Ashok Jagdish Prajapati

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28/05/2026

मकानमालिक की ताका-झांकी

रात का समय था। गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ...
27/05/2026

रात का समय था। गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। पूजा अपने कमरे में बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, क्योंकि आज उसका पति रवि कई दिनों बाद शहर से वापस लौटने वाला था।

पूजा और रवि की शादी को अभी सिर्फ छह महीने हुए थे। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। रवि हमेशा पूजा को खुश रखने की कोशिश करता था। इस बार शहर से लौटते समय वह पूजा के लिए एक खास तोहफा लाया था।

दरवाजे पर दस्तक हुई।

“पूजा, दरवाजा खोलो,” रवि की आवाज सुनते ही पूजा दौड़ पड़ी।

दरवाजा खुलते ही रवि मुस्कुराया। उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था। पूजा ने खुशी से पूछा, “क्या लाए हो मेरे लिए?”

रवि ने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, “पहले आँखें बंद करो।”

पूजा हँसने लगी। “अच्छा बाबा, कर ली बंद।”

रवि ने अपने बैग से एक मुलायम लाल रंग की पट्टी निकाली और प्यार से पूजा की आँखों पर बांध दी।

“अरे, ये क्या कर रहे हो?” पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“बस दो मिनट चुपचाप बैठो,” रवि बोला।

पूजा का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रवि क्या सरप्राइज देने वाला है। कमरे में हल्की खुशबू फैल चुकी थी। रवि ने मोमबत्तियाँ जलाई थीं और पूरे कमरे को फूलों से सजा दिया था।

फिर उसने धीरे से पूजा का हाथ पकड़ा और उसे कमरे के बीचों-बीच ले आया।

“अब पट्टी खोलूँ?” पूजा ने उत्सुकता से पूछा।

“नहीं, अभी नहीं,” रवि बोला।

अचानक रवि ने धीमी आवाज़ में कहा, “पूजा, तुमने मेरी जिंदगी बदल दी है। पहले मैं सिर्फ काम में खोया रहता था, लेकिन तुम्हारे आने के बाद घर घर जैसा लगने लगा।”

पूजा की आँखों के पीछे हल्की नमी आ गई।

रवि ने उसके हाथ में एक छोटा डिब्बा रखा।

“अब पट्टी खोल लो।”

पूजा ने धीरे-धीरे लाल पट्टी हटाई। सामने का नज़ारा देखकर वह हैरान रह गई। पूरा कमरा गुलाब के फूलों से सजा था। मेज पर छोटा सा केक रखा था जिस पर लिखा था — “मेरी जिंदगी, पूजा।”

डिब्बे के अंदर एक सुंदर सा चाँदी का कंगन था।

पूजा की आँखें भर आईं। “इतना सब मेरे लिए?”

रवि मुस्कुराया। “तुम इसके लायक हो।”

पूजा ने भावुक होकर रवि को गले लगा लिया। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। कमरे की खिड़की से आती ठंडी हवा और मोमबत्तियों की रोशनी उस पल को और भी खूबसूरत बना रही थी।

रवि ने मजाक करते हुए कहा, “वैसे लाल पट्टी में तुम और भी प्यारी लग रही थीं।”

पूजा हँस पड़ी। “तो रोज बांध दिया करो।”

दोनों की हँसी पूरे कमरे में गूंज उठी। उस रात लाल पट्टी सिर्फ आँखों पर बंधी कपड़े की पट्टी नहीं थी, बल्कि भरोसे, प्यार और अपनेपन का प्रतीक बन गई थी।

रात के करीब दस बज चुके थे। कमरे की हल्की पीली रोशनी पूरे माहौल को शांत और सुकून भरा बना रही थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी ...
27/05/2026

रात के करीब दस बज चुके थे। कमरे की हल्की पीली रोशनी पूरे माहौल को शांत और सुकून भरा बना रही थी। बाहर ठंडी हवा चल रही थी और खिड़की के पर्दे धीरे-धीरे हिल रहे थे। बिस्तर पर बैठे अमित की नजर बार-बार कमरे के दरवाजे की तरफ जा रही थी। वह मुस्कुराते हुए अपनी पत्नी निशा का इंतजार कर रहा था।

