06/04/2025
श्रीराम कथा : भाग ०१
श्रीरामजन्म
प्राचीन भारत में, अयोध्या नगरी के राजा दशरथ, जो अपनी न्यायप्रियता और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी तीन रानियाँ थीं - कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राजा दशरथ को कोई पुत्र नहीं था, और यह चिंता उनके मन में सदैव बनी रहती थी। राज्य के उत्तराधिकारी के बिना, उन्हें भविष्य की चिंता सताती थी।
राजा दशरथ ने अपने गुरु, ऋषि वशिष्ठ से इस समस्या का समाधान पूछा। ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी, जो पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। राजा दशरथ ने तुरंत यज्ञ की तैयारी शुरू करवाई। देश भर से ऋषि-मुनियों और विद्वानों को आमंत्रित किया गया।
यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित हुई, और वेद मंत्रों का उच्चारण होने लगा। ऋषि ऋष्यश्रृंग ने यज्ञ का संचालन किया। यज्ञ की समाप्ति पर, अग्नि देव प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ को एक दिव्य पायस (खीर) का पात्र दिया। उन्होंने कहा, "हे राजन, यह पायस आपकी रानियों को खिलाएं, इससे आपको चार तेजस्वी पुत्र प्राप्त होंगे।"
राजा दशरथ ने प्रसन्न होकर पायस को अपनी रानियों में बाँट दिया। कौशल्या ने आधा पायस खाया, कैकेयी ने एक चौथाई और सुमित्रा ने बचा हुआ पायस ग्रहण किया। समय बीतता गया, और रानियाँ गर्भवती हुईं।
कौशल्या के गर्भ से, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र में, भगवान विष्णु के सातवें अवतार, श्री राम का जन्म हुआ। अयोध्या में आनंद की लहर दौड़ गई। राजा दशरथ और उनकी रानियाँ खुशी से झूम उठे।
कौशल्या ने अपने पुत्र को गोद में लिया, और उनके नेत्रों में वात्सल्य के अश्रु बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु, आपने मेरे घर को अपने आगमन से धन्य कर दिया है। मैं आपकी कृपा से कृतार्थ हूँ।"
ऋषि वशिष्ठ ने बालक का नाम राम रखा। राम का तेज सूर्य के समान था, और उनकी आभा दिव्य थी। अयोध्या के हर घर में उत्सव मनाया गया। राजा दशरथ ने दान-पुण्य किया और गरीबों को भोजन कराया।
कैकेयी ने भरत को जन्म दिया, और सुमित्रा ने जुड़वां पुत्रों, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चारों राजकुमार तेजस्वी और गुणवान थे। उनका लालन-पालन राजा दशरथ और उनकी रानियों ने बड़े प्यार से किया।
राम की बाल लीलाएँ अयोध्या के लोगों के लिए आनंद का स्रोत थीं। उनकी मधुर वाणी और दिव्य मुस्कान सभी का मन मोह लेती थी। वे अपने भाइयों के साथ खेलते और सीखते थे। ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें वेदों, शास्त्रों और युद्ध कला की शिक्षा दी।
एक दिन, जब राम और उनके भाई खेल रहे थे, तो राजा दशरथ ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने कहा, "मेरे प्रिय पुत्रों, तुम मेरे राज्य के उत्तराधिकारी हो। तुम्हें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।"
राम ने विनम्रता से कहा, "पिताजी, हम आपकी आज्ञा का पालन करेंगे। हम अपने राज्य और अपनी प्रजा की सेवा में तत्पर रहेंगे।"
समय बीतता गया, और राम युवावस्था में प्रवेश कर गए। वे एक आदर्श पुत्र, एक कुशल योद्धा और एक न्यायप्रिय राजकुमार थे। उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई।
एक दिन, ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आए और राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा, "राजन, राक्षसों ने मेरे आश्रम में विघ्न डालना शुरू कर दिया है। मुझे राम और लक्ष्मण की सहायता चाहिए।"
राजा दशरथ को राम को भेजने में हिचकिचाहट हुई, लेकिन ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया कि यह राम के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। राजा दशरथ ने अनिच्छा से राम और लक्ष्मण को ऋषि विश्वामित्र के साथ भेज दिया।
राम और लक्ष्मण ने ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में राक्षसों का सामना किया और उन्हें पराजित किया। उन्होंने ताड़का और सुबाहु जैसे शक्तिशाली राक्षसों का वध किया। उनकी वीरता और पराक्रम देखकर ऋषि विश्वामित्र प्रसन्न हुए।
ऋषि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र और ज्ञान प्रदान किया।
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