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31/03/2026

चलते रहने का नाम ही जीवन है लेकिन अगर थक गए हो तो इसे सुनो और अच्छा लगे तो शेयर जरूर करें!

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29/03/2026

Einstein भी रह गए थे दंग! 😱 भारत का वो वैज्ञानिक जिसने दुनिया को दिया ‘Boson’ कण | The Story of S.N. Bose.

इस वीडियो में देखिए:
✅ कैसे एक भारतीय वैज्ञानिक ने आइंस्टीन को चिट्ठी लिखकर दुनिया बदल दी?
✅ क्या है ‘Bose-Einstein Statistics’ का रहस्य?
✅ क्यों S.N. Bose को कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला?
✅ Higgs Boson (God Particle) से उनका क्या नाता है?
विज्ञान के इतिहास के उस पन्ने को पलटिए जिसे दुनिया ने भुला दिया।
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18/03/2026

वो महिला जिस पर पत्थर फेंके गए… लेकिन उसी ने बेटियों का भविष्य लिख दिया! ये कहानी सिर्फ एक स्कूल की नहीं, एक ऐसी क्रांति की है जिसने भारत की सोच बदल दी। आखिर कौन थी ये महिला, और क्यों आज भी उनकी कहानी पूरी तरह नहीं बताई जाती?

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19वीं सदी का भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा था। एक ओर अंग्रेज़ी शासन के नए कानून थे, तो दूसरी ओर सदियों पुरानी भारतीय परं...
09/03/2026

19वीं सदी का भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा था। एक ओर अंग्रेज़ी शासन के नए कानून थे, तो दूसरी ओर सदियों पुरानी भारतीय परंपराएं। इसी दौर में एक ऐसा नाम सामने आया जिसने इन दोनों दुनियाओं को गहराई से समझा — विष्णनाथ नारायण मंडलिक। 8 मार्च 1833 को जन्मे मंडलिक बॉम्बे के एक प्रतिष्ठित नागरिक, प्रसिद्ध वकील, लेखक और हिंदू कानून के बड़े विद्वान माने जाते थे।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के मुरुड गांव में जन्मे मंडलिक का परिवार परंपरागत रूप से प्रभावशाली था। उनकी ननिहाल का संबंध पेशवा शासन से बताया जाता है और उनके परदादा सूबेदार रहे थे। शुरुआती शिक्षा घर पर प्राप्त की और फिर गांव के स्कूल में पढ़ाई की। आगे चलकर रत्नागिरी में उन्होंने राव बहादुर रामचंद्र बालकृष्ण के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की।

सिर्फ चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने एलफिंस्टोन इंस्टीट्यूशन में प्रवेश लिया और वहां क्लेयर स्कॉलरशिप प्राप्त की। उनकी प्रतिभा देखकर एक प्रोफेसर ने उन्हें इंग्लैंड जाकर इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा देने की सलाह दी, लेकिन परिवार ने उन्हें भारत में ही रहने का निर्णय दिया। यही फैसला आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।

उन्होंने कुछ समय तक सिंध में ब्रिटिश अधिकारी सर जॉर्ज ले ग्रैंड जैकब के निजी सहायक के रूप में काम किया। लेकिन 1862 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और हाई कोर्ट प्लीडर की परीक्षा पास कर बॉम्बे में वकालत शुरू की। जल्द ही वे उन गिने-चुने भारतीयों में शामिल हो गए जिन्हें अंग्रेज़ी और सिविल कानून की गहरी समझ थी।1884 में उन्हें सरकारी वकील नियुक्त किया गया। अदालत के साथ-साथ वे एक गंभीर लेखक भी थे। उन्होंने याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति और नीलकंठ के व्यावहार-मयुख जैसे ग्रंथों का अध्ययन और अनुवाद किया। साथ ही कई अंग्रेज़ी कानून की पुस्तकों का मराठी में अनुवाद कर समाज तक ज्ञान पहुंचाया।