आज उनकी शादी की पहली सालगिरह थी। पूरे दिन दोनों परिवार और दोस्तों के साथ व्यस्त रहे थे। अब आखिरकार दोनों को अपने लिए थोड़ा समय मिला था। अमित ने घड़ी की तरफ देखा और हल्के मजाक में आवाज लगाई,
“निशा, अभी और कितना समय लगेगा? मैं कब से इंतजार कर रहा हूँ।”

ड्रेसिंग रूम से निशा की हँसी सुनाई दी,
“बस पाँच मिनट और… लड़कियों को तैयार होने में समय लगता है।”

अमित मुस्कुराया और सिर हिलाकर तकिए से टिक गया। उसे पता था कि निशा जब भी तैयार होती है, पूरे मन से होती है। वह हर छोटी चीज़ का ध्यान रखती थी।

कुछ देर बाद कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। निशा हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसके खुले बाल और चेहरे की मुस्कान अमित को कुछ पल के लिए चुप कर गई। वह बस उसे देखता रह गया।

निशा ने शर्माते हुए पूछा,
“ऐसे क्या देख रहे हो?”

अमित बिस्तर से उठकर उसके पास आया और बोला,
“सोच रहा हूँ कि मैं कितना खुशकिस्मत हूँ।”

निशा हल्का सा मुस्कुराई। उसने धीरे से कहा,
“आज का दिन बहुत अच्छा था। लेकिन असली खुशी तो अब मिल रही है, जब हम दोनों आराम से साथ बैठे हैं।”

दोनों बालकनी में जाकर बैठ गए। रात का आसमान तारों से भरा हुआ था। नीचे सड़क पर सन्नाटा था। अमित ने दो कप चाय बनाई और एक कप निशा को देते हुए बोला,
“याद है, शादी के बाद पहली रात तुम इतनी घबराई हुई थी कि ठीक से बात भी नहीं कर पा रही थी।”

निशा हँस पड़ी,
“और तुम बार-बार पानी पूछ रहे थे।”

दोनों पुरानी बातें याद करके हँसने लगे। उनके बीच का रिश्ता सिर्फ पति-पत्नी का नहीं था, बल्कि गहरी दोस्ती का भी था। वे छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूँढ लेते थे।

कुछ देर बाद निशा ने अमित के कंधे पर सिर रख दिया।
“एक साल कैसे निकल गया पता ही नहीं चला,” उसने धीरे से कहा।

अमित ने उसका हाथ पकड़ते हुए जवाब दिया,
“क्योंकि हर दिन तुम्हारे साथ खूबसूरत था।”

कमरे में वापस आकर दोनों बिस्तर पर बैठ गए। बाहर रात और गहरी हो चुकी थी, लेकिन उनके दिलों में अपनापन और प्यार की गर्माहट थी। उस शांत रात में उन्हें एहसास हो रहा था कि जिंदगी की असली खुशी महंगे तोहफों में नहीं, बल्कि अपने इंसान के साथ बिताए गए ऐसे छोटे और यादगार पलों में होती है।

गाँव के किनारे बने पुराने से मकान में उस दिन हल्की बारिश हो रही थी। आँगन में तुलसी के पास रखी मिट्टी की खुशबू पूरे घर मे...
27/05/2026

गाँव के किनारे बने पुराने से मकान में उस दिन हल्की बारिश हो रही थी। आँगन में तुलसी के पास रखी मिट्टी की खुशबू पूरे घर में फैल गई थी। घर के बड़े बेटे रवि शहर काम से गए हुए थे और घर में सिर्फ उनकी पत्नी सुनीता थी। पिछले दो दिनों से उसकी तबीयत थोड़ी खराब चल रही थी, इसलिए सास ने गाँव के मशहूर वैद्य वेदजी को बुला लिया था।

दोपहर का समय था। दरवाज़े पर साइकिल की घंटी बजी।
“लगता है वैद्यजी आ गए,” सास ने कहा और बाहर चली गईं।

सफेद कुर्ता, कंधे पर झोला और चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए वेदजी अंदर आए। गाँव में लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे सिर्फ दवाई ही नहीं देते थे, लोगों का दुख-सुख भी सुनते थे।

“कैसी तबीयत है बहू की?” उन्होंने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।

सुनीता धीरे से कमरे से बाहर आई। हल्की गुलाबी साड़ी में उसका चेहरा थोड़ा उतरा हुआ लग रहा था, मगर आँखों में एक अलग चमक थी।
“बस थोड़ा सिर भारी है,” उसने धीमे स्वर में कहा।

वेदजी ने नब्ज देखने के लिए हाथ आगे बढ़ाया। सुनीता ने काँपते हाथों से अपनी कलाई उनके सामने कर दी। बाहर बारिश की बूंदें टीन की छत पर मधुर आवाज़ कर रही थीं। कुछ पल दोनों बिल्कुल शांत रहे।

“कमज़ोरी ज्यादा है,” वेदजी बोले, “आराम कम करती हो क्या?”

