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पे कमीशन के फ़ायदे अतिरिक्त शर्तें लगाकर नहीं रोके जा सकते: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को यह टिप्पणी की कि स...
05/04/2026

पे कमीशन के फ़ायदे अतिरिक्त शर्तें लगाकर नहीं रोके जा सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को यह टिप्पणी की कि सेंट्रल पे कमीशन की सिफ़ारिशों की मनमानी व्याख्या करके किसी कर्मचारी को पे कमीशन के फ़ायदों से वंचित करने के लिए कोई अतिरिक्त शर्त नहीं लगाई जा सकती।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। यह मामला उन याचिकाकर्ताओं से जुड़ा था, जिन्होंने शुरू में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन में जूनियर इंजीनियरिंग कैडर में नौकरी शुरू की थी। बाद में कैडर के विलय के बाद उन्हें 'जूनियर इंजीनियर' के तौर पर नया पदनाम दिया गया।

लेवल 8 पर ₹4,800 के ग्रेड पे के साथ 4 साल की लगातार सेवा पूरी करने के बाद वे सातवें सेंट्रल पे कमीशन की सिफ़ारिशों के अनुसार, लेवल 9 (ग्रेड पे ₹5,400) में 'नॉन-फ़ंक्शनल अपग्रेडेशन' (NFU) के लिए पात्र हो गए।

हालांकि, सरकार ने यह कहते हुए उन्हें इस फ़ायदे से वंचित कर दिया कि NFU का लाभ केवल उन्हीं कर्मचारियों को मिलेगा जिनकी सीधी भर्ती (Direct Recruitment) लेवल 8 पर हुई थी, जबकि पे कमीशन ने न तो ऐसी कोई पाबंदी लगाई थी और न ही यह अनिवार्य किया था कि यह लाभ केवल सीधी भर्ती वालों तक ही सीमित रहेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलील स्वीकार करते हुए उन्हें लेवल 9 के लाभ देने का निर्देश दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

केंद्र सरकार की अपील ख़ारिज करते हुए जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि सरकार ने एक अतिरिक्त शर्त—कि केवल लेवल 8 पर सीधी भर्ती वाले ही पात्र होंगे—लगाकर याचिकाकर्ताओं को NFU के लाभ से अनुचित रूप से वंचित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सातवें पे कमीशन की सिफ़ारिशों में ऐसी किसी शर्त का कोई ज़िक्र नहीं है। इस तरह की शर्त लगाकर किसी को भी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"NFU का लाभ इस आधार पर रोकना कि याचिकाकर्ताओं ने ₹4,800 के ग्रेड पे के साथ सेवा शुरू नहीं की थी—और इस तरह सातवें पे कमीशन की सिफ़ारिशों के संबंधित पैराग्राफ़ में 'एंट्री-लेवल' (शुरुआती स्तर) की शर्त जोड़ना—NFU का लाभ देने के लिए अतिरिक्त शर्तें लगाने जैसा ही है।"

कोर्ट ने आगे कहा,

“सीधी-सादी रीडिंग से यह लगता है कि लेवल 8 में चार साल की सर्विस पूरी होने पर और सीनियरिटी-कम-उपयुक्तता के आधार पर एक जूनियर इंजीनियर NFU का हकदार है। 4,800/- रुपये के एंट्री-लेवल जूनियर ग्रेड के साथ ऑप्शन पर ज़ोर देने से रिट याचिकाकर्ताओं को सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा सुझाया गया फ़ायदा नहीं मिल पाएगा।”

कोर्ट ने आदेश दिया,

“यह मनाही सही वजहों से नहीं है। इसलिए हमें अपील के तहत दिए गए आदेश में दखल देने का कोई कारण नज़र नहीं आता। सिविल अपील खारिज की जाती है।”

तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।

Cause Title: UNION OF INDIA & OTHERS VERSUS SUNIL KUMAR RAI & OTHERS
साभार

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, CJI बोले- हम पीछे जा रहे? जानें कोर्ट में क्या-क्या हुआ? यूनिवर्सिटी ग...
29/01/2026

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, CJI बोले- हम पीछे जा रहे? जानें कोर्ट में क्या-क्या हुआ?

