Jamia Abubakar Siddique

Jamia Abubakar Siddique Follow ALJAMIATUL ISLAMI ABUBAKAR SIDDIQUE

16/07/2026

There's no fear when you have the ultimate protection. This beautiful animation reminds us that seeking refuge in Allah can light up even the darkest moments. His protection is the strongest shield we have.

16/07/2026

जब तलवार उठाने वाला खुद झुक गया: हज़रत उमर (रज़ि०) के इस्लाम कुबूल करने का ऐतिहासिक वाकया​1. इस्लाम के कट्टर दुश्मन 'उमर...
15/07/2026

जब तलवार उठाने वाला खुद झुक गया: हज़रत उमर (रज़ि०) के इस्लाम कुबूल करने का ऐतिहासिक वाकया
​1. इस्लाम के कट्टर दुश्मन 'उमर'
​यह वह दौर था जब मक्का की वादियों में इस्लाम की गूंज नई-नई शुरू हुई थी। उमर बिन खत्ताब अपनी ताकत, बहादुरी और सख्त मिजाज के लिए पूरे अरब में जाने जाते थे। वह बुतपरस्ती (मूर्तियों की पूजा) और अपने पुरखों के धर्म के कट्टर समर्थक थे। जब उन्होंने देखा कि इस्लाम की वजह से मक्का के घर-घर में फूट पड़ रही है—भाई भाई से अलग हो रहा है, बेटा बाप का दीन छोड़ रहा है—तो उनका खून उबल उठा।
​वह इस्लाम कबूल करने वाले नए मुसलमानों पर बेइंतहा ज़ुल्म ढाते थे। उनकी एक कनीज़ (दासी) ने जब इस्लाम कुबूल किया, तो वह उसे तब तक मारते रहते जब तक कि वह खुद थक नहीं जाते।
​2. वह खौफनाक रात और कत्ल का इरादा
​एक दिन मक्का के काफिरों की एक सभा बैठी। सबने कहा कि (हज़रत) मुहम्मद (ﷺ) ने हमारे खुदाओं को बुरा-भला कहा है और कौम को बांट दिया है, कोई है जो उनका खात्मा कर सके?
​उमर जलाल में खड़े हुए और अपनी नंगी तलवार हाथ में लेकर बोले, "यह काम उमर करेगा!"
​वह कड़कड़ाती धूप में, हाथ में नंगी तलवार लिए, आंखों में खून उतारे पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) को (माज़अल्लाह) कत्ल करने के इरादे से निकल पड़े। रास्ते में उन्हें नुऐम बिन अब्दुल्लाह (रज़ि०) मिले, जो चुपके से इस्लाम कुबूल कर चुके थे। उमर के हाथ में नंगी तलवार और चेहरे पर दरिंदगी देखकर उन्होंने पूछा, "उमर, कहाँ का इरादा है?"
​उमर ने गरज कर कहा, "आज मैं मुहम्मद (ﷺ) का किस्सा खत्म करने जा रहा हूँ, जिसने कुरैश में फूट डाल दी है।"
​3. "पहले अपने घर की खबर लो!"
​नुऐम (रज़ि०) घबरा गए कि अगर उमर हुज़ूर (ﷺ) तक पहुँच गए तो कयामत आ जाएगी। उन्होंने उमर का ध्यान भटकाने के लिए कहा, "उमर! दूसरों के पीछे भागने से पहले ज़रा अपने घर की खबर तो लो। तुम्हारी सगी बहन फातिमा और तुम्हारे बहनोई सईद बिन ज़ैद भी अपना दीन छोड़कर मुसलमान हो चुके हैं!"
​यह सुनना था कि उमर के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनके गुस्से की आग अब अपनी ही बहन के खिलाफ भड़क उठी। उन्होंने फौरन अपना रास्ता बदला और बहन के घर की तरफ दौड़ पड़े।
​4. बहन के घर में कुरआन की गूंज
​जब उमर अपनी बहन के घर के करीब पहुँचे, तो उन्हें घर के अंदर से किसी के पढ़ने की बहुत ही खूबसूरत और दिलकश आवाज़ आ रही थी। दरअसल, सहाबी हज़रत खब्बाब (रज़ि०) उनकी बहन और बहनोई को छुपकर कुरआन की सूरह ता-हा पढ़ा रहे थे।
​जैसे ही उमर ने दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक दी, हज़रत खब्बाब (रज़ि०) खौफ के मारे घर के एक कोने में छुप गए और कुरआन के पन्ने (सहीफे) छुपा दिए गए।
​उमर ने अंदर कदम रखते ही दहाड़ कर पूछा, "यह कैसी आवाज़ थी जो मैं बाहर सुन रहा था?"