सुनीता हल्का मुस्कुराई।
“घर का काम खत्म ही कहाँ होता है?”

सास चाय बनाने रसोई में चली गईं। अब कमरे में सिर्फ वेदजी और सुनीता थे।
“आप खुद का ध्यान नहीं रखोगी तो बीमार पड़ जाओगी,” वेदजी ने नरम आवाज़ में कहा।

उनकी बातों में एक अपनापन था। सुनीता कई दिनों से अकेलापन महसूस कर रही थी। पति काम में इतने व्यस्त रहते कि बात करने तक का समय नहीं मिलता। वेदजी की चिंता उसे अच्छी लग रही थी।

“कभी-कभी लगता है,” सुनीता बोली, “घर में सबकी फिक्र करने वाला कोई नहीं।”

वेदजी ने उसकी ओर देखा।
“हर इंसान चाहता है कि कोई उसे समझे।”

ये सुनकर सुनीता की आँखें भर आईं। मगर उसने तुरंत नज़रें झुका लीं। वह जानती थी कि रिश्तों की मर्यादा सबसे जरूरी होती है। मन में उठी भावनाएँ सिर्फ एक पल की कमजोरी थीं।

तभी सास चाय लेकर आ गईं। माहौल फिर सामान्य हो गया।

चाय पीते हुए वेदजी ने कहा,
“बहू को दवाई से ज्यादा आराम और खुश रहने की जरूरत है। परिवार का साथ सबसे बड़ी दवा होता है।”

शाम होने लगी थी। बारिश अब थम चुकी थी। वेदजी जाने लगे तो सुनीता उन्हें दरवाज़े तक छोड़ने आई।

“अपना ध्यान रखिएगा,” वेदजी ने जाते-जाते कहा।

सुनीता ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया। उस दिन उसे समझ आ गया था कि जिंदगी में प्यार सिर्फ आकर्षण नहीं होता, बल्कि सम्मान, अपनापन और समझ भी होता है। उसने तय किया कि अब वह अपने पति से खुलकर अपनी भावनाएँ साझा करेगी, ताकि रिश्तों में दूरी की जगह फिर से मिठास आ सके।

रीमा सुबह से ही बेचैन थी। उसके पति अमित रोज की तरह ऑफिस गए थे, लेकिन आज घर में एक अजीब-सी खामोशी थी। शादी को पाँच साल हो...
27/05/2026

रीमा सुबह से ही बेचैन थी। उसके पति अमित रोज की तरह ऑफिस गए थे, लेकिन आज घर में एक अजीब-सी खामोशी थी। शादी को पाँच साल हो चुके थे, पर रिश्ते में पहले जैसी गर्माहट नहीं बची थी। अमित हमेशा काम में व्यस्त रहते और रीमा खुद को अकेला महसूस करने लगी थी। इसी अकेलेपन में उसकी दोस्ती पुराने कॉलेज फ्रेंड करण से हो गई थी।

उस दिन करण रीमा से मिलने उसके घर आया था। दोनों ड्राइंग रूम में बैठे बातें कर रहे थे। रीमा बार-बार घड़ी देख रही थी।

“डरो मत, अमित शाम से पहले नहीं आएंगे,” करण मुस्कुराकर बोला।

रीमा ने धीमी आवाज में कहा, “फिर भी मन घबरा रहा है।”

दोनों चाय पीते हुए पुराने दिनों की बातें करने लगे। रीमा लंबे समय बाद खुलकर हँस रही थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी।

ट्रिन... ट्रिन...

