे वैसे मैं भी चाहता हूँ कि आपका बेटा भी मेरी बेटी का हर सपना पूरा करे।

आप जैसी अपेक्षाएं मेरी बेटी से रखते हैं वैसे ही अपेक्षाएं मैं आपके बेटे से भी रखता हूँ।

जैसे मैंने अपनी बेटी को प्यार से पाला है वैसे ही आपको भी मेरी बेटी को रखना होगा, आप जैसे चाहे वैसे उसे रख नहीं सकते। मेरी नज़र हमेशा उस पर बनी रहेगी।

मेरी बेटी अपने पति का प्यार पाने के लिए तरसेगी नहीं, वो उसके जीवन का अविभाज्य अंग है। अगर वो अपने पति को समय देने से कतराती नहीं तो उन दोनों के बीच भी कोई नहीं आएगा।

वो आपके घर के किसी कोने में पति के समय और साथ का इंतज़ार करते हुए रोनी नहीं चाहिए और उसकी इस अपेक्षा को गुनाह मानना भी उसे मंजूर नहीं होगा।

जमाइराज, अगर आप उसके साथ हो तो वो उस घर में या धरती के किसी भी कोने में अकेली कैसे हो सकती है? और आपकी अर्धांगिनी है तो फिर बाहर से आनेवाली के ताने या उपेक्षा वो क्यों सहे?

उसे कभी भी वो जो है जैसी है उस बात के लिए शर्म या संकोच नहीं होना चाहिए, वो हंसमुख है तो खुले दिल से हँसेगी भी। वो सरल, शांत होने के साथ साथ स्वतंत्र भी है।

आपने जैसे संस्कार अपने बेटे को दिए है वैसे ही संस्कार मैंने अपनी बेटी को भी दिए हैं इसलिये उसके संस्कारों को निशाना बनाने की गलती मत कीजियेगा।

याद रहे वो सिर्फ अपना घर बदल रही है अपना व्यक्तित्व या अस्तित्व नहीं।

उसे खुलकर हँसने का, जीने का, अपने विचारों को व्यक्त करने का पूरा हक है और उसके इस हक का सम्मान आपको करना होगा।

आपके बेटे से बिल्कुल भी कम मत आँकना मेरी बेटी की ज़िंदगी को, वो ऐसी ज़िन्दगी क्यों जिये जो उसकी नहीं है?..

कभी भी ऐसा मत सोचियेगा की अब उसका कोई नहीं है, शादी के बाद बेटियां पराई हो जाती थी वो दिन भी अब पराये (पुराने)हो गए।

मैं पिता हूँ उसका और जब जब उसे ज़रूरत होगी उसके साथ खड़ा रहूंगा। उसके पिता के घर के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे और वहाँ का आँगन हमेशा उसकी राह ताकता रहेगा।

वो भी आपके परिवार की सदस्य है अब उसका स्वीकार वैसे ही करना जैसे आपने अपने बच्चों का किया है।

उसे अकेला या परायेपन का एहसास ना हो इसका ध्यान रखना। क्योंकि मेरी बेटी स्वतंत्र ज़रूर है पर अकेली नहीं।

वो हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा अनमोल खज़ाना है,वो हमारी ज़िंदगी में खुशियां और प्यार लेकर आई है। वैसी ही खुशियाँ और प्यार वो आपके घर में भी बिखेरेगी ऐसे संस्कार दिए है मैंने। उसका सम्मान करना।

क्योंकि जिस दिन मेरी बेटी की आँख में आँसू आये, उसका पिता सबकी आंखों से आँसू बहा देगा।

#गुजरात के कवि श्री तुषार शुक्ल की लिखी हुई रचना का हिंदी अनुवाद ।

बहुत ज़रूरी होता हैएक बार बिल्कुल अकेला रह जाना,खुद से दूर हो जाना,अंजान राहों पर भटक जाना,अंधियारों में गुम हो जाना|बहु...
20/01/2021

