Shreya Lekhika

Shreya Lekhika शौहरत के लिए बिक जाऊँ इतनी सस्ती जान नहीं हूँ
और हर कोई मुझे समझ ले इतनी भी आसान नहीं हूँ

©श्रेया The page is about,poems, gazals, muktak and lot more...

04/11/2025

31/10/2025

24/10/2025

मृत्यु को जीतो..._______________________________________________ये मैं दो कैसे हो गई,,अरे ये क्या है, मुझे कुछ समझ नहीं ...
17/10/2025

मृत्यु को जीतो...

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ये मैं दो कैसे हो गई,,अरे ये क्या है, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मेरे जैसी दिखने वाली लेटी क्यूँ है और मैं, मैं घूम कैसे रही हूँ। सब सो रहे हैं, किसे जगाऊं। सुबह के पांच बजे हैं। किस्से पूछूँ,,,,,,, हाथ पैर शिथिल हो गए, कुछ महसूस ही नहीं हो रहा।
अरेरेरेsss.....ये क्या हो रहा है, मैं क्या करूं। क्या मैं मर गई, या ये कोई स्वप्न है। मैं इस शरीर से बाहर क्यूँ हूँ????!!!
मैं 15 मिनिट तक इधर उधर भागती स्वयं को देखती , समझ ही नहीं पा रही थी, क्या हो गया है......निशब्द, स्तब्ध, शिथिल, मैं, आत्मा, अब शरीर में नहीं...ये मुझे समझ आ गया था...,,,, मैं फूट फूट कर रोने लगी। क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा था कि 40 की उम्र में, मैं गुज़र जाऊंगी। मैंने तो जीवन के बहुत सारे प्लॉन बनाए थे। कल ही तो मेरा करवाचौथ का व्रत आने वाला था। उसके लिए नई साड़ी, चूड़ी, और कितना कुछ लाई थी। छुटकी को "रोज़ - मेरी" स्कूल में शनिवार को एडमिशन के लिए ले जाना था।

शनाया के सोमवार से हॉफ ईयरली पेपर हैं , उसकी तैयारी करवानी थी। और कितना कुछ, जो मैं ही करती थी, क्योंकि सुधीर तो ऑफ़िस में व्यस्त रहते थे ना। घर की पूरी जिम्मेदारी मेरी थी। अब कैसे सब होगा.....मैंने सुधीर को देखा, मेरी छोटी बेटी जो 5 साल की थी और बड़ी बेटी जो 10 साल की अभी तीन दिन पहले ही हुई थी,,,देखा, सब सो रहे थे। मुझे और ज़्यादा रोना आ रहा था। हे प्रभु अब इन बच्चों का क्या होगा। ये कैसे रहेंगे मेरे बिना।

दिन भर इन्हें मम्मा - मम्मा करने की आदत थी। मुझसे लिपट कर सारा दिन मेरी बेटियाँ रहती थीं। अब ये कैसे समझ पाएंगे कि मम्मा के बिना भी जीना होता है।
मेरा भगवत गीता का अध्ययन, आत्मा अमर होती है का पठन और ढेर सारा किया हुआ मेडिटेशन, कुछ काम नहीं कर रहा था। मैं बिल्कुल वैसी थी, जैसा अर्जुन अपने दादा और भाई बंधुओं को देख कर हो रहा था, उसका पूरा ज्ञान निष्क्रिय हो गया था, तब। बस... मैं भी वैसे ही असहाय सा महसूस कर रही थी । थोड़ी देर में शनाया उठी, मेरी बच्ची पता नहीं कैसे, कुछ दिनों से कुछ ज़्यादा ही जिम्मेदार हो गई थी। ख़ुद से जल्दी उठना, अपना बेड व्यवस्थित करके, चद्दर समेटना और मेरे पैर छू कर, मेरी किचेन में मदद करना। सब कुछ आ गया था, उसे।
अब सोचती हूँ, क्यूँ कान्हा उसे इतना निपुण बना रहे थे। वो मुझे उठाने लगी, मेरे शरीर को, पर वो तो बस एक मांस का पिंड था अब। वो परेशान हुई, उसने सुधीर को उठाया। सुधीर आए और मुझे आवाज़ लगाई,,,,नीना ,, मुझे हिलाते हुए ज़ोर से आवाज़ लगाई,,, नीना कितना सोओगी, अब उठ भी जाओ। तुम तो सबसे पहले उठती हो। बुखार भी नहीं हैं, एकदम ठंडी पड़ी हो। उनका माथा ठनका,,नीना इतनी ठंडी क्यूँ है आज,उन्होंने मेरी सांसे चेक की, और एकदम निढाल हो कर फर्श पर गिर गए। नीना,,,नीना,,,कहते हुए ज़ोर से रोने लगे।
अरेरेरे यार नीना,,,ऐसे कौन करता है। वो फूट फूट कर रोने लगे। मैं आत्मा अपने आप को संभाल ही नहीं पा रही थी।
चाह कर भी मैं उनसे बात नहीं कर सकती थी। ना छू सकती थी। ना गले लगा सकती थी,ना ये बता सकती थी,,की अब मैं कभी नहीं लौट पाऊंगी,,,की नहीं जाना था मुझे भी। नहीं जाना था,,,,!!!,मेरी बड़ी बेटी शनाया मेरे शरीर से लिपट कर फ़फ़क फ़फक कर रोने लगी। मम्मा - मम्मा, मैं इतनी बड़ी नहीं हुई अभी, प्लीज़ मत जाओ, वापस आ जाओ। छोटी बेटी, उस मासूम को तो मालूम ही नहीं था, की उसे अब कितना जल्दी बड़ा होना पड़ेगा। वो उन दोनों को देखकर रोने लगी।