रीमा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“इतनी जल्दी कौन आ गया?” उसने घबराकर कहा।

करण भी घबरा गया। रीमा धीरे-धीरे दरवाजे के पास गई और जैसे ही दरवाजा खोला, सामने अमित खड़े थे।

“अरे! तुम इतनी जल्दी?” रीमा के मुँह से निकला।

अमित ने थके हुए चेहरे से कहा, “ऑफिस में तबीयत खराब हो गई, इसलिए छुट्टी लेकर आ गया।”

अमित अंदर आए तो उनकी नजर सीधे सोफे पर बैठे करण पर पड़ी। कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

“ये कौन है?” अमित ने गंभीर आवाज में पूछा।

रीमा के हाथ काँपने लगे। “वो… ये करण है, मेरा कॉलेज फ्रेंड।”

करण तुरंत खड़ा हो गया। “नमस्ते भाईसाहब।”

अमित ने बिना मुस्कुराए जवाब दिया, “नमस्ते।”

कमरे का माहौल भारी हो चुका था। अमित सब समझने की कोशिश कर रहे थे। रीमा की घबराहट उनसे छिप नहीं रही थी।

“कॉलेज फ्रेंड अचानक घर कैसे?” अमित ने सवाल किया।

रीमा की आँखें झुक गईं। करण ने बात संभालने की कोशिश की, “असल में मैं इसी शहर में काम से आया था, तो सोचा पुराने दोस्त से मिल लूँ।”

अमित कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने रीमा की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्से से ज्यादा दर्द था।

“अगर तुम्हें अकेलापन महसूस होता था तो मुझे बताना चाहिए था,” अमित ने धीमी आवाज में कहा। “मैं काम में इतना उलझ गया कि तुम्हारी भावनाएँ समझ ही नहीं पाया।”

रीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े। उसे पहली बार एहसास हुआ कि रिश्ते छिपाने से नहीं, बात करने से बचते हैं।

करण ने माहौल समझते हुए कहा, “मुझे अब चलना चाहिए।”

वह वहाँ से चला गया। उसके जाते ही घर में फिर सन्नाटा छा गया।

रीमा रोते हुए बोली, “मुझसे गलती हो गई अमित… मैं बस किसी से बात करना चाहती थी।”

अमित ने गहरी साँस ली। “रिश्ते भरोसे से चलते हैं, रीमा। अगर हम एक-दूसरे से दूर हो गए हैं, तो उसे मिलकर ठीक करना होगा।”

उस दिन दोनों ने पहली बार खुलकर अपने रिश्ते की परेशानियों पर बात की। शायद वही बातचीत उनके टूटते रिश्ते को फिर से जोड़ने की शुरुआत थी।

रात काफी हो चुकी थी। दीवार घड़ी की सुइयाँ बारह पार कर चुकी थीं, लेकिन कमरे में अब भी सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर हल्की बार...
27/05/2026

रात काफी हो चुकी थी। दीवार घड़ी की सुइयाँ बारह पार कर चुकी थीं, लेकिन कमरे में अब भी सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और खिड़की से आती ठंडी हवा माहौल को और उदास बना रही थी।

रवि बिस्तर के एक कोने पर बैठा था। उसकी आँखों में नींद नहीं, बस बेचैनी थी। सामने उसकी पत्नी नेहा चुपचाप अलमारी में कपड़े ठीक कर रही थी। पिछले कुछ महीनों से दोनों के रिश्ते में अजीब दूरी आ गई थी। पहले जहाँ छोटी-छोटी बातों पर हँसी गूंजती थी, वहीं अब हर बात में खामोशी थी।

रवि ने धीरे से कहा,
“नेहा, तुम मुझसे इतनी दूर क्यों हो गई हो?”

नेहा ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया,
“थक गई हूँ रवि… हर दिन वही जिम्मेदारियाँ, वही तनाव। अब बात करने का मन नहीं करता।”

उसके शब्द सुनकर रवि का दिल टूट गया। वह जानता था कि नेहा घर और काम दोनों संभालते-संभालते परेशान हो चुकी है, लेकिन वह खुद भी अंदर से बिखर रहा था।

कुछ देर बाद रवि ने फिर कोशिश की,
“क्या मेरी कोई गलती है? अगर है तो बता दो… लेकिन यूँ चुप मत रहा करो।”

नेहा इस बार भी शांत रही। उसकी बेरुखी रवि को अंदर तक चुभ रही थी। अचानक उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।

“मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ नेहा,” रवि रोते हुए बोला, “लेकिन तुम्हारी ये खामोशी मुझे हर दिन मार रही है। पहले तुम मेरे हर दर्द को बिना बोले समझ जाती थीं… अब ऐसा लगता है जैसे मैं इस घर में अकेला हूँ।”

नेहा ने पहली बार उसकी तरफ देखा। उसने रवि को शायद पहली बार इस तरह टूटते हुए देखा था। उसका गला भर आया।

वह धीरे से उसके पास बैठ गई और बोली,
“मैं भी खुश नहीं हूँ रवि। बस जिंदगी की भागदौड़ में खुद को खो दिया है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मेरी चुप्पी तुम्हें इतना दर्द दे रही है।”

रवि ने नम आँखों से उसकी तरफ देखा।
“मुझे तुम्हारा साथ चाहिए नेहा, बस इतना कि जब मैं घर आऊँ तो लगे कि कोई अपना इंतजार कर रहा है।”

नेहा की आँखों से भी आँसू बहने लगे। उसने रवि का हाथ पकड़ लिया।

“माफ कर दो,” वह धीमे से बोली, “मैं अपनी परेशानियों में इतनी उलझ गई कि तुम्हारे दिल का हाल समझ ही नहीं पाई।”

कमरे में अब भी रात का सन्नाटा था, लेकिन दोनों के दिलों में जमी बर्फ पिघलने लगी थी।

नेहा ने रवि के कंधे पर सिर रख दिया। बाहर बारिश अब धीमी हो चुकी थी। रवि ने महसूस किया कि रिश्ते में सबसे ज्यादा दर्द दूरी नहीं देती, बल्कि अपनों की बेरुखी देती है।

उस रात दोनों ने तय किया कि चाहे जिंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, वे एक-दूसरे से बात करना कभी बंद नहीं करेंगे। क्योंकि रिश्ते खामोशी से नहीं, समझ और साथ से चलते हैं।

27/05/2026

घर छोड़ के जा रही थी

26/05/2026

नई किरायेदारन

सुबह से ही घर में हल्की-हल्की भागदौड़ थी। पूजा बार-बार घड़ी देख रही थी। आज उसके देवर रोहित कई महीनों बाद शहर से घर आने व...
26/05/2026

सुबह से ही घर में हल्की-हल्की भागदौड़ थी। पूजा बार-बार घड़ी देख रही थी। आज उसके देवर रोहित कई महीनों बाद शहर से घर आने वाला था। पूरे परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन पूजा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। वह रसोई का काम जल्दी-जल्दी निपटा रही थी और फिर कमरे में जाकर अलमारी खोलकर साड़ियाँ देखने लगी।

“कौन-सी पहनूँ?” उसने खुद से पूछा।

तभी उसकी सास कमरे में आईं और मुस्कुराकर बोलीं, “अरे बहू, इतना सजने-संवरने की क्या जरूरत है?”

पूजा हल्का सा शर्मा गई। “माँजी, इतने दिनों बाद घर आ रहा है, अच्छा तो लगना चाहिए ना।”

असल में रोहित सिर्फ देवर नहीं, बल्कि पूजा के लिए छोटे भाई जैसा था। शादी के बाद जब पूजा पहली बार इस घर में आई थी, तब वही था जिसने उसे हर मुश्किल में हँसाया था। जब कभी उसे मायके की याद आती, रोहित मजाक करके उसका मन हल्का कर देता। इसलिए उसके आने की खबर से पूजा सच में खुश थी।

पूजा ने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी, बालों में छोटी-सी गजरा लगाया और शीशे के सामने खड़ी होकर खुद को देखने लगी। तभी उसका पति अमित कमरे में आया और हँसते हुए बोला, “वाह! लगता है मेरे लिए तो तुम कभी इतनी तैयार नहीं हुई।”

पूजा मुस्कुरा दी। “आप भी ना, बस मजाक करते रहिए।”

अमित ने प्यार से कहा, “अच्छा है, घर में फिर से रौनक आ जाएगी। रोहित के बिना घर कितना सूना लगता था।”

दोपहर होते-होते दरवाजे की घंटी बजी। पूजा सबसे पहले दरवाजे की तरफ भागी। सामने रोहित खड़ा था, हाथ में बैग और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

