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कंपनी की सालगिरह में उसने मेरे माता-पिता को ड्राइवरों की मेज़ पर बैठाकर कहा—“ये मेरे ससुराल वाले नहीं”, तभी सबसे बड़ा मे...
17/09/2026

कंपनी की सालगिरह में उसने मेरे माता-पिता को ड्राइवरों की मेज़ पर बैठाकर कहा—“ये मेरे ससुराल वाले नहीं”, तभी सबसे बड़ा मेहमान पिता के सामने रुक गया

भाग १

कंपनी की सालगिरह में मेरे पति ने मेरे माता-पिता को ड्राइवरों की मेज़ पर बैठाया और सबके सामने कहा—“ये मेरे ससुराल वाले नहीं हैं।”

गुरुग्राम के अरावली ग्रैंड होटल की अड़तीसवीं मंज़िल पर उस रात वर्धन औद्योगिक समूह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी।

शाम सात बजकर बीस मिनट पर मैं मुख्य सभागार के बाहर खड़ी थी, जब माँ ने मुझे देखकर कपड़े का थैला ऊपर उठाया।

माँ ने मुस्कुराकर कहा—
—मथुरा से पेड़े लाई हूँ। तुम्हारे ससुराल वालों के लिए भी अलग डिब्बा रखा है।

उनकी साड़ी साधारण थी। हल्की हरी। किनारे पर पुराना सुनहरा काम।

पिताजी ने वही धूसर बंदगला पहन रखा था जो मैंने उन्हें पाँच साल पहले दिया था। उसकी बाँह के पास कपड़ा थोड़ा घिस गया था।

उनके हाथ में एक पतला नीला चमड़े का बस्ता भी था।

मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

मैंने बस्ते की ओर इशारा करके पूछा—
—यह क्या है?

पिताजी ने पट्टा ठीक करते हुए कहा—
—पुराने कागज़ हैं। एक आदमी ने मँगवाए थे।

मैंने दोबारा नहीं पूछा।

उसी समय राघव बाहर आया।

उसने पहले मुझे देखा।

फिर मेरे माता-पिता को।

उसके चेहरे की मुस्कान आधे पल में गायब हो गई।

राघव मेरे करीब आया और दबी आवाज़ में बोला—
—तुमने बताया क्यों नहीं कि ये लोग आज ही आ रहे हैं?

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
—मैंने कल रात बताया था।

उसने जबड़ा कसकर कहा—
—तुमने कहा था माँ-पापा आएँगे। यह नहीं कहा था कि सीधे समारोह में आ जाएँगे।

मैं कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने पिताजी के कपड़ों पर नज़र डाली।

फिर माँ के हाथ में कपड़े का थैला देखा।

राघव ने लंबी साँस लेकर कहा—
—आज बड़े लोग आए हुए हैं, नंदिनी। थोड़ा समझा करो।

वही उसका असली वाक्य था।

शादी के चार साल में मैंने इसे अलग-अलग शब्दों में दर्जनों बार सुना था।

मेरी नौकरी छोटी है।

मेरे मायके का घर पुराना है।

पिताजी सार्वजनिक बस में भी चले जाते हैं।

माँ अब भी कपड़े के थैले में मिठाई लाती हैं।

और राघव के लिए आदमी की कीमत अक्सर उसके आने के ढंग से तय होती थी।

मैंने धीमे स्वर में कहा—
—ये मेरे माता-पिता हैं।

राघव ने मेरी बात काटकर कहा—
—मैंने मना कब किया? बस मुख्य मेज़ पर मत बैठाना। वहाँ निवेशक बैठेंगे।

उसने एक कर्मचारी को बुलाया।

फिर सभागार के पिछले हिस्से में बने आठ नंबर की मेज़ की ओर इशारा कर दिया।

वहाँ दो चालक, तीन निजी सहायक, एक ध्वनि व्यवस्था वाला लड़का और दो कार्यक्रम कर्मचारी बैठे थे।

मुझे लगा शायद मैं गलत समझ रही हूँ।

मैंने उसका हाथ पकड़कर पूछा—
—तुम सच में इन्हें वहाँ बैठा रहे हो?

राघव ने मेरी पकड़ हटाते हुए कहा—
—आज रात मेरा पद तय होना है। मेरी मेहनत पर पानी मत फेरो।

पिताजी हमारे पीछे खड़े सब सुन रहे थे।

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

माँ ने बस मिठाई का थैला थोड़ा कसकर पकड़ लिया।

पिताजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा—
—चलो। जहाँ जगह है, वहीं बैठ जाएँगे।

उनके उस एक वाक्य ने मुझे राघव से कहीं ज़्यादा छोटा कर दिया।

क्योंकि अपमान उन्होंने सहा था।

और सफाई देने की इच्छा मुझे हो रही थी।

रात सात बजकर पैंतालीस मिनट पर राघव के विभाग के दो बड़े ग्राहक आए।

उनमें से एक ने माँ-पिताजी को देखकर पूछा कि वे किसके साथ आए हैं।

राघव ने एक पल भी नहीं लिया।

उसने हँसते हुए कहा—
—जान-पहचान के लोग हैं। मथुरा की तरफ़ से आए हैं।

वह आदमी मुस्कुराया।

राघव ने अगला वाक्य और साफ़ करके कहा—
—मेरे ससुराल वाले नहीं हैं।

मेरे कानों में सभागार का बाकी शोर जैसे पीछे चला गया।

माँ की उँगलियाँ थैले के हैंडल पर रुक गईं।

पिताजी की आँखें राघव पर टिक गईं।

मैंने उसके सामने जाकर पूछा—
—अभी तुमने क्या कहा?

राघव ने आसपास देखते हुए कहा—
—यहाँ तमाशा मत शुरू करना।

मैंने फिर पूछा—
—तुमने मेरे माता-पिता को पहचानने से इनकार किया?

राघव मेरे पास आया और लगभग फुसफुसाया—
—तुम्हें समझ क्यों नहीं आता? लोगों पर प्रभाव बनाना पड़ता है। कल घर चलकर जो कहना है कहना।

मैं उसे देखती रही।

उस पल मुझे पहली बार लगा कि समस्या उसका झूठ नहीं था।

समस्या यह थी कि उसे अपना झूठ बिल्कुल गलत नहीं लग रहा था।

पिताजी ने मुझे आवाज़ देकर कहा—
—नंदिनी, रहने दे।

वह झुके और माँ के थैले से गिरा पेड़े का छोटा डिब्बा उठा लिया।

ढक्कन के कोने पर धूल लग गई थी।

उन्होंने रूमाल से उसे साफ़ किया।

राघव तब भी नहीं रुका।

उसने जेब से बटुआ निकाला।

पाँच सौ रुपये निकालकर पिताजी के सामने मेज़ पर रख दिए।

राघव ने बनावटी सहजता से कहा—
—आप लोग चाहें तो जल्दी निकल जाइए। इतने में स्टेशन तक आराम से पहुँच जाएँगे।

माँ ने पहली बार सीधा उसकी ओर देखा।

उन्होंने धीमे स्वर में पूछा—
—हमारे यहाँ रहने से तुम्हें इतनी परेशानी है?