बहनोई ने बात टालनी चाही, लेकिन उमर का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने कहा, "मुझे पता चल चुका है कि तुम दोनों गुमराह (मुसलमान) हो चुके हो!"
​5. बहन का खून और वह ऐतिहासिक जुमला
​यह कहकर उमर अपने बहनोई सईद पर टूट पड़े और उन्हें ज़मीन पर गिराकर बुरी तरह पीटने लगे। जब सगी बहन फातिमा अपने पति को बचाने के लिए बीच में आईं, तो उमर ने उन्हें भी ज़ोरदार तमाचा दे मारा। वार इतना सख्त था कि उनकी बहन के चेहरे से खून का फव्वारा फूट पड़ा।
​अपनी सगी बहन को लहूलुहान देखकर उमर एक पल के लिए ठिठके। लेकिन उस बहादुर बहन ने अपने भाई की आंखों में आंखें डालकर, खून पोंछते हुए गरज कर कहा:
​"हाँ उमर! हम मुसलमान हो चुके हैं। हम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान ला चुके हैं। अब तुम्हारी जो मर्जी आए कर लो, लेकिन हमारे दिलों से इस ईमान को नहीं निकाल सकते!"
​6. पत्थर दिल का पिघलना और ज़बान पर कलमा
​सगी बहन के चेहरे पर बहता खून और उनके चेहरे का यह अटूट विश्वास देखकर उमर का अंदरूनी गुरूर और गुस्सा ढह गया। उनके दिल पर एक गहरी चोट लगी। उन्होंने अपनी बहन से बड़े नरम लहजे में कहा, "अच्छा, मुझे वह पन्ने दिखाओ जो तुम लोग पढ़ रहे थे।"
​बहन ने कहा, "भाई! तुम नापाक हो और इसे सिर्फ पाक लोग ही छू सकते हैं।" उमर ने फौरन गुस्ल (स्नान) किया और जब कुरआन के उन पन्नों को हाथ में लिया, तो उन पर सूरह ता-हा की ये आयतें लिखी थीं:
​"ता-हा। हमने यह कुरआन तुम पर इसलिए नाज़िल नहीं किया कि तुम मुशक्कत में पड़ जाओ। बल्कि यह तो नसीहत है उस शख्स के लिए जो डर रखता हो..." (कुरआन 20:1-3)
​जैसे-जैसे उमर आगे पढ़ते गए, उनका दिल पिघलता गया, आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई। वह रो पड़े और बोले, "कितना पाक और कितना खूबसूरत कलाम है यह!"
​कोने में छुपे सहाबी हज़रत खब्बाब (रज़ि०) फौरन बाहर आए और बोले, "ऐ उमर! मुबारक हो। कल ही अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने दुआ मांगी थी कि 'या अल्लाह! उमर बिन खत्ताब या अबू जहल में से किसी एक के ज़रिए इस्लाम को ताकत बख्श।' मुझे यकीन है कि हुज़ूर की दुआ तुम्हारे हक में कुबूल हो गई है।"
​7. दार-ए-अरकम की तरफ सफ़र
​अब उमर की तलवार हाथ में तो थी, लेकिन इरादा बदल चुका था। वह दार-ए-अरकम (जहाँ नबी और सहाबा छुपे थे) पहुँचे। दरवाज़े पर दस्तक हुई। सहाबा ने झरोखे से देखा कि बाहर उमर नंगी तलवार लिए खड़ा है। सब सहम गए।
​लेकिन शेरे-खुदा हज़रत हम्ज़ा (रज़ि०) ने कहा, "दरवाज़ा खोलो! अगर वह खैर के इरादे से आया है तो ठीक, वरना उसी की तलवार से उसका सर कलम कर दूंगा।"
​जैसे ही उमर अंदर दाखिल हुए, अल्लाह के रसूल (ﷺ) आगे बढ़े, उमर का दामन कसकर पकड़ा और फरमाया, "उमर! किस इरादे से आए हो? क्या तुम तब तक बाज़ नहीं आओगे जब तक कि तुम पर अल्लाह का अज़ाब न आ जाए?"
​आधी दुनिया को कंपा देने वाला उमर, रहमतुल-लिल-आलमीन (ﷺ) के कदमों में ढह गया और कांपती आवाज़ में बोला:
​"या रसूलअल्लाह! मैं अल्लाह पर, आप पर और उस कलाम पर ईमान लाने आया हूँ जो अल्लाह की तरफ से आया है। अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह!"
​वहाँ मौजूद तमाम सहाबा ने इस शिद्दत से "अल्लाहु अकबर" का नारा लगाया कि मक्का की पहाड़ियां गूंज उठीं और काफिर अपने घरों में दुबक गए। यह वह दिन था जब इस्लाम को छुपाकर नहीं, बल्कि खुलेआम ज़ाहिर किया जाने लगा, और हुज़ूर (ﷺ) ने उमर को 'फ़ारूक़' (हक़ और बातिल में फर्क करने वाला) का खिताब दिया।

