Agni News

Agni News अग्नि किसी से भेदभाव नही करती।

भारत की जनता पर हो रहे अन्याय अत्याचार का विरोध कर न्याय की भूमिका पर काम करना.
भारत के सर्वांगीण विकास के लिये जाती धर्म से हटकर जनाधार का मार्गदर्शन कर भारत को जागतिक महासत्ता प्रस्थापित करना यही अग्नी न्यूज का लक्ष्य हैं.

मृगबास में हनुमान जी की प्रतिमा के साथ की कई कायराना हरकत का खुलासा दोषी निकला कैलाश शर्मा ,पर्दे के पीछे की मैली राजनीत...
15/11/2024

मृगबास में हनुमान जी की प्रतिमा के साथ की कई कायराना हरकत का खुलासा दोषी निकला कैलाश शर्मा ,पर्दे के पीछे की मैली राजनीति का खुलासा होना अभी बाकी भक्तों बिना तत्वों के और बिना जानकारी के किसी भी समाज को बदनाम कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेखने बालो ये गलत है ।
उसकी समाज देखकर उसके दोष का पता नहीं लगाया जा सकता और किसी दोषी की कोई समाज नही होती
दोषी कोई भी हो उसको कड़ी सजा मिलना चाहिए।

28/11/2023
27/09/2020

मोदी अभी PM है..तो फिर नित नए भगवान गढ़ने की क्या जरूरत है..एकबार में जो चाहे ले कर देश को दंगा मुक्त कर दे..
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- अब नए प्रभु अवतरित हुए है..
- नाम है : "भगवान श्रीकृष्ण विराजमान"..
- नया तीर्थ है "स्थान श्रीकृष्ण जन्मभूमि"..
- जमीन है 13.37 एकड़..
- निशाना है मथुरा की शाही ईदगाह..
◆ श्रीकृष्ण जन्म ईदगाह की जमीन पर हुआ था
- कोर्ट में केस दाखिल हो चुका है..

👉 इस मुद्दे पर तीसरी बार लिख रहा हूँ..और शायद अब हिंदुओं को आत्ममंथन की जरूरत है..लगभग 3500 मस्जिदों पर संघी गिरोह का दावा है..

★ एक मस्जिद को मन्दिर में 500 साल लगे तो 3500 मस्जिद को मन्दिर बनाने में (3500 X 500) = 17.5 लाख साल लगेंगे..

👉 17.5 लाख साल का "अंधकार युग" दस्तक दे रहा है..यानी हिन्दूराष्ट्र बनते हुए इस पृथ्वी का जीवनकाल भी समाप्त हो सकता है..

● ज्यादातर लोगों को मालूम नही है कि हमारे पुरखो ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला सुलझा लिया था..इसे "1968 का समझौता" कहते है..
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- 1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बना
- इसका उद्देश्य था श्रीकृष्ण मन्दिर बनाना
- 1958 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ बना
- पर इसे जमीन पर मालिकाना हक नही था
- 1964 में कोर्ट में केस दाखिल हुआ

◆ 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने खुद आगे बढ़ कर मुसलमानो से समझौता किया..

◆ इस समझौते में मुसलमानो ने मन्दिर के लिए अपने पक्ष की जमीन छोड़ दी..उसके बदले मुसलमानो को मन्दिर के पास की जमीन दी गई..

धार्मिक आतंकवाद की एक नई लहर तैयार हो चुकी है..विश्व के धनी व्यक्तियों के मालिक मुम्बई में बैठ कर "डिजिटल आतंकवाद" फैलाने की तैयारी कर चुके है..आपको केवल तलवार उठा कर इतना कहना है : मन्दिर वही बनाएंगे..बांसुरी से तलवार तक का सफर..

09/01/2020

#अजीबोगरीब_देश_है_ये!

बताइये विरोध का भला ये कोई तरीका हुआ भाई??

और से नफ़रत है तो आपके गांव में 1360 वोट हों और उसमें से 60 मुस्लिम वोट हों और आप #मुस्लिम उम्मीदवार को 554 देकर जीता दें???
ये तो ग़लत बात है न!

