02/06/2026
मुंबई उपनगरीय रेलवे स्टेशनों पर फ्री यूरिनल्स का घोटाला: ठेकेदार कैसे कमाते हैं करोड़ों?
मुंबई: मुंबई की उपनगरीय रेलवे स्टेशनों पर यूरिनल्स (पेशाबघर) और कुछ टॉयलेट्स को यात्रियों के लिए फ्री रखा गया है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। रेलवे के नियमों के मुताबिक यूरिनल्स का इस्तेमाल पूरी तरह मुफ्त होना चाहिए, जबकि शौच (लैट्रिन) के लिए नाममात्र का शुल्क (जैसे ₹2) लिया जा सकता है। लेकिन ठेकेदार (कॉन्ट्रैक्टर्स) इस नियम को तोड़कर यात्रीगण से जबरन पैसे वसूल रहे हैं और करोड़ों रुपये की कमाई कर रहे हैं।पुराना घोटाला, नई शिकायतेंरेलवे बोर्ड की 2012 की गाइडलाइंस के अनुसार स्टेशनों पर यूरिनल्स फ्री हैं, लैट्रिन के लिए अधिकतम ₹2 और बाथरूम के साथ ₹5 तक लिया जा सकता है। लेकिन मुंबई के अधिकांश स्टेशनों पर अटेंडेंट या ठेकेदार के कर्मचारी ₹5 से ₹10 तक चार्ज करते हैं, चाहे यूरिनल हो या टॉयलेट। कई जगहों पर बोर्ड पर फ्री लिखा होता है, फिर भी एंट्री पर पैसे मांगे जाते हैं।
2010 में मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि यह छोटा-सा घोटाला हर महीने ठेकेदारों को एक करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा दे रहा है। अगर रोजाना हजारों यात्री ₹2-3 एक्स्ट्रा देते हैं तो आंकड़ा आसानी से लाखों में पहुंच जाता है। आज 2026 में भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। दादर, माहिम, माटुंगा, चर्चगेट, अंधेरी जैसे व्यस्त स्टेशनों पर यह आम शिकायत है।
ठेकेदार पैसे कैसे कमाते हैं?यूरिनल पर भी चार्ज: रेलवे नियमों के बावजूद ठेकेदार "मेंटेनेंस फीस" या "क्लीनिंग चार्ज" के नाम पर ₹1 से ₹5 वसूलते हैं। कई बार फ्री यूरिनल बंद रखकर यात्रियों को पेड टॉयलेट की ओर धकेला जाता है|
ओवरचार्जिंग: शौच के लिए ₹2 की जगह ₹10-20 और बाथरूम के लिए और ज्यादा। महिलाओं से अक्सर ज्यादा पैसे मांगे जाते हैं।
पे-एंड-यूज मॉडल का दुरुपयोग: ठेकेदार रेलवे से कॉन्ट्रैक्ट लेकर सुविधा बनाते हैं, लेकिन रखरखाव कम खर्च में करते हैं और ज्यादा वसूली पर फोकस रहता है। कुछ स्टेशनों पर "पे-एज-यू-लीज" जैसे प्रयोग भी हुए, लेकिन कमाई का मुख्य जरिया जबरन वसूली ही है।
कम सफाई, ज्यादा कमाई: कई रिपोर्ट्स में स्टेशनों के टॉयलेट्स गंदे, बदबूदार और अपर्याप्त बताए गए हैं। ORF की 2010 की स्टडी में मुंबई के 109 स्टेशनों की हालत खराब पाई गई थी। ठेकेदार सफाई पर कम खर्च कर पॉकेट मोटी करते हैं।
यात्री परेशान, रेलवे चुप....लाखों लोकल यात्री रोज इन स्टेशनों का इस्तेमाल करते हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के यात्री जबरन पैसे देते हैं क्योंकि विकल्प नहीं होता।