मक्का के काफिरों को खुली चुनौती: "किसे अपनी बीवी को बेवा करना है?"
ईमान लाने के फ़ौरन बाद हज़रत उमर (रज़ि०) ने अल्लाह के रसूल (ﷺ) से पूछा, "या रसूलअल्लाह! क्या हम हक़ पर नहीं हैं?" हुज़ूर (ﷺ) ने फरमाया, "बेशक हम हक़ पर हैं।" उमर ने कहा, "फिर हम छुपकर इबादत क्यों करें? खुदा की कसम! अब इस्लाम का ऐलान सरेआम होगा।"
वह सीधे काफिरों के सबसे बड़े गढ़ 'काबा' पहुँचे, जहाँ कुरैश के बड़े-बड़े सरदार बैठे थे। उमर ने अपनी तलवार पर हाथ रखा और मक्का के उन ज़ालिमों के बीच खड़े होकर दहाड़ते हुए वह ऐतिहासिक ऐलान किया जिसने काफ़िरों के कलेजे कँपा दिए। उन्होंने कहा:
"ओ मक्का के लोगो! कान खोलकर सुन लो, उमर बिन ख़त्ताब अब मुसलमान हो चुका है! और सुनो, तुम में से जिस किसी को भी अपनी बीवी को बेवा (Widow) बनाना हो, अपने बच्चों को यतीम (Orphan) करना हो, और अपनी माँ को रुलाना हो... वह मक्का की इस घाटी के पीछे आकर उमर का रास्ता रोक कर दिखाए!"
यह हज़रत उमर (रज़ि०) का खौफ और उनका जलाल था कि मक्का का बड़े से बड़ा सूरमा और काफ़िरों के सरदार भी सिर झुकाए बैठे रहे, लेकिन किसी माई के लाल में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह उमर बिन ख़त्ताब के सामने खड़ा हो सके या उनका रास्ता रोक सके। इसके बाद सभी मुसलमान सफें (लाइनें) बनाकर खुलेआम काबा में नमाज़ पढ़ने गए।