#केरल के पुदुकोट्टल ज़िले के #कीरमंगलम में #सेरियालुर_इनम ग्राम पंचायत में #ग्राम_प्रधान का चुनाव हुआ।

#मोहम्मद जियावउद्दीन को 554 वोट मिले और रनर अप रहे #शंकर जिन्होंने 537 वोट पाए।

गांव के अधिकतर हिन्दुओ ने सरकार के CAA और NRC के विरोध में तय किया कि हम मुस्लिम उम्मीदवार को जिताएंगे और देश को सन्देश देंगे कि हम एक हैं।

#कितने_बाजू_कितने_सिर_गिन_ले_दुश्मन_ध्यान_से

04/12/2019

#एंड्रॉइड इस्तेमाल करने वालों #सावधान

एंड्रॉइड में सेंध लगी है एक नए #मालवेयर द्वारा।

StrongHogg वाइकिंग योद्धा होते थे जो दुश्मन पर अटैक करके उन्हें बन्दी बनाते थे और फिरौती या रेंसम लेते थे।

इस मालवेयर से #हैकर्स आपके फोन के रुट एक्सेस ( )लिए बिना ही आपके फोन में दाखिल होकर मनमानी कर सकते हैं।
यह आपके फोन में एक ही समय पर कई एप्स रन कर सकता है और बड़ी आसानी से एक एप से दूसरे एप में घुस जाता है।
यही खूबियां इस मालवेयर को बहुत खास और खतरनाक बनाती है।

इस समय तकरीबन 36 मेलिसियस एप्स इस लूप होल का फायदा उठाकर गूगल प्ले के टॉप के 500 एप्स के लिए खतरा बने हैं।
StrandHogg इन 36 मेलिसियस एप्स को अन्य एप में घुसकर #ट्रॉजन द्वारा एक्सेस पा लेता है।

हैकर्स इसके द्वारा आपके सारी बातचीत सुन सकते हैं,रिकॉर्ड कर सकते है, आपके लॉगिन इन्फॉर्मेशन ले सकते हैं, आपका लोकेशन जान सकते हैं, आपके एसएमएस पढ़ सकते हैं और आपके फोन से एसएमएस भेज सकते हैं, आपके फोन से फोटो खींच सकते है। मतलब आप उनके पूरे कंट्रोल में हैं।

अभीतक इसका कोई फिक्स ( इलाज) एंड्रॉयड नहीं निकाल पाई है, लगे हुए हैं।

गूगल प्ले ऐसे मेलिसियस एप्स को ढूढ़कर हटा रहा है लेकिन हैकर्स नए नए एप्स बनाकर अपलोड कर रहे हैं और ये इतने लुभावने हो सकते हैं कि ज्यादातर लोग इन्हें डाऊनलोड कर लेते हैं।

आपकी कमजोरी और लालच ही हैकर्स की ताकत है, याद रखिए।

24/11/2019

#नकली_वेबसाइटों_से_सावधान

#बचो_और_बचाओ



शायद आप लोगों को पता हो कल इंटनरेट का जन्मदिन था, इस उपलक्ष्य में इस शैतान के बारे में थोड़ा जान लें।
जनमदिन मुबारक हो #इंटरनेट।

आप #बैंक में पैसा जमा कराने जाते हैं, या किसी काम से पुलिस स्टेशन या रेलवे स्टेशन या #स्कूल, #कॉलेज #हस्पताल या #डॉक्टर के पास जाते हैं न!
कभी आपको लगा कि आप जिस जगह गए हैं वह जगह असल में नकली बैंक है, या नकली रेलवे स्टेशन, कॉलेज, या हस्पताल इत्यादि।

नहीं न। लेकिन सोचिये अगर ऐसा हो तो क्या होता? वैसे ऐसा होना बहुत कठिन है क्योंकि जो फ्रॉडस्टर हैं, उन्हें करोड़ों रुपये इन्वेस्ट करने होंगे इन सबकी नकल बनाने में और आपको ठगने के लिए।