राघव ने गर्दन मोड़कर आसपास देखा और कहा—
—परेशानी की बात नहीं है। ऐसे कार्यक्रमों में छवि देखनी पड़ती है।

मैंने हाथ बढ़ाया।

मैं वे नोट उठाकर उसके चेहरे के सामने फेंक देना चाहती थी।

पिताजी ने मेरी कलाई पकड़ ली।

फिर उन्होंने खुद पाँचों नोट उठाए।

एक-एक करके सीधा किया।

और राघव के सामने वापस रख दिए।

पिताजी ने शांत स्वर में कहा—
—पैसे अपने पास रखो।

राघव ने हल्की हँसी के साथ कहा—
—पाँच सौ रुपये ही हैं, अंकल। इतना स्वाभिमान दिखाने की ज़रूरत नहीं है।

पिताजी ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
—बेटा, कुछ चीज़ें पाँच सौ से नहीं खरीदी जातीं। पाँच करोड़ से भी नहीं।

राघव के चेहरे पर चिढ़ साफ़ दिखी।

उसी समय मुख्य द्वार की ओर हलचल हुई।

किसी ने कहा कि बेदी निवेश समूह के अध्यक्ष हरीश बेदी आ गए हैं।

राघव लगभग तुरंत वहाँ चला गया।

मैं माँ के पास बैठ गई।

पिताजी अब भी अपने नीले बस्ते पर हाथ रखे थे।

तभी मेरी नज़र उसके धातु वाले छोटे बंद पर गई।

उस पर तीन तिरछी रेखाएँ बनी थीं।

ठीक वैसी ही तीन रेखाएँ सभागार के मंच के पीछे वर्धन समूह के पुराने प्रतीक में बनी थीं।

मैंने कुछ सेकंड उसे देखा।

फिर मन ने खुद ही बात टाल दी।

संयोग होंगे।

मुख्य द्वार पर राघव हरीश बेदी से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा।

हरीश बेदी ने हाथ बढ़ाया भी।

फिर उनकी नज़र हमारे कोने की ओर गई।

उनका हाथ हवा में ही रुक गया।

वे राघव को छोड़कर सीधे हमारी ओर आने लगे।

आसपास बैठे लोग उन्हें रास्ता देने लगे।

वे पिताजी से तीन कदम दूर रुके।

उनके चेहरे पर पहचान थी।

बहुत पुरानी पहचान।

हरीश बेदी ने धीमे स्वर में पूछा—
—महेश जी?

पिताजी खड़े नहीं हुए।

उन्होंने बस चश्मा उतारा।

हरीश बेदी एक कदम और आगे आए और बोले—
—आप मुझे पहचान रहे हैं?

पिताजी ने उन्हें कुछ क्षण देखा।

फिर कहा—
—हरीश। बहुत साल हो गए।

मेरे पीछे किसी का गिलास मेज़ से टकराया।

राघव तेज़ी से आया।

उसने बीच में बोलने की कोशिश की—
—बेदी साहब, ये बस…

हरीश बेदी ने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा—
—अभी नहीं।

राघव वहीं रुक गया।

तभी उसके फ़ोन की घंटी बजी।

स्क्रीन पर नाम देखकर उसका चेहरा बदल गया।

देवेंद्र वर्धन।

समूह के अध्यक्ष।

राघव ने फ़ोन कान से लगाया।

दूसरी ओर की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मेरे पास खड़े होने के कारण मुझे भी कुछ शब्द सुनाई दिए।

देवेंद्र वर्धन ने पूछा—
—राघव, महेश शर्मा कहाँ बैठे हैं?

राघव की उँगलियाँ फ़ोन पर कस गईं।

उसने हकलाकर कहा—
—सर… कौन महेश शर्मा?

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर उधर से अगला प्रश्न आया।

देवेंद्र वर्धन ने बेहद ठंडे स्वर में पूछा—
—तुमने आज रात किस आदमी को आठ नंबर की सेवा मेज़ पर बैठाया है, तुम्हें पता भी है?

राघव ने मेरी तरफ़ देखा।

फिर पिताजी की ओर।

पिताजी ने पहली बार अपना नीला बस्ता खोला।

अंदर वही पुरानी धातु की मुहर वाली एक मोटी फाइल रखी थी।

उन्होंने फाइल बाहर नहीं निकाली।

सिर्फ़ मेरी ओर देखा।

पिताजी ने शांत स्वर में कहा—
—नंदिनी, यह बस्ता मेरे पास ले आओ।

मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया।

उसका वजन मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा था।

पिताजी ने आगे कहा—
—मैं सोचता था इन कागज़ों की तुम्हारी जिंदगी में कभी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

उन्होंने राघव की तरफ़ देखा।

फिर मंच के पीछे चमकती उन्हीं तीन तिरछी रेखाओं की ओर।

और उसी समय मुख्य दरवाज़े पर देवेंद्र वर्धन दिखाई दिए।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई थी।

जब मैं लाठी के सहारे घर लौटी, पति ने मुझे बोझ कहा—शाम तक सास ने मुझे और मेरी आठ साल की बेटी को तूफ़ान में निकाल दियाभाग ...
17/09/2026

जब मैं लाठी के सहारे घर लौटी, पति ने मुझे बोझ कहा—शाम तक सास ने मुझे और मेरी आठ साल की बेटी को तूफ़ान में निकाल दिया

भाग १

सेना अस्पताल से लौटते ही करण ने मेरी लाठी की ओर देखकर कहा—
—तुम अब पत्नी नहीं, बोझ हो।
शाम तक मैं बेटी के साथ बारिश में घर से बाहर थी।

उसने यह बात इतनी आसानी से कही थी जैसे सुबह की चाय ठंडी होने की शिकायत कर रहा हो।

मेरी आठ साल की बेटी आन्या रसोई की मेज़ के पीछे खड़ी थी। उसके हाथ में दूध का गिलास था। उसने पीना बंद कर दिया।

मैं दरवाज़े के पास ही खड़ी रही।

दिल्ली छावनी के सेना अस्पताल से मुझे घर आए मुश्किल से १८ घंटे हुए थे।

मेरे बाएँ पैर में अभी पूरा भरोसा नहीं लौटा था। डॉक्टर ने कहा था कि अगले चार महीने तक मुझे सहारे की जरूरत पड़ सकती है।

मैंने करण को देखा।

उसने मेरी आँखों में देखने के बजाय मेज़ पर रखा नीला दस्तावेज़ों का फ़ोल्डर बंद किया।

मैंने धीमे से पूछा—

—क्या कहा तुमने?

