18/05/2026
सासाराम में ड्यूटी निभाते हुए मौत को गले लगाने वाला मुकेश "शहीद" या सिर्फ "असामयिक निधन" ?
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ड्यूटी निभाते हुए किसी कर्मी की जान चली जाए, तो
स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाएं जुड़ जाती हैं। ऐसे मामलों में सम्मानजनक शब्दों और संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा भी होती है। सवाल किसी नियम से टकराने का नहीं, बल्कि उस भावना को समझने का है जो आम लोगों के मन में उठती है।
इसी जिले में एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ निजी यात्रा पर एक हिल स्टेशन गए थे। वहां आतंकियों ने यात्रियों को निशाना बनाया, जिसमें कई लोगों की जान गई और वे भी उस घटना के शिकार हुए। बाई चांस वो सुरक्षा एजेंसी में कार्यकर्त अधिकारी थे (लेकिन उस समय वह निजी यात्रा पर थें) ।
उस समय मीडिया और समाज ने उन्हें सम्मान के साथ “शहीद” कहा, और आज भी हर साल उनके गांव से रिपोर्टिंग होती है। इस वर्ष भी हुई ही । यह बताता है कि इस देश में लोगों की भावनाएं और सम्मान की परंपरा कितनी गहरी है।
इसी भावना के कारण आज भी लोग पूछ रहे हैं कि जब कोई व्यक्ति ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान गंवाता है, तो उसे सम्मानजनक संबोधन देने में संकोच क्यों होना चाहिए।
लोगों का मानना है कि कई बार कुछ मामलों में सम्मान सहज रूप से दिया जाता है, जबकि कुछ वास्तविक और संवेदनशील मामलों में भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाता। यह चर्चा किसी विवाद के लिए नहीं, बल्कि समान संवेदना और सम्मान की अपेक्षा के रूप में देखी जानी चाहिए।
उम्मीद है कि मेन स्ट्रीम मीडिया,प्रशासन और पुलिस विभाग जनता की भावनाओं को समझेंगे, और इस तरह के मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाएंगे।
ड्यूटी निभाने के दौरान एक छोटे से सिपाही की मौत हो या लेफ्टीनेंट कर्नल की, ऊंचा या नीचा , गरीब या अमीर, गोरा या काला ,महिला या पुरुष ! जान की कीमत सबकी बराबर होनी चाहिए ।
शहीद मुकेश को हमारा सलाम 🇮🇳
नोट : देश के लिए काम करने वाले या देश के लिए जान देने वालों के अधिकारों की बात करना भी देशभक्ति है । प्रिय पाठकों,अगर आप सुरक्षा विभाग में नौकरी नहीं करते हैं तो भी साथ खड़ा हो कर उन्हें सपोर्ट कर सकते हैं 🙏