औऱ पकड़े जाने के चांसेस भी ज्यादा हैं।

लेकिन इंटरनेट की दुनिया में, जो अब हम सबके लिए सबकुछ हो चुकी है, नकली बैंक, नकली कॉलेज, नकली डॉक्टर हर चीज़ है।
इसमें पैसा भी 10 से 20 हजार रुपये मात्र लगता है। और रिटर्न लाखों का।
कैसे? चलिए देखते हैं।

आप ऑनलाइन बैंकिंग करते हैं? ऑनलाइन ट्रांजेक्शन करते हैं? करते ही होंगे। डिजिटल इंडिया के नागरिक जो ठहरे।
ख़ैर, जब ये सब करते हैं तो थोड़ी सुरक्षा की बातें सीख लीजिये।
आपने अपने बैंक का वेबसाइट खोलकर उसमें ट्रांसजेसक्शन करना चाहा। नाम है समझ लीजिए,
आप क्या करते हैं, ब्राउजर पर जाकर टाईप करते हैं या कोई लिंक होता है उसे क्लिक करके ओपन करते हैं।
100 में से 20 बार सम्भावना है कि आप icicibank com की जगह iccibank com टाइप कर देंगे।
आप ऑनलाइन खरीदारी के लिए ऑर्डर कर रहे हैं, com की जगह aamzon com टाइप कर दिया।

अब अगर आपकी किस्मत ख़राब है तो ये जो iccibank.com या amazon.com वाला वेबसाइट बिल्कुल आपकी बैंक का हमशक्ल होगा। #राम_और_श्याम, #डॉन जैसा।

आप लॉगिन कीजिये, कुछ इधर उधर घूम कर आपको पता चलेगा कि सर्वर डाउन है। चलो थोड़ी देर में फिर ट्राई करते हैं।

लेकिन तबतक आपका लॉगिन इन्फॉर्मेशन इस हमशक्ल के पास जा चुका है। या आप खरीदारी के लिए पैसभेज चुके हैं।
यानि कि आपकी लंका लग चुकी है।

और ये फ़र्ज़ी हमशक्ल डोमेन वैलिड HTTPS का उपयोग भी करने लगे हैं, मतलब आप ठीक से झांसे में फंसिए।
नामक से लेकर।

आपको जरा भी शक नहीं होगा।
डरा तो दिया हूं, तो इससे बचाने का तरीका भी बताना फ़र्ज़ है न!

✔️Rescan.pro जैसे ऑनलाइन स्कैनर्स से वेबसाइट चेक कीजिये, जिसपर आप जाना चाहते हैं। ये स्कैनर्स आपको वेबसाइट के संभावित खतरों के बारे में बता देगा।

✔️स्पेलिंग 2-3 बार चेक कर लिया कीजिये वेबसाइट की।

✔️ब्राऊजर में जो एड्रेस डाला है उसे कॉपी करके गूगल में डाल दीजिए, सर्च कीजिये।

है न आसान! जरा सी सावधानी, ज़िन्दगी भर आसानी।

21/10/2019

कुछ रिजल्ट तुरन्त पाने की बेचैनी ने ही #क्रांतिकारियों को हथियार उठाने पर मज़बूर किया होगा, वे राम और कृष्ण के द्वारा किये गए अंतिम विकल्प को पहले आजमा रहे थे ।
#गांधी ने #राम और #कृष्ण को सीक्वेंस में फॉलो किया, जो कोई नहीं करता था। ये एक अचंभित कर देने वाला दांव था सभी के लिए, विशेषकर #ब्रिटिश राज के लिए।
लेकिन मुझे ये मानने में कोई दुविधा नहीं है कि ब्रिटेन की जगह अगर हिटलर या #जापान का भारत पर कब्ज़ा होता तो गांधी ट्रेन की बोगी में रहस्मयी स्थिति में मृत पाए जाते।
अंग्रेजों ने भरपूर अत्याचार किये, लेकिन वे खुद के बनाये हुए कानूनों का अक्षरशः पालन करते थे और आज भी करते हैं। इसलिए गांधी , नेहरू, पटेल इत्यादि को फांसी नहीं दे पाए।
वर्तमान सरकार की निरंकुशता देखकर दोनों में से कोई भी रास्ता तुरन्त परिणामदायक नहीं दिखता। निरंकुशता इन्होंने जनता से ही शक्ति लेकर पाई है। बहुत हैरानी हुई है पिछले 3 दिनों में कुछ विद्यार्थियों से बात की है, बस मोदी मोदी कर रहे हैं। जिनमे से कुछ पक्के मोदी विरोधी थे कुछ दिन पहले तक।
कोई तर्क, कोई तथ्य सुनने को तैयार नहीं है।
स्थिति निराशाजनक है। लोकतंत्र में जनता का प्रतिबिंब शासक में होता है।
जनता को यही शासक चाहिए। यही शासन चाहिए।
विपक्ष की जगह #संसद और विधानसभा नहीं सड़क पर होती है,मीडिया विपक्ष होता है। दोनों गायब हैं। राजनैतिक विपक्ष और मीडिया के तो ख़ैर कहने ही क्या!