उसने कुर्सी पीछे की और उठ गया—

—जो तुमने सुना।

फिर मेरी लाठी की तरफ देखा—

—मैं पिछले नौ महीने अकेला सब संभाल रहा हूँ। अब मुझे तुम्हारी देखभाल भी करनी पड़ेगी। मेरी भी कोई जिंदगी है।

नौ महीने।

मैंने वह संख्या मन में दोहराई।

इन्हीं नौ महीनों में मैं हर रविवार आन्या से वीडियो पर बात करती थी।

इन्हीं नौ महीनों में करण हर महीने कहता था—

—घर की चिंता मत करो। मैं हूँ।

उस समय वही चार शब्द मुझे सोने देते थे।

अब समझ नहीं आ रहा था कि उनमें से कौन-सा शब्द सच था।

सास विमला जी सीढ़ियों से नीचे उतरीं।

उनके हाथ में मेरी अलमारी से निकला एक सूट था।

उन्होंने उसे सोफ़े पर फेंका—

—बहस मत करो, राधिका। करण बहुत सह चुका है।

मैं उनकी तरफ मुड़ी।

उन्होंने बिना आवाज़ धीमी किए कहा—

—यह मेरे बेटे का घर है। यहाँ वही रहेगा जिससे उसे शांति मिले।

आन्या ने गिलास रख दिया।

वह मेरी तरफ दौड़ी नहीं।

बस दो कदम आगे आई।

जैसे उसे डर हो कि अगर उसने गलत हरकत की तो उसे भी कहीं भेज दिया जाएगा।

मैंने करण से कहा—

—आन्या के सामने बात मत करो।

करण हँसा नहीं।

गुस्सा भी नहीं हुआ।

उसने नीला फ़ोल्डर मेरी तरफ बढ़ा दिया—

—तो इस पर हस्ताक्षर कर दो। फिर आराम से बात करेंगे।

मैंने उसे लिया।

ऊपर लिखा था कि यह किसी ऋण और संपत्ति संबंधी प्रक्रिया का आवेदन था।

नीचे चार जगह पीले निशान लगे थे।

जहाँ मुझे हस्ताक्षर करने थे।

मैंने पहला पन्ना पलटा।

करण ने तुरंत हाथ बढ़ाया—

—पूरा पढ़ने की जरूरत नहीं है।

मेरी उँगलियाँ वहीं रुक गईं।

सेना में एक बात मैंने बहुत जल्दी सीख ली थी।

जिस कागज़ पर कोई आदमी आपको पढ़े बिना हस्ताक्षर करवाना चाहे, वही कागज़ सबसे धीरे पढ़ना चाहिए।

मैंने फ़ोल्डर बंद कर दिया।

—कल देखूँगी।

करण का चेहरा बदल गया।

बस थोड़ा-सा।

लेकिन मैंने देख लिया।

उसने फ़ोल्डर वापस खींचा—

—कल नहीं। आज।

मैंने उसे फिर देखा।

उस क्षण पहली बार मुझे लगा कि मेरी लाठी असली समस्या नहीं थी।

विमला जी ने होंठ भींचे—

—इतना भी विश्वास नहीं है अपने पति पर?

मैंने जवाब नहीं दिया।

मेरी नजर फ़ोल्डर के किनारे से बाहर निकले एक सफेद कागज़ पर गई।

ऊपर हमारे गुरुग्राम वाले घर का पता था।

नीचे मेरे नाम के सामने कुछ लिखा था।

करण ने कागज़ अंदर धकेल दिया।

फिर फोन उठाकर बाहर चला गया।

मैंने सिर्फ उसकी आखिरी बात सुनी—

—कल तक हो जाएगा। आप चिंता मत कीजिए।

वह किससे बात कर रहा था, मैंने नहीं पूछा।

दोपहर के बाद विमला जी मेरे कमरे में आईं।

दो बड़े काले थैले बिस्तर पर रखे।

फिर मेरी अलमारी खोल दी।

मैं कुछ सेकंड उन्हें देखती रही।

—ये क्या कर रही हैं?

उन्होंने कपड़े मोड़ने की भी कोशिश नहीं की।

सीधे थैले में डालती गईं।

—कुछ दिन अपने पुराने घर रहो।

—पुराना घर पाँच साल से बंद है।

—तो खुल जाएगा।

—करण ने कहा है?

उन्होंने मेरी तरफ देखा—

—उसे कहने की जरूरत नहीं।

मैं दरवाज़े की चौखट पकड़कर खड़ी हो गई।

मेरे पैर में कंपन शुरू हो गया था।

आन्या अपने कमरे से भागकर आई।

उसने देखा कि उसकी दादी उसके कपड़े भी दूसरे थैले में रख रही हैं।

वह तुरंत मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

—मम्मा, हम कहाँ जा रहे हैं?

मैंने उसके बाल पीछे किए—

—नाना के घर।

उसका चेहरा थोड़ा उठा।

उसे मेरे पिता की याद बहुत कम थी।

पापा को गए चार साल हो चुके थे।

लेकिन पुराने घर के आम के पेड़ की तस्वीर उसे याद थी।

करण शाम छह बजे नीचे आया।

बारिश शुरू हो चुकी थी।

मैंने सोचा था शायद वह अपनी माँ को रोक देगा।

कम से कम आन्या के लिए।

उसने कुछ नहीं कहा।

वह मुख्य दरवाज़े पर हाथ बाँधकर खड़ा रहा।

विमला जी ने दोनों थैले बरामदे के बाहर रख दिए।

एक थैले का मुँह खुल गया।

आन्या की गुलाबी स्वेटर गीले फर्श पर गिर गई।

आन्या उसे उठाने झुकी।

मेरे मुँह से बस निकला—

—रहने दो।

मैंने करण को देखा।

—मैंने इस घर के लिए क्या-क्या दिया है, तुम्हें याद है?

उसने सीधा जवाब दिया—

—पुरानी बातें गिनाने से घर तुम्हारा नहीं हो जाता।

फिर दरवाज़े की तरफ इशारा किया—

—और एक बात याद रखना। बाहर जाने का फैसला तुम्हारा है।

मैं कुछ पल उसे देखती रही।

फिर समझ गई।

वह चाहता था कि यह बात ऐसे ही कही जाए।

कि मैं अपनी इच्छा से गई।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मैंने आन्या का हाथ पकड़ा।

बारिश इतनी तेज थी कि गाड़ी तक पहुँचते-पहुँचते मेरे बाल चेहरे से चिपक गए।

मेरी पुरानी स्वचालित गाड़ी नौ महीने से खड़ी थी।

तीसरी कोशिश में चालू हुई।

आन्या पीछे बैठी रही।

जब हम सोसायटी के फाटक से निकले तो उसने धीमे से पूछा—

—पापा हमें लेने आएँगे?

मेरे हाथ स्टीयरिंग पर कस गए।

मैंने शीशे में उसका चेहरा देखा।

—अभी हम नाना के घर जा रहे हैं।

मैं झूठ नहीं बोल पाई।

गुरुग्राम से देहरादून जिले के भोगपुर तक रास्ता लंबा लगा।

रात करीब साढ़े दस बजे हम पुराने मकान के सामने पहुँचे।

लोहे का फाटक जंग से भूरा हो चुका था।

बरामदे की छत एक तरफ झुकी थी।

घास मेरे घुटनों तक आ रही थी।

घर अँधेरा था।

लेकिन बगल वाले मकान में पीली रोशनी जल रही थी।

गाड़ी बंद होते ही वहाँ का दरवाज़ा खुला।

एक दुबला-सा आदमी छाता लेकर बाहर आया।

वह करीब आया तो मैं पहचान गई।

गोविंद काका।

पापा के सबसे पुराने पड़ोसी।

अब शायद ७९ या ८० के होंगे।

उन्होंने मुझे देखा।

फिर लाठी देखी।

फिर पीछे बैठी आन्या को।

उनके चेहरे से रंग उतर गया।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

पहले गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोला।

आन्या से बोले—

—अंदर चल बिटिया। पहले कपड़े बदलेंगे।

फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा।

—उसने निकाल दिया?

