Shreya Lekhika

Shreya Lekhika न होने से मुझे होगा बहुत आराम पर मसअला
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(((क्रोमोसोम का फर्क)))अरे ये क्या मैसेज है स्वाति ने कहा, फोन का नोटिफिकेशन ऑन था, इंस्टाग्राम का कोई मैसेज। ओह मेरी लग...
17/12/2025

(((क्रोमोसोम का फर्क)))

अरे ये क्या मैसेज है स्वाति ने कहा, फोन का नोटिफिकेशन ऑन था, इंस्टाग्राम का कोई मैसेज। ओह मेरी लगाई हुई स्टोरी का रिप्लाई।
स्वाति ने जैसे ही इंस्टा मैसेज पढ़ा, उसके मन में चिड़चिड़ाहट और लोगों की विक्षिप्त सोच पर खेद भर आया।

किसी बुद्धिजीवी पुरुष ने लिखा था, " आप लोग महिलाओं के साथ जो गलत हो रहा है, उसका बड़ा बखान करती हैं,पर क्या पुरुष बेचारा नहीं, उसे भी तो काट कर बक्से में डाला जा रहा है, और यदि आप लोग हम पुरुषों के सामने सभ्यता से आए, ढंग के कपड़े पहने तो क्या हम कुछ करेंगे आप के साथ, और सबसे बड़ी बात, आप क्यों हमारे मत्थे ये दोष डालती हैं, जबकि महिलाएं ही तो महिलाओं की दुश्मन है। वैसे भी एक स्त्री और पुरुष में क्या फर्क है, मात्र क्रोमोसोम ही का न। आप लोग स्वयं शिक्षित नहीं तो हम क्या करे??!

स्वाति को हंसी भी आ रही थी और क्रोध भी। किंतु महिलाएं पुरुषों से ज्यादा शांत होती हैं,सो स्वाति ने रिप्लाई कुछ यूँ किया।

भाईसाहब कहने लायक तो नहीं आप किंतु मैं अपने संस्कार जानती हूँ तो सुनिए....
***
पहली बात तो महिलाएं, कभी भी पुरुष या महिला के गीत नहीं गाती क्योंकि वो जानती है, स्त्री और पुरुष तत्व दोनों हर एक व्यक्ति में होते हैं, तभी तो अभी तक उसने बाप भाई वाली (((gaali))))का आविष्कार नहीं किया। जब आप मात्र क्रोमोसोम के फर्क की बात करते हैं तो फिर पुरुष तत्व पुरुषों में ही ज्यादा क्यों, वो महिलाओं में सिरसा की तरह विशाल रूप क्यों नहीं ले लेता। हरेक व्यक्ति में शिव और शक्ति हैं, योग में कहे तो इड़ा और पिंगला, किंतु जब एक भी अपने संतुलन से बाहर चला जाए तो समाज में विकृति उत्पन्न करता है।
आपने कहा मात्र क्रोमोसोम तो फिर महिलाओं में सहनशक्ति कहाँ से आ जाती है, क्योंकि यही पुरुष तत्व जो पुरुष प्रधान समाज ने श्रेष्ठ बताया कि पुरुष जो कहे वो होगा, जहां चाहे वहां जाएगा, उसे तो पूर्णतः भोक्ता ही बना दिया ,जिसे हर बात की आज़ादी है। और यदि क्रोमोसोम का ही खेल है मात्र, तो फिर जो स्त्रियां गलत कर रही हैं वो भी तो पुरुष तत्व अधिक होने की वजह से ही कर रहीं, क्योंकि महिला मतलब प्रकृति और प्रकृति मतलब देना, बहुत सारा सहना, वो ऐसी होती तो अब तक समाज को महिला प्रधान समाज कब का घोषित कर दिया होता।
आप कहते हैं,हम शिक्षित नहीं, शिक्षा स्कूलों से नहीं समाज से मिलती है, आप तो है न शिक्षित फिर किसी का रेप करते हुए अपनी मां अपनी बहन अपनी बेटी याद नहीं आती। अरे आप तो आँखो से पूरा नोच लेते हैं सड़क पर जाती हुई किसी महिला को। और वो जिसमें सिर्फ क्रोमोसोम का फर्क है, डरी हुई जल्दी से वहां से भागने की कोशिश करती है।
शिक्षा के मंदिर में ही सबसे ज्यादा, बुरी हालत हो रही है छोटी बच्चियों की।

और अब सभ्यता की बात, तो आपने अपने अश्लील आचरण देखे हैं, सीटी बजाना, भद्दे गाने गाना, अपनी गंदी फोटोज भेजना, और बोलते हुए भी शर्म आती है मुझे।
एक तीन साल की बच्ची से कैसी सभ्यता चाहिए आपको की उसे हाथ लगाते हुए भी हाथ नहीं कांपते आप लोगो के। महिलाएं भी गलत है, ये सच है कि बहुत सी महिलाएं महिलाओं का साथ नहीं देती, लेकिन वो भी तब ही जब उनमें पुरुष तत्व ज्यादा हो, हम सभी पुरुषों को गलत नहीं कहती लेकिन जो गलत भी हो रहा है समाज में, वो पुरुष ही कर रहे हैं।
क्या आपने कभी सुना है, अमुक महिला ने एक पुरुष को छेड़ा, ,किसी पुरुष का सामूहिक बलात्कार किया।
लानत है आपकी सोच पर, जो इसे सिर्फ क्रोमोसोम का फर्क कहता है, और फिर भी उस फर्क का फायदा उठाता है।

समाज को सभ्य या विभत्स बनाने का कार्य दोनों स्त्री- पुरुष का है, किंतु आपने तो स्त्री को ही भोग वस्तु बना लिया। जहां आपके होने से उसे सुरक्षा महसूस होनी चाहिए थी, वहीं वह आपकी उपस्थिति से घबराती है।
अरे इनोसेंट बनने का कोई शौक नहीं हमें, हमसे ज्यादा ताकतवर कोई नहीं। बच्चा पैदा करते वक्त 206 हड्डियां टूटने जितना दर्द सहती हैं हम, आप क्या बराबरी करेंगे हमारी। हमारे जितना हौसला, जो रोज़ प्रताड़ना, कभी सास की, कभी पति की और कभी बेटे की सुन कर, सह कर भी हंसती रहती हैं, क्योंकि स्त्री तत्व ज़्यादा जो होता है, स्त्रियों में, घर में सभी का ध्यान, मान - सम्मान पसंद न पसंद एक एक चीज़ का ध्यान रखती हैं हम।
तो मात्र क्रोमोसोम का फ़र्फ़ नहीं स्त्री या पुरुष
इस बात को जब अच्छे से समझ जायेंगे, तो किसी महिला के इनबॉक्स में घुसने से पहले और कुछ लिखने से पहले दो बार सोचेंगे।

स्वाति के इस रिप्लाई के बाद, कोई रिप्लाई नहीं आया...शायद वो बुद्धिजीवी क्रोमोसोम का फर्क समझ गया था।

Shreyaa Vaishnav

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