17/09/2026
कंपनी की सालगिरह में उसने मेरे माता-पिता को ड्राइवरों की मेज़ पर बैठाकर कहा—“ये मेरे ससुराल वाले नहीं”, तभी सबसे बड़ा मेहमान पिता के सामने रुक गया
भाग १
कंपनी की सालगिरह में मेरे पति ने मेरे माता-पिता को ड्राइवरों की मेज़ पर बैठाया और सबके सामने कहा—“ये मेरे ससुराल वाले नहीं हैं।”
गुरुग्राम के अरावली ग्रैंड होटल की अड़तीसवीं मंज़िल पर उस रात वर्धन औद्योगिक समूह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी।
शाम सात बजकर बीस मिनट पर मैं मुख्य सभागार के बाहर खड़ी थी, जब माँ ने मुझे देखकर कपड़े का थैला ऊपर उठाया।
माँ ने मुस्कुराकर कहा—
—मथुरा से पेड़े लाई हूँ। तुम्हारे ससुराल वालों के लिए भी अलग डिब्बा रखा है।
उनकी साड़ी साधारण थी। हल्की हरी। किनारे पर पुराना सुनहरा काम।
पिताजी ने वही धूसर बंदगला पहन रखा था जो मैंने उन्हें पाँच साल पहले दिया था। उसकी बाँह के पास कपड़ा थोड़ा घिस गया था।
उनके हाथ में एक पतला नीला चमड़े का बस्ता भी था।
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।
मैंने बस्ते की ओर इशारा करके पूछा—
—यह क्या है?
पिताजी ने पट्टा ठीक करते हुए कहा—
—पुराने कागज़ हैं। एक आदमी ने मँगवाए थे।
मैंने दोबारा नहीं पूछा।
उसी समय राघव बाहर आया।
उसने पहले मुझे देखा।
फिर मेरे माता-पिता को।
उसके चेहरे की मुस्कान आधे पल में गायब हो गई।
राघव मेरे करीब आया और दबी आवाज़ में बोला—
—तुमने बताया क्यों नहीं कि ये लोग आज ही आ रहे हैं?
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
—मैंने कल रात बताया था।
उसने जबड़ा कसकर कहा—
—तुमने कहा था माँ-पापा आएँगे। यह नहीं कहा था कि सीधे समारोह में आ जाएँगे।
मैं कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने पिताजी के कपड़ों पर नज़र डाली।
फिर माँ के हाथ में कपड़े का थैला देखा।
राघव ने लंबी साँस लेकर कहा—
—आज बड़े लोग आए हुए हैं, नंदिनी। थोड़ा समझा करो।
वही उसका असली वाक्य था।
शादी के चार साल में मैंने इसे अलग-अलग शब्दों में दर्जनों बार सुना था।
मेरी नौकरी छोटी है।
मेरे मायके का घर पुराना है।
पिताजी सार्वजनिक बस में भी चले जाते हैं।
माँ अब भी कपड़े के थैले में मिठाई लाती हैं।
और राघव के लिए आदमी की कीमत अक्सर उसके आने के ढंग से तय होती थी।
मैंने धीमे स्वर में कहा—
—ये मेरे माता-पिता हैं।
राघव ने मेरी बात काटकर कहा—
—मैंने मना कब किया? बस मुख्य मेज़ पर मत बैठाना। वहाँ निवेशक बैठेंगे।
उसने एक कर्मचारी को बुलाया।
फिर सभागार के पिछले हिस्से में बने आठ नंबर की मेज़ की ओर इशारा कर दिया।
वहाँ दो चालक, तीन निजी सहायक, एक ध्वनि व्यवस्था वाला लड़का और दो कार्यक्रम कर्मचारी बैठे थे।
मुझे लगा शायद मैं गलत समझ रही हूँ।
मैंने उसका हाथ पकड़कर पूछा—
—तुम सच में इन्हें वहाँ बैठा रहे हो?
