17/11/2025
D*288/T*900 दिन विशेष : 17 नवंबर
सत्ता में आने वाले दल को जोतिबा का नीति-दर्शन ही अपनाना होगा-डॉ.अंबेडकर
17.11.1951 के “जनता” के अंक में की गई घोषणा के अनुसार डॉ.अंबेडकर के मनमाड़ और नासिक में सार्वजनिक सभाएं आयोजित की गई। नासिक में उनके कार्यक्रम की शुरुआत 17.11.1951 को शाम 6 बजे हुई। उन्होंने कहा-
मेरा यह चुनावी दौरा है और मैं चुनाव के बारे में ही कुछ कहने जा रहा हूँ। मेरी आपसे विनती है कि इस क्षेत्र से चुनावों में उतरे शे. का. फ. और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को ही आप अपना मत दें।
इस चुनाव में काँग्रेस को हराना बिल्कुल असंभव है ऐसा नहीं है। सब जानते हैं कि काँग्रेस में कितना असंतोष फैला हुआ है। आजाद सोच वाले नागरिक काँग्रेस पसंद नहीं करते। वह केवल गुलाम चाहती है। जिन लोगों को यह बात हजम नहीं होती वे काँग्रेस छोड़ देते हैं। देश में आज जितने दल हैं उनमें जनता को अत्यंत अप्रिय दल अगर कोई है तो वह है काँग्रेस।
इसके बावजूद मुझे डर है कि इस चुनाव में काँग्रेस ही जीतेगी। इसकी वजह एक ही है और वह है आज काँग्रेस विरोधी दलों में एकता नहीं है। कई पार्टियां हैं और हर पार्टी द्वारा अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए गए हैं। ये उम्मीदवार आपस में झगड़ेगे और उनके झगड़ों के कारण काँग्रेस विरोधी ताकतों का बल कम होगा और काँग्रेस की विजय होगी।
काँग्रेस विरोधी सभी दलों को एकजुट कर एक चुनाव क्षेत्र से काँग्रेस के खिलाफ एक ही उम्मीदवार खड़ा रहे ऐसा कुछ करने की मेरी इच्छा थी लेकिन इतना समय नहीं था इसलिए इस बारे में की गई मेरी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी। हालांकि जिन पार्टियों में ज्यादा एकजुटता है उनमें कम से कम चुनावों तक ही सही एकता लाने के उद्देश्य से फेडरेशन द्वारा समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव करार किया है। आप जानते हैं कि पंढरपूर जाने के कई रास्ते हैं। सभी एक ही राह से जाएं यह संभव नहीं होता। कुछ लोगों की श्रद्धा होती है कि फलां राह से जाएंगे तभी वैकुंठ की प्राप्ति होगी। अभी तक हमें राजनीति का कोई खास अनुभव नहीं है। जब अनुभव की प्राप्ति होगी तभी सभी दल इकट्ठा आकर राह के बारे में विचार करेंगे। उसी में से हमें काँग्रेस के खिलाफ पक्षों की एकजुटता के दर्शन होंगे। लेकिन आज हर किसी को अपना ही रास्ता सही प्रतीत हो रहा है। ऐसे हालात में राह की ओर ज्यादा ध्यान देना छोड़कर किस दिशा में जाना है यह देखकर उस दिशा में जाने वाले दूसरों के हाथों में हाथ डालकर आगे बढ़ा जाए तो उसका मतलब किसी को धोखा देना नहीं होगा। और किसी पर बेईमानी का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता।
इसी नजरिए के साथ फेडरेशन और समाजवादी पक्ष ने चुनाव गठबंधन किया है। हम दोनों के बीच कुछ मामलों में मतभेद हैं, लेकिन हम दोनों की दिशा एक ही है। उच्च वर्ग के दबाव से जनता को मुक्ति दिलाने को लेकर हम दोनों दलों की एक राय है। इसलिए भले सभी मामलों में हमारी राय एक न हो लेकिन दोनों दलों का एक दिल से, संगठित होकर इस लड़ाई में एक दूसरे का साथ देना संभव है इसका हम दोनों पार्टियों को यकीन होने के कारण ही हम संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
