04/02/2026
मैं निशा बांगरे हूं। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की पूर्व एसडीएम, यानी डिप्टी कलेक्टर। विधानसभा चुनाव के समय मैंने अपने पद से इस्तीफा दिया, क्योंकि चुनाव लड़कर समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन न तो मुझे टिकट मिला और न ही मैं चुनाव लड़ सकी। आज न मैं डिप्टी कलेक्टर हूं, न विधायक। ऐसा लगता है जैसे ज़िंदगी मुझे कम से कम दस साल पीछे ले गई हो।
लोग पूछते हैं कि इतना अच्छा पद छोड़ने की ज़रूरत क्या थी। कुछ लोग इसे बेवकूफी भी कहते हैं। लेकिन मेरा सपना था कि सत्ता में जाकर ज़मीनी स्तर पर बदलाव करूं। अफ़सोस, मैं अपनी ही लड़ाई पूरी नहीं लड़ पाई।
मैं एक मां हूं, एक बेटी और एक पत्नी भी। एक भरा-पूरा परिवार है, लेकिन भीतर एक खालीपन है। मैं अनुसूचित जाति समुदाय से आती हूं, जहां पीढ़ियों से भेदभाव का सामना करना पड़ा। मेरे पिता ने तमाम मुश्किलों के बावजूद पढ़ाई की और लेक्चरर बने। उसी संघर्ष की दूसरी पीढ़ी मैं हूं—गांव की पहली लड़की जो इंजीनियर बनी और फिर डिप्टी कलेक्टर।
कॉर्पोरेट नौकरी के साथ मैंने एमपीपीएससी की तैयारी की और 2018 में चयन हुआ। बतौर एसडीएम जब गांवों में काम किया, तो लगा कि मैं लोगों के जीवन में सचमुच बदलाव ला सकती हूं। वहीं से राजनीति में जाने का विचार मजबूत हुआ। लोगों ने भी मुझे नेता के रूप में देखना शुरू किया।
लेकिन इस्तीफा देने के बाद हालात मेरे पक्ष में नहीं आए। आज मैं घर पर हूं, बेरोज़गार हूं और पांच साल के बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहती हूं। न पर्याप्त बचत है, न सुरक्षित भविष्य।
फिर भी हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं है। अब मेरी लड़ाई सामाजिक ढांचे में बदलाव की है। हालात चाहे जैसे हों, मैं इस संघर्ष को आगे बढ़ाऊंगी—क्योंकि यही मेरे जीवन का उद्देश्य है।