मेरा दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।

मैंने पूछा—

—आपको कैसे पता?

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

अपने घर के अंदर गए।

करीब एक मिनट बाद लौटे तो उनके हाथ में पुराना भूरा लिफ़ाफ़ा था।

किनारों पर धूल जम चुकी थी।

ऊपर मेरे पिता की लिखावट में सिर्फ दो शब्द थे—

राधिका के लिए।

मेरी उँगलियाँ अपने आप काँप गईं।

—यह क्या है?

गोविंद काका ने लिफ़ाफ़ा मेरी हथेली पर रख दिया।

—तेरे पिता ने मरने से छह महीने पहले मुझे दिया था।

मैंने सिर उठाया।

बारिश छाते के किनारे से लगातार गिर रही थी।

उन्होंने कहा—

—उन्होंने एक शर्त रखी थी। जब तक करण तुम्हें इस घर से निकाल न दे… या तुम्हें यह न कहे कि गुरुग्राम वाला घर सिर्फ उसका है… तब तक यह लिफ़ाफ़ा तुम्हें नहीं देना।

मेरे हाथ से लाठी लगभग फिसल गई।

गोविंद काका ने तुरंत पकड़ ली।

मैंने लिफ़ाफ़े को देखा।

सील अभी भी बंद थी।

अंदर कई कागज़ों की मोटी परत महसूस हो रही थी।

एक छोटी कठोर चीज भी थी।

शायद कोई चाबी।

शायद कुछ और।

तभी मेरा फोन बजा।

करण था।

मैंने उठाया।

वह शांत स्वर में बोला—

—सुबह दस बजे तक वापस आ जाना। कागज़ों पर हस्ताक्षर करके फिर जहाँ जाना हो चली जाना।

मैंने सामने अपने पिता की लिखावट देखी।

करण ने दूसरी तरफ कहा—

—और राधिका, कोई चालाकी मत करना। तुम्हें पता भी नहीं है कि घर के कागज़ कहाँ हैं।

फोन कट गया।

गोविंद काका ने मेरी हथेली में दबा लिफ़ाफ़ा देखा।

फिर धीमे से बोले—

—यही बात तेरे पिता ने भी कही थी।

मैंने उनकी ओर देखा।

काका ने पुराने घर का ताला खोल दिया।

और उस रात, जब आन्या मेरे पिता के पुराने कमरे में पहली बार सोई, वह लिफ़ाफ़ा मेरे सामने मेज़ पर बंद पड़ा रहा।

क्योंकि मुझे पहली बार डर करण से नहीं लग रहा था।

मुझे डर इस बात से लग रहा था कि पापा चार साल पहले ऐसा क्या जान गए थे, जो मैं आज तक नहीं जान पाई थी।

जिस कंपनी को मैंने ग्यारह साल देकर खड़ा किया, उसी मेज़ पर पति ने मेरी जगह अपनी सचिव को दी—मैंने बस प्रवेश-पत्र रख दियाPA...
17/09/2026

जिस कंपनी को मैंने ग्यारह साल देकर खड़ा किया, उसी मेज़ पर पति ने मेरी जगह अपनी सचिव को दी—मैंने बस प्रवेश-पत्र रख दिया

PART 1

मैंने ग्यारह साल पुराना प्रवेश-पत्र पति की मेज़ पर रखा। उसने इस्तीफ़े की चिट्ठी देखी और बोला—
—तुम्हें लगता है तुम्हारे बिना कंपनी रुक जाएगी?

आरव मल्होत्रा के हाथ में पेट की दवा की चाँदी रंग की पट्टी थी।

उसने अंगूठे से एक खाँचा दबाया।

“टक।”

सफेद गोली निकलकर मेज़ के किनारे तक लुढ़क गई।

उसने गोली नहीं उठाई।

सिर्फ मेरी चिट्ठी दोबारा पढ़ी।

खिड़की के बाहर गुरुग्राम की चवालीसवीं मंज़िल धुले हुए शीशे जैसी लग रही थी। बारिश अभी बीती थी। काँच पर पानी की छोटी बूँदें अटकी थीं।

आरव कुर्सी पर पीछे हुआ और बोला—

—फिर सिया वाली बात?

मैंने उत्तर नहीं दिया।

उसने माथा दबाया।

—मैंने कहा था उससे माफ़ी माँगने के लिए।

मैंने फोन खोलकर उसके सामने रख दिया।

—मुझे माफ़ी नहीं मिली।

सात दिन पुराना संदेश स्क्रीन पर था।

सिया अरोड़ा ने लिखा था—

“नंदिनी जी, आरव सर चाहते हैं कि यह मामला यहीं समाप्त हो।”

“आगे से मुख्य कार्यालय से जुड़ी सभी मंज़ूरियाँ मेरे माध्यम से जाएँगी। आपको हर बात में सीधे हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।”

फिर आख़िरी पंक्ति—

“कुछ कुर्सियों पर बहुत समय बैठने से लोगों को भ्रम हो जाता है कि वह जगह हमेशा उनकी ही रहेगी।”

आरव की आँखें उसी पंक्ति पर टिक गईं।

कुछ क्षण बाद उसने धीरे से कहा—

—यह मैंने नहीं लिखवाया।

मैंने फोन उठा लिया।

—मुझे मालूम है।

वह मेरी ओर देखने लगा।

मैंने प्रवेश-पत्र उसके सामने सरका दिया।

—अब फ़र्क नहीं पड़ता।

उसकी उँगलियाँ रुक गईं।

आरव ने पहली बार आवाज़ धीमी की—

—तुम इस्तीफ़ा एक सचिव के संदेश की वजह से दे रही हो?

मैं हँसी नहीं।

बस उसे देखती रही।

ग्यारह साल।

जब “अर्कवर्ण” में बारह कर्मचारी थे, मैं वित्त देखती थी, खरीद भी, सामान पहुँचने का हिसाब भी।

जब किराया चुकाने के बाद खाते में सिर्फ दो महीने का वेतन बचता था, मैं रात को घर जाकर अगले दिन के भुगतान का क्रम बनाती थी।

फिर कंपनी बढ़ी।

आरव सबकी ज़ुबान पर “आरव सर” हो गया।

मैं ब्रांड विभाग की प्रमुख बनी।

आठ साल पहले हमने शादी की।

कंपनी में बहुत कम लोगों को पता था कि हम पति-पत्नी हैं।

यह फैसला भी मेरा था।

मैं नहीं चाहती थी कि कोई मेरी मेहनत को विवाह का लाभ कहे।

मैं उसे कार्यालय में “आरव सर” कहती रही।

पहले वह घर लौटकर मज़ाक करता था—

—कभी घर में भी सर मत बोल देना।

अब वह मज़ाक कई महीनों से नहीं हुआ था।

सिया पिछले वर्ष अक्टूबर में आई थी।

छब्बीस साल की।

तेज़।

बहुत व्यवस्थित।

उसका दूसरा साक्षात्कार मैंने लिया था।

नियुक्ति की पर्ची पर सबसे पहले मैंने ही लिखा था—“योग्य।”

दो महीने बाद आरव की पुरानी सचिव मातृत्व अवकाश पर चली गई।

मानव संसाधन विभाग ने नाम माँगे।

मैंने सिया का नाम दिया।

उस रात आरव ने खाना खाते हुए पूछा था—

—भरोसा है?