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन(UGC) के नए नियमों पर रोक लग गई है. सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) के नए नियमों पर बड़ा फैसला सुनाया और यूजीसी की नई गाइडलाइन्स पर तत्काल रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने UGC के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ को अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताते हुए स्थगित कर दिया. चीफ जस्टिस सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि इस नियम को स्पष्ट करने की जरूरत है. तब तक 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे. कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की.

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, CJI बोले- हम पीछे जा रहे
सीजेआई सूर्यकांत ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है.
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यूजीसी के नए नियमों पर बीते कुछ दिनों से बवाल जारी है. सवर्ण तबके के स्टूडेंट्स इन नियमों का विरोध कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले यानी बुधवार को ही यूजीसी नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने के लिए हामी भरी ती. याचिका में कहा गया है कि ये नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के खिलाफ भेदभाव पैदा कर सकते हैं. मामला राहुल देवन और अन्य बनाम केंद्र सरकार है. सीजेआई सूर्यकांत ने याचिका को सुनवाई के लिए आज लिस्ट किया था.

दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक लगा दी है. सीजेआई सूर्यकांत की बेंच कहा कि ये प्रावधान पहली नज़र में अस्पष्ट हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया और जवाब तलब किया. सीजेआई सूर्यकांत ने केंद्र सरकार को रेगुलेशंस को फिर से बनाने के लिए कहा है, तब तक इनका संचालन रोक दिया गया है. अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब देने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जाति आधारित भेदभाव क्या है, इस बारे में 2026 के UGC नियमों को अभी लागू न किया जाए. 2012 के नियम तब तक लागू रहेंगे, जब तक SC नए नियमों की संवैधानिकता की जांच नहीं कर लेता.

‘हम अब भी जातिगत भेदभाव से जूझ रहे’

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि एसजी, कृपया इस मामले की जांच के लिए कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करने के बारे में सोचें ताकि समाज बिना किसी भेदभाव के एक साथ विकास कर सके. हमें आज़ादी मिले 75 साल गुज़र चुके हैं और हम जातिगत भेदभाव से अभी भी जूझ रहे हैं. सीजेआई ने आगे कहा कि अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं और विश्विद्यालयों में छात्र पढ़ते हैं साथ रहते हैं.

यूजीसी नियमों के खिलाफ सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में किसने क्या कहा?

CJI: क्या रैगिंग की शिकायत इस नियम के तहत सुनी जाएगी?

वकील: नियमों में रैगिंग की परिभाषा ही नहीं, फ्रेशर पहले महीने में ही जेल जा सकता है.

वकील: यह नियम सिर्फ जाति के मुद्दों तक सीमित, रिग्रेसिव और सीनियर-जूनियर का बंटवारा करता है.

CJI: उत्तर या पूर्वोत्तर से आए छात्र के खिलाफ क्षेत्रीय/सांस्कृतिक तंज पर क्या यह नियम लागू होगा?

CJI: अगर SC समुदाय के भीतर ही एक समूह दूसरे का अपमान करे तो क्या कोई उपाय है?

CJI: casteless समाज की दिशा में जो हासिल किया, क्या हम पीछे जा रहे हैं?

CJI: रैगिंग सबसे बड़ी बुराई.

CJI: अलग-अलग हॉस्टल बनाने जैसे सुझाव न दें.

वकील: पूरी UGC रेगुलेशन रद्द होनी चाहिए, बेहतर ड्राफ्ट का सुझाव दे सकते हैं.

वकील विष्णु जैन: UGC नियमों की धारा 3(c) पूरी तरह एक्सक्लूसिव है.

विष्णु शंकर जैन: यह मान लिया गया है कि भेदभाव सिर्फ SC, ST, OBC के खिलाफ होता है.

याचिकाकर्ता का तर्क- यह परिभाषा जनरल कैटेगरी को बाहर करती है.