राघव ने मेरी पकड़ हटाते हुए कहा—
—आज रात मेरा पद तय होना है। मेरी मेहनत पर पानी मत फेरो।
पिताजी हमारे पीछे खड़े सब सुन रहे थे।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
माँ ने बस मिठाई का थैला थोड़ा कसकर पकड़ लिया।
पिताजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा—
—चलो। जहाँ जगह है, वहीं बैठ जाएँगे।
उनके उस एक वाक्य ने मुझे राघव से कहीं ज़्यादा छोटा कर दिया।
क्योंकि अपमान उन्होंने सहा था।
और सफाई देने की इच्छा मुझे हो रही थी।
रात सात बजकर पैंतालीस मिनट पर राघव के विभाग के दो बड़े ग्राहक आए।
उनमें से एक ने माँ-पिताजी को देखकर पूछा कि वे किसके साथ आए हैं।
राघव ने एक पल भी नहीं लिया।
उसने हँसते हुए कहा—
—जान-पहचान के लोग हैं। मथुरा की तरफ़ से आए हैं।
वह आदमी मुस्कुराया।
राघव ने अगला वाक्य और साफ़ करके कहा—
—मेरे ससुराल वाले नहीं हैं।
मेरे कानों में सभागार का बाकी शोर जैसे पीछे चला गया।
माँ की उँगलियाँ थैले के हैंडल पर रुक गईं।
पिताजी की आँखें राघव पर टिक गईं।
मैंने उसके सामने जाकर पूछा—
—अभी तुमने क्या कहा?
राघव ने आसपास देखते हुए कहा—
—यहाँ तमाशा मत शुरू करना।
मैंने फिर पूछा—
—तुमने मेरे माता-पिता को पहचानने से इनकार किया?
राघव मेरे पास आया और लगभग फुसफुसाया—
—तुम्हें समझ क्यों नहीं आता? लोगों पर प्रभाव बनाना पड़ता है। कल घर चलकर जो कहना है कहना।
मैं उसे देखती रही।
उस पल मुझे पहली बार लगा कि समस्या उसका झूठ नहीं था।
समस्या यह थी कि उसे अपना झूठ बिल्कुल गलत नहीं लग रहा था।
पिताजी ने मुझे आवाज़ देकर कहा—
—नंदिनी, रहने दे।
वह झुके और माँ के थैले से गिरा पेड़े का छोटा डिब्बा उठा लिया।
ढक्कन के कोने पर धूल लग गई थी।
उन्होंने रूमाल से उसे साफ़ किया।
राघव तब भी नहीं रुका।
उसने जेब से बटुआ निकाला।
पाँच सौ रुपये निकालकर पिताजी के सामने मेज़ पर रख दिए।
राघव ने बनावटी सहजता से कहा—
—आप लोग चाहें तो जल्दी निकल जाइए। इतने में स्टेशन तक आराम से पहुँच जाएँगे।
माँ ने पहली बार सीधा उसकी ओर देखा।
उन्होंने धीमे स्वर में पूछा—
—हमारे यहाँ रहने से तुम्हें इतनी परेशानी है?