मैंने रोटी तोड़ते हुए कहा—

—तुम्हें ऐसे लोग पसंद हैं जिन्हें हर काम दो बार न समझाना पड़े। यह लड़की वैसी है।

पहले तीन महीने सब ठीक था।

फिर एक सुबह तिमाही बैठक में आरव की जगह पर काली कॉफी की जगह जई के दूध वाली कॉफी रखी थी।

मैंने सहज ही पूछा—

—आरव सर की पसंद बदल गई?

सिया कागज़ सीधा करते हुए मुस्कुराई—

—पेट खराब रहता है उनका। मैंने काली कॉफी कम करवा दी है।

“मैंने कम करवा दी है।”

बस चार शब्द।

मैं दो क्षण चुप रही।

फिर खुद को समझा लिया।

बैठक के बीच आरव ने दो बार गला साफ किया।

सिया बिना बुलाए अंदर आई और उसके दाहिने हाथ के पास गुनगुना पानी रख गई।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

घर लौटते समय मैंने पूछा—

—अब दूध वाली कॉफी पीने लगे?

आरव ने गाड़ी मोड़ी।

—सिया कहती है काली कॉफी पेट के लिए ठीक नहीं।

मैंने शीशे से बाहर देखा।

—तुम तो दूध वाली कॉफी छूते भी नहीं थे।

वह हँसा।

—तुम यह भी ध्यान रख रही हो?

मैंने उसकी ओर देखा।

उसने जोड़ा—

—नंदिनी, कृपया हर छोटी बात का अर्थ मत निकाला करो।

उस रात बात वहीं खत्म हो गई।

दूसरी बार हमारी शादी की आठवीं सालगिरह थी।

मैंने एक महीने पहले मेहरौली के एक छोटे रेस्तराँ में मेज़ बुक की थी।

साथ में उसका पुराना घड़ी वाला डिब्बा था।

वही घड़ी जो मैंने कंपनी शुरू होने के दूसरे साल खरीदी थी।

तब मेरी डेढ़ महीने की तनख्वाह लगी थी।

पाँच बजकर बीस मिनट पर सिया का फोन आया।

उसने कहा—

—आज रात आरव सर निवेशकों से मिलने जा रहे हैं। उनका निजी कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है।

मैंने पूछा—

—कहाँ?

एक क्षण की चुप्पी।

फिर उसकी आवाज़ आई—

—वित्त पोषण से जुड़ी जानकारी अभी सीमित रखी गई है।

मैंने धीरे से पूछा—

—मुझसे भी?

उसने कहा—

—कंपनी के नियम सबके लिए समान हैं।

मैंने रेस्तराँ की बुकिंग रद्द कर दी।

रात दस बजकर सैंतीस मिनट पर आरव घर आया।

दरवाज़ा खोलते ही उसने पूछा—

—तुम सोई नहीं?

मैंने रसोई से कहा—

—आज तारीख क्या है?

वह वहीं रुक गया।

मैंने अलमारी से पुरानी घड़ी निकाली और उसके सामने रख दी।

उसने डिब्बा देखा।

फिर मुझे।

उसने धीमे से कहा—

—नंदिनी, आज सच में बहुत ज़रूरी बैठक थी।

मैंने सिर हिलाया।

—मुझे तुमसे बैठक छोड़ने को नहीं कहना था।

वह थोड़ा सहज हुआ।

मैंने डिब्बा उसकी ओर बढ़ाया।

—सिर्फ इतना चाहती थी कि यह बात मुझे तुम्हारी सचिव से न पता चले।

उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

अगले चार महीनों में चीज़ें इतनी धीरे बदलीं कि हर बार शिकायत करना मुझे ही छोटा लगता।

मेरी तीन बैठकों से मेरा नाम हट गया।

ब्रांड खर्च की मंज़ूरी पहले मेरे पास आती थी, फिर आरव के पास।

अब बीच में “मुख्य कार्यालय समन्वय” जुड़ गया।

उसका अर्थ था—सिया।

एक शुक्रवार सिया मेरे विभाग में आई।

उसने बारह लोगों के सामने कहा—

—अब से सभी बड़े अभियान मुख्य कार्यालय से अनुमोदित होंगे।

मैंने पूछा—

—किसका निर्णय है?

उसने सीधे मेरी आँखों में देखा।

—आरव सर का।

मैं उसी समय आरव के कमरे में गई।

उसने कंप्यूटर से नज़र नहीं उठाई।

मैंने पूछा—

—तुमने मेरी मंज़ूरी की सीमा बदली?

उसने कहा—

—प्रक्रिया आसान कर रहा हूँ।

—मुझसे पूछे बिना?

तब उसने पहली बार वह वाक्य कहा जिसने मेरे भीतर कुछ साफ कर दिया।

उसने कुर्सी पीछे की और बोला—

—नंदिनी, तुम्हें लगता है तुम्हारे बिना कंपनी रुक जाएगी? किसी एक व्यक्ति पर कारोबार नहीं टिकता।

उसी क्षण मेरा फैसला हो गया।

मैं उस आदमी से बहस नहीं करूँगी जो मेरी ग्यारह साल की मेहनत को “किसी एक व्यक्ति” कहकर छोटा कर चुका था।

सात दिन बाद मेरा इस्तीफ़ा उसकी मेज़ पर था।

मैं अपने कमरे में लौटी तो मेज़ लगभग खाली थी।

दीया, मेरी सहायक, दरवाज़े के पास खड़ी थी।

उसकी आँखें लाल थीं।

उसने कुछ नहीं पूछा।

बस एक गहरा नीला लिफाफा मेरी ओर बढ़ा दिया।

ऊपर हाथ से लिखा था—

“केवल नंदिनी के लिए।”

नीचे कबीर सूद के हस्ताक्षर थे।

कबीर कंपनी के पुराने विधि और अनुपालन प्रमुख थे। मेरे बाद आरव के साथ सबसे लंबे समय से काम करने वालों में से एक।