बहुत ज़रूरी होता है
एक बार बिल्कुल अकेला रह जाना,
खुद से दूर हो जाना,
अंजान राहों पर भटक जाना,
अंधियारों में गुम हो जाना|
बहुत ज़रूरी होता है
एक बार दिल का टूट जाना,
सारे भरोसे और उम्मीदों का खो जाना,
आंसुओं से भीग जाना,
फिर एक जिद के साथ उभरना |
बहुत ज़रूरी होता है
एक बार जिन्दगी में हार जाना,
और अनगिनत ठोकरें खाना |
क्योंकि तब हम पाते हैं अपने-आप को जान,
रिश्तों की खूबसूरती और उसकी भावनाओं को जान,
ढूंढ पाते हैं तब हम सही रास्ते,
तलाश पाते हैं मंजिलों को |
तब हम जान पाते हैं दर्द को,
हर जख्म और हर आंसुओं के मर्म को,
सीख जाते हैं खुलकर हंसना, मुस्कुराना,
फिर हर सपनों को सचकर दिखलाना |
तब हम जान पाते हैं सफलता का रहस्य,
सीख जाते हैं संभलना,
और लोगों की इज्जत करना,
फिर संभलते हुए आगे बढ़ते चले जाना |

Author: Unknown

26/11/2020

जब मैं सन्नाटे में रह गई
______________
"मम्मी तुम यहाँ की नौकरानी हो क्या"
किचन का प्लेटफार्म पर जमी कीट को साफ़ करते करते मेरा हाथ रुक गया
मेरा पाँच साल का बेटा मेरा आँचल खींच खींच कर पूछ रहा था
मैं छुट्टियों में मायके गई थी बच्चों को लेकर
पतिदेव मुझे पहुँचा कर वापस चले गए थे
शादी के कितने सालों बाद भी जब भी मैं मायके जाती मुझे ऐसा लगता कि मैं अपने घर आ गई हूं
मेरी आदत कि मैं घर को सजाती संवारती रहती थी
डैडी मम्मी को बड़ा अच्छा लगता था मेरा घर की सेटिंग बदलना
डैडी ने तो मेरा नाम ही रख दिया था इंकलाब जिंदाबाद

अब भी डैडी के जाने के बाद भी मैं मायके आकर सब कुछ ठीक से सजा संवार कर अरेंज करके रखना चाहती थी
ताकि मम्मी को कुछ करना ना पड़े और घर भी ठीक हो जाए
जबकि मेरी भाभी को मेरा वहां आना बिल्कुल पसंद नहीं था वह मुंह से तो कुछ ना कहती पर बिना कहे ही ऐसा माहौल बना देती कि मेरा कुछ दिन रहना दूभर हो जाता
फिर भी मेरा मन नहीं मानता था मम्मी की मोहब्बत में मैं वापस भी नहीं आ पाती थी जब तक पूरी छुट्टी खत्म ना हो जाए इस बीच भाभी का रवैया मुझे कई बार यह फैसला लेने पर मजबूर करता अब यहां कभी नहीं आऊंगी
पूरे घर की गंदगी और बिखरी हुई चीज है साफ करने में और अरेंज करने में सुबह से शाम हो गई थी बाथरूम में भरे हुए गीले सूखे गंदे साफ कपड़े उसमें चादर तौलिया और भाई बहनों के और उनके बच्चों के कपड़े का ढेर लगा था क्योंकि छुट्टियों में सभी आए हुए थे
किसी ने कहा तो नहीं था मगर जैसी मेरी आदत थी मैंने सारे कपड़े धोए बाथरूम को रगड़ रगड़ कर साफ़ करके चमकाया छत पर कपड़े फैलाए जो कम से कम डेढ़ सौ तो होंगे ही फिर किचन में आ गई ताकि वहां भी सब ठीक कर दूँ यह सब मेरा बेटा सुबह से देख रहा था
अभी सब ठीक भी नहीं कर पाई थी कि बेटे ऐसा सवाल कर दिया कि मैं थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गई कोई जवाब ही ना बन पड़ा फिर सोच कर मैंने जवाब दिया नहीं बेटा यह मेरा घर है जैसे वहां तुम्हारा घर है ना बनारस में वैसे ही यह मेरा घर है
बच्चे का दूसरा सवाल तीर बनके मेरे मन को लगा

तो मम्मी आपको इस घर से निकाल क्यों दिया गया है

आप वहां क्यों रहती हैं बनारस में

समझ में नहीं आया कि मैं अपने बच्चे को क्या जवाब दूँ
सन्नाटे में काथा हाथ में लिए खड़ी रह गई
फिर मेरी मम्मी ने समझाया कि सब लड़कियों को अपने ससुराल जाना पड़ता है और वही उनका घर होता है मैं सोच रही थी वहां भी कहा मैं अपनी मर्जी से कुछ कर पाती हूं
मैं सोची रही थी की का तीसरा सवाल आ गया