मेरे लिए बहुत मुश्किल था, वो क्षण क्योंकि मुझे अब दूसरी यात्रा करनी थी। अनंत की यात्रा।
मै भगवान से अरदास कर रही थी। प्लीज़ मुझे कुछ और समय दे दो।
सुधीर और बच्चे मुझे वापस आने को कह कर, बेइंतहा रो रहे थे। पर मेरे हाथ में कुछ नहीं था...
मैं आत्मा जो उस क्षण ना जा पा रही थी, और ना आ पा रही थी,ये समझ पाई कि जीवन जीने के साथ, मरना भी होता है। और मरने का कोई समय निर्धारित नहीं, मृत्यु एक क्षण में,, आपको इस दुनिया से उस दुनिया में ले जाती है,सोचने भर का भी समय नहीं मिलता। जाने की बिल्कुल भी ना तैयारी होती है ना इच्छा। (((( ये सब जानते हैं, पर मैं अभी नहीं मरूंगा, ये भी मानते हैं)))

इसीलिए हम सभी को हर क्षण मृत्यु की तैयारी करनी चाहिए। तैयारी जिसमें न काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर,हद से ज़्यादा आसक्ति न लोगों से, ना चीज़ों से, न ख़ुद से। कुछ बन जाने की होड़ में हमें अपनों के साथ होने वाले पलों को नहीं गंवाना चाहिए। जीवन न कुछ बनने का नाम है,, ना कहीं पहुंचने का, क्योंकि मिल कर भी क्या मिलेगा, क्या वो स्थाई होगा, आप कहेंगे,,तो फिर जीने का मतलब क्या, यदि कोई उद्देश्य ही न हो।
अवश्य उद्देश्य के बिना तो भगवान की प्राप्ति भी नहीं, किंतु उसे सहज भाव से होने देना, अवश्य हठ होना चाहिए, हठ योग यही है, किंतु अंतःकरण में, अभी क्यों नहीं हुआ, मुझे कुछ क्यों नहीं मिलता का क्षोभ ना हो, जीवन स्वीकार करते जाने का नाम है। पानी की तरह निश्चलता से बहना जीवन है। लोग पत्थर भी मारेंगे और बांध भी लगाएंगे,,, किंतु साहस और विनम्रता से चलते रहने का नाम जीवन है। यहाँ कोई बड़ा और कोई छोटा नहीं, जो है, वो असल में है ही नहीं। सबके बीच में होकर अपने आप को अलग रख कर जीना ही जीवन है। हम सब आत्मा की यात्रा पर हैं और अपने अपने पाठ सीखने आए हैं, तो बस हर क्षण एक सीख है, यही समझ कर जीना जीवन है। साक्षी भाव में हर पल रहना ही जीवन है।
जीते हुए मरने के लिए तैयार रहना,, स्वीकार भाव में रहना ही,,जीवन है

मुस्कुराते हुए सबको हँसाते रहना ही सही मायने में जीवन है दोस्तो!!!

कल में नहीं पल में जीना जीवन है!!

Shreyaa Vaishnav

08/10/2025

 #जयमाँकाली ..   #नवरात्रि_7th_day
29/09/2025

#जयमाँकाली ..

#नवरात्रि_7th_day

20/09/2025

अद्भुत आवाज़ के धनी आदरणीय Kumar_Mishra sir, बहुत बहुत धन्यवाद सर, 🙏 मेरी कलम को आपकी आवाज ने जीवंत कर दिया।, बेहद शुक्रिया सादर 🙏 😊

आँखें कभी तो
पूरा फ़साना होती है
और कभी
एक माचिस की डिब्बी में
बंद ज़िंदगी
वो जो हर रोज़
कई तूफ़ान लिए चलती है
ढूंढती है किसी अपने को
जो कह सके “मैं हूं न”
कभी झिलमिलाती है खुशियों से
और कभी उफन जाती है
समंदर की लहरों सी
आँखें जो कई ख्वाबों को
बनाती है दिल की पेंसिल से
और फिर ख़ुद ही मिटा देती है
हकीकत का रबर लेकर
आँखें होती है कभी उस
काले बादल जैसी
जो घुमड़ता तो है
पर बरसता नहीं
पर अंदर बहुत सारा
बह रहा होता है
शोर करता हुआ
कलमलाता हुआ
और एक दिन
भीष्म ऊष्मा से
फूट पड़ता है
तब या तो प्रलय हो जाती है
और खत्म कर देती है सब कुछ
या रिस्ता है
धीरे धीरे बूँद बूँद
नस नस में
और धुआँ धुआँ सा
घुटने लगता है
अंदर ही अंदर
क्योंकि जगह
नहीं मिलती उसे
कहीं फूटने की
बिखरने की
बरसने की
तो उन बूंदों को
वो कभी दिल में रख कर
रक्तचाप बना लेता है
और कभी दिमाग में रख कर
माइग्रेन
कभी थायराइड तो कभी
डायबिटीज़ की शक्ल ले
वो घूमता रहता है अंग अंग में
उसे डर जो लगता है
फटने से
कहीं ख़त्म न कर दे
वो सब कुछ
इसलिए काट देता है
पूरी ज़िंदगी वो यूंही
आँखों से झांकता हुआ
चुप चाप !!

Shreyaa Vaishnav

अजीब लोग.....
11/09/2025

अजीब लोग.....

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