मैंने लिफाफे को पलटा।

सील बंद थी।

दीया ने धीमे से कहा—

—कबीर सर ने कहा है इसे अपने पास रखिए। अभी किसी को मत दीजिए।

मैंने उसे बैग में रख लिया।

अंदर क्या था, मैंने नहीं पूछा।

शाम छह बजकर पाँच मिनट पर मैंने अपना प्रवेश-पत्र सुरक्षा अधिकारी को देना चाहा।

तभी पीछे से आरव की आवाज़ आई।

वह तेज़ कदमों से आया और मेरे सामने रुक गया।

उसने कहा—

—कार्ड मत दो।

मैंने उसकी ओर देखा।

—इस्तीफ़ा दे चुकी हूँ।

उसका जबड़ा तन गया।

—कल सुबह बोर्ड की बैठक है।

मैंने कहा—

—मुझे पता है।

वह एक क्षण चुप रहा।

फिर बोला—

—तुम उस बैठक में नहीं आओगी।

मैंने अपने बैग पर हाथ रखा।

नीले लिफाफे का कठोर किनारा उँगलियों के नीचे महसूस हुआ।

मैंने कार्ड सुरक्षा अधिकारी की हथेली पर रख दिया।

—कल नौ बजे मिलते हैं।

लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होने से ठीक पहले मैंने आरव का चेहरा देखा।

पहली बार वह नाराज़ नहीं था।

वह परेशान था।

और असली बात अगली सुबह खुलनी बाकी थी।

सास ने सबके सामने लाल नाइटी मेरे मुँह पर फेंकी, मैंने बस इतना कहा—“ठीक है माँ, आज आपकी हर बात मानूँगी” और उस रात पूरा घर...
17/09/2026

सास ने सबके सामने लाल नाइटी मेरे मुँह पर फेंकी, मैंने बस इतना कहा—“ठीक है माँ, आज आपकी हर बात मानूँगी” और उस रात पूरा घर चुप हो गया
भाग १

सास ने लाल नाइटी मेरे सामने फेंककर कहा—
—इसे पहन, शायद तेरे पति का मन ठीक हो जाए।

मैंने पति को देखा। वह चुप था। उसी पल मेरे भीतर कुछ बदल गया।

लाल कपड़ा मेरे पैरों के पास पड़ा था।

बैठक में लगभग पूरा परिवार मौजूद था।

मेरी दोनों देवरानियाँ मेहरिन और तसनीम सोफे पर बैठी थीं। तीन बच्चे सामने फर्श पर खेल रहे थे। मेरे पति सफवान खिड़की के पास वाली कुर्सी पर बैठे थे।

और मेरी सास रौशन आरा बेगम मेरे सामने खड़ी थीं।

उन्होंने मेरी तरफ ऊपर से नीचे तक देखा और होंठ सिकोड़ दिए।

फिर मेरी बाँह की ओर इशारा करके बोलीं—

—दिन भर रसोई में पड़ी रहती हो। कभी खुद को भी देख लिया करो।

मेहरिन ने मुँह दूसरी तरफ घुमाया, मगर उसकी हँसी छिपी नहीं।

तसनीम ने अपने नाखून देखते हुए धीमे से मुस्कुराया।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मेरी हथेलियों से उस समय भी धनिए और आटे की मिली-जुली गंध आ रही थी।

दोपहर के करीब डेढ़ बजे थे।

सुबह पाँच बजकर दस मिनट से मैं काम में लगी थी।

पहले नाश्ता।

फिर बच्चों के लिए अलग खाना।

सास के लिए कम तेल वाली दाल।

देवर के लिए मछली।

सफवान को शुक्रवार को पुलाव पसंद था, इसलिए वह भी बनाया था।

बारह लोगों का खाना बनाते-बनाते मेरी कमर सीधी नहीं हो रही थी।

लेकिन उस कमरे में खड़े किसी इंसान को मेरे हाथ नहीं दिख रहे थे।

सबको सिर्फ मेरा चेहरा दिख रहा था।

थका हुआ।

बिना सजावट का।

सास ने फिर कपड़े की तरफ देखा—

—जाओ, नहा लो। बाल ठीक करो। इसे पहनकर अपने कमरे में बैठना। हर समय नौकरानी जैसी बनी रहोगी तो पति भी क्या करेगा?

मेरी नजर फिर सफवान पर गई।

उसने बस अपनी उँगलियाँ आपस में कस लीं।

मैं चाहती थी वह एक वाक्य बोले।

सिर्फ एक।

“अम्मी, बस कीजिए।”

लेकिन दस साल में जिस आदमी ने हर मुश्किल समय में चुप रहना सीखा हो, वह उस दिन अचानक बोलने वाला नहीं था।

मैंने धीरे से झुककर लाल नाइटी उठा ली।

कपड़ा मेरी मुट्ठी में दब गया।

फिर मैं सीधी हुई।

सास की आँखों में देखकर मुस्कुराई—

—ठीक है माँ।

कमरे में हँसी थम गई।

मैंने कपड़ा बाँह पर रखा—

—आप जब कह रही हैं, तो आज आपकी बात पूरी तरह मानूँगी।

रौशन आरा बेगम शायद किसी जवाब की उम्मीद कर रही थीं।

उन्हें मेरा इतना आसानी से मान जाना समझ नहीं आया।

पर मैंने उन्हें सोचने का समय नहीं दिया।

सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर चली गई।

हमारा घर लखनऊ के चौक से थोड़ी दूर एक पुरानी कॉलोनी में था।

तीन मंजिल का मकान।

नीचे सास।

पहली मंजिल पर दोनों देवरों के परिवार।

ऊपर दो कमरे मेरे और सफवान के।

लेकिन रसोई एक ही थी।

जिम्मेदारी भी लगभग एक ही इंसान की थी।

मैं।

शादी के शुरू में मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगा था।

तब घर में मेरे ससुर भी थे।

सास के घुटनों में दर्द रहता था।

मेहरिन नई-नई माँ बनी थी।

तसनीम की शादी नहीं हुई थी।

मैंने खुद कहा था—

—मैं कर लूँगी।

शायद मेरी सबसे बड़ी गलती यही थी कि मैंने यह वाक्य बहुत आसानी से बोल दिया था।

धीरे-धीरे “मैं कर लूँगी” इस घर का नियम बन गया।

किसी को बुखार?

सादिया कर लेगी।

मेहमान आ गए?

सादिया देख लेगी।

बच्चे स्कूल से आ गए?

सादिया खिला देगी।

दवा खत्म?

सादिया ले आएगी।

बिजली का बिल?

सादिया याद रखेगी।

सास की जाँच?

सादिया साथ जाएगी।

कुछ साल बाद किसी ने पूछना ही बंद कर दिया कि मैं कर पाऊँगी या नहीं।

उस एक वाक्य में मेरी दस साल की जगह तय हो गई थी।

मैं घर की बहू नहीं रही थी।

मैं घर की सुविधा बन गई थी।

ऊपर कमरे में पहुँचकर मैंने दरवाजा बंद नहीं किया।

बस हल्के से भेड़ दिया।

अलमारी खोली।

ऊपरी खाने में कपड़ों के पीछे क्रीम रंग का एक मोटा लिफाफा रखा था।

उसके कोने पर नीली मुहर थी।

मैंने उसे बाहर निकाला।

कुछ पल हाथ में रखा।

फिर वापस रख दिया।

सुबह वह लिफाफा डाक से आया था।

मैंने अभी तक सफवान को उसके बारे में नहीं बताया था।

बताने का सोच रही थी।

लेकिन दोपहर की वह घटना पहले हो गई।

मैं स्नानघर में चली गई।

करीब बीस मिनट बाद बाहर निकली तो पहली बार मुझे जल्दी नहीं थी।

आमतौर पर नहाते समय भी नीचे रखी दाल का ध्यान रहता था।

कभी गैस।

कभी बच्चों की आवाज।

कभी सास की पुकार।

उस दिन नीचे से दो बार आवाज आई।

मैंने सुना।

जवाब नहीं दिया।

अलमारी से साफ कपड़े निकाले।

फिर लाल नाइटी को देखा।

कुछ क्षण मेरे हाथ रुक गए।

सास ने जो कहा था, उसे मैंने ठीक-ठीक याद किया।

“नहा लो। इसे पहनकर अपने कमरे में बैठना।”

