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जीवन में किसी भी चीज़ को हासिल करने के लिए मेहनत के साथ-साथ सब्र की भी ज़रूरत होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संजू सैमसन ...
02/03/2026

जीवन में किसी भी चीज़ को हासिल करने के लिए मेहनत के साथ-साथ सब्र की भी ज़रूरत होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संजू सैमसन हैं। पिछले एक साल में संजू के साथ क्या कुछ नहीं हुआ। शुभमन गिल के लिए उन्होंने अपनी बैटिंग पोज़िशन छोड़ी। एशिया कप में फिनिशर की भूमिका निभाई, फिर प्लेइंग-11 से ड्रॉप कर दिए गए। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ जब मौका मिला, तब फॉर्म ने साथ नहीं दिया। धीरे-धीरे सब मानने लगे कि अब शायद संजू का खेल खत्म हो चुका है।

संजू को डगआउट में बैठा देखकर दुख होता था, लेकिन किया भी क्या जा सकता था? अभिषेक शर्मा का साथ देने के लिए टीम में विस्फोटक बल्लेबाज़ ईशान किशन की वापसी हो चुकी थी। उनके आने के बाद टीम संयोजन में संजू के लिए जगह बन ही नहीं पा रही थी।

लेकिन जिस पर ऊपरवाले का आशीर्वाद हो, उसे कौन रोक सकता है। अभिषेक शर्मा की फॉर्म बिगड़ी और संजू को टीम में शामिल करना मजबूरी बन गया। कुछ मैचों में उन्हें अच्छी शुरुआत मिली, लेकिन वे उसे बड़े स्कोर में तब्दील नहीं कर पाए। यह सिलसिला पिछले कई महीनों से संजू के साथ चलता आ रहा था।

इसके बावजूद संजू ने हार नहीं मानी। अंदर से वह दुखी ज़रूर थे, लेकिन उन्होंने अपना धैर्य बनाए रखा। फिर वह शाम आई, जिसने संजू को रातों-रात हीरो बना दिया। सेमीफाइनल में वेस्ट इंडीज के खिलाफ मुकाबला जीतना बेहद ज़रूरी था। रन चेज़ बड़ा था, इसलिए उम्मीदें अभिषेक, ईशान और सूर्यकुमार यादव से थीं, लेकिन इस अहम मुकाबले में भारत के ये तीनों सूरमा जल्दी ढेर हो गए।

जीत की मशाल लेकर जो खिलाड़ी आखिर तक मैदान में डटा रहा, वह थे संजू सैमसन।

संजू ने पूरे धैर्य के साथ बल्लेबाज़ी की। न कोई जल्दबाज़ी दिखाई, न कोई गलत शॉट खेला। मानो उन्हें पहले से पता हो कि यह दिन उनका है और टीम इंडिया को जीत दिलाने वाला वही खिलाड़ी होंगे।

जब टी20 वर्ल्ड कप के सुपर 8 मुकाबले में भारतीय क्रिकेट टीम का सामना वेस्ट इंडीज क्रिकेट टीम से हुआ, तब शायद ही किसी ने स...
02/03/2026

जब टी20 वर्ल्ड कप के सुपर 8 मुकाबले में भारतीय क्रिकेट टीम का सामना वेस्ट इंडीज क्रिकेट टीम से हुआ, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह मैच एक खिलाड़ी की तकदीर बदल देगा। शुरुआत अच्छी नहीं रही। अभिषेक शर्मा, ईशान किशन और सूर्यकुमार यादव जैसे भरोसेमंद नाम जल्दी-जल्दी पवेलियन लौट गए। स्टेडियम में सन्नाटा था, करोड़ों फैंस की उम्मीदें डगमगा रही थीं। लेकिन क्रीज़ पर एक खिलाड़ी अंत तक खड़ा रहा। नाम, संजू सैमसन।

यह वही संजू थे, जिनकी फॉर्म पर सवाल उठे थे। जिन्हें न्यूज़ीलैंड के खिलाफ सीरीज में बतौर ओपनर आजमाया गया, लेकिन जब रन नहीं आए तब उन्हें प्लेइंग 11 से ड्राप कर दिया गया । वही संजू, जिनके लिए टीम में जगह बनाना हर बार एक जंग जैसा रहा। किस्मत जैसे बार-बार उनकी परीक्षा ले रही थी। मगर कल रात, संजू सिर्फ रन नहीं बना रहे थे… वो भरोसा बना रहे थे।

हर बाउंड्री के बाद उनकी आंखों में जल्दबाज़ी नहीं, सुकून दिखता था। हर सिंगल के साथ वो मैच को अपने काबू में लेते जा रहे थे। रन रेट बढ़ रहा था, दबाव बढ़ रहा था… लेकिन संजू का दिल नहीं डगमगाया। वो शतक के पीछे नहीं भागे। वो तालियों के पीछे नहीं भागे। वो बस अंत तक खड़े रहना चाहते थे। और जब आखिरकार जीत की लकीर पार हुई, तब संजू ने बल्ला नीचे रखा — जैसे कह रहे हों, “आज मैंने खुद को नहीं, अपने भरोसे को जिताया है।”

ये पारी सिर्फ स्कोरबोर्ड पर दर्ज एक मैच विनिंग पारी नहीं थी। ये उन तमाम सवालों का जवाब थी जो सालों से उनके पीछे-पीछे चलते थे। कल रात कोलकाता में सिर्फ भारत नहीं जीता… एक खिलाड़ी ने अपनी किस्मत से जंग जीत ली।

जब भी क्रिकेट इतिहास के सबसे जुझारू विकेटकीपर-बल्लेबाज़ों की बात होती है, साउथ अफ्रीका के मार्क बाउचर का नाम ज़ेहन में स...
05/02/2026