1864 में उन्होंने “Native Opinion” नाम से एक अंग्रेज़ी द्वि-साप्ताहिक पत्र शुरू किया, जिसके शुरुआती वर्षों में लगभग सभी लेख वे स्वयं लिखते थे। इसके अलावा वे बॉम्बे विश्वविद्यालय, नगर निगम और सार्वजनिक बहसों में भी सक्रिय रहे। बाद में उन्हें भारत की सुप्रीम लेजिस्लेटिव काउंसिल में भी स्थान मिला, जहां हिंदू कानून पर उनकी विशेषज्ञता का विशेष सम्मान किया जाता था।1888 में उन्हें ब्राइट्स डिज़ीज़ का पता चला और इलाज के लिए वे कंबाला हिल स्थित अपने घर में रहने लगे। 9 मई 1889 को उनका निधन हो गया। लेकिन कानून, लेखन और समाज के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष है।

Vishwanath Narayan Mandlik

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी पहचान केवल गीतकार के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में होती है। स...
09/03/2026

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी पहचान केवल गीतकार के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में होती है। साहिर लुधियानवी उन्हीं शायरों में से एक थे। उनकी शायरी में मोहब्बत की नर्मी भी थी और समाज के सच को बेनकाब करने की ताकत भी। 8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्मे साहिर का असली नाम अब्दुल हई था। उनका जन्म एक अमीर जमींदार परिवार में हुआ, लेकिन बचपन ज्यादा देर तक सुख में नहीं रहा। माता-पिता के अलग होने के बाद उनकी मां सरदार बेगम उन्हें लेकर उस आलीशान दुनिया से बाहर आ गईं। यहीं से शुरू हुआ संघर्ष का वह दौर जिसने एक संवेदनशील शायर को जन्म दिया।

1945 में उनका पहला काव्य संग्रह ‘तल्खियां’ प्रकाशित हुआ और इसी किताब ने उर्दू शायरी की दुनिया में उन्हें अचानक एक नई पहचान दे दी। उनकी कविताओं में दर्द, बगावत और इंसाफ की मांग साफ दिखाई देती थी। कुछ साल बाद वे मुंबई पहुंचे। शुरुआत आसान नहीं थी, मगर 1951 की फिल्म ‘नौजवान’ ने उन्हें फिल्मी दुनिया में पहचान दिलाई। इसके बाद ‘प्यासा’, ‘नया दौर’, ‘गुमराह’ और ‘कभी कभी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े गीतकारों में शामिल कर दिया। साहिर का मानना था कि गीत सिर्फ तुकबंदी नहीं होते, उनमें विचार और साहित्य की आत्मा भी होनी चाहिए।

मुंबई के जुहू में उनका एक बंगला था — ‘परछाइयां’। कहा जाता है कि इसी घर की रातों में कई अमर गीत लिखे गए। समंदर की हवा, देर रात की तन्हाई और कागज़ पर झुककर लिखता एक शायर — यही वह माहौल था जहां से “जाने वो कैसे लोग थे”, “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है” और “कभी कभी मेरे दिल में” जैसे गीत जन्मे।

साहिर ने कभी शादी नहीं की। उनकी जिंदगी में सबसे अहम जगह उनकी मां की थी। हालांकि उनकी और लेखिका अमृता प्रीतम की मोहब्बत की कहानी आज भी साहित्य की सबसे रहस्यमयी प्रेम कथाओं में गिनी जाती है — एक ऐसी मोहब्बत जो कभी पूरी नहीं हुई, मगर हमेशा याद रखी गई।

25 अक्टूबर 1980 को 59 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। लेकिन सच यह है कि साहिर कहीं गए नहीं। उनके शब्द आज भी जिंदा हैं, क्योंकि सच्ची शायरी वक्त से ज्यादा मजबूत होती है।

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 # # तरुण बोस — वह अभिनेता जो हर किरदार में इतना घुल जाते थे कि पहचान ही मिट जाती थी1960 के दशक की कई मशहूर फिल्मों में ...
09/03/2026