विष्णु शंकर जैन: धारा 3(c) का उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं

सीजेआई: कोर्ट सिर्फ संवैधानिकता और वैधता की शुरुआती जांच कर रही है

विष्णु शंकर जैन ने अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए धारा 3(c) पर रोक की मांग की.

CJI ने उदाहरण देकर पूछा क्या यह नियम क्षेत्रीय या सांस्कृतिक भेदभाव को कवर करेगा?

किसकी याचिका और क्या दलील?

यूजीसी इक्विटी नियमों के खिलाफ याचिकाएं मृतुंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल देवान ने दायर की थीं. उनका कहना था कि नए नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं. याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि जाति आधारित भेदभाव की कोई भी कानूनी परिभाषा समझदारी पर आधारित होनी चाहिए. एक अन्य वकील ने रैगिंग को लेकर चिंता जताई और कहा कि सामान्य वर्ग के छात्र को उसकी पहचान के आधार पर अलग तरीके से देखा जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि ये नियम सिर्फ जाति आधारित मुद्दों पर ध्यान देते हैं, जबकि कैंपस की असल स्थिति को नजरअंदाज करते हैं.

सीजेआई सूर्यकांत ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि कुछ समुदायों को दूसरों की तुलना में ज्यादा सुविधाएं मिल रही हैं. अब ज्यादातर राज्यों में यहां तक कि विधायिका ने भी माना है कि आरक्षित समितियों में भी लोग ‘हैव्स’ और ‘हैव नॉट्स’ बन गए हैं.’ सीजेआई ने कहा कि 75 साल (आजादी के) बाद, जो भी हमने जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने में हासिल किया है… क्या हम पीछे की ओर जा रहे हैं?. जस्टिस बागची ने कहा कि अनुच्छेद 15(4) राज्यों को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा कोई ढांचा नहीं होना चाहिए जिससे शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक विभाजन हो.

उन्होंने आगे कहा, ‘भारत की एकता शैक्षणिक संस्थानों में दिखनी चाहिए. उम्मीद है कि हम अमेरिका की तरह अलग-अलग स्कूलों में न पहुंच जाएं, जहां अश्वेत और श्वेत अलग-अलग स्कूलों में जाते थे.’

UGC नियमों के खिलाफ याचिका में क्या है?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2021’ को चुनौती दी गई है. यूजीसी के मुताबिक, ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए बने हैं, मगर याचिका में आरोप लगाया गया है कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा सिर्फ एससी/एसटी/ओबीसी तक सीमित है. इससे जनरल कैटेगरी के छात्र शिकायत निवारण तंत्र से वंचित रह सकते हैं. यूजीसी नियमों के खिलाफ कई याचिकाएं और एप्लीकेशन कोर्ट में दाखिल हो चुकी हैं.

यूजीसी के नए नियम क्या हैं

यूजीसी की ओर से देश भर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों व अन्य सभी उच्च शिक्षण संस्थाओं को रैगिंग के खिलाफ सख्त कदम उठाने का स्पष्ट निर्देश है. यूजीसी के मुताबिक, देशभर के इन सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को सख्ती से एंटी रैगिंग गाइडलाइंस लागू करना अनिवार्य है. तय नियमों के दायरे में यूजीसी ने रैगिंग रोकने के लिए कड़े नियम बनाए हैं. यूजीसी के अनुसार देशभर के जो भी उच्च शिक्षण संस्थान इन नियमों को लागू करने में असफल रहे उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. यूजीसी का कहना है कि किसी उच्च शिक्षा संस्थान में रैगिंग और आत्महत्या जैसा मामला सामने आना बेहद गंभीर है. ऐसे मामले में गहन जांच की जाएगी और संबंधित विश्वविद्यालय को इसके लिए समन किया जाएगा.

यूजीसी का नियमों पर क्या है यूजीसी का तर्क

यूजीसी का कहना है कि ये नियम यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए हैं. नियमों के मुताबिक हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक इक्विटी कमेटी बनानी होगी. ये कमेटी एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतें सुनेगी और तय समय में उनका निपटारा करेगी. कमेटी में एससी-एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का होना जरूरी है. कमेटी का काम कैंपस में बराबरी का माहौल बनाना और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए योजनाएं लागू करना है.