तो क्या मम्मी तुम छोटी को भी निकाल दोगी घर से
मेरी 3 साल की छोटी बिटिया मेरा चेहरा देखकर आंखें पटपटा रही थीं
मैं उस रात हो ना सकी
सोच रही थी कि कैसा बेबस जीवन होता है लड़कियों का वह अपने मन की कहीं भी नहीं कर पाती
ससुराल में जो जैसा चल रहा था वैसे ही चलेगा वही करना होगा
जो वहां होता है
अपना घर से अपने शौक से अपना घर सजाने का मौका ही नहीं मिलता था
मेरे घर सजाना शायद भाभी को इसीलिए पसंद नहीं था कि मैं उनके घर में क्यों दख़ल दे रही हूँ
एकतरह से ठीक भी था
वह उन्हीं का घर था और उन्हीं की मर्जी पर चलना भी चाहिए
मन की पीड़ा शादी के इतने सालों बाद भी शांत नहीं हो सकी है
अब बच्चे अलग अलग से ड सेटल हो गए और पतिदेव के साथ मैं इस घर में अकेली हूं उम्र के साथ शरीर कमजोर हो गया है जरा सा भी कुछ करती हो तो सांस फूलने लगती है मगर फिर भी वही मन में धुटा हुआ शौक है पूरा करने की कोशिश करती हूं मगर उम्र बढ़ने के साथ दुनिया भर की बीमारियां और कमजोरी कुछ करने कहां देती हैं
साथ साथ बच्चे और पतिदेव भी समझाते हैं आराम करो तबीयत ना खराब हो जाए
वह क्या जाने की मेरा मन की पीड़ा जो अपने घर को ढूंढ रहा है
जहां वह अपनी मर्जी से सजा संवार सके
बहरहाल अब मैंने अपनी बड़ी बहन के समझाने के बाद मायके में बच्चों के सामने काम करना बंद कर दिया है
मगर आप ही बताएं अपने मन की पीड़ा को कहाँ जाकर शांत करूँ
© @डॉक्टर फातिमा तस्नीम
बनारस

21/11/2020

👌 #जरूर पढें

बेटी जब शादी के मंडप से ससुराल जाती है तब पराई नहीं लगती मगर जब वह मायके आकर हाथ मुंह धोने के बाद सामने टंगे टाविल के बजाय अपने बैग से छोटे से रुमाल से मुंह पौंछती है , तब वह पराई लगती है.
जब वह रसोई के दरवाजे पर अपरिचित सी खड़ी हो जाती है , तब वह पराई लगती है.
जब वह पानी के गिलास के लिए इधर उधर आँखें घुमाती है , तब वह पराई लगती है.
जब वह पूछती है वाशिंग मशीन चलाऊँ क्या तब वह पराई लगती है.
जब टेबल पर खाना लगने के बाद भी बर्तन खोल कर नहीं देखती तब वह पराई लगती है.
जब पैसे गिनते समय अपनी नजरें चुराती है तब वह पराई लगती है.
जब बात बात पर अनावश्यक ठहाके लगाकर खुश होने का नाटक करती है तब वह पराई लगती है.....
और लौटते समय 'अब कब आएगी' के जवाब में 'देखो कब आना होता है' यह जवाब देती है, तब हमेशा के लिए पराई हो गई ऐसे लगती है.
लेकिन गाड़ी में बैठने के बाद जब वह चुपके से
अपनी आखें छुपा के सुखाने की कोशिश करती । तो वह परायापन एक झटके में बह जाता तब वो पराई सी लगती
😪
नहीं चाहिए हिस्सा भइया मेरा मायका सजाए रखना ,
कुछ ना देना मुझको
बस प्यार बनाए रखना ,
पापा के इस घर में
मेरी याद बसाए रखना ,
बच्चों के मन में मेरामान बनाए रखना ,
बेटी हूँ सदा इस घर की
ये सम्मान सजाये रखना।।....
बेटी से माँ का सफ़र (बहुत खूबसूरत पंक्तिया ,
सभी महिलाओ को समर्पित)
बेटी से माँ का सफ़र .
बेफिक्री से फिकर का सफ़र .
रोने से चुप कराने का सफ़र उत्सुकत्ता से संयम का सफ़र .
पहले जो आँचल में छुप जाया करती थी.
आज किसी को आँचल में छुपा लेती हैं|
पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को सर पे उठाया करती थी ।
आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करती हैं|
पहले जो छोटी छोटी बातों पे रो जाया करती थी.
आज बो बड़ी बड़ी बातों को मन में छुपाया करती हैं|
पहले भाई,,दोस्तों से लड़ लिया करती थी.
आज उनसे बात करने को भी तरस जाती हैं|
माँ,माँ कह कर पूरे घर में उछला करती थी.
आज माँ सुन के धीरे से मुस्कुराया करती हैं|
10 बजे उठने पर भी जल्दी उठ जाना होता था.
आज 7 बजे उठने पर भी लेट हो जाया करती हैं|
खुद के शौक पूरे करते करते ही साल गुजर जाता था.
आज खुद के लिए एक कपडा लेने को तरस जाया करती है|
पूरे दिन फ्री होके भी बिजी बताया करती थी.
अब पूरे दिन काम करके भी काम चोर कहलाया करती हैं|
एक एग्जाम के लिए पूरे साल पढ़ा करती थी.
अब हर दिन बिना तैयारी के एग्जाम दिया करती हैं|
ना जाने कब किसी की बेटी किसी की माँ बन गई.
कब बेटी से माँ के सफ़र में तब्दील हो गई .?
बेटी है तो कल है|