# # तरुण बोस — वह अभिनेता जो हर किरदार में इतना घुल जाते थे कि पहचान ही मिट जाती थी

1960 के दशक की कई मशहूर फिल्मों में एक ऐसा चेहरा दिखाई देता है जिसे देखते ही लगता है कि यह कलाकार किसी भी किरदार को पूरी सच्चाई के साथ जी सकता है। 1965 की फिल्म **“गुमनाम”** में निर्दयी तस्कर मदनलाल, **“मुझे जीने दो”** में चंबल के डकैतों से टकराता एक संवेदनशील पुलिस अधिकारी और **“अनुपमा”** में अपनी ही बेटी से जूझता एक जटिल पिता — इन तीनों किरदारों को निभाने वाला अभिनेता एक ही था, **तरुण बोस**। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे किरदार में इतने घुल जाते थे कि पर्दे पर अभिनेता नहीं, सिर्फ चरित्र दिखाई देता था।

28 सितंबर 1928 को कलकत्ता में जन्मे तरुण बोस की परवरिश नागपुर में हुई। वहां हिंदी और उर्दू आम बोलचाल की भाषा थी, इसलिए उन्होंने दोनों भाषाओं पर अद्भुत पकड़ बना ली। दिलचस्प बात यह रही कि शुरुआत में उन्हें अपनी मातृभाषा बंगाली में ही आलोचना का सामना करना पड़ा। पहले बंगाली नाटक के बाद समीक्षकों ने यहां तक कह दिया कि “गैर-बंगाली लोग बंगाली नाटक क्यों करते हैं?” यह टिप्पणी उन्हें भीतर तक चुभ गई और उन्होंने अपनी बंगाली भाषा को सुधारने के लिए लगातार मेहनत की।

सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में उन्होंने **ऑल इंडिया रेडियो, नागपुर** के लिए ऑडिशन दिया और रेडियो नाटकों में काम करना शुरू कर दिया। मंच, रेडियो और अभिनय उनके जीवन का हिस्सा बन चुके थे। हालांकि परिवार की जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने **पोस्ट एंड टेलीग्राफ विभाग** में नौकरी भी शुरू कर दी ताकि स्थिर आय बनी रहे और साथ-साथ अभिनय भी जारी रखा जा सके।

उनकी जिंदगी का बड़ा मोड़ तब आया जब नागपुर के **सेंट फ्रांसिस स्कूल** में एक नाटक के दौरान महान फिल्मकार **बिमल रॉय** मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे। नाटक देखने के बाद बिमल रॉय उनके अभिनय से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें बॉम्बे बुला लिया। 1957 में असित सेन की फिल्म **“अपराधी कौन”** से तरुण बोस ने फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद **मधुमती, सुजाता, बंदिनी, मेरी सूरत तेरी आंखें, गुमनाम, अनुपमा, ऊंचे लोग, देवर, सत्यकाम और आन मिलो सजना** जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।

करीब 15 साल के करियर में उन्होंने लगभग 40 फिल्मों में काम किया। उनकी एक खासियत यह भी थी कि वे किरदार के अनुसार अपना हाव-भाव पूरी तरह बदल लेते थे। शायद यही वजह थी कि वे किसी एक छवि में बंधे नहीं, लेकिन बड़े स्टार भी नहीं बन पाए।

8 मार्च 1972 को मात्र 43 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी जिंदगी खुद किसी फिल्म की कहानी लगती है। संघर्ष, असफलता, जिद और फिर असाधा...
09/03/2026

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी जिंदगी खुद किसी फिल्म की कहानी लगती है। संघर्ष, असफलता, जिद और फिर असाधारण सफलता। अनुपम खेर उन्हीं कलाकारों में से एक हैं। एक ऐसा अभिनेता जिसने 28 साल की उम्र में 65 साल के बूढ़े पिता का किरदार निभाकर इतिहास रच दिया। एक ऐसा कलाकार जिसने कभी बैंक खाते में सिर्फ 400 रुपये होने के बाद भी हार नहीं मानी। और एक ऐसा इंसान जिसने चेहरे पर लकवा होने के बावजूद शूटिंग जारी रखी।