मैंने वही किया।

नाइटी पहनी।

ऊपर से अपना लंबा सूती गाउन डाल लिया।

बाल सुखाए।

चेहरे पर थोड़ी क्रीम लगाई।

फिर खिड़की के पास कुर्सी खींचकर बैठ गई।

नीचे से बर्तनों की आवाज आ रही थी।

तीन बजकर बीस मिनट पर सफवान कमरे में आया।

उसने मुझे कुर्सी पर बैठे देखा तो वहीं रुक गया।

उसकी आँखें मेरे पीछे मेज पर पड़ी लाल कपड़े की बाँह तक गईं।

फिर उसने धीमे से पूछा—

—तुम नीचे नहीं आओगी?

मैंने घड़ी देखी।

फिर उसकी तरफ देखा—

—क्यों?

वह असहज होकर बोला—

—अम्मी पूछ रही थीं। खाने के बाद बहुत से बर्तन पड़े हैं।

मैंने सिर हिलाया—

—माँ ने मुझे नहाकर तैयार होने और अपने पति के लिए ठीक दिखने को कहा था।

सफवान ने गहरी साँस ली।

मैंने उसके चेहरे से नजर नहीं हटाई।

वह बोला—

—सादिया, तुम जानती हो उनका मतलब क्या था।

मैंने पहली बार बिना आवाज ऊँची किए उसे बीच में रोक दिया—

—और तुम जानते थे कि मुझे कैसा लगा था।

सफवान चुप हो गया।

कमरे में पंखे की आवाज रह गई।

मैंने खिड़की से बाहर देखा।

सामने वाली छत पर कपड़े हवा में हिल रहे थे।

कुछ देर बाद सफवान मेरी तरफ बढ़ा।

उसने मेज पर हाथ रखा—

—आज जाने दो।

मैं मुस्कुराई।

—मैं दस साल से यही तो कर रही हूँ।

वह वहीं खड़ा रह गया।

मैंने फिर कुछ नहीं कहा।

शाम साढ़े सात बजे तक मैं नीचे नहीं गई।

पहले बच्चों की आवाज आई।

फिर तसनीम की।

फिर सास की तेज पुकार—

—सादिया!

मैं कुर्सी पर ही रही।

दूसरी बार आवाज और ऊँची हुई।

तभी मेरी नजर अलमारी पर गई।

क्रीम रंग का वह लिफाफा अंदर रखा था।

मैं उठी।

अलमारी खोली।

उसे बाहर निकाला।

इस बार वापस नहीं रखा।

मैंने लिफाफा मेज पर रख दिया।

उसी समय नीचे से सास की आवाज आई—

—रात का खाना कौन बनाएगा?

मैंने उस लिफाफे पर अपनी हथेली रख दी।

और दस साल में पहली बार मुझे लगा कि शायद यह सवाल मुझसे नहीं, इस पूरे घर से पूछा जाना चाहिए था।

लेकिन असली जवाब अभी बाकी था।

जारी रहेगा…

माँ ने मुझे दादाजी की गोद में बैठने से रोका था, फिर उसी रात दादाजी दरवाज़े पर आए और बोले—“मैं मीरा को लेने आया हूँ।”PART...
17/09/2026

माँ ने मुझे दादाजी की गोद में बैठने से रोका था, फिर उसी रात दादाजी दरवाज़े पर आए और बोले—“मैं मीरा को लेने आया हूँ।”

PART 1

माँ ने महीनों से मुझे दादाजी की गोद से दूर रखा था। उसी रात वह दरवाज़े पर आए और बोले—“मीरा को लेने आया हूँ।” माँ रो पड़ीं।

उस समय मेरी उम्र नौ साल थी।

इतनी कि किसी बड़े की मुस्कान और उसकी आँखों के बीच का अंतर समझ सकूँ।

लेकिन इतनी भी नहीं कि हर बात का सही मतलब निकाल पाऊँ।

माँ कई हफ्तों से एक ही बात कह रही थीं।

एक शाम उन्होंने मेरी कलाई पकड़कर कहा—

—दादाजी अब पहले जैसे नहीं रहे। उनकी हर बात पर भरोसा मत किया कर।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—क्यों?

माँ ने जवाब नहीं दिया।

बस मेरी कलाई छोड़ दी।

उस दिन से जब भी मैं दादाजी की तरफ दौड़ती, माँ की आवाज़ पीछे से आ जाती।

—मीरा, यहीं रहो।

दादाजी तब कुछ नहीं कहते।

बस मुस्कुरा देते।

कभी-कभी उनकी मुस्कान एक पल ज्यादा टिक जाती थी, जैसे वह कोई बात कहना चाहते हों और फिर भूल जाते हों कि क्या कहना था।

लखनऊ के चौक के पास उनका पुराना दोमंज़िला मकान था।

हरे रंग का दरवाज़ा।

ऊपर छोटी-सी बालकनी।

और पीछे जाली से बंद एक बरामदा, जहाँ बचपन से एक पुरानी दूरबीन खड़ी रहती थी।

दादाजी मुझे बताते थे कि आसमान में जो चीज़ छोटी दिखती है, वह जरूरी नहीं कि सच में छोटी हो।

तब मैं हँस देती थी।

उस रविवार पूरा परिवार उनके घर गया था।

दोपहर के खाने के बाद माँ रसोई में चाची की मदद करने चली गईं।

मैं बैठक में आई तो दादाजी अकेले बैठे थे।

उनकी सफेद कमीज़ की आस्तीन कोहनी तक मुड़ी हुई थी।

सामने की मेज पर चश्मा, दवाइयों का डिब्बा और एक नीला लिफ़ाफ़ा रखा था।

लिफ़ाफ़े के ऊपर सिर्फ मेरा नाम लिखा था।

“मीरा।”

मैंने हाथ बढ़ाया।

दादाजी ने तुरंत लिफ़ाफ़े पर हथेली रख दी।

फिर हल्का-सा मुस्कुराए।

—अभी नहीं।

मैंने होंठ फुला लिए।

—इसमें क्या है?

उन्होंने सिर हिलाया।

—समय आने पर।

मुझे लगा शायद जन्मदिन का कोई उपहार होगा।

मैं बिना सोचे उनकी गोद में जाकर बैठ गई।

रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी।

बाहर किसी ठेले वाले की घंटी बज रही थी।

तभी दादाजी का हाथ मेरे कंधे पर आया।

वह थोड़ा झुके।

उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे दोबारा सुनना पड़ा।

—आज रात तुम मेरे पास आकर सो सकती हो?