मुझसे सवाल पूछा गया कि महाराष्ट की शेतकरी-कामगार पार्टी किसान-मजदूर पक्ष से आपने हाथ नहीं मिलाया? आज से पहले कभी इस विषय पर मैंने सार्वजनिक रूप से कुछ कहा नहीं था लेकिन आज मैं इस सवाल का जवाब देने वाला हूं। पहले ब्राह्मणेतर दल था। न सिर्फ अपने प्रांत में बल्कि मध्यप्रांत, वरदहाद, मद्रास में भी ऐसी पार्टी का अस्तित्व था। म. ज्योतिबा फुले ने इस पार्टी की शुरुआत की थी, इसीलिए इस पार्टी के अनुयायी अपने को म. फुले के अनुयायी कहलाने लगे। लेकिन वे केवल नाममात्र के अनुयायी रहे। ज्योतिबा का कार्यक्रम, उनकी नीतियां आदि बातों को ईन लोगों ने त्याग दिया। अपने अलग अस्तित्व को जमीन में अपने ही हाथों गाडकर वे काँग्रेस में भी शामिल हुए। कालांतर में ये ब्राह्मणेतर दल नामशेष हुआ। ज्योतिबा का अनुयायी कहलाने मुझे पहले कभी शर्म महसूस नहीं हुई और आज भी नहीं होती है। आत्मविश्वास के साथ मैं कह सकता हूं कि केवल मैं ही आज तक ज्योतिबा से ईमानदारी और निष्ठा के साथ जुड़ा हुआ हूं। मुझे इस बात का भी यकीन है कि इस देश में जनता के सर्वांगीण हित का उद्देश्य लेकर भले कोई भी दल आए, उस दल का नाम कोई भी हो, उसे ज्योतिबा की नीतियों, उनके दर्शन और उनके कार्यक्रम के सहारे ही आगे बढ़ना होगा। प्रजातंत्र तक पहुंचाने वाला वही एक सही रास्ता है। समाज के 80 प्रतिशत लोगों को विद्या प्राप्ति से वॉचत रखना और उन्हें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक गुलामी में बांधकर रखना खुली आंखों से जब दिखाई देता रहे तब स्वराज, स्वराज कहकर हल्ला मचाने से क्या फायदा? स्वराज का फायदा सबको मिलना चाहिए। पिछड़े वर्ग की सर्वांगीण उन्नति का कार्यक्रम लेकर आगे चलने के अलावा कोई भी दल आज जनता का नेतृत्व नहीं कर सकता यह बात सूरज की रोशनी की तरह सत्य और साफ है। मुझे लगता है कि समाजवादी पार्टी को भी इस बारे में सोचना चाहिए।
आज का किसान कामगार पक्ष असल में ब्राह्मणेतर दलों की आवृत्ति बनकर आगे आया है। लेकिन ब्राह्मणेतर दल कहलाने में उस पार्टी को शरम क्यों आती है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है। इस पार्टी के नेताओं के साथ हमारे बहुत पुराने और घनिष्ठ संबंध हैं। इसके बावजूद इस दल के साथ फेडरेशन ने सहयोग क्यों नहीं किया इसका जवाब आज मुझे देना है।
इस पार्टी के बारे में एक बात जगजाहिर है कि यह पार्टी किसी जमाने में कम्युनिस्ट पार्टी बनना चाहती थी। नासिक जिले में ही दाभाडी में इस पार्टी की बैठक हुई और उसमें एक योजना को अपनाया गया था। उसे 'दाभाडी प्रबंध' कहा जाता है। यह प्रबंध पूरी तरह कम्युनिस्ट दर्शन पर आधारित है। आज इस देश में कम्युनिज्म को जगह देने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। हो सकता है जवाहरलाल नेहरू के हाथों आंतरराष्ट्रीय राजनीति में हुई बड़ी गलतियों के कारण कम्युनिज्म आ भी सकता है और फिर चीन और रूस के नियंत्रण में जाने के बाद इस देश की आजादी खत्म भी हो सकती है।