बहुत प्यारी होती है बेटियाँ ,
न जाने लोग बोझ क्यों समझते हैं बेटियाँ ll

Save girls... 🙏.

Author: Unknown

चुप्पी..........*बहुत ही सुन्दर पंक्तिया एक नारी की कलम से**छोटी थी जब,  बहुत ज्यादा बोलती थी**माँ हमेशा झिडकती ,**चुप र...
18/11/2020

चुप्पी..........
*बहुत ही सुन्दर पंक्तिया एक नारी की कलम से*
*छोटी थी जब, बहुत ज्यादा बोलती थी*
*माँ हमेशा झिडकती ,*
*चुप रहो ! बच्चे ज्यादा नहीं बोलते .*
*थोड़ी बड़ी हुई जब , थोड़ा ज्यादा बोलने पर*
*माँ फटकार लगाती*
*चुप रहो ! बड़ी हों रही हों .*
*जवान हुई जब , थोड़ा भी बोलने पर*
*माँ जोर से डपटती*
*चुप रहो , दूसरे के घर जाना है .*
*ससुराल गई जब , कु़छ भी बोलने पर*
*सास ने ताने कसे,*
*चुप रहो , ये तुम्हारा मायका नहीं* .
*गृहस्थी संभाला जब , पति की किसी बात पर बोलने पर*
*उनकी डांट मिली ,*
*चुप रहो ! तुम जानती ही क्या हों ?*
*नौकरी पर गई , सही बात बोलने पर कहा गया*
*चुप रहो ! अगर काम करना है तो*
*थोड़ी उम्र ढली जब , अब जब भी बोली तो*
*बच्चों ने कहा*
*चुप रहो ! तुम्हें इन बातों से क्या लेना* .
*बूढ़ी हों गई जब , कुछ भी बोलना चाहा तो*
*सबने कहा*
*चुप रहो ! तुम्हें आराम की जरूरत है।*
*इन चुप्पी की तहों में , आत्मा की गहों में*
*बहुत कुछ दबा पड़ा है*
*उन्हें खोलना चाहती हूँ , बहुत कुछ बोलना चाहती हूँ*
*पर सामने यमराज खड़ा है , कहा उसने*
*चुप रहो ! तुम्हारा अंत आ गया है*
*और मैं चुपचाप चुप हो गई*
*हमेशा के लिए...

Author: Unknown

13/10/2020

अपनी ख़ुशी टाँगने को, तुम कंधे क्यूँ तलाशती हो..?
कमज़ोर हो, ये वहम क्यों पालती हो..??

ख़ुश रहो क़ि ये काजल, तुम्हारी आँखों मे आकर सँवर जाता हैं..!
ख़ुश रहो क़ि कालिख़ को, तुम निखार देती हों..!!

ख़ुश रहो क़ि तुम्हारा माथा, बिंदिया की ख़ुशकिस्मती हैं..!
ख़ुश रहो क़ि तुम्हारा रोम-रोम, बेशक़ीमती हैं..!!

