29/01/2026
क्या सचमुच यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा लाया गया बिल सवर्ण समाज के युवाओं के विरुध्द है ! इसको समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि को समझ लेना आवश्यक है. केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में आईआईटी, आईआईएम तथा अन्य राष्ट्रीय महत्व के उच्च शिक्षण संस्थानों में लगभग 100 छात्रों ने आत्महत्या की है। चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से प्रायः सभी छात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों से थे।
हम दलित समाज से आने वाले हैदराबाद के रोहित वेमुला और मुंबई की आदिवासी डॉक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या की घटनाओं को कैसे भूल सकते हैं ! इन मामलों में पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसके बाद माननीय न्यायालय ने केंद्र सरकार को सख़्त निर्देश दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाए जाएँ।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में संसद की समिति गठित की गई, जिसके अध्यक्ष वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जी थे। समिति की अनुशंसाओं के आधार पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने समता (इक्विटी) समिति का गठन किया, ताकि दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, महिलाएँ और दिव्यांग छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की तत्काल सुनवाई हो और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस व्यवस्था को अब “सवर्ण विरोधी” बताकर इसके खिलाफ़ प्रदर्शन किए जा रहे हैं। जब भी वंचित वर्गों के हित में या उनकी सुरक्षा के लिए कोई क़दम उठाया जाता है तो उसका इस प्रकार विरोध किया जाना न समाज हित में है और न ही देश हित में.
उच्च शिक्षण संस्थानों में लगातार हो रहे भेदभाव और उसके कारण छात्रों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पूरे समाज के लिए चेतावनी है। क्या हम चाहते हैं कि ऐसे छात्र सुरक्षा के अभाव में अपनी जान देते रहें?
हम सभी से अपील करते हैं कि यूजीसी के इस प्रावधान को पूर्वाग्रह के बिना पढ़ा और समझा जाए. अगर प्रस्तावित बिल के किसी अंश से किसी प्रकार का भ्रम पैदा होता है तो उसके लिए न्यायालय का दरवाज़ा खुला है. लेकिन बेवजह भ्रम का शिकार हो कर समाज में तनाव फैलाने से देश आगे नहीं बढ़ सकता। न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों के बिना न हमारा देश मज़बूत होगा न ही लोकतंत्र।