1. आग की पूजा से सफ़र की शुरुआत​सलमान फ़ारसी (रज़ि०) का असली नाम 'माबेह' था और वह पारस (आज के ईरान) के एक अमीर और रसूखदा...
14/07/2026

1. आग की पूजा से सफ़र की शुरुआत
​सलमान फ़ारसी (रज़ि०) का असली नाम 'माबेह' था और वह पारस (आज के ईरान) के एक अमीर और रसूखदार घराने में पैदा हुए थे। उनके पिता अपनी कौम के बड़े ज़मींदार थे और पारसी धर्म (आग की पूजा करने वाले) के कट्टपंथी थे। सलमान को आग की रखवाली का काम सौंपा गया था ताकि आग कभी बुझने न पाए। उनके पिता उनसे इतना प्यार करते थे कि उन्हें घर से बाहर भी नहीं जाने देते थे।
​2. एक नई रोशनी की तलाश
​एक दिन उनके पिता ने उन्हें अपनी ज़मीन की देखरेख के लिए बाहर भेजा। रास्ते में सलमान ने एक ईसाई चर्च (गिरजाघर) देखा, जहाँ लोग इबादत कर रहे थे। उन्हें वह तरीका अपने धर्म (आग की पूजा) से बेहतर लगा। जब उन्होंने घर लौटकर अपने पिता को यह बात बताई, तो उनके पिता नाराज़ हो गए और उन्हें घर में बेड़ियों से बांधकर कैद कर दिया।
​लेकिन सलमान के दिल में हक़ को जानने की तड़प जाग चुकी थी। वह किसी तरह कैद से भागे और सीरिया (शाम) जाने वाले एक ईसाई काफिले में शामिल हो गए।
​3. सीरिया से मदीना तक का कठिन सफ़र
​सीरिया पहुँचकर वह बड़े-बड़े ईसाई पादरियों और विद्वानों की सेवा में रहे ताकि सच्चा ज्ञान हासिल कर सकें। जब उनके आखिरी उस्ताद (पादरी) की मौत का वक्त आया, तो उन्होंने सलमान से कहा:
​"बेटा! अब ज़मीन पर कोई ऐसा सच्चा इंसान नहीं बचा जिसके पास मैं तुम्हें भेजूं। लेकिन अब वह वक्त करीब है जब अरब की सरज़मीन पर आखिरी नबी (पैगंबर) का आगमन होने वाला है, जो हज़रत इब्राहिम के दीन को दोबारा ज़िंदा करेंगे। वह एक ऐसी जगह हिजरत (प्रस्थान) करेंगे जहाँ खजूर के बहुत सारे बाग़ होंगे और दो पथरीले मैदानों के बीच का इलाका होगा।"
​सलमान उस आखिरी नबी की तलाश में अरब के एक काफिले के साथ चल दिए। लेकिन रास्ते में उस काफिले के लोगों ने उनके साथ धोखा किया और उन्हें एक यहूदी के हाथों गुलाम बनाकर बेच दिया। किस्मत से, वह यहूदी उन्हें लेकर यसरिब (मदीना) आ गया। मदीना को देखते ही सलमान पहचान गए कि यह वही जगह है जिसकी भविष्यवाणी उनके उस्ताद ने की थी।
​4. पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०) से मुलाकात और इम्तिहान
​जब अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना तशरीफ लाए, तो सलमान फ़ारसी (रज़ि०) उनके पास तीन निशानियों की जाँच करने पहुँचे, जो उन्हें ईसाई पादरी ने बताई थीं:
​पहली निशानी: वह नबी सदका (दान) का माल खुद नहीं खाएंगे। (सलमान ने सदका कहकर खजूर दीं, हुज़ूर ﷺ ने खुद नहीं खाईं, साथियों को दे दीं)।
​दूसरी निशानी: वह तोहफा (गिफ्ट) स्वीकार करेंगे। (सलमान ने तोहफा कहकर खजूर दीं, हुज़ूर ﷺ ने खुद भी खाईं और साथियों को भी दीं)।
​तीसरी निशानी: उनकी पीठ पर 'मोह्र-ए-नुबुव्वत' (नबूवत की मुहर) होगी।