आर्थर कॉनन डायल की कृति #शेरलॉक_होम्स में एक कहानी है, "The Illistratious Client". लड़की को पता है कि जिससे प्रेम करती है वह womanizer मानसिक रोगी है, और अपनी पत्नियों का हत्यारा। फिर भी वो उसे बेइंतहा चाहती है, उसकी मीठी मीठी flattering बातें उसे बेहद पसंद है।
मरने के करीब पहुँच जाती है। उसका अगला शिकार बनने के बेहद करीब। लेकिन ख़ुद को गलत कैसे माने?

#भारत की जनता स्टॉकहोम सिंड्रोम से पीड़ित है। अपने ऊपर क्रूरता करने वाले से इश्क़।
इसका इलाज़ विनाश ही है।

ऐसे में कुछ मित्र दिखते हैं, Saurabh Bajpai Saket Gokhale Onkar Singh Dhillon .. जो संघर्ष को सड़क और न्यायपालिका में ले जाने की शुरुआत कर चुके हैं। जो काम विपक्ष और मीडिया को करना चाहिए, ये कर रहे हैं।

आज 22 अक्टूबर को कानपुर में सौरभ वाजपेयी के बैनर तले शहीद पत्रकार #गणेश_शंकर_विद्यार्थी की स्मृति के बहाने पत्तलकारों को आईना दिखाने जा रहे हैं।

सौरभ भाई Delhi University में #इतिहास के प्रोफेसर हैं।
इनका भी एक परिवार है, पत्नी और छोटा सा बेटा है। लेकिन ये किराए के मकान में रहते हैं, ऐसा नहीं है कि ये सक्षम नहीं है किंतु इनका कहना है कि जिस समाज में सभी के पास घर नहीं है, मेरे पास भी अपना घर होने का कोई औचित्य नहीं है। ये समाज ही मेरा घर है।
अगले साल ये इस्तीफा देकर पूर्ण रूप से अपने आपको नेशनल मूवमेंट फ़्रंट के लिए समर्पित कर देंगे।

इन तीनों को फॉलो कीजिये। साथ दीजिये।
बहुत कड़वी बात लगेगी लेकिन ये लोग , ईश्वर न करे, शायद हम लोगों के लिये शहीद भी हो जाएंगे।
इनके साथ चलिये।कुछ उम्मीद ये दिखा रहे हैं या विनाश निश्चित है।

हर बात के लिये नेहरू को दोष देने वाले उनपर ये भी इल्जाम लगाते हैं कि  #नेहरू जी ने खुद को  #भारत_रत्न दे दिया था।  #इतिह...
11/10/2019

हर बात के लिये नेहरू को दोष देने वाले उनपर ये भी इल्जाम लगाते हैं कि #नेहरू जी ने खुद को #भारत_रत्न दे दिया था।

#इतिहास बड़ा रोचक विषय है, ये एक बार घटित हो गया तो हो गया, इसे बदला नहीं जा सकता।

हां, हीन भावना और ईर्ष्या से अंधे तथा मूढ़ता से भरे मस्तिष्कों के लिए सबसे बड़ा टाइमपास हैं,इतिहास को खुद के पूर्वाग्रह के अनुसार बदलकर अन्य जिंदा लाशों को खुद की तरह जोम्बी बना देना।

