27/01/2026
"कैसा हराया…”—एक संवाद, एक कहानी
“कैसा हराया…”
इस एक संवाद ने जहां शहर शेख को चर्चा में ला कर देश-भर में प्रसिद्धि दिला दी, वहीं मरज़िया पठान की खामोशी ने उन्हें एक समझदार नगरसेविका के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आख़िर “कैसा हराया” के पीछे की कहानी क्या है, इसे समझने की ज़रूरत है।
क्या यह विधायक जितेंद्र आव्हाड के प्रति गुस्सा है, नाराज़गी है या टीस?
जी हाँ, आपने बिल्कुल सही समझा।
दरअसल, एनसीपी के लिए शहर शेख के पिता ने वर्षों तक कड़ी मेहनत की। उनके कथन के अनुसार, जितेंद्र आव्हाड को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया और कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। लेकिन जब इतनी मेहनत के बावजूद उसका कोई फल नहीं मिला, तो स्वाभाविक रूप से गुस्सा फूट पड़ा।
इसी गुस्से को एक अवसर मिला—और वह अवसर दिया AIMIM ने।
इस मौके का पूरा लाभ उठाते हुए शहर शेख ने अपनी मेहनत का फल हासिल किया और राजनीति में जीत की ओर पहला मज़बूत क़दम बढ़ाने में सफल रहे।
इस जीत की खुशी में, भावावेश में यह वाक्य अनायास ही निकल गया—“कैसा हराया…”।
यह संकेत शायद सीधे तौर पर जितेंद्र आव्हाड की ओर था।
हरे रंग को लेकर दिए गए बयान पर जब पत्रकारों ने सवाल पूछे, तो शहर शेख ने स्पष्ट किया कि
“हरे रंग से रंग दूंगी” का मतलब अपने इलाके को हरियाली से सजाना है—यानी पेड़-पौधे लगाकर क्षेत्र को हरा-भरा बनाना।
वहीं, मरज़िया पठान की खामोशी यह भी दर्शाती है कि उनके दिल की मुराद पूरी हो चुकी है।
— राशिद विरोधी