जब भी क्रिकेट इतिहास के सबसे जुझारू विकेटकीपर-बल्लेबाज़ों की बात होती है, साउथ अफ्रीका के मार्क बाउचर का नाम ज़ेहन में सबसे पहले आता है। वह ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने दस्तानों के पीछे से भी मैच जिताए और बल्ले से ऐसे प्रहार किए कि विपक्षी टीम हिल गई। लेकिन बाउचर की कहानी सिर्फ रिकॉर्ड्स और आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्द, जिद, संघर्ष और अचानक आए उस ब्रेक की कहानी है जिसने उनके शानदार करियर को बीच रास्ते रोक दिया।

मार्क बाउचर का जन्म 3 दिसंबर 1976 को ईस्ट लंदन, साउथ अफ्रीका में हुआ था। उन्होंने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत एक स्पेशलिस्ट विकेटकीपर के रूप में की। घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें 1997 में साउथ अफ्रीका की टेस्ट टीम में जगह मिली। शुरुआती दौर में उनसे बल्लेबाज़ी की नहीं, बल्कि सिर्फ भरोसेमंद विकेटकीपिंग की उम्मीद की जाती थी, लेकिन बाउचर ने जल्द ही यह धारणा तोड़ दी कि विकेटकीपर सिर्फ दस्तानों तक सीमित रहता है।

विकेटकीपिंग में बाउचर की सबसे बड़ी ताकत उनके बेहद तेज रिफ्लेक्सेस थे। मुश्किल से मुश्किल कैच लपकना, तेज और स्पिन दोनों तरह के गेंदबाज़ों के साथ समान आत्मविश्वास से कीपिंग करना उनकी पहचान बन गया। अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में उन्होंने 555 डिसमिसल्स किए, जो लंबे समय तक विश्व रिकॉर्ड रहा। यह आंकड़ा बताता है कि वह सिर्फ विकेटकीपर नहीं, बल्कि मैदान पर खेल को नियंत्रित करने वाले खिलाड़ी थे।

बल्लेबाज़ी के लिहाज़ से बाउचर आमतौर पर निचले क्रम में उतरते थे, लेकिन उनकी बैटिंग में गज़ब की ताकत और निडरता थी। संकट की घड़ी में वह तेज रन बनाकर मैच का रुख बदल देते थे। 2006 में ज़िम्बाब्वे के खिलाफ खेली गई 147 रनों की पारी उनकी सबसे यादगार पारियों में से एक मानी जाती है। कई मौकों पर वह नाबाद रहते हुए साउथ अफ्रीका को मुश्किल हालात से बाहर निकाल चुके थे और यह साबित कर दिया कि विकेटकीपर भी टीम के लिए मैच विनर हो सकता है।

मार्क बाउचर ने कई अहम मुकाबलों में साउथ अफ्रीका को बल्ले से जीत दिलाई, खासकर तब जब शीर्ष क्रम पूरी तरह विफल रहा। उनकी पारियाँ अक्सर सिर्फ स्कोर नहीं बढ़ाती थीं, बल्कि टीम का मनोबल और मैच का मोमेंटम दोनों बदल देती थीं।

लेकिन साल 2012 में एक हादसे ने उनके पूरे करियर की दिशा बदल दी। इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान नेट प्रैक्टिस में एक गेंद सीधे बाउचर की आंख पर जा लगी। चोट इतनी गंभीर थी कि उनकी बाईं आंख की रोशनी को स्थायी नुकसान पहुंचा। डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि आगे क्रिकेट खेलना बेहद जोखिम भरा होगा। मजबूरन, इसी चोट के चलते मार्क बाउचर को उसी साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेना पड़ा।

खिलाड़ी के रूप में संन्यास लेने के बाद भी बाउचर का क्रिकेट से रिश्ता खत्म नहीं हुआ। उन्होंने कोचिंग को अपना नया रास्ता बनाया और आगे चलकर साउथ अफ्रीका की राष्ट्रीय टीम के हेड कोच भी बने। मैदान से बाहर रहते हुए भी उन्होंने खेल को नई दिशा देने की कोशिश की।

मार्क बाउचर सिर्फ आंकड़ों या रिकॉर्ड्स का नाम नहीं हैं। वह उस खिलाड़ी का प्रतीक हैं जिसने दर्द में भी खेला, टीम के लिए हर भूमिका निभाई और अंत तक लड़ता रहा। दस्तानों वाला यह योद्धा आज भी क्रिकेट इतिहास में अपनी जुझारू पहचान के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

जब दुनिया की बड़ी क्रिकेट ताकतों के सामने ज़िम्बाब्वे को अक्सर हल्के में लिया जाता था, तब ग्रांट फ्लावर जैसे खिलाड़ी उस ...
03/02/2026

जब दुनिया की बड़ी क्रिकेट ताकतों के सामने ज़िम्बाब्वे को अक्सर हल्के में लिया जाता था, तब ग्रांट फ्लावर जैसे खिलाड़ी उस टीम की असली रीढ़ थे। वह ऐसे बल्लेबाज़ थे जो शोर नहीं मचाते थे, लेकिन क्रीज़ पर टिककर विपक्ष को थका देते थे। बाएं हाथ की उनकी बल्लेबाज़ी में धैर्य भी था और ज़रूरत पड़ने पर आक्रामकता भी। ग्रांट फ्लावर उस दौर के खिलाड़ी थे, जब ज़िम्बाब्वे क्रिकेट पहचान बना रहा था और हर रन, हर पारी एक जंग की तरह लड़ी जाती थी।