राघव ने गर्दन मोड़कर आसपास देखा और कहा—
—परेशानी की बात नहीं है। ऐसे कार्यक्रमों में छवि देखनी पड़ती है।
मैंने हाथ बढ़ाया।
मैं वे नोट उठाकर उसके चेहरे के सामने फेंक देना चाहती थी।
पिताजी ने मेरी कलाई पकड़ ली।
फिर उन्होंने खुद पाँचों नोट उठाए।
एक-एक करके सीधा किया।
और राघव के सामने वापस रख दिए।
पिताजी ने शांत स्वर में कहा—
—पैसे अपने पास रखो।
राघव ने हल्की हँसी के साथ कहा—
—पाँच सौ रुपये ही हैं, अंकल। इतना स्वाभिमान दिखाने की ज़रूरत नहीं है।
पिताजी ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
—बेटा, कुछ चीज़ें पाँच सौ से नहीं खरीदी जातीं। पाँच करोड़ से भी नहीं।
राघव के चेहरे पर चिढ़ साफ़ दिखी।
उसी समय मुख्य द्वार की ओर हलचल हुई।
किसी ने कहा कि बेदी निवेश समूह के अध्यक्ष हरीश बेदी आ गए हैं।
राघव लगभग तुरंत वहाँ चला गया।
मैं माँ के पास बैठ गई।
पिताजी अब भी अपने नीले बस्ते पर हाथ रखे थे।
तभी मेरी नज़र उसके धातु वाले छोटे बंद पर गई।
उस पर तीन तिरछी रेखाएँ बनी थीं।
ठीक वैसी ही तीन रेखाएँ सभागार के मंच के पीछे वर्धन समूह के पुराने प्रतीक में बनी थीं।
मैंने कुछ सेकंड उसे देखा।
फिर मन ने खुद ही बात टाल दी।
संयोग होंगे।
मुख्य द्वार पर राघव हरीश बेदी से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा।
हरीश बेदी ने हाथ बढ़ाया भी।
फिर उनकी नज़र हमारे कोने की ओर गई।
उनका हाथ हवा में ही रुक गया।
वे राघव को छोड़कर सीधे हमारी ओर आने लगे।
आसपास बैठे लोग उन्हें रास्ता देने लगे।
वे पिताजी से तीन कदम दूर रुके।
उनके चेहरे पर पहचान थी।
बहुत पुरानी पहचान।
हरीश बेदी ने धीमे स्वर में पूछा—
—महेश जी?
पिताजी खड़े नहीं हुए।
उन्होंने बस चश्मा उतारा।
हरीश बेदी एक कदम और आगे आए और बोले—
—आप मुझे पहचान रहे हैं?
पिताजी ने उन्हें कुछ क्षण देखा।
फिर कहा—
—हरीश। बहुत साल हो गए।
मेरे पीछे किसी का गिलास मेज़ से टकराया।
राघव तेज़ी से आया।
उसने बीच में बोलने की कोशिश की—
—बेदी साहब, ये बस…
हरीश बेदी ने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा—
—अभी नहीं।
राघव वहीं रुक गया।
तभी उसके फ़ोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नाम देखकर उसका चेहरा बदल गया।
देवेंद्र वर्धन।
समूह के अध्यक्ष।
राघव ने फ़ोन कान से लगाया।
दूसरी ओर की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मेरे पास खड़े होने के कारण मुझे भी कुछ शब्द सुनाई दिए।
देवेंद्र वर्धन ने पूछा—
—राघव, महेश शर्मा कहाँ बैठे हैं?
राघव की उँगलियाँ फ़ोन पर कस गईं।
उसने हकलाकर कहा—
—सर… कौन महेश शर्मा?
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर उधर से अगला प्रश्न आया।
देवेंद्र वर्धन ने बेहद ठंडे स्वर में पूछा—
—तुमने आज रात किस आदमी को आठ नंबर की सेवा मेज़ पर बैठाया है, तुम्हें पता भी है?
राघव ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर पिताजी की ओर।
पिताजी ने पहली बार अपना नीला बस्ता खोला।
अंदर वही पुरानी धातु की मुहर वाली एक मोटी फाइल रखी थी।
उन्होंने फाइल बाहर नहीं निकाली।
सिर्फ़ मेरी ओर देखा।
पिताजी ने शांत स्वर में कहा—
—नंदिनी, यह बस्ता मेरे पास ले आओ।
मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया।
उसका वजन मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा था।
पिताजी ने आगे कहा—
—मैं सोचता था इन कागज़ों की तुम्हारी जिंदगी में कभी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
उन्होंने राघव की तरफ़ देखा।
फिर मंच के पीछे चमकती उन्हीं तीन तिरछी रेखाओं की ओर।
और उसी समय मुख्य दरवाज़े पर देवेंद्र वर्धन दिखाई दिए।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई थी।