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बैतूल नगर निगम बनेगा... तो क्या मुलताई फिर पीछे रह जाएगी?अगर बैतूल नगर निगम बनता है, तो मुलताई के हिस्से में क्या आएगा?❖...
31/07/2026

बैतूल नगर निगम बनेगा... तो क्या मुलताई फिर पीछे रह जाएगी?

अगर बैतूल नगर निगम बनता है, तो मुलताई के हिस्से में क्या आएगा?

❖ न ताप्ती लोक की मांग पूरी होगी...
❖ न जिला बनने का सपना साकार होगा...
❖ न कोई बड़ी प्रशासनिक सौगात मिलेगी...

फिर क्या मुलताई के लोगों के हिस्से में सिर्फ़ बैतूल के नेताजी की चरण वंदना ही रह जाएगी?

मुलताई की जनता वर्षों से जिले का दर्जा, ताप्ती लोक और विकास की बड़ी योजनाओं की मांग कर रही है। अब समय आ गया है कि मुलताई के अधिकारों और भविष्य पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।

मुलताई किसी की कृपा नहीं, अपना हक़ मांग रही है।
विकास में बराबरी का अधिकार हमारा भी है।

Hemant Khandelwal Dr Mohan Yadav Raja Pawar Sukhdeo Panse II

माँ ताप्ती जन्मोत्सव की समस्त श्रद्धालुओं, भक्तजनों एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। माँ ताप्ती का पावन...
20/07/2026

माँ ताप्ती जन्मोत्सव की समस्त श्रद्धालुओं, भक्तजनों एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

माँ ताप्ती का पावन आशीर्वाद आप सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और नई ऊर्जा का संचार करे। आस्था, सेवा और सद्भाव का यह महापर्व हम सभी के जीवन में मंगल एवं खुशहाली लेकर आए।

जय माँ ताप्ती! 🚩🙏

यह केवल "गर्मी" नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिकी दिवालिएपन (Ecological Bankruptcy) का परिणाम है, जिसका ब्लूप्रिंट पिछले एक...
27/04/2026

यह केवल "गर्मी" नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिकी दिवालिएपन (Ecological Bankruptcy) का परिणाम है, जिसका ब्लूप्रिंट पिछले एक दशक में तैयार किया गया है। जब दुनिया की 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में 95 नाम भारत के हों, तो यह जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कॉर्पोरेट मिलीभगत से पैदा की गई एक आपदा है।

तपता भारत: 'कंक्रीट का विकास' या 'जीवंतता का विनाश'?

जब विकास की परिभाषा केवल 'पेड़ काटकर हाईवे बनाना' और 'जंगल उजाड़कर खदानें खोलना' रह जाए, तो नतीजे वही होते हैं जो आज हम भुगत रहे हैं। भारत आज एक "हीट चैंबर" बन चुका है, और इसकी जवाबदेही किसी 'अदृश्य मौसम' पर नहीं, बल्कि उन 'दृश्य निर्णयों' पर है जो सत्ता के गलियारों में लिए गए।

1. अरावली से हसदेव तक: "प्रॉफिट" के लिए "फेफड़ों" की बलि
जब लोग 'सेव अरावली', 'सेव आरे' या 'सेव हसदेव' के लिए सड़कों पर उतरे, तो उन्हें विकास विरोधी बताकर चुप करा दिया गया।
हसदेव का सच: छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में हज़ारों पेड़ों की कटाई केवल इसलिए की गई ताकि विशिष्ट बिजनेस घरानों के कोयला ब्लॉकों का रास्ता साफ हो सके। यह "देश की ज़रूरत" नहीं, बल्कि "कॉर्पोरेट की तिजोरी" भरने का खेल था।

अरावली का विनाश:दिल्ली-एनसीआर का प्राकृतिक बफर 'अरावली' आज अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण की भेंट चढ़ चुका है। नतीजा? झुलसा देने वाली लू और ज़हरीली हवा।

2. 'विश्वगुरु' का मॉडल: पर्यावरण संरक्षण कानूनों का कमज़ोर होना
पिछले कुछ वर्षों में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के नियमों को जिस तरह से शिथिल किया गया, वह आत्मघाती है।
जवाबदेही: जब CAG 54,282 करोड़ के बेहिसाब खर्च पर सवाल उठाता है, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि पर्यावरण के नाम पर वसूले गए 'ग्रीन सेस' का क्या हुआ?