ग्रांट फ्लावर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम अक्टूबर 1992 में भारत के खिलाफ टेस्ट डेब्यू से रखा, जहां उन्होंने पहली ही पारी में 82 रन बनाकर अपने हुनर का परिचय दिया। करियर की शुरुआत उन्होंने ओपनर के रूप में की, लेकिन वनडे क्रिकेट में नंबर छह पर मिली सफलता के बाद वह मिडिल ऑर्डर में स्थायी हो गए। लंबे समय तक बल्लेबाज़ी करने की क्षमता और कठिन परिस्थितियों में टीम को संभालने का माद्दा उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

1995 में पाकिस्तान के खिलाफ ज़िम्बाब्वे की पहली ऐतिहासिक टेस्ट जीत में ग्रांट फ्लावर ने नाबाद दोहरा शतक जड़कर खुद को हमेशा के लिए क्रिकेट इतिहास में दर्ज कर लिया। यह पारी न सिर्फ उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ पारियों में गिनी जाती है, बल्कि ज़िम्बाब्वे क्रिकेट के सबसे गौरवपूर्ण पलों में से एक भी मानी जाती है। वह ऐसे बल्लेबाज़ थे जो हालात के हिसाब से खेलते थे—जब विकेट बचाना ज़रूरी हो तो दीवार बन जाते थे और जब रन चाहिए हों तो बड़े शॉट खेलने से नहीं डरते थे।

बल्लेबाज़ी के साथ-साथ ग्रांट फ्लावर विकेट के आसपास एक शानदार फील्डर भी थे और सीमित ओवरों के क्रिकेट में उपयोगी लेफ्ट-आर्म स्पिन गेंदबाज़ के तौर पर टीम को संतुलन देते थे, हालांकि कभी-कभी उनके गेंदबाज़ी एक्शन पर सवाल भी उठे। शानदार शुरुआत के बाद समय के साथ टेस्ट और वनडे—दोनों फॉर्मेट में उनका औसत धीरे-धीरे गिरने लगा, लेकिन टीम में उनकी अहमियत बनी रही।

2003 के इंग्लैंड दौरे पर भाई एंडी फ्लावर के संन्यास के बाद उन्हें फिर से ओपनिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरे पर वह लगातार टीम को संकट से बाहर नहीं निकाल पाए, लेकिन ट्रेंट ब्रिज में नैटवेस्ट सीरीज़ के दौरान खेली गई उनकी नाबाद 96 रनों की पारी ने साबित कर दिया कि बड़े मौकों पर वह अब भी मैच जिताने की काबिलियत रखते थे।

2004 में ज़िम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड और सीनियर खिलाड़ियों के बीच चल रहे विवाद के दौरान ग्रांट फ्लावर विद्रोही खिलाड़ियों की आवाज़ बनकर सामने आए। उन्होंने बेझिझक अपनी बात रखी और खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए खड़े हुए। उसी साल उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का बड़ा फैसला किया, जिसने ज़िम्बाब्वे टीम को गहरा झटका दिया।

संन्यास के बाद ग्रांट फ्लावर ने इंग्लैंड की काउंटी टीम एसेक्स के साथ करार किया, जहां उन्होंने 2005 से 2010 के बीच छह सफल सीज़न बिताए। इस दौरान उन्होंने टीम को तीन वनडे खिताब और एक T20 ट्रॉफी जिताने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद वह ज़िम्बाब्वे लौटे और संक्षिप्त अंतरराष्ट्रीय कमबैक करते हुए साउथ अफ्रीका के खिलाफ दो वनडे खेले। साथ ही 2010–11 में मशोनालैंड ईगल्स को घरेलू T20 खिताब दिलाकर कप्तान के तौर पर भी अपनी छाप छोड़ी।

खिलाड़ी के रूप में संन्यास के बाद भी ग्रांट फ्लावर क्रिकेट से जुड़े रहे और कोचिंग की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने ज़िम्बाब्वे के अलावा पाकिस्तान और श्रीलंका की टीमों के साथ बैटिंग कोच के रूप में काम किया और कई युवा बल्लेबाज़ों को निखारने में योगदान दिया। ग्रांट फ्लावर सिर्फ एक बल्लेबाज़ नहीं थे, बल्कि वह उस दौर की पहचान थे जब ज़िम्बाब्वे क्रिकेट संघर्ष कर रहा था, लेकिन हार मानने को तैयार नहीं था। उनकी कहानी धैर्य, साहस और आत्मसम्मान की एक सशक्त मिसाल है।

न्यूज़ीलैंड के खिलाफ मौजूदा टी20 सीरीज़ में संजू सैमसन का बल्ला पूरी तरह खामोश नजर आया है। पूरी टी20I सीरीज़ में वह सिर्...
31/01/2026

न्यूज़ीलैंड के खिलाफ मौजूदा टी20 सीरीज़ में संजू सैमसन का बल्ला पूरी तरह खामोश नजर आया है। पूरी टी20I सीरीज़ में वह सिर्फ एक बार ही 20 रन का आंकड़ा पार कर पाए हैं। पिछले चार टी20 मुकाबलों में उनके बल्ले से कुल मिलाकर महज 40 रन निकले हैं, जिसने टीम मैनेजमेंट की चिंता जरूर बढ़ा दी है।

वहीं दूसरी ओर, लंबे समय बाद टीम इंडिया में वापसी करने वाले ईशान किशन ने मिले मौकों को दोनों हाथों से भुनाया है। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ उन्होंने न सिर्फ अपनी तूफानी बल्लेबाज़ी से असर छोड़ा, बल्कि शानदार फील्डिंग से भी सभी का दिल जीत लिया। मैदान पर उनकी फुर्ती और ऊर्जा साफ दिख रही है।