​जब सलमान हुज़ूर (ﷺ) के पीछे खड़े होकर मुहर देखने की कोशिश कर रहे थे, तो हुज़ूर (ﷺ) समझ गए और उन्होंने अपनी चादर हटा दी। मुहर देखते ही सलमान की आँखों में आँसू आ गए, उन्होंने हुज़ूर (ﷺ) का चूमा और इस्लाम कबूल कर लिया। बाद में अल्लाह के रसूल और सहाबा ने मिलकर भारी रकम और खजूर के पेड़ लगाकर उन्हें गुलामी से आज़ाद कराया।
​5. जंग-ए-खंदक और सलमान का ऐतिहासिक मशविरा
​हिजरी 5 में जब मक्का के काफिरों ने मदीना पर भारी फौज के साथ हमला किया, तो मुसलमान सोच में पड़ गए कि इतनी बड़ी सेना का मुकाबला कैसे करें। तब सलमान फ़ारसी (रज़ि०) ने एक ऐसा मशविरा दिया जो अरब के इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। उन्होंने कहा:
​"हमारे पारस (ईरान) में जब दुश्मन का घेराव भारी होता था, तो हम अपने चारों तरफ एक गहरी खंदक (Tranch/खाई) खोद दिया करते थे।"
​अल्लाह के रसूल (ﷺ) को यह मशविरा बेहद पसंद आया। मदीना के चारों तरफ गहरी खाई खोदी गई, जिसे देखकर दुश्मन हैरान रह गए और मदीना महफूज़ रहा।
​6. "सलमान मेरे अहले-बैत (परिवार) से हैं"
​सलमान फ़ारसी (रज़ि०) का मकाम इस्लाम में इतना ऊंचा था कि एक बार मुहाजिर और अनसार (सहाबा के दो समूह) इस बात पर बहस कर रहे थे कि सलमान हमारे ग्रुप से हैं। तब अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फरमाया:
​"सलमान न मुहाजिर हैं न अनसार, सलमान तो मेरे अहले-बैत (मेरे घरवाले) में से हैं।"
​एक गुलाम से उठकर नबी के परिवार का हिस्सा बनने का यह सफर हर इंसान के लिए मिसाल है। वह मदीना और मदाएन के गवर्नर भी रहे, लेकिन हमेशा बेहद सादगी से रहे और खुद चटाई बुनकर अपना गुज़ारा करते थे।

14/07/2026

🌙✨ मोटू, पतलू और उनके साथियों के साथ एक खूबसूरत सफर की शुरुआत...

सफर की तैयारी, भाईचारा, अच्छे अख़लाक़ और मोहब्बत का पैगाम। ❤️

अगर आपको यह वीडियो पसंद आए तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर ज़रूर करें।

कमेंट में लिखिए: "माशाअल्लाह" 🤍

अगला पार्ट जल्द आने वाला है, इसलिए पेज को फॉलो करना न भूलें।













13/07/2026

13/07/2026

There is a special kind of peace found in the quiet moments of prayer. Walking toward the mosque at sunset reminds me of the beauty in simplicity. How do you find your inner peace at the end of a long day?

12/07/2026

Jamia Abubakar Siddique

12/07/2026

There's nothing like the excitement of a child's first day at a new madrasa! Seeing his eyes light up at the beautiful architecture is a memory we'll cherish forever. Teaching the importance of a warm greeting is step one. What’s one value you hope to pass down to your children?

11/07/2026

Hazrat Younis alaihissalam ka vakia

Address

Muzaffarnagar

Telephone

+919084874453

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Jamia Abubakar Siddique posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share