7 मार्च 1955 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में जन्मे अनुपम खेर एक साधारण कश्मीरी पंडित परिवार से आते हैं। उनके पिता पुष्कर नाथ खेर वन विभाग में क्लर्क थे और मां दुलारी खेर गृहिणी थीं। बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था। इसी जुनून ने उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक पहुंचाया, जहां से उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं।

मुंबई आने के बाद उनका संघर्ष आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उन्हें धोखा भी झेलना पड़ा। एक एक्टिंग स्कूल में नौकरी का झांसा देकर उन्हें मुंबई बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि ऐसा कोई संस्थान था ही नहीं। यह मुंबई में उनका पहला बड़ा झटका था।

लंबे संघर्ष के बाद 1984 में महेश भट्ट की फिल्म “सारांश” ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस फिल्म में उन्होंने 65 साल के रिटायर्ड स्कूल टीचर का किरदार निभाया, जबकि उस समय उनकी उम्र सिर्फ 28 साल थी। फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट नहीं रही, लेकिन उनकी अदाकारी ने सबको हैरान कर दिया। इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला और यहीं से उनका करियर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ गया।

करियर के दौरान उन्होंने हर तरह के किरदार निभाए। कभी खतरनाक विलेन बने तो कभी शानदार कॉमेडियन।

लेकिन उनकी जिंदगी में मुश्किलें भी कम नहीं आईं। 2004 के आसपास उनके कई प्रोजेक्ट्स फ्लॉप हो गए और हालत इतनी खराब हो गई कि उनके बैंक खाते में सिर्फ 400 रुपये बचे थे। घर और ऑफिस तक गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और फिर से काम शुरू किया।

एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें फेशियल पैरालिसिस हो गया। डॉक्टरों ने आराम करने की सलाह दी, लेकिन उसी दौरान फिल्म “हम आपके हैं कौन” की शूटिंग शुरू होनी थी। अनुपम खेर ने बीमारी के बावजूद कैमरे के सामने खड़े होने का फैसला किया और शूटिंग पूरी की।

उनकी जिंदगी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर हौसला जिंदा हो तो कहानी कभी खत्म नहीं होती।

दक्षिण भारत का औद्योगिक शहर कोयंबटूर आज जिस पहचान के साथ खड़ा है, उसके पीछे कई दूरदर्शी लोगों का योगदान रहा है। उन्हीं म...
09/03/2026

दक्षिण भारत का औद्योगिक शहर कोयंबटूर आज जिस पहचान के साथ खड़ा है, उसके पीछे कई दूरदर्शी लोगों का योगदान रहा है। उन्हीं में से एक नाम है दीवान बहादुर चिन्ना सीवरम रत्नसभापति मुदलियार का। उन्हें अक्सर “आधुनिक कोयंबटूर का जनक” कहा जाता है। उनका जीवन केवल एक उद्योगपति या राजनेता की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कहानी है जिसने शहर के विकास को अपना मिशन बना लिया था।

समृद्ध परिवार और प्रारंभिक जीवन

रत्नसभापति मुदलियार का जन्म 9 मार्च 1886 को एक समृद्ध व्यापारी परिवार में हुआ। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर आर्कोट जिले के चेय्यार के पास स्थित सीवरम गांव से जुड़ा था, लेकिन व्यापार के कारण वे कोयंबटूर में बस गए थे। बचपन से ही उन्होंने व्यापार, समाज सेवा और नेतृत्व का माहौल देखा। उनकी शिक्षा कोयंबटूर में ही हुई और यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई।

