10/10/2025
सिर्फ चार साल पहले की बात है — भारत में तालिबान का नाम लेना भी सबसे बड़ा अपराध और गुनाह माना जाता था। भारतीय मीडिया ने तालिबान के खिलाफ जितना नकारात्मक प्रचार किया, उतना शायद पश्चिमी मीडिया ने भी नहीं किया। तालिबान को आतंक, कट्टरपंथ और पिछड़ेपन की निशानी के रूप में पेश किया गया, मानो वे किसी सुधार या बातचीत के लायक ही नहीं हों।
लेकिन आज, सिर्फ चार साल बाद, हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। वही भारत सरकार अब तालिबान के विदेश मंत्री का स्वागत कर रही है। काबुल में भारतीय दूतावास को फिर से खोलने की तैयारी हो रही है, और तालिबान सरकार के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की बातें खुलकर हो रही हैं। यह बदलाव इस सच्चाई को उजागर करता है कि दुनिया में न तो दुश्मनी स्थायी होती है, न दोस्ती।
असल में, हर संगठन या आंदोलन की अपनी पृष्ठभूमि और अपनी लड़ाई होती है। तालिबान की लड़ाई अपने देश की आज़ादी, संप्रभुता और विदेशी दखल के खिलाफ थी। बाहर के देशों और उनकी मीडिया को किसी देश के आंतरिक मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए। वक्त बदलता है — जो कल दुश्मन था, वह आज दोस्त बन सकता है।
आज तालिबान के साथ रिश्तों को बेहतर बनाना भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा है। अफ़ग़ानिस्तान इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता, व्यापार और सुरक्षा में बड़ा रोल निभाता है। भारत के लिए ज़रूरी है कि वह ज़मीनी हक़ीक़तों को समझे और अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्ते बनाए। यही आधुनिक विदेश नीति की असली पहचान है — दुश्मनी नहीं, संवाद और समझदारी।