संजू के लगातार फ्लॉप प्रदर्शन के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि पांचवें टी20 मैच में उन्हें प्लेइंग इलेवन से बाहर किया जा सकता है। उनकी जगह ईशान किशन को मौका मिलने की संभावना मजबूत होती जा रही है। इस अटकल को और बल तब मिला, जब पांचवें टी20 से पहले ईशान किशन को प्रैक्टिस सेशन के दौरान विकेटकीपिंग करते हुए देखा गया।

ईशान की विकेटकीपिंग यह साफ संकेत दे रही है कि टीम मैनेजमेंट बड़ा फैसला ले सकता है और संजू सैमसन की जगह ईशान किशन को मौका मिल सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि आखिरी टी20 मुकाबले में टीम इंडिया किस खिलाड़ी पर भरोसा जताती है।

2003 वर्ल्ड कप का सुपर सिक्स मुकाबला। सामने थी दुनिया की सबसे खतरनाक टीम—ऑस्ट्रेलिया, और सामने था केन्या, जिसे ज़्यादातर...
30/01/2026

2003 वर्ल्ड कप का सुपर सिक्स मुकाबला। सामने थी दुनिया की सबसे खतरनाक टीम—ऑस्ट्रेलिया, और सामने था केन्या, जिसे ज़्यादातर लोग हल्के में ले रहे थे। नतीजा वही रहा जो उम्मीद थी—ऑस्ट्रेलिया ने मैच 5 विकेट से जीत लिया। लेकिन स्कोरबोर्ड से कहीं ज़्यादा, इस मैच की याद आज भी एक नाम की वजह से ज़िंदा है—आसिफ करीम।

केन्या की पारी भले ही लंबी नहीं चली, लेकिन असली कहानी तब शुरू हुई जब आसिफ करीम ने गेंद थामी। बाएं हाथ के इस स्पिनर ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों की लय पूरी तरह तोड़ दी। जिस पिच पर रन बनना आसान माना जा रहा था, वहां करीम ने अपनी फ्लाइट, कंट्रोल और सटीक लाइन-लेंथ से कंगारुओं को बांधकर रख दिया।

8.2 ओवर, 6 मेडन, सिर्फ 7 रन और 3 विकेट।
ये आंकड़े आज भी वर्ल्ड कप इतिहास की सबसे किफायती स्पेल्स में गिने जाते हैं।

उस दौर में ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाज़ी में बड़े-बड़े नाम थे—आक्रामक, आत्मविश्वास से भरे और किसी भी गेंदबाज़ को दबाव में डालने की काबिलियत रखने वाले। लेकिन उस दिन आसिफ करीम ने हालात उलट दिए। रन नहीं निकल रहे थे, स्ट्राइक रोटेट नहीं हो पा रही थी और हर गेंद पर विकेट का खतरा महसूस हो रहा था।

दिलचस्प बात यह रही कि पूरे 2003 वर्ल्ड कप में किसी भी गेंदबाज़ ने ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज़ों को इस तरह नहीं बांधा, जैसा आसिफ करीम ने इस एक स्पेल में कर दिया। भले ही मैच ऑस्ट्रेलिया जीत गया, लेकिन मैदान से निकलते वक्त तालियां केन्या के इस स्पिनर के लिए भी बज रही थीं।

क्रिकेट इतिहास ऐसे ही पलों से बनता है—जहां जीत-हार से ज़्यादा याद रहता है एक खिलाड़ी का जादू। और 2003 वर्ल्ड कप में आसिफ करीम का यह स्पेल, उसी जादू का नाम है।

ड्वेन जॉन ब्रावो वेस्टइंडीज क्रिकेट के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक रहे हैं, जिन्होंने लिमिटेड ओवर्स क्रिकेट की तस्वी...
29/01/2026

ड्वेन जॉन ब्रावो वेस्टइंडीज क्रिकेट के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से एक रहे हैं, जिन्होंने लिमिटेड ओवर्स क्रिकेट की तस्वीर ही बदल दी। 7 अक्टूबर 1983 को त्रिनिदाद में जन्मे ब्रावो ने बहुत कम उम्र में अपनी प्रतिभा दिखाई और 2004 में वेस्टइंडीज टीम में जगह बनाई। शुरुआत में वह एक मीडियम पेस गेंदबाज़ थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक ऐसे ऑलराउंडर के रूप में विकसित किया, जो बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और फील्डिंग—तीनों में मैच का रुख पलट सकता था।

ब्रावो को लिमिटेड ओवर्स क्रिकेट का सबसे खतरनाक ऑलराउंडर इसलिए माना जाता है क्योंकि वह दबाव के हालात में भी बेखौफ खेलते थे। आखिरी ओवरों में उनकी विस्फोटक बल्लेबाज़ी, डेथ ओवर्स में उनकी किफायती और चतुर गेंदबाज़ी, खासकर उनकी स्लोअर गेंदें, बड़े-बड़े बल्लेबाज़ों के लिए मुश्किल बन जाती थीं। इसके अलावा उनकी शानदार फील्डिंग ने कई बार मैच का पासा पलटा और उन्हें एक कंप्लीट पैकेज बना दिया।

इंटरनेशनल क्रिकेट में ब्रावो का असर सिर्फ उनके प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। वह वेस्टइंडीज की उस टीम का अहम हिस्सा थे जिसने 2012 और 2016 में टी20 वर्ल्ड कप जीता। इन टूर्नामेंट्स में उन्होंने दबाव के पलों में शानदार गेंदबाज़ी की और टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकाला। ब्रावो मैदान पर ऊर्जा, आत्मविश्वास और जीत की भूख लेकर उतरते थे, जिसने पूरी टीम को निडर क्रिकेट खेलने का हौसला दिया।