ख़ुश रहो क़ि तुम न होतीं, तो क्या-क्या न होता..?
न मकानों के घर हुए होते, न आसरा होता..!!

न रसोइयों से खुशबुएँ ममता की, उड़ रही होतीं..!
न त्योहारों पर महफिलें, सज रही होतीं..!!

ख़ुश रहो क़ि तुम बिन, कुछ नहीं हैं..!
तुम्हारे हुस्न से ये आसमाँ, दिलक़श और ये ज़मीं हसीं हैं..!!

ख़ुश रहो क़ि रब ने तुम्हें पैदा ही, ख़ुद मुख़्तार किया..!
फ़िर क्यों किसी और को तुमने, अपनी मुस्कानों का हक़दार किया..!!

ख़ुश रहो जान लो क़ि, तुम क्या हों..?
चांद सूरज हरियाली, हवा हो..!!

खुशियाँ देती हो, खुशियाँ पा भी लो..!
कभी बेबात, गुनगुना भी लों..!!

अपनी मुस्कुराहटों के फूलों को,अपने संघर्ष की मिट्टी में खिलने दो..!
अपने पंखों की ताकत को, नया आसमान मिलने दो..!!

और हाँ मत ढूँढो कंधे..!
क़ि सहारे, सरक जाया करते हैं..!!

AUTHOR: Unknown

11/10/2020

ज़िन्दगी से लम्हे चुरा, पर्स मे रखती रही,
फुरसत से खरचूंगी ,बस यही सोचती रही।
उधड़ती रही जेब ,करती रही तुरपाई,फिसलती रही खुशियाँ,
करती रही भरपाई।
इक दिन फुरसत पायी
सोचा .......
खुद को आज रिझाऊं ,बरसों से जो जोड़े
वो लम्हे खर्च आऊं।
खोला पर्स..लम्हे न थे ,जाने कहाँ रीत गए!
मैंने तो खर्चे नही, जाने कैसे बीत गए !!
फुरसत मिली थी सोचा, खुद से ही मिल आऊं।
आईने में देखा जो ,पहचान ही न पाऊँ।
ध्यान से देखा बालों पे ,चांदी सी चढ़ी थी,
,,,,,,,,,थी तो मुझ जैसी,
जाने कौन खड़ी थी।

Author: Unknown

10/10/2020

❤️ मैं ❤️

*पीठ में बहुत दर्द था*
डाॅक्टर ने कहा
अब और मत झुकना
अब और अधिक झुकने की
गुंजाइश नहीं रही...

झुकते-झुकते
तुम्हारी रीढ़ की हड्डी में
गैप आ गया है

सुनते ही हँसी और रोना
एक साथ आ गया...

ज़िंदगी में पहली बार
किसी के मुँह से
सुन रही थी
ये शब्द
"मत झुकना..."

बचपन से तो
घर के बड़े, बूढ़ों
माता-पिता
और समाज से
यही सुनती आई है,
"झुकी रहना..."

नारी के
झुके रहने से ही
बनी रहती है गृहस्थी...

नारी के
झुके रहने से ही
बने रहते हैं संबंध

नारी के
झुके रहने से ही
बना रहता है
प्रेम...प्यार...घर...परिवार

झुकती गई,
झुकते रही,
झुकी रही,
भूल ही गई...
उसकी कहीं कोई
रीढ़ भी है...

और ये आज कोई
कह रहा है
"झुकना मत..."

परेशान-सी सोच रही है
कि क्या सच में
लगातार झुकने से
रीढ़ की हड्डी
अपनी जगह से
खिसक जाती है ?

और उनमें कहीं गैप,
कहीं ख़ालीपन आ जाता है ?

सोच रही है...

बचपन से आज तक
क्या क्या खिसक गया
उसके जीवन से
कहाँ कहाँ ख़ालीपन आ गया
उसके अस्तित्व में
कहाँ कहाँ गैप आ गया
उसके अंतरतम में

बिना उसके जाने समझे...

उसका
अल्हड़पन
उसके सपने
कहाँ खिसक गये

उसका मन
उसकी चाहत
कितने ख़ाली हो गये

उसकी इच्छा, अनिच्छा में
कितना गैप आ चुका

क्या वास्तव में नारी की
रीढ़ की हड्डी
बनाई है भगवान ने
समझ नहीं आ रहा...

Author: Unknown

Address

Patehara Kalan
Mirzapur

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Girls Needs No Comparison posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category