आखिर यूजीसी के नियमों का क्यों हो रहा है विरोध

यूजीसी के नए नियमों का विरोध सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी के छात्र कर रहे हैं. उनका आरोप है कि ये नियम सवर्णों के खिलाफ हैं. नियमों में सिर्फ SC, ST और OBC के खिलाफ भेदभाव की बात है. जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव का शिकार माना ही नहीं गया है जिसको लेकर विरोध हो रहा है. सवर्ण समाज के लोगों का कहना है कि इन नियमों का फायदा उठाकर कोई भी छात्र सवर्णों को फंसाने के लिए झूठी शिकायत कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ याचिका दायर हो चुकी है. याचिका में कहा गया है कि ये UGC एक्ट और उच्च शिक्षा में समान अवसर की भावना के खिलाफ है. विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे भेदभाव कम नहीं, बल्कि ज्यादा हो सकता है.
साभार

एक बार कोटे का लाभ ले लिया तो सामान्य सीट पर हक नहीं, आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसलासुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को क...
07/01/2026

एक बार कोटे का लाभ ले लिया तो सामान्य सीट पर हक नहीं, आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में आवेदक ने यदि एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया है तो वह सामान्य श्रेणी की सीटों पर नियुक्ति पाने का हकदार नहीं है। भले ही उसका कुल अंक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से अधिक हो। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के अनारक्षित कैडर में एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार की नियुक्ति की मांग पर विचार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उक्त आवेदक ने आरंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ उठाया था। पीठ ने फैसले में कहा कि एक बार जब किसी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ने आरक्षण का लाभ ले लिया है तो उसे सामान्य श्रेणी के रिक्तियों/सीटों पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को सिर्फ इसलिए सामान्य श्रेणी में नियुक्त करने का आदेश दिया था क्योंकि उसने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से ऊंची फाइनल रैंक हासिल की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ने आरंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ उठाया है, इसलिए, उन्हें सामान्य श्रेणी की सीटों पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

पीठ ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार परीक्षा के किसी भी स्टेज पर छूट का सहारा लेता है, तो वह परीक्षा नियम, 2013 के नियम 14(ii) के प्रोविजो के दायरे में नहीं आएगा और उस स्थिति में, कैडर आवंटन के लिए लागू पॉलिसी के मकसद से, वह जनरल स्टैंडर्ड पर चुने गए उम्मीदवारों की लिस्ट में नहीं आएगा, जो अपने होम स्टेट कैडर की जनरल इनसाइडर वैकेंसी पर इनसाइडर उम्मीदवार के तौर पर दावा कर रहा हो।

दरअसल, यूपीएससी द्वारा 2013 में भारतीय वन सेवा परीक्षा से मामले में विवाद शुरू हुआ। यह परीक्षाा दो चरणों में हुई थी, प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य और साक्षात्कार। प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य श्रेणी का कट-ऑफ 267 अंक था, जबकि अनुसूचित जाति (एससी) उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 233 था। इस परीक्षा में आरक्षित श्रेणी के आवेदक जी. किरण ने रियायती कट-ऑफ का फायदा उठाकर 247.18 अंक के साथ क्वालिफाई किया, जबकि सामान्य श्रेणी के आवेदक एंटनी एस. मारियप्पा ने जनरल कट-ऑफ पर 270.68 अंक के के साथ क्वालिफाई किया।

हालांकि, अंतिम मेरिट लिस्ट में आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार जी. किरण की रैंक 19 थी और एंटनी की रैंक 37 थी। लेकिन, कैडर आवंटन के दौरान, कर्नाटक में केवल एक जनरल इनसाइडर वैकेंसी थी और कोई एससी इनसाइडर वैकेंसी नहीं थी। केंद्र सरकार ने जनरल इनसाइडर पोस्ट एंटनी को दी और किरण को तमिलनाडु कैडर में भेजा।
साभार

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