अपने करियर के दौरान ब्रावो ने कई यादगार प्रदर्शन किए। वह टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ों में शामिल रहे और कई मुकाबलों में आखिरी ओवरों में ताबड़तोड़ रन बनाकर टीम को जीत दिलाई। आईसीसी टूर्नामेंट्स में उनका प्रदर्शन बताता है कि वह बड़े मैचों के खिलाड़ी थे, जो दबाव को अपने पक्ष में बदलना जानते थे।

ड्वेन ब्रावो सिर्फ एक शानदार क्रिकेटर ही नहीं, बल्कि मैदान पर एक एंटरटेनर भी थे। उनका जश्न मनाने का अंदाज़ और उनका मशहूर गाना “चैंपियन” फैंस के बीच आज भी लोकप्रिय है। उन्होंने साबित किया कि क्रिकेट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि जुनून, आत्मविश्वास और जश्न का नाम भी है। इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी लिमिटेड ओवर्स क्रिकेट पर ब्रावो की छाप हमेशा बनी रहेगी, क्योंकि उन्होंने ऑलराउंडर की भूमिका को एक नई पहचान दी।

क्रिकेट की दुनिया में कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो शोर नहीं मचाते, लेकिन जब भी मैदान पर उतरते हैं तो इतिहास अपने आप बन जा...
20/01/2026

क्रिकेट की दुनिया में कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो शोर नहीं मचाते, लेकिन जब भी मैदान पर उतरते हैं तो इतिहास अपने आप बन जाता है। वीवीएस लक्ष्मण उन्हीं में से एक थे। न कोई दिखावा, न आक्रामक जश्न—बस शांत चेहरे के पीछे छुपा एक ऐसा बल्लेबाज़, जो सबसे मुश्किल हालात में भारत की उम्मीद बन जाता था। लक्ष्मण उस दौर में खेले, जब टीम में सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे दिग्गज मौजूद थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

लक्ष्मण का जन्म 1 नवंबर 1974 को हैदराबाद में हुआ। वह एक पढ़े-लिखे परिवार से थे, जहां ज़्यादातर लोग डॉक्टर थे। लक्ष्मण खुद भी मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे और चाहते तो एक सुरक्षित करियर चुन सकते थे, लेकिन क्रिकेट का जुनून उनके भीतर कुछ और ही मांग कर रहा था। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी और पूरा ध्यान क्रिकेट पर लगाया। घरेलू क्रिकेट में हैदराबाद की ओर से खेलते हुए उनकी तकनीक, क्लास और कलाई के शानदार इस्तेमाल ने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा।

1996 में लक्ष्मण को भारतीय टीम में मौका मिला, लेकिन शुरुआत बिल्कुल आसान नहीं रही। वनडे क्रिकेट में वह लगातार मौके मिलने के बावजूद खुद को साबित नहीं कर पाए और कई बार टीम से बाहर कर दिए गए। ऐसा समय भी आया जब उन्हें “टेस्ट स्पेशलिस्ट” कहकर सीमित किया जाने लगा। लेकिन यही टेस्ट क्रिकेट आगे चलकर लक्ष्मण की पहचान बन गया।

लक्ष्मण का करियर 2001 में कोलकाता के ईडन गार्डन्स में खेले गए टेस्ट मैच के साथ हमेशा के लिए अमर हो गया। ऑस्ट्रेलिया की टीम लगातार 16 टेस्ट जीत चुकी थी और भारत फॉलोऑन खेल रहा था। हार लगभग तय मानी जा रही थी। तभी लक्ष्मण ने 281 रन की ऐतिहासिक पारी खेली। राहुल द्रविड़ के साथ उनकी साझेदारी ने न सिर्फ मैच पलट दिया, बल्कि भारतीय क्रिकेट के आत्मविश्वास को भी नई जान दे दी। यह पारी आज भी दुनिया की महानतम टेस्ट पारियों में गिनी जाती है।

इस पारी के बाद लक्ष्मण ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ बन गए। शेन वॉर्न जैसे दिग्गज स्पिनर भी उनके सामने असहज दिखते थे। ऑफ-साइड में उनकी टाइमिंग, स्पिन के खिलाफ फुटवर्क और दबाव में शांत रहना उन्हें खास बनाता था। जब भी भारत मुश्किल में होता, ड्रेसिंग रूम में एक ही नाम लिया जाता—लक्ष्मण।

दूसरे क्रिकेटरों ने भी लक्ष्मण की खूब सराहना की। सचिन तेंदुलकर ने उन्हें गॉड-गिफ्टेड टैलेंट कहा, राहुल द्रविड़ ने उनके साथ बल्लेबाज़ी को सौभाग्य बताया, जबकि रिकी पोंटिंग और शेन वॉर्न जैसे ऑस्ट्रेलियाई दिग्गजों ने खुले तौर पर माना कि लक्ष्मण उनके लिए सबसे मुश्किल भारतीय बल्लेबाज़ थे।

लक्ष्मण के करियर के हाई पॉइंट्स की बात करें तो कोलकाता टेस्ट के अलावा ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लगातार शानदार पारियां, विदेशी धरती पर मैच जिताऊ इनिंग्स और 100 से ज्यादा टेस्ट मैच खेलना शामिल है। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 8781 रन बनाए और भारत की कई ऐतिहासिक जीतों की नींव रखी।

वहीं लो पॉइंट्स भी उनके करियर का हिस्सा रहे। वनडे क्रिकेट में असफलता, बार-बार टीम से बाहर होना और 2011 के इंग्लैंड दौरे में खराब फॉर्म ने उनके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाई। 2012 में उन्होंने उस समय संन्यास लिया, जब आलोचनाएं बढ़ रही थीं, लेकिन उन्होंने हमेशा गरिमा के साथ मैदान छोड़ा।