ऐसा करने से स्वयं की अकर्मण्यता को ढंकने का एक बढ़िया सा बहाना मिल जाता है और आत्म सन्तुष्टि मिलती है।

एक उदाहरण देता हूँ, मेरा एक मित्र था। वह हद से ज्यादा गोरा था। पता नहीं उसके गोरे रंग से एक अन्य मित्र को अक्सर ईर्ष्या होती थी। किसी न किसी प्रकार से वो उसके गोरे रंग का मजाक उड़ाकर उसे नीचा साबित करना चाहता था। वह गोरा था इसमें इसका कोई हाथ नहीं था। न ही उसे कोई घमंड था।

एक दिन इस ईर्ष्यालु मित्र ने कह दिया " यार #विजय ये #निखिल बहुत #अमीर है, दिन भर AC में रहता है, इसलिए गोरा है। मैं भी AC. में रहूं तो 6 महीने में इससे ज्यादा गोरा हो जाऊं।
ये हीन भावना और ईर्ष्या नेहरू विरोधियों में अक्सर देखने मिलती है।
भारत रत्न को लेकर नेहरू जी पर जो इल्जाम ये दुर्बुद्धि लगाते हैं , उसके लिए एक तथ्य पढिये। वैसे तो इन वैशाख नन्दनो पर कोई असर होने से रहा।

आम धारणा है कि "भारत रत्न" की सिफारिश #प्रधानमंत्री द्वारा #राष्ट्रपति से की जाती है।
लेकिन आधिकारिक प्रक्रिया की जांच करें, तो इसका कोई आधिकारिक उल्लेख नहीं है। ये एक अलिखित परम्परा रही है।

पंडित नेहरू के मामले में, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ #राजेंद्र_प्रसाद ने सामान्य परंपरा से एक अलग दिशा में जाने का निर्णय लिया।

13 जुलाई, 1955 को, नेहरू यूरोपीय देशों और सोवियत संघ के सफल दौरे से वापस आ गए थे, एक ऐसा दौरा जिसका उद्देश्य शांति को बढ़ावा देना था क्योंकि शीत युद्ध तेजी से आगे बढ़ रहा था।

भारत को विश्व मामलों में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने के नेहरू के प्रयासों को भारत के बाहर लोकप्रिय समर्थन मिला।

नेहरू के दिल्ली लौटने पर, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने प्रोटोकॉल की अवहेलना करते हुए उन्हें रिसीव करने गए।

नेहरू के आगमन का जश्न मनाने के लिए एक बड़ी भीड़ एकत्र हुई थी; उनकी जयजयकार और उत्साह ने नेहरू को दिल्ली हवाई अड्डे के छोटे से हिस्से से एक छोटा भाषण देने के लिए मजबूर किया।

राष्ट्रपति प्रसाद ने 15 जुलाई, 1955 को राष्ट्रपति भवन में एक विशेष भोज की मेजबानी की।

यही पर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न देने की घोषणा की।

राष्ट्रपति द्वारा इस. #निर्णय को 16 जुलाई, 1955 के टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया था।

राजेन्द्रप्रसाद ने नेहरू को 'हमारे समय में शांति के महान वास्तुकार' के रूप में वर्णित किया।

अखबार ने बताया कि वास्तव में, राष्ट्रपति ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने असंवैधानिक तरीके से काम किया है क्योंकि उन्होंने सम्मान देने का फैसला किया है "मेरे प्रधानमंत्री या कैबिनेट से सलाह या सलाह के बिना"।

यह उन्होंने खुद राष्ट्रपति द्वारा आयोजित भोज में स्वीकार किया था।

उन्होंने कहा था,

"ऐसा करने में ( नेहरूजी को भारत रत्न देने में)... एक बार के लिए, यह असंवैधानिक कहा जा सकता है, क्योंकि मैं यह कदम अपनी पहल पर और अपने प्रधानमंत्री से किसी सिफारिश या सलाह के बिना ले रहा हूं; लेकिन मुझे पता है कि मेरी कार्रवाई सबसे उत्साह से संपन्न होगी। "

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की न्यूज़ रिपोर्ट चित्र में

03/09/2019

इस महीने अर्थात सितम्बर में भारत के सबसे पूज्य स्वतंत्रता सेनानियों में से एक शहीद ए आज़म #भगतसिंह का जन्मदिन है .28 सितम्बर १९०७ को उनका जन्म हुआ था .