आज ही यहां के 'गावकरी' नाम के अखबार में मैंने एक बड़ा कष्टदायक समाचार पढ़ा। खबर है कि नेपाल में प्रवेश पाने के लिए कम्युनिस्ट सेना जिस मौके की तलाश में थी वह मौका उसे नेपाल की आंतरिक स्थितियों के कारण मिल रहा है। आज भारत की सरहद पर कम्युनिस्ट सेना बिल्कुल तैयार होकर आकर खड़ी है। कब यह सेना हमारे देश में प्रवेश करेगी इसका कोई भरोसा नहीं है। आज यह डर साफ दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं, मैंने एक साल पहले ही इस संकट की सूचना जवाहरलाल नेहरू को दी थी। उस वक्त किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। आज संयोगवश से मेरा डर सच साबित होने जैसे हालात पैदा हो रहे हैं।
हमें अपने देश की आजादी को बनाए रखना होगा। आजादी को कायम रखते हुए हमें देश को समृद्ध बनाना है। कम्युनिज्म को इस देश में अगर हम आसरा देंगे तो हमारी आजादी खत्म हो जाएगी। हमारा देश रूस का गुलाम हो जाएगा। पूर्वी यूरोप के राष्ट्रों का इतिहास हमें यही बता रहा है। आज हमारे देश के सामने जो बड़े महत्वपूर्ण सवाल हैं उन्हें हम अपनी आजादी खोकर हल नहीं कर सकते। कम्युनिज्म के कारण देश की आजादी मिट्टी में मिल जाएगी इस बात को हम नजरंदाज नहीं कर सकते।
कम्युनिज्म के अलावा अन्य रास्ते भी हैं जिन पर चल कर हम अपने देश की आजादी को कायम रख सकते हैं। दलित, पीड़ित जनता को सुवी और समृद्ध भी बना सकते हैं इसका मुझे विश्वास है। प्रजातंत्र का यह मार्ग अगर अधूरा और असफल सिद्ध हुआ तो ही हम कम्युनिज्म के बारे में सोचेंगे।
कम्युनिज्म से हाथ मिलाने वालों से, उसके बताए मार्ग पर आगे बढ़ने वालों तथा होगा? बताया उनके अनुयायियों से मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या उन्होंने इस बारे में सोचा कि अगर इस देश में कम्युनिस्ट राज आएगा तो इस देश का क्या जाता है कि शेतकरी कामगार पार्टी के पीछे पूरा मराठा समाज है और इसीलिए मैं यह खासकर जानना चाहता हूँ। कम्युनिज्म का मतलब है कि अपनी सारी संपत्ति सरकार के नाम करना। न सिर्फ सभी उद्योग, बल्कि पूरी खेती, जमीन, घर सब कुछ सरकार का हो जाएगा। और यह सब तानाशाही राजनीति के तहत अमल में लाया जाएगा। शेतकरी कामगार पार्टी के पीछे खड़े मराठा समाज को क्या यह स्वीकार है? उनकी जमीन, उनकी खेती, उनके बागान, उनके घर-बार सब अगर सरकार के हो जाएंगे तो क्या यह उन्हें चलेगा?
प्रजातंत्र में ऐसा होना संभव नहीं। इसीलिए यहां तानाशाही की स्थापना की जाएगी। विधानसभाओं को नेस्तनाबूत करके प्रजातांत्रिक राजनीति को खत्मकर कम्युनिस्ट राजनीति यह करेगी। जो लोग 'दाभाडी प्रबंध' हमारा प्रण है कहने वालों के लिए अब यह बंध गले के रोड़े जैसा लगने लगा है शेतकरी कामगार पार्टी के नेताओं के लिए अब इस रोड़े को निकाल फेंकना मुश्किल हो गया है। इस रोड़े को निकाल फेंकना राजनीतिक बेईमानी करने जैसा है ऐसा उन्हें लगता है। लेकिन कभी न कभी इस पार्टी को यह राजनीतिक रोड़ा निकाल कर फेंकना ही पड़ेगा। उम्मीद करते हैं कि जोतिबा के अनुयायी कहलाने वालों को जल्द ही पता चलेगा कि कम्युनिज्म की राह सही नहीं है।
संदर्भ : बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय खंड 40 पृष्ठ 236-39
संकलन एवं प्रस्तुति - Navneet Motghare