आज वीवीएस लक्ष्मण सिर्फ एक पूर्व क्रिकेटर नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के मार्गदर्शक हैं। नेशनल क्रिकेट अकादमी में रहकर वह युवा खिलाड़ियों को वही सिखा रहे हैं, जो उन्होंने अपने शांत स्वभाव और कठिन संघर्ष से सीखा था। लक्ष्मण की कहानी यह सिखाती है कि असली महानता शोर मचाने में नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में जिम्मेदारी निभाने में होती है।

शेन वॉर्न क्रिकेट इतिहास के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से थे, जिन्होंने खेल की परिभाषा ही बदल दी। 13 सितंबर 1969 को ऑस्ट्...
19/01/2026

शेन वॉर्न क्रिकेट इतिहास के उन चुनिंदा खिलाड़ियों में से थे, जिन्होंने खेल की परिभाषा ही बदल दी। 13 सितंबर 1969 को ऑस्ट्रेलिया में जन्मे शेन कीथ वॉर्न की क्रिकेट में एंट्री आसान नहीं थी। बचपन में वह न तो बहुत फिट माने जाते थे और न ही पारंपरिक एथलीट जैसे दिखते थे। ऑस्ट्रेलियाई सिलेक्टर्स तक को लगता था कि यह लड़का टेस्ट क्रिकेट के दबाव को नहीं झेल पाएगा। बावजूद इसके, वॉर्न के पास एक ऐसी कला थी जो बहुत कम लोगों के पास होती है—लेग स्पिन। 1992 में भारत के खिलाफ उन्हें टेस्ट डेब्यू का मौका मिला, लेकिन पहले ही मैच में वह कोई विकेट नहीं ले पाए। आलोचकों ने तुरंत उन्हें नकार दिया और कहा कि ऑस्ट्रेलिया ने गलत खिलाड़ी को मौका दे दिया है।

हालांकि, शेन वॉर्न हार मानने वालों में से नहीं थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत थी गेंद पर उनका असाधारण कंट्रोल और बल्लेबाज़ों के दिमाग को पढ़ने की क्षमता। वॉर्न सिर्फ गेंद नहीं घुमाते थे, बल्कि बल्लेबाज़ को भ्रम में डाल देते थे। 1993 की एशेज सीरीज़ में इंग्लैंड के माइक गैटिंग को डाली गई उनकी गेंद, जिसे आज भी “बॉल ऑफ द सेंचुरी” कहा जाता है, ने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार बना दिया। उस एक गेंद ने दुनिया को दिखा दिया कि लेग स्पिन अब खत्म नहीं हुआ है, बल्कि एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है।

इसके बाद शेन वॉर्न का करियर लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ता चला गया। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 708 विकेट और वनडे में 293 विकेट लेकर खुद को अब तक के महानतम स्पिन गेंदबाज़ों में शामिल कर लिया। 1999 वर्ल्ड कप में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई और एशेज सीरीज़ में इंग्लैंड के खिलाफ बार-बार मैच जिताऊ प्रदर्शन किया। वॉर्न सिर्फ विकेट लेने वाले गेंदबाज़ नहीं थे, बल्कि मैदान पर एक रणनीतिकार और लीडर भी थे, जो हर गेंद से मैच की दिशा बदलने का दम रखते थे।

लेकिन इस चमकदार करियर में उतार-चढ़ाव भी आए। 2003 में ड्रग टेस्ट फेल होने के कारण शेन वॉर्न को एक साल का बैन झेलना पड़ा, जो उनके करियर का सबसे बड़ा लो पॉइंट माना जाता है। मैदान के बाहर उनके विवादों ने भी उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया और कई लोगों ने कहा कि वह अपने टैलेंट को खुद ही बर्बाद कर रहे हैं। हालांकि, वॉर्न की खासियत यही थी कि वह हर गिरावट के बाद और ज्यादा मजबूत होकर लौटे।

बैन के बाद वापसी करते हुए शेन वॉर्न ने फिर से साबित कर दिया कि वह क्यों खास हैं। उन्होंने विकेटों की झड़ी लगा दी और अपने अनुभव से टीम को लगातार जीत दिलाई। आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के साथ खिलाड़ी और कप्तान के रूप में उन्होंने पहला खिताब जीता, जो उनकी रणनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता का बड़ा उदाहरण है। 2007 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी वॉर्न की विरासत कायम रही। उन्होंने लेग स्पिन को दोबारा जीवित किया और दुनिया भर के युवा गेंदबाज़ों के लिए प्रेरणा बन गए।

2022 में शेन वॉर्न का अचानक निधन हो गया, जिसने पूरी क्रिकेट दुनिया को गहरे सदमे में डाल दिया। आज भी जब क्रिकेट में लेग स्पिन की बात होती है, तो सबसे पहला नाम शेन वॉर्न का ही लिया जाता है। वह सिर्फ एक महान गेंदबाज़ नहीं थे, बल्कि क्रिकेट के जादूगर थे, जिन्होंने अपने हुनर, आत्मविश्वास और जुनून से इस खेल को अमर यादें दीं।

इरफान पठान भारतीय क्रिकेट के उन खिलाड़ियों में रहे हैं, जिनसे बहुत कम उम्र में ही बड़ी उम्मीदें जुड़ गई थीं। वडोदरा से आ...
17/01/2026

इरफान पठान भारतीय क्रिकेट के उन खिलाड़ियों में रहे हैं, जिनसे बहुत कम उम्र में ही बड़ी उम्मीदें जुड़ गई थीं। वडोदरा से आने वाले इरफान पठान ने अंडर-19 और घरेलू क्रिकेट में अपनी स्विंग गेंदबाज़ी से चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे बाएं हाथ से नई गेंद को दोनों ओर स्विंग करा सकते थे, जो भारतीय परिस्थितियों में बहुत दुर्लभ माना जाता है। इसी खासियत ने उन्हें बेहद कम उम्र में टीम इंडिया का दरवाज़ा खोल दिया।