नगरपालिका से शुरू हुआ प्रभाव

1906 में वे कोयंबटूर नगर पालिका परिषद के सदस्य बने। उस समय उनकी उम्र केवल बीस वर्ष थी। अगले दो दशकों तक उन्होंने नगर प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1921 में उन्हें नगरपालिका का चेयरमैन बनाया गया। 1936 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने शहर के विकास की कई महत्वपूर्ण योजनाओं को आगे बढ़ाया। उस दौर में सड़कें, जल व्यवस्था और नगर नियोजन जैसी सुविधाओं को मजबूत करने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव

रत्नसभापति मुदलियार केवल प्रशासनिक नेता नहीं थे, बल्कि स्वदेशी आंदोलन के समर्थक भी थे। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै द्वारा स्थापित स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी के लिए उन्होंने धन एकत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह प्रयास ब्रिटिश कंपनियों के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देने का प्रतीक था।

सम्मान और विरासत

समाज और शहर के लिए उनके योगदान को देखते हुए उन्हें “दीवान बहादुर” की उपाधि दी गई। साथ ही उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का अधिकारी भी बनाया गया। आज कोयंबटूर का प्रसिद्ध इलाका आर.एस. पुरम उनके नाम पर है और शहर की प्रमुख सड़क डी.बी. रोड भी उनके सम्मान में जानी जाती है।

इतिहास में जीवित एक नाम

कोयंबटूर की सड़कों और इलाकों में आज भी उनकी याद मौजूद है। शहर की आधुनिक पहचान बनाने वाले इस व्यक्तित्व ने दिखाया कि दूरदर्शी नेतृत्व किसी भी शहर की दिशा बदल सकता है।

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“चंदा रे चंदा रे… कभी तो ज़मीं पर आ…”यह गीत सुनते ही 90 के दशक का वही सुरीला दौर याद आने लगता है, जब हर गीत में एक अलग ह...
09/03/2026

“चंदा रे चंदा रे… कभी तो ज़मीं पर आ…”
यह गीत सुनते ही 90 के दशक का वही सुरीला दौर याद आने लगता है, जब हर गीत में एक अलग ही मिठास हुआ करती थी। उस दौर में कई आवाज़ें आईं, लेकिन कुछ आवाज़ें ऐसी थीं जो सिर्फ गाने नहीं गाती थीं, बल्कि यादों का हिस्सा बन जाती थीं। उन्हीं आवाज़ों में एक नाम है — साधना सरगम।

07 मार्च 1969 को महाराष्ट्र के दाभोल में जन्मी साधना सरगम का असली नाम साधना घाणेकर है। संगीत से उनका रिश्ता बचपन से ही जुड़ गया था। उनकी मां नीला घाणेकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका थीं, इसलिए घर में हमेशा रियाज़ और सुरों का माहौल रहता था। यही वजह रही कि साधना सरगम की पहली गुरु उनकी अपनी मां ही बनीं।

छह साल की उम्र… और एक गीत जिसने पहचान दिलाई

बहुत कम लोग जानते हैं कि साधना सरगम की आवाज़ देश ने पहली बार तब सुनी थी जब वह केवल छह साल की थीं। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला मशहूर गीत “एक चिड़िया, अनेक चिड़िया” आज भी लोगों की यादों में बसता है। उस गीत में जो मासूम आवाज़ सुनाई देती है, वह साधना सरगम की ही थी।

बाद में उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गुरु पंडित जसराज से भी तालीम ली। संगीतकार वसंत देसाई ने भी उनके करियर को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिल्मों में कदम… और धीरे-धीरे बढ़ती पहचान

साधना सरगम ने प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत एक गुजराती फिल्म से की थी। हिंदी फिल्मों में उनका पहला रिलीज़ हुआ गीत फिल्म “विधाता” का “सात सहेलियां” था। इस गीत में किशोर कुमार और अल्का याज्ञनिक जैसी बड़ी आवाज़ें भी शामिल थीं।