“भाभी!” उसने खुश होकर कहा।

“आ गए तुम!” पूजा की आँखों में खुशी साफ दिखाई दे रही थी।

रोहित ने घर में कदम रखा तो सास-ससुर भी खुश हो गए। घर का माहौल पलभर में हँसी से भर गया। पूजा तुरंत उसके लिए पानी और खाना लेकर आई।

खाना खाते हुए रोहित बोला, “भाभी, आपके हाथ का खाना बहुत मिस किया मैंने।”

पूजा हँसते हुए बोली, “बस-बस, ज्यादा तारीफ मत करो।”

शाम को पूरा परिवार छत पर बैठा बातें कर रहा था। रोहित अपने शहर के किस्से सुना रहा था और सब लोग हँस रहे थे। अमित ने अचानक कहा, “देखो ना, रोहित के आने से पूजा कितनी खुश है।”

पूजा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “परिवार में अपने लोग हों तो घर घर जैसा लगता है।”

उस रात घर में सचमुच अलग ही सुकून था। रिश्तों की गर्माहट, अपनापन और छोटी-छोटी खुशियाँ ही तो परिवार को खास बनाती हैं।

रीना की शादी को पाँच साल हो चुके थे। उसका पति अमित एक सीधा-सादा और मेहनती इंसान था। वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था ...
26/05/2026

रीना की शादी को पाँच साल हो चुके थे। उसका पति अमित एक सीधा-सादा और मेहनती इंसान था। वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था और उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से अमित को रीना के व्यवहार में बदलाव महसूस होने लगा था। वह अक्सर फोन छुपाकर बात करती, देर रात तक किसी से चैट करती और अमित के सामने घबराई हुई रहती।

अमित ने कई बार पूछना चाहा, लेकिन हर बार उसने खुद को रोक लिया। उसे भरोसा था कि उसकी पत्नी कभी उसका दिल नहीं दुखाएगी। लेकिन एक दिन वह सच सामने आ ही गया, जिसकी अमित ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

उस दिन अमित ऑफिस से जल्दी घर लौट आया। जैसे ही उसने कमरे का दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। रीना कमरे में किसी दूसरे आदमी के साथ खड़ी थी। दोनों घबराकर अलग हो गए। कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

अमित के हाथ काँपने लगे। उसकी आँखों में गुस्से से ज्यादा दर्द था। वह कुछ पल तक चुपचाप रीना को देखता रहा। रीना का चेहरा डर से पीला पड़ चुका था।

“अमित… मेरी बात सुनो…” रीना रोते हुए बोली।

लेकिन अमित के होंठों से कोई शब्द नहीं निकला। जिस इंसान पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसी ने उसका भरोसा तोड़ दिया था।

रीना उसके पैरों के पास बैठ गई। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

“मुझसे गलती हो गई… मुझे माफ कर दो… मैं बहुत बड़ी भूल कर बैठी…” वह रोते हुए कह रही थी।

अमित ने भारी आवाज़ में पूछा, “कमी क्या थी मेरे प्यार में?”

यह सुनकर रीना और ज्यादा टूट गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह सिर्फ रोए जा रही थी। उसे एहसास हो चुका था कि उसने एक पल की कमजोरी में अपना घर, अपना रिश्ता और अपने पति का विश्वास सब दांव पर लगा दिया।

दूसरा आदमी मौका देखकर वहाँ से निकल गया। अब कमरे में सिर्फ पति-पत्नी थे और उनके बीच टूटा हुआ भरोसा।

रीना हाथ जोड़कर बोली, “मैं जानती हूँ मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। लेकिन एक मौका दे दो। मैं सब ठीक कर दूँगी। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

अमित की आँखों में आँसू आ गए। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी जिंदगी में ऐसा दिन भी आएगा। उसने धीरे से कहा, “रिश्ते प्यार से नहीं, भरोसे से चलते हैं… और आज वही टूट गया।”

रीना फूट-फूटकर रोने लगी। उसे पहली बार अपने किए की गंभीरता समझ आ रही थी। उस रात घर में कोई नहीं सो पाया। एक तरफ पछतावा था, दूसरी तरफ टूटा हुआ विश्वास।