साल 2003 में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर इरफान पठान को टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू का मौका मिला। उस समय वह सिर्फ 19 साल के थे। भले ही आंकड़े बहुत बड़े नहीं थे, लेकिन उनकी गेंदों में स्विंग, नियंत्रण और समझ साफ दिख रही थी। इसके बाद उन्होंने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लगातार मौके मिलने शुरू हो गए और वह भारत के नियमित तेज़ गेंदबाज़ों में गिने जाने लगे।

इरफान पठान की गेंदबाज़ी की खास बात सिर्फ स्विंग ही नहीं थी, बल्कि उनका एंगल और अनुशासन भी था। वे नई गेंद से बल्लेबाज़ को खेलने पर मजबूर करते थे और विकेट लेने की बजाय दबाव बनाना जानते थे। इसके साथ-साथ निचले क्रम में उनका योगदान भी अहम था। इसी वजह से चयनकर्ता और टीम मैनेजमेंट उन्हें एक ऐसे खिलाड़ी के तौर पर देखने लगे, जो गेंद और बल्ले दोनों से टीम को फायदा पहुंचा सकता है।

उनके करियर का सबसे बड़ा और निर्णायक दौर साल 2006 में आया, जब भारत ने पाकिस्तान का दौरा किया। कराची टेस्ट में इरफान पठान ने टेस्ट क्रिकेट के इतिहास की सबसे यादगार हैट्रिक ली। उसी सीरीज में उन्होंने बल्लेबाज़ी में भी अहम रन बनाए। इसके बाद 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ उनका प्रदर्शन भारत की जीत की वजह बना और उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया। इसी दौर में यह चर्चा तेज हो गई कि इरफान पठान कपिल देव के बाद भारत के सबसे बड़े ऑलराउंडर बन सकते हैं।

हालांकि, यहीं से उनके करियर में समस्याएं शुरू हो गईं। टीम मैनेजमेंट ने इरफान की भूमिका बार-बार बदलनी शुरू कर दी। कभी उनसे तेज़ गेंदबाज़ की तरह प्रदर्शन की उम्मीद की गई, तो कभी बल्लेबाज़ी पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया। इस चक्कर में उनकी गेंदबाज़ी की स्वाभाविक स्विंग धीरे-धीरे खत्म होने लगी। उनकी रफ्तार भी कम हुई और एक्शन में बदलाव के कारण चोटों की समस्या बढ़ गई।

जैसे-जैसे प्रदर्शन में गिरावट आई, इरफान पठान टीम से बाहर होने लगे। उसी समय भारत को ज़हीर खान, इशांत शर्मा और आगे चलकर कई नए तेज़ गेंदबाज़ मिलने लगे, जिससे प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई। सीमित ओवरों के क्रिकेट में उनकी भूमिका साफ नहीं रह गई और टेस्ट टीम में भी वे पहले जैसी धार नहीं दिखा पाए।

आखिरकार, फिटनेस की समस्याएं, स्विंग का खत्म होना और लगातार मौके न मिल पाना उनके टीम इंडिया से बाहर होने की बड़ी वजह बनीं। इरफान पठान का करियर इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा के साथ-साथ निरंतरता और सही भूमिका भी उतनी ही ज़रूरी होती है। उन्होंने जो शुरुआत की थी, वह असाधारण थी, लेकिन जिस ऊंचाई तक पहुंचने की उम्मीद की गई थी, वहां तक उनका सफर पूरा नहीं हो सका।

बांग्लादेश क्रिकेट के इतिहास में कुछ तारीखें हमेशा याद रखी जाएंगी, और उनमें से एक है दिसंबर 2004। चटगांव का मैदान, सामने...
16/01/2026

बांग्लादेश क्रिकेट के इतिहास में कुछ तारीखें हमेशा याद रखी जाएंगी, और उनमें से एक है दिसंबर 2004। चटगांव का मैदान, सामने भारत जैसी बड़ी टीम और बांग्लादेश को पहली बार किसी दिग्गज टीम को हराने का मौका। उस ऐतिहासिक जीत के नायक बने मशरफे बिन मुर्तजा। नई गेंद हाथ में लेते ही उन्होंने भारतीय बल्लेबाज़ों पर हमला बोला। सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और युवराज सिंह जैसे नाम उनकी सटीक लाइन-लेंथ के सामने जूझते नज़र आए। मशरफे ने उस मैच में 3 अहम विकेट लिए और भारत की बल्लेबाज़ी की कमर तोड़ दी। यही वो मैच था, जिसने बांग्लादेश क्रिकेट को पहचान दी और मशरफे को एक फाइटर के तौर पर स्थापित कर दिया।

इसके बाद आया 2007 का वर्ल्ड कप, जहां पोर्ट ऑफ स्पेन में भारत और बांग्लादेश आमने-सामने थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह मैच भारतीय क्रिकेट के लिए एक झटका साबित होगा। मशरफे मुर्तजा ने उस दिन वीरेंद्र सहवाग और युवराज सिंह को अपनी तेज और उछाल भरी गेंदों से पवेलियन भेज दिया। शुरुआती ओवरों में उनके स्पेल ने भारत को संभलने का मौका ही नहीं दिया और पूरी टीम 191 रन पर सिमट गई। भारत की इस हार ने उन्हें वर्ल्ड कप से बाहर कर दिया, और पूरी दुनिया ने जाना कि बांग्लादेश सिर्फ खेलने नहीं, बल्कि हराने आया है—और इस कहानी का सबसे बड़ा किरदार थे मशरफे मुर्तजा।