1986 में फिल्म “जांबाज़” का गीत “हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िंदगी में” लोगों को बेहद पसंद आया। इसके बाद संगीतकारों ने उनकी आवाज़ को खास तौर पर नोटिस करना शुरू कर दिया।

90 का दशक… जब हर जगह गूंजती थी उनकी आवाज़

1990 के दशक में साधना सरगम हिंदी फिल्म संगीत की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में शामिल हो गईं। फिल्म “विश्वात्मा” का गीत “सात समंदर पार” और “जो जीता वही सिकंदर” का “पहला नशा” आज भी सदाबहार गीतों में गिने जाते हैं।

अपने करियर में उन्होंने 36 भाषाओं में 15 हजार से ज्यादा गीत गाए हैं। तमिल फिल्म “अज़ागी” के गीत “पत्तू शोलई” के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।

आज भले उनकी आवाज़ पहले जितनी फिल्मों में सुनाई नहीं देती, लेकिन संगीत प्रेमियों के दिलों में उनकी जगह आज भी उतनी ही खास है।

भारतीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल कलाकार नहीं रहते, बल्कि एक युग बन जाते हैं। उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ...
09/03/2026

भारतीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल कलाकार नहीं रहते, बल्कि एक युग बन जाते हैं। उस्ताद ज़ाकिर हुसैन भी ऐसा ही नाम थे। जब वे तबले पर बैठते थे तो ऐसा लगता था जैसे केवल संगीत नहीं, बल्कि पूरी एक कहानी सुनाई दे रही हो। उनकी उंगलियों की गति, ताल की समझ और संगीत के प्रति उनका दृष्टिकोण उन्हें अपने दौर का सबसे महान तबला वादक बना गया।

9 मार्च 1951 को मुंबई में जन्मे ज़ाकिर हुसैन संगीत की उस विरासत में पले-बढ़े जहां हर दिन रियाज़ से शुरू होता था। उनके पिता उस्ताद अल्ला रखा भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान तबला वादकों में गिने जाते थे। बचपन से ही घर में तबले की थाप गूंजती रहती थी। यही वजह थी कि संगीत उनके लिए कोई अलग कला नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा था। मात्र सात साल की उम्र में उन्होंने औपचारिक प्रशिक्षण शुरू कर दिया था और कुछ ही वर्षों में मंच पर प्रस्तुति देने लगे।

कम उम्र में ही उनकी प्रतिभा ने दुनिया का ध्यान खींच लिया। बारह साल की उम्र तक वे अपने पिता के साथ देश-विदेश में कार्यक्रम करने लगे थे। लेकिन उनकी यात्रा केवल शास्त्रीय संगीत तक सीमित नहीं रही। युवा होते-होते वे पश्चिमी संगीत की ओर भी आकर्षित हुए और बाद में उन्होंने भारतीय और पश्चिमी संगीत का ऐसा संगम बनाया जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।

1970 के दशक में उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम किया। जॉर्ज हैरिसन, जॉन मैकलॉफलिन और कई प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ उनकी साझेदारी ने एक नए प्रकार के संगीत को जन्म दिया। “शक्ति” जैसे फ्यूजन समूह ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई। उनकी उंगलियों की रफ्तार इतनी तेज़ होती थी कि कई लोग उसे पक्षी के पंखों की गति से तुलना करते थे।

ज़ाकिर हुसैन ने तबले को केवल संगत वाद्य नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे एक स्वतंत्र अभिव्यक्ति का माध्यम बना दिया। उनके कॉन्सर्ट में तबला कभी नदी की तरह बहता था, कभी घोड़े की दौड़ जैसा सुनाई देता था और कभी बिजली की चमक जैसा तेज़।

अपने लंबे करियर में उन्होंने कई ग्रैमी पुरस्कार जीते और भारतीय संगीत को दुनिया के हर कोने तक पहुंचाया। 15 दिसंबर 2024 को उनके निधन के साथ संगीत जगत का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन उनकी थाप आज भी दुनिया के हर तबले में गूंजती है।

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