मेरी पीठ सीधी हो गई।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—क्या?

वह कुछ क्षण मुझे देखते रहे।

फिर उन्होंने वह बात कही जिसने मेरे भीतर पहली बार सचमुच डर पैदा किया।

—अभी अपनी माँ को मत बताना।

उसी समय रसोई की तरफ से कदमों की आवाज़ आई।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उनकी आँखें पहले मेरे चेहरे पर गईं।

फिर दादाजी के हाथ पर।

उन्होंने तेज़ी से कहा—

—मीरा, नीचे उतरो।

मैं तुरंत उतर गई।

माँ मेरे पास आईं।

उन्होंने पूछा—

—दादाजी ने क्या कहा?

मैंने दादाजी की तरफ देखा।

वह चुप थे।

मुझे नहीं पता मैंने झूठ क्यों बोला।

मैंने गर्दन हिलाई।

—कुछ नहीं।

घर लौटते समय माँ कार चला रही थीं।

मैं पीछे बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी।

शाम की रोशनी दुकानों के शीशों पर पड़ रही थी।

लेकिन मेरे कानों में बार-बार वही वाक्य आ रहा था।

“अपनी माँ को मत बताना।”

करीब दस मिनट बाद मुझसे रहा नहीं गया।

मैं आगे झुकी।

—माँ?

उन्होंने शीशे में मुझे देखा।

—हाँ?

मैंने कहा—

—दादाजी ने मुझसे एक बात कही थी।

उनकी उँगलियाँ गाड़ी के पहिए पर कस गईं।

—क्या?

मैंने सब बता दिया।

एक शब्द भी नहीं बदला।

माँ ने अचानक गाड़ी किनारे लगा दी।

कुछ सेकंड इंजन चलता रहा।

वह सामने देखती रहीं।

फिर मेरी तरफ मुड़ीं।

—उन्होंने बिल्कुल यही कहा कि आज रात उनके पास सो जाओ?

मैंने सिर हिला दिया।

माँ ने पूछा—

—और मुझे बताने से मना किया?

मैंने फिर सिर हिलाया।

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

उनके होंठ हिले।

—हे भगवान...

मैं पहली बार उनसे ज्यादा डर गई।

मैंने पूछा—

—क्या हुआ?

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

—आज रात तुम कहीं नहीं जाओगी।

घर पहुँचते ही उन्होंने चाची नजमा को फोन किया।

मैं गलियारे में खड़ी थी।

माँ की पूरी बात सुनाई नहीं दे रही थी।

बस कुछ टुकड़े।

—उन्होंने मीरा से कह दिया...

थोड़ी देर चुप्पी।

—हाँ, आज रात ही।

फिर माँ की आवाज़ टूट गई।

—मुझे पता था, एक दिन यह समय आएगा।

मेरा पेट जैसे भीतर से सिकुड़ गया।

कौन-सा समय?

शाम के खाने पर माँ मुश्किल से दो निवाले खा पाईं।

पापा शहर से बाहर थे।

मैंने दो बार पूछा कि दादाजी के साथ क्या हुआ है।

दोनों बार माँ ने कहा—

—अभी नहीं।

रात करीब ग्यारह बजे घंटी बजी।

माँ एकदम स्थिर हो गईं।

मैं सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

उन्होंने दरवाज़ा खोला।

बाहर दादाजी थे।

वही सफेद कमीज़।

कंधे पर भूरी शॉल।

हाथ में पुराना चमड़े का थैला।

माँ ने उन्हें अंदर आने के लिए रास्ता नहीं दिया।

उन्होंने पूछा—

—बाबा, आप यहाँ क्यों आए हैं?

दादाजी ने शांत स्वर में कहा—

—मीरा को लेने आया हूँ।

माँ का चेहरा कठोर हो गया।

—नहीं।

दादाजी ने उनकी तरफ देखा।

—निलोफर...

माँ ने सिर हिला दिया।

—मैं उसे नहीं भेजूँगी।

दादाजी ने लंबी साँस ली।

—तुम उसे सारी जिंदगी हर मुश्किल बात से बचाकर नहीं रख सकती।

माँ की आँखें भर आईं।

—वह सिर्फ नौ साल की है।

दादाजी ने मेरी तरफ देखे बिना कहा—

—इसीलिए चाहता हूँ कि आज रात वह वहाँ रहे।

माँ ने दोनों हाथ चेहरे पर रख लिए।

कुछ देर तक कोई नहीं बोला।

फिर उन्होंने बहुत धीमे कहा—

—लेकिन अगर कल...

दादाजी ने तुरंत रोक दिया।

—कल की बात अभी मत करो।

मेरे पैर जैसे जमीन में धँस गए।

कल क्या था?

करीब आधे घंटे बाद माँ मेरे कमरे में आईं।

मेरी जैकेट अलमारी से निकाली।

फिर बोलीं—

—तैयार हो जाओ।

मैंने उन्हें देखा।

—कहाँ?

उन्होंने मेरी आँखों से बचते हुए कहा—

—दादाजी के घर।

मैंने कुछ नहीं पूछा।

गाड़ी में माँ ने पूरे रास्ते मेरा हाथ पकड़े रखा।

दादाजी के घर पहुँचकर मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ी।

लेकिन उन्होंने मुझे रोक दिया।

वह पीछे वाले बरामदे का दरवाज़ा खोलकर अंदर गए।

वहाँ फर्श पर दो अलग-अलग गद्दे पड़े थे।

एक बड़ा।

एक छोटा।

दोनों के बीच करीब चार हाथ की दूरी थी।

खिड़की के पास वही पुरानी दूरबीन खड़ी थी।

पास की छोटी मेज पर पानी की बोतल, तीन चॉकलेट और वही नीला लिफ़ाफ़ा रखा था।

मेरा नाम अब भी उसके ऊपर साफ दिखाई दे रहा था।

माँ दरवाज़े के बाहर ही खड़ी रहीं।

मैंने दादाजी की तरफ देखा।

—यह सब क्या है?

दादाजी ने जवाब देने से पहले आसमान की तरफ देखा।

फिर उनकी नजर नीले लिफ़ाफ़े पर गई।

उन्होंने उसे उठाया।

लेकिन खोला नहीं।

बस मेरी तरफ बढ़ाकर बोले—

—पहले तुम्हें आज की रात दिखानी है।

मैंने लिफ़ाफ़ा पकड़ लिया।

उसके भीतर कुछ कागज़ थे।

ऊपर बाईं तरफ कुछ सख्त-सा भी महसूस हुआ।

मैंने उसे खोलना चाहा।

दादाजी ने मेरी उँगलियों पर हाथ रख दिया।

—सुबह।

मैंने माँ की तरफ देखा।

उनके गाल भीगे हुए थे।

और उसी क्षण पहली बार मुझे लगा कि जिस चीज़ से मैं पूरे दिन डर रही थी, शायद माँ उससे भी ज्यादा किसी दूसरी चीज़ से डर रही थीं।

और फिर वह रात शुरू हुई, जिसने दादाजी के बारे में मेरे मन में बना हर फैसला बदल दिया।

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