25/02/2026
खुदीराम बोस के मन में अंग्रेजों के अत्याचारों के प्रति गहरी नफरत थी। वे 'युगांतर' जैसी क्रांतिकारी संस्थाओं से जुड़ गए और कम उम्र में ही बम बनाने और गुप्त अभियानों में माहिर हो गए। सबसे प्रसिद्ध घटना 1908 की है, जब उन्हें और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी को अत्याचारी ब्रिटिश जज 'किंग्सफोर्ड' को खत्म करने की जिम्मेदारी दी गई। किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों को कोड़ों से पीटने और कड़ी सजा देने के लिए कुख्यात था। 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में खुदीराम ने किंग्सफोर्ड की बग्गी पर बम फेंका। दुर्भाग्य से उस बग्गी में किंग्सफोर्ड नहीं, बल्कि दो निर्दोष यूरोपीय महिलाएं थीं। पकड़े जाने के बाद जब खुदीराम बोस पर मुकदमा चला, तो पूरा देश दंग रह गया। अदालत में उनकी उम्र और उनके चेहरे की शांति देखकर जज भी चकित था। जब जज ने उन्हें मौत की सजा सुनाई, तो खुदीराम के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी, बल्कि वे मुस्कुरा रहे थे। जज को लगा कि शायद इस बालक को 'फांसी' का अर्थ समझ नहीं आया है। जब जज ने पूछा, "क्या तुम्हें समझ आया कि तुम्हें मौत की सजा मिली है?" तो खुदीराम ने बड़ी निर्भीकता से कहा- "हाँ, मुझे समझ आ गया है। अगर आप मुझे थोड़ा समय दें, तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूँ।"
11 अगस्त 1908 की सुबह, जब उन्हें फांसी के तख्ते की ओर ले जाया गया, तो उनके एक हाथ में 'भगवद्गीता' थी और होंठों पर 'वंदे मातरम्' का नारा। वे शान से चलते हुए फांसी के फंदे तक पहुँचे और और स्वयं उसे गले में डाल लिया। उनकी उनकी शहादत ने पूरे बंगाल और भारत के युवाओं में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा की जिससे अंग्रेजों के पसीने छूट गए।