मशरफे सिर्फ तेज गेंदबाज़ नहीं थे, वे जज़्बे से खेलने वाले खिलाड़ी थे। उनका करियर जितना ऊंचाइयों से भरा था, उतना ही दर्द से भी। घुटनों की गंभीर चोट, बार-बार सर्जरी और डॉक्टरों की चेतावनियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। यही जज़्बा साफ दिखा 2019 वर्ल्ड कप में, जब वे बांग्लादेश टीम के कप्तान थे। उनका घुटना इतनी खराब हालत में था कि वे ठीक से दौड़ भी नहीं पा रहे थे, लेकिन फिर भी उन्होंने वर्ल्ड कप के सभी मैच खेले। गेंदबाज़ी में रफ्तार भले कम हो गई हो, लेकिन अनुभव और नियंत्रण से उन्होंने बेहद किफायती स्पेल डाले और टीम को हर मैच में संतुलन दिया।

2019 वर्ल्ड कप मशरफे के करियर का सबसे भावुक अध्याय बन गया। कप्तान के तौर पर वे मैदान पर लंगड़ाते हुए दिखे, लेकिन उनका दिल और दिमाग पूरी तरह टीम के लिए धड़क रहा था। हर ओवर के साथ वे यह साबित करते गए कि क्रिकेट सिर्फ फिटनेस का खेल नहीं, बल्कि हौसले का इम्तिहान भी है। मशरफे मुर्तजा शायद आंकड़ों में सबसे महान न हों, लेकिन जिन मैचों में उन्होंने इतिहास बदला—2004 भारत के खिलाफ जीत, 2007 वर्ल्ड कप में भारत की हार और 2019 में टूटे शरीर के साथ कप्तानी—इन पलों ने उन्हें बांग्लादेश क्रिकेट का अमर नायक बना दिया।

न्यूज़ीलैंड क्रिकेट के इतिहास में डेनियल विटोरी का नाम बेहद खास सम्मान के साथ लिया जाता है। शांत स्वभाव, आंखों पर चश्मा ...
15/01/2026

न्यूज़ीलैंड क्रिकेट के इतिहास में डेनियल विटोरी का नाम बेहद खास सम्मान के साथ लिया जाता है। शांत स्वभाव, आंखों पर चश्मा और चेहरे पर हमेशा सुकून लिए मैदान पर उतरने वाले विटोरी को सिर्फ एक स्पिनर कहना गलत होगा, क्योंकि वह असल में क्रिकेट के सबसे समझदार और चालाक दिमागों में से एक थे। बिना ज्यादा आक्रामकता दिखाए, अपने खेल से बड़े-बड़े बल्लेबाज़ों को परेशान करना उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

डेनियल विटोरी ने महज़ 18 साल की उम्र में 1997 में न्यूज़ीलैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू किया और अपने पहले ही मैच में 4 विकेट लेकर दुनिया को अपने टैलेंट का एहसास करा दिया। उसी साल उन्होंने वनडे क्रिकेट में भी कदम रखा और बहुत जल्द टीम के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में गिने जाने लगे। कम उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाना उनकी मानसिक मजबूती को दिखाता था।

गेंदबाज़ी के मामले में विटोरी लेफ्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स स्पिनर थे, लेकिन उनकी असली ताकत गेंद को घुमाना नहीं, बल्कि सटीक लाइन-लेंथ, हल्की ड्रिफ्ट और बल्लेबाज़ की सोच को पढ़ना था। वह तेज़ टर्न पर निर्भर नहीं रहते थे, बल्कि धैर्य के साथ लंबे स्पेल डालकर बल्लेबाज़ को गलती करने पर मजबूर करते थे। यही वजह थी कि वे टेस्ट क्रिकेट में 300 से ज्यादा विकेट लेने में कामयाब रहे।

विटोरी का चश्मा और उनका सादा लुक क्रिकेट फैंस के बीच उनकी पहचान बन गया था। मैदान पर वह किसी प्रोफेसर या वैज्ञानिक जैसे लगते थे, जो हर गेंद से पहले बल्लेबाज़ के दिमाग में झांक चुका हो। उनकी यही शांत छवि बल्लेबाज़ों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव बना देती थी।

गेंद के साथ-साथ विटोरी ने बल्ले से भी न्यूज़ीलैंड के लिए अहम योगदान दिया। उन्हें टीम का सबसे भरोसेमंद लोअर-ऑर्डर बल्लेबाज़ माना जाता था। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 4500 से ज्यादा रन बनाए और 6 शतक भी लगाए। कई बार जब टीम मुश्किल में फंसी, तब विटोरी ने संयम और समझदारी से पारी खेलकर टीम को संभाला।

डेनियल विटोरी ने न्यूज़ीलैंड टीम की कप्तानी भी की और सीमित संसाधनों के बावजूद टीम को मजबूती से आगे बढ़ाया। वह ऐसे कप्तान थे जो मैदान पर ज्यादा शोर नहीं करते थे, बल्कि अपनी रणनीति और फैसलों से मैच का रुख पलटते थे। खिलाड़ियों के बीच उनका सम्मान इसी वजह से हमेशा बना रहा।

लगभग दो दशकों तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद डेनियल विटोरी ने 2015 में क्रिकेट से संन्यास लिया, लेकिन इसके बाद भी उनका क्रिकेट से नाता नहीं टूटा। कोच और मेंटर के रूप में उन्होंने दुनिया भर की टीमों के साथ काम किया और आज भी उन्हें क्रिकेट के सबसे तेज़ दिमागों में गिना जाता है। विटोरी की कहानी इस बात की मिसाल है कि क्रिकेट सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि समझ, धैर्य और सोच का खेल भी है।

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