कभी-कभी इंसान छोटी सी गलती समझकर ऐसा कदम उठा लेता है, जिसका दर्द पूरी जिंदगी पीछा नहीं छोड़ता। रिश्तों में सच्चाई और विश्वास सबसे बड़ी ताकत होते हैं, क्योंकि एक बार भरोसा टूट जाए तो उसे दोबारा जोड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।

रवि और नेहा की शादी को सात साल हो चुके थे। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन हर रिश्ते की तरह उनके बीच भी छोटी...
26/05/2026

रवि और नेहा की शादी को सात साल हो चुके थे। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन हर रिश्ते की तरह उनके बीच भी छोटी-बड़ी परेशानियाँ आती रहती थीं। कभी घर के खर्च को लेकर बहस हो जाती, तो कभी रवि के देर से घर आने पर नेहा नाराज़ हो जाती। कई बार बात इतनी बढ़ जाती कि दोनों पूरे दिन एक-दूसरे से ठीक से बात भी नहीं करते थे।

एक शाम रवि ऑफिस से थका हुआ घर लौटा। आते ही उसने देखा कि नेहा चुपचाप रसोई में काम कर रही है। चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी। रवि समझ गया कि सुबह की बात अभी तक उसके मन में है। सुबह उसने जल्दी में नेहा की बात ध्यान से नहीं सुनी थी और बिना कुछ कहे ऑफिस चला गया था।

रात का खाना भी दोनों ने चुपचाप खाया। घर में अजीब सी खामोशी थी। टीवी चल रहा था, लेकिन किसी का ध्यान उस पर नहीं था। रवि कई बार नेहा से बात करने की कोशिश करता, मगर वह छोटे-छोटे जवाब देकर फिर चुप हो जाती।

रात को जब दोनों अपने कमरे में पहुंचे तो रवि ने धीरे से कहा, “नेहा, क्या तुम अभी भी नाराज़ हो?”

नेहा ने तकिये को ठीक करते हुए कहा, “तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? तुम तो हमेशा अपनी दुनिया में व्यस्त रहते हो।”

रवि कुछ पल चुप रहा। फिर उसने नेहा का हाथ पकड़ लिया और बोला, “फर्क पड़ता है तभी तो बात कर रहा हूँ। अगर तुम्हारी नाराज़गी मायने नहीं रखती, तो मैं कोशिश भी नहीं करता।”

नेहा की आँखें हल्की नम हो गईं। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे बस इतना चाहिए कि तुम मेरी बात सुन लिया करो। हर बार मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी बातें तुम्हारे लिए जरूरी ही नहीं हैं।”

रवि ने गहरी साँस ली। “गलती मेरी है। ऑफिस के तनाव में मैं कई बार समझ नहीं पाता कि तुम भी पूरे दिन कितनी जिम्मेदारियाँ संभालती हो। लेकिन सच कहूँ, तुम्हारे बिना मेरा घर घर नहीं लगता।”

कमरे की नाराज़गी धीरे-धीरे पिघलने लगी। नेहा मुस्कुराई और बोली, “और तुम्हें गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता है।”

रवि हँस पड़ा, “हाँ, लेकिन तुम्हें मनाने की आदत भी तो है।”

दोनों की हँसी के साथ माहौल बदल गया। जो बातें पूरे दिन दिल में बोझ बनी हुई थीं, वो रात की शांत बातचीत में हल्की हो गईं। यही उनकी खास बात थी। चाहे दिन कितना भी खराब क्यों न जाए, रात को सोने से पहले दोनों अपने मन की बात जरूर कर लेते थे।

नेहा हमेशा कहती थी, “रिश्ते में जीतने से ज्यादा जरूरी है रिश्ते को बचाए रखना।”

रवि भी मानता था कि पति-पत्नी के बीच समस्या होना गलत नहीं है, लेकिन उन समस्याओं को दिल में दबाकर रखना सबसे बड़ी गलती है। इसलिए दोनों ने एक नियम बना लिया था—कभी भी गुस्से में सोना नहीं है।

समय के साथ उनकी समझ और गहरी होती गई। अब जब भी कोई परेशानी आती, दोनों जानते थे कि रात की एक सच्ची बातचीत हर उलझन को आसान बना सकती है। क्योंकि प्यार वही होता है, जहाँ नाराज़गी के बाद भी लोग एक-दूसरे का हाथ छोड़ते नहीं।

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