19/07/2016
हैशटैग "बाप"..
हैशटैग "जवानी"..
हैशटैग "नौकरी".
हैशटैग "सरकारी"
हैशटैग "शौक"...
हैशटैग "जबरा"...
हैशटैग "ज़िन्दगी"
मैं "बाप" हूँ.......एक माध्यम वर्गीय सरकारी "बाप"
मैं पिछले 25 सालों से "बाप" हूँ और 28 सालों से "पति"
समय बीतता गया ...और समय के साथ बीत रहा "मैं"।
मुझे फिल्में देखने का बहोत शौक था...पर अब नही देखता......असल में चाह के भी देख नही पाता....कारण बहोत से हैं...ज़िम्मेदारियाँ,भाग दौड़...पर सबसे बड़ा कारण कुछ और ही है...कारण ये की मैं जब पहली बार बाप बना था तब शाहरुख़ ख़ान फ़िल्मी दुनिया में उभर रहा था...मुझे खूब पसंद था वो...पर धीरे धीरे मुझे उससे जलन होने लगी...जलन क्यूँ?????? इसलिए की हम दोनों करीब करीब एक ही उम्र के हैं। हममें अंतर ये है कि वो उमर के साथ बढ़ता गया और मैं उमर के साथ दबता चला गया,अनेक ज़िम्मेदारियों के बोझ तले....उम्र के साथ उसका रुपया-पैसा-इज़्ज़त-शौहरत बढ़ी। मेरी स्थीति जस की तस रही।एक उप्लभदी ये मिली की "क्लर्क" से "केशियर" प्रमोट हो गया...पर उस प्रमोशन के चक्कर में सिर के पूरे बाल सफेद हो गए...तमाम बीमारियों ने शरीर में घर करना शुरू कर दिया,कमर 30 से बढ़ के 38 हो गयी..बहोत कुछ हो गया और बढ़ते हर इंच के साथ मेरी जलन बढ़ती गयी....
ख़ैर, बात शाहरुख़ ख़ान की नही मेरी है...
मैं "बाप" हूँ.
आज मैंने बाप होने का फ़र्ज़ निभाया है....आज मैंने अपनी "बेटी" की शादी की है।
खूब धमाल हुआ...पिछले कुछ दिनों मेंमेहमान ,रिश्तेदार,पडोसी,ननौकर-चाकर,.सबने जम के मौज की...और इन सबके बीच "मैं"
सबकी ज़रुरत, काम ज़्यादा की रखवाली करता...एक चमड़े के बैग में 10,20,50,100,500,1000 के नोट भरे..हर ज़रूर्स्ट के हिसाब से नोट निकाल निकाल के देता "मैं"...
"बरात" आयी.
"बाराती"आये...
"वरमाला" हुई..
खाना पीना शुरू हुआ...मैं एक कोने में खड़ा ये सब देखता रहा...लोग काउंटर पे खडे हर एक आइटम के लिए एक नया प्लेट उठा रहे थेl..इधर हर प्लेट के साथ मेरे 500 रूपये जा रहे थे..मैंने कैटरर को समझाने की कोशिश की पर बेटे ने झिड़क दिया..की बाराती क्या सोचेंगे???.सबने खूब खाया पीया,डकार मारी और चले गए ...मैंने सबसे पर्सनली पुछा "खाना खाया"?????पर मुझसे किसी ने नही पुछा... क्यों मैं "लड़की" का बाप हूँ...सब मुझे देखना है..सबकी ज़रुरत मेरी ज़ोम्मेदारी है..
शादी के मंडप में शादी पूरे रीती रिवाज से शुरू हुईi...हर मंत्र पे बैग में से 51/101 निकाल निकाल के देता हुआ मैं...
लड़के के माँ-बाप,भाई-बहन, चाचा-चाची, मामा-मामी,बुआ-मौसी,सबको कुछ माँ कुछ दिया।।।नेग के तौर पे....ये सब दहेज ना होकर भी एक ज़िम्मेदारी है.....क्योंकि लड़की हमारे है.
कन्यादान हुआ..आँखें भर आयीं..जिस बेटी को पाल-पोस के बाद किआ वो एक पल में दूसरे के घर की जो गयी..उसका अपना परिवार होगा अब..."ससुर" "बाप"( नया) होगा..और "सास" "माँ"(नयी)
और हम मेहमान.......एक बेटी की शादी के बाद माँ बाप मिल ही कितना पाते हैं.......
विदाई की रस्म का समय आया... सजी हुई नयी चमचमाती कार आयी
जिसको मैंने अपने प्रोविडेंट फण्ड में जमा किये हुए रुपयों से खरीदा था......
सब रोये।।गले मिले....
मैं कोने में खड़ा बस उस कार को देख रहा था.....
लाल रंग की...हुंडई की
मुझे कार बहोत पसंद है...सोचा था कभी अपने लिए खरीदूंगा एक अच्छी सी कार...पर खरीद नहीं पाया.......
बेटी को गाड़ी में बिठाया और उस कार को धीरे से धक्का दिया....रस्म अदायगी के तौर पे..
बेटी तो जा ही रही थी......पर साथ ही मेरी आँखों के सामने मेरे जीवन भर की कमाई जो पाई पाई करके बचायी ... वो भी जा रही थी..6 लाख़ की वो लाल रंग की हुंडई की कार।
सब लोग तीतर-बितर हुए..मैं थोड़े सुकून की तलाश में घर के अंदर गया.....थक के बिस्तर पे पड़ा......वो चमड़े का बैग अभी भी कलाई में फसां था....मैंने थकी हाथों से उस बैग को खोला...अब उस बैग में 50 100 500 100 के नोटों की जगह लॉन..झालर...खाने।।मंडप....हार-फूल वालों का बकाया बिल भरा था ...मैं और थक गया...और वहीँ पसर गया..
सुबह नींद खुली..पता चला मैं जहाँ रात में थक के पड़ा था वहीँ सो गया था..... देखा नाते रिश्तेदार चाय पीते शादी में होने वालों घटनाओं और लड़के वालों को लेके गप्पे मार रहे थे....और उनकी बच्चे तेज़ आवाज़ में टीवी देख रहे थे...
मेरा ध्यान उधर गया.....
देखा "शाहरुख़ खान" "जबरा" नाम के गाने पे लाल किला के सामने अपने घने काले बालों पे हाँथ फेरता उछल उछल के नाच रहा था... और घर के बच्चे उसकी नक़ल कर रहे थे..
मैं फट से उठा....ग़ुस्से भरी उदासी से चमड़े के बैग को देखा जल्दी -जल्दी दफ्तर जाने की तैयारी करने लगा...उधर शाहरुख़ ख़ान "फैन" को हिट करने में लगा था...इधर मैं चमड़े के बैग में पड़े "बिल" को "निल" करने की जद्दोज़हद शुरू करने जा रहा था......
मैं अचानक समय के साथ बूढ़ा हो चूका था.....