मेरा ये मानना है ऐसे लोगों को सिर्फ इनके जन्मदिन पर ना याद करके हमेशा याद करते रहना चाहिए , जिससे इनके बारे में भविष्य में कोई दुष्प्रचार न कर पाए.

इतिहासकार प्रोफेसर विपिन चंद्रा 1990 के शुरुआती दशक में भगत सिंह को क्रांतिकारी के रूप में लोगों के सामने लाये थे.
इसके बाद कम्युनिस्टों ने भगत सिंह को अपना बताते हुए भगत सिंह की कुछ पैम्फ़्लेट्स के नए संस्करण छापे.

अचानक दक्षिणपंथी दलों और संगठनो ने भगत सिंह पर अपना हक़ जताना शुरू किया . उनको केसरी पगड़ी पहना दी.
उन पर गेरुए वस्त्र डाल दिए, तिलक लगा दिया . उनके फोटो डालकर JOIN लिखे चित्र आने लगे , जैसे भगतसिंह ने सारी क्रांति संघ की शाखा में सीखी थी.

शहीद-ए-आज़म भगतसिंह पर अपने शोध कार्य के लिए विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर #चमनलाल को शायद सभी जानते होंगे.
#जवाहरलाल_नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व शोधार्थी और प्रोफेसर को भगत सिंह पर उनके काम के लिए जाना जाता है.
भगत सिंह से जुड़े तथ्य जुटाने के लिए उन्होंने भगतसिंह के खटकड़कलां के पैतृक निवास से लेकर विदेश में बसी उनकी बहन से भी मुलाकाते की थीं.

चमनलाल ने बताया था कि जो लोग भगत सिंह की जेब में #पिस्तौल दिखाते हैं वो मूर्ख और घटिया लोग हैं, उनकी जेब में दो चीजें रहती थीं. एक जेब में भगत सिंह पॉकेट डिक्शनरी रखते थे और दूसरी जेब में दुनिया की कोई महान किताब रखते थे.

भगत के साथी कहते थे कि वो किताबें पढ़ता नहीं था बल्कि पीता था.

चमनलाल के अनुसार भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू विचारों के मामले में काफी करीबी थे. साथ ही भगत सिंह, डॉ #अंबेडकर और पंडित #नेहरू #हिन्दुस्तान के सबसे बड़े बुद्धिजीवी थे.

नेहरू और अंबेडकर विदेश से पढ़कर आए थे, लेकिन भगत सिंह सिर्फ 12वीं पास थे. फिर भी उनका मानसिक स्तर, प्रतिभा नेहरू-अंबेडकर के बराबर था.
अगर आज भगत सिंह जिंदा होते तो इन दोनों से बड़े बुद्धजीवी होते.

भगत सिंह को जब अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था तो अख़बारों ने लिखा था कि ‘समाजवादी क्रांतिकारी’ गिरफ़्तार हुआ है.

जब पहली बार भगत सिंह का नाम 1929 में सार्वजनिक हुआ, तब नेहरू ने कांग्रेस के मुखपत्र, कांग्रेस बुलेटिन में कोर्ट के समक्ष दी हुई भगत सिंह के संपूर्ण बयान को छाप डाला था .
साथ ही क्रांतिकारियों द्वारा किए जा रहे उपवास के पक्ष में भी नेहरू ने लिखा था .
गांधीजी इससे काफी नाराज़ थे , वे भगतसिंह के हिंसक रास्ते से सहमत नहीं थे. किन्तु नेहरु जी हमेशा भगत सिंह के साथ दिखे.
भगतसिंह को समग्रता से स्वीकार करने की हिम्मत किसी दल में नहीं रही , वे जो भी थे किन्तु धर्मांध या धर्म की राजनीति कभी नहीं करते थे.

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