पॉलिसी विफलता: नीति-निर्माता चीन की तरह 'रियल रिसोर्सेज' (तेल रिज़र्व, फॉरेस्ट कवर) को सुरक्षित करने के बजाय रेटिंग एजेंसियों और बिल्डिंग लॉबी को खुश करने में लगे हैं।

3. 'ईएमआई' पर टिका घर और झुलसता शहर
मजदूरों की दिहाड़ी 2017 से फ्रीज है, घर की बचत खत्म हो रही है और मध्यम वर्ग कर्ज (EMI) के बोझ तले दबा है। ऐसे में एक व्यक्ति के लिए 'क्लाइमेट चेंज' एक विलासिता का मुद्दा बन जाता है, क्योंकि उसकी पूरी ऊर्जा केवल जिंदा रहने के संघर्ष में खर्च हो रही है। सत्ता इसी लाचारी का फायदा उठाती है और धार्मिक उन्माद व झूठी रैलियों के पीछे असली मुद्दों को दफन कर देती है।

यह राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं है?
यह मुद्दा राजनीतिक इसलिए नहीं बनता क्योंकि:

1. कॉर्पोरेट फंडिंग: जंगल काटने वाली कंपनियां ही सत्ताधारी दल की सबसे बड़ी चंदादाता (Political Funding) हैं।
2. इमोशनल नैरेटिव: जब तक जनता को 'धार्मिक गौरव' और 'वीवीआईपी काफिलों' की चकाचौंध में उलझाया जा सकता है, तब तक उसे 'साँस लेने लायक हवा' की कमी महसूस नहीं होने दी जाएगी।

मसूरी के मलबे से लेकर झारखंड के कटते जंगलों तक, कहानी एक ही है—"लूट की खुली छूट"। अगर आज भारत 'नॉन-लिवेबल' (जीने लायक नहीं) बन रहा है, तो इसकी सीधी जवाबदेही उस 'पॉलिसी सर्कल' पर है जिसने पर्यावरण को 'अड़चन' और कॉर्पोरेट मुनाफे को 'विकास' मान लिया है।

क्या अब समय नहीं आ गया कि 'लिविंग वेज' की तरह 'लिवेबल एनवायरनमेंट' को भी एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मांगा जाए?

दुनिया का सबसे गर्म देश बना भारत ।दुनिया के सबसे गर्म 100 शहर भारत में ।कुछ महीने पहले सर्दियों में सबसे प्रदूषित देश था...
27/04/2026

दुनिया का सबसे गर्म देश बना भारत ।

दुनिया के सबसे गर्म 100 शहर भारत में ।

कुछ महीने पहले सर्दियों में सबसे प्रदूषित देश था भारत।

जब सैकड़ों साल पुराने पेड़ काटे जाते हैं तो हम भारत के लोग चुप रहते हैं ।

जब जंगल के जंगल अडानी को दे दिए जाते हैं तो हम चुप रहते हैं ।

तो ठीक है , जलेंगे , मरेंगे , लेकिन गलत को गलत नहीं कहेंगे.. चलने दो ऐसे ही.. बस हमें सरकार से सवाल करने को मत कहो..

💔 एक माँ का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता…यदि ड्यूटी के दौरान लापरवाही या दुर्व्यवहार से नवजात की जान गई है, तो...
25/02/2026

💔 एक माँ का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता…
यदि ड्यूटी के दौरान लापरवाही या दुर्व्यवहार से नवजात की जान गई है, तो यह बेहद गंभीर विषय है।

अस्पताल भरोसे की जगह होते हैं, भय की नहीं।

जरूरी है कि—
🔹 पूरी घटना की निष्पक्ष जांच हो
🔹 जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई हो
🔹 भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के पुख्ता इंतज़ाम हों
स्वास्थ्य व्यवस्था में संवेदनशीलता और जवाबदेही ही असली सेवा है।
#माँ_का_सम्मान #न्याय_की_आवाज़

देश की 70% आबादी पर यह सरकार का अब तक का सबसे बड़ा प्रहार है।भारत–अमेरिका के बीच प्रस्तावित एग्रीकल्चर ट्रेड डील लगभग तय...
04/02/2026

देश की 70% आबादी पर यह सरकार का अब तक का सबसे बड़ा प्रहार है।

भारत–अमेरिका के बीच प्रस्तावित एग्रीकल्चर ट्रेड डील लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन इसके दूरगामी और विनाशकारी परिणामों को लेकर भारतीय किसानों की चिंताएँ और गहरी हो गई हैं।

अमेरिकी कृषि को भारी सरकारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत का किसान पहले से ही उच्च लागत, कर्ज़ और अनिश्चित बाज़ार से जूझ रहा है।
ऐसे में अगर सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत में आए, तो
➡️ देशी फसलों के दाम गिरेंगे
➡️ MSP और कमजोर होगी
➡️ सबसे बड़ा नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को होगा

यह डील आयात निर्भरता बढ़ाने, कॉरपोरेट नियंत्रण मजबूत करने और किसान की सौदेबाज़ी शक्ति खत्म करने की दिशा में एक खतरनाक कदम है।

इसके असर सिर्फ किसान की आमदनी तक सीमित नहीं रहेंगे—
यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश की आत्मनिर्भरता पर भी सीधा खतरा है।

किसान विकास के विरोधी नहीं हैं,
लेकिन किसानों की सहमति और संरक्षण के बिना किया गया कोई भी समझौता
👉 किसान हित में नहीं हो सकता।

आईपीएस सिमिला प्रसाद को लोग यूँ ही ‘लेडी सिंघम’ नहीं कहते।मध्य प्रदेश के डिंडौरी में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने नक्सल प्...
04/02/2026

आईपीएस सिमिला प्रसाद को लोग यूँ ही ‘लेडी सिंघम’ नहीं कहते।
मध्य प्रदेश के डिंडौरी में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाके में अपने साहस, सख़्त निर्णयों और दमदार कार्यशैली से अलग पहचान बनाई।

सिमिला प्रसाद न सिर्फ़ एक मेहनती और जांबाज़ आईपीएस अधिकारी हैं, बल्कि एक प्रतिभाशाली एक्ट्रेस और डांसर भी हैं।
उन्होंने साबित किया कि वर्दी पहनने का सपना और कला के प्रति जुनून—दोनों को साथ जिया जा सकता है।

आईपीएस बनने से पहले वे DSP के रूप में भी अपनी सेवाएँ दे चुकी हैं।
उनकी कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सपनों को किसी एक दायरे में सीमित नहीं करना चाहते।

मैं निशा बांगरे हूं। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की पूर्व एसडीएम, यानी डिप्टी कलेक्टर। विधानसभा चुनाव के समय मैंने अपने पद...
04/02/2026

मैं निशा बांगरे हूं। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की पूर्व एसडीएम, यानी डिप्टी कलेक्टर। विधानसभा चुनाव के समय मैंने अपने पद से इस्तीफा दिया, क्योंकि चुनाव लड़कर समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन न तो मुझे टिकट मिला और न ही मैं चुनाव लड़ सकी। आज न मैं डिप्टी कलेक्टर हूं, न विधायक। ऐसा लगता है जैसे ज़िंदगी मुझे कम से कम दस साल पीछे ले गई हो।
लोग पूछते हैं कि इतना अच्छा पद छोड़ने की ज़रूरत क्या थी। कुछ लोग इसे बेवकूफी भी कहते हैं। लेकिन मेरा सपना था कि सत्ता में जाकर ज़मीनी स्तर पर बदलाव करूं। अफ़सोस, मैं अपनी ही लड़ाई पूरी नहीं लड़ पाई।
मैं एक मां हूं, एक बेटी और एक पत्नी भी। एक भरा-पूरा परिवार है, लेकिन भीतर एक खालीपन है। मैं अनुसूचित जाति समुदाय से आती हूं, जहां पीढ़ियों से भेदभाव का सामना करना पड़ा। मेरे पिता ने तमाम मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई की और लेक्चरर बने। उसी संघर्ष की दूसरी पीढ़ी मैं हूं—गांव की पहली लड़की जो इंजीनियर बनी और फिर डिप्टी कलेक्टर।
कॉर्पोरेट नौकरी के साथ मैंने एमपीपीएससी की तैयारी की और 2018 में चयन हुआ। बतौर एसडीएम जब गांवों में काम किया, तो लगा कि मैं लोगों के जीवन में सचमुच बदलाव ला सकती हूं। वहीं से राजनीति में जाने का विचार मजबूत हुआ। लोगों ने भी मुझे नेता के रूप में देखना शुरू किया।
लेकिन इस्तीफा देने के बाद हालात मेरे पक्ष में नहीं आए। आज मैं घर पर हूं, बेरोज़गार हूं और पांच साल के बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहती हूं। न पर्याप्त बचत है, न सुरक्षित भविष्य।
फिर भी हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं है। अब मेरी लड़ाई सामाजिक ढांचे में बदलाव की है। हालात चाहे जैसे हों, मैं इस संघर्ष को आगे बढ़ाऊंगी—क्योंकि यही मेरे जीवन का उद्देश्य है।

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