09/07/2026
#जाति_जनगणना और #जनहितअभियान, स्वतंत्र भारत में जाति जनगणना की माँग काफी समय से उठती रही है। जब 2011 में 14वीं जनगणना शुरू हुई, तब उसमें जाति को शामिल करने की माँग फिर सुनाई दी। इससे पहले जाति जनगणना की माँग केवल कुछ राजनेताओं द्वारा उठाई जाती थी और अन्य राजनेताओं, प्रोफेसरों, नौकरशाहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और वकीलों—संक्षेप में पूरे बौद्धिक वर्ग—द्वारा इसका विरोध किया जाता था। चूँकि यह माँग मुख्यतः पिछड़े वर्गों की ओर से आती थी, इसलिए जल्द ही ठंडी पड़ जाती थी। लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग था क्योंकि मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने से ओबीसी समुदाय के बीच एक बौद्धिक वर्ग उभरकर सामने आया था। दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों के बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर इसने एक प्रभावशाली दबाव समूह का निर्माण किया। यदि कोई जाति जनगणना पर संसद में हुई बहस को पढ़े, तो भाषणों की गुणवत्ता में इस बौद्धिक वर्ग का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
जाति जनगणना प्रतिलिपि
दिल्ली स्थित एक संगठन ‘जनहित अभियान’ ने जाति जनगणना के पक्ष में राजनेताओं, प्रोफेसरों और सामाजिक चिंतकों को एक साझा मंच पर लाकर इस माँग को एक आंदोलन का रूप दिया। जनहित अभियान की स्थापना 2007 में राज नारायण यादव ने डॉ. चंद्रशेखर यादव, राजेंद्र रवि, डॉ. अनूप सराया और संजय कुमार के साथ मिलकर की थी। संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य सरकारी नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना था। संगठन ने बिहार में ‘गेरुआ आंदोलन’ शुरू किया, जिसका उद्देश्य टूटे हुए पुलों का पुनर्निर्माण कराना था। इसी आंदोलन में काम करते हुए संगठन को यह एहसास हुआ कि किसी भी नीति या कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के लिए आँकड़ों का कितना महत्व है। आँकड़े एकत्र करने के लिए संगठन के भीतर ‘जनहित रिसर्च ग्रुप’ नामक एक इकाई बनाई गई। इस समूह के सदस्यों ने सूचना के अधिकार (RTI) को एक प्रभावशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने भारत सरकार से पूछा कि क्या उसके पास देश के किसी भी गाँव के बारे में—जिसमें वहाँ के सभी निवासियों की जाति, धर्म, आयु, शिक्षा, भूमि स्वामित्व और आय जैसी जानकारी शामिल हो—पूर्ण आँकड़े उपलब्ध हैं। उत्तर था—नहीं। इसके बाद समूह ने योजना आयोग से पूछा कि यदि ऐसे आँकड़े उपलब्ध हों तो क्या इससे बेहतर योजनाएँ बनाने में मदद मिलेगी। उत्तर था—हाँ। लगभग उसी समय सरकार ने 2011 की जनगणना की अधिसूचना जारी की, जिसने जनहित अभियान को जनगणना प्रक्रिया में जाति संबंधी जानकारी शामिल करने के लिए अभियान शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
जनहित अभियान ने 2009 में दिल्ली में जाति जनगणना पर पहला सम्मेलन आयोजित किया। इसमें समाजवादी चिंतक सुरेंद्र मोहन, लोहियावादी चिंतक मस्तराम कपूर, समाजशास्त्री प्रो. नंदूराम और प्रो. इम्तियाज अहमद तथा पत्रकार दिलीप मंडल सहित अनेक लोगों ने भाग लिया। इन बुद्धिजीवियों को साथ लाने के बाद संगठन ने विभिन्न दलों के सांसदों को भी जोड़ने का प्रयास किया। इस अभियान की विशेषता यह थी कि आयोजकों ने कभी किसी से आर्थिक सहायता नहीं माँगी और स्वयंसेवकों से ही अपने खर्च स्वयं वहन करने को कहा। धीरे-धीरे कारवाँ बढ़ता गया और अनेक दलित तथा ओबीसी सांसदों ने अपने-अपने राज्यों में जाति जनगणना के समर्थन में कार्यक्रम और बैठकों के आयोजन में जनहित अभियान की मदद की। अंततः यह आंदोलन अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण कर गया। राज नारायण बताते हैं कि शरद यादव, मायावती, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, कांग्रेस सांसद के. हनुमंता राव, छगन भुजबल, टीडीपी प्रमुख के. चंद्रबाबू नायडू, स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे तथा अन्य नेताओं ने न केवल सार्वजनिक रूप से इस आंदोलन का समर्थन किया बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी जनहित अभियान के कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन किया। संगठन ने 2010, 2011, 2012 और 2013 में दिल्ली में बड़े सम्मेलन आयोजित किए। इसी वर्ष जुलाई में भी दिल्ली में एक सम्मेलन आयोजित किया गया। संगठन ने जाति जनगणना की आवश्यकता के बारे में आम जनता में जागरूकता फैलाने के लिए अनेक पुस्तिकाएँ भी प्रकाशित कीं। संगठन का मानना है कि जाति जनगणना जनहित में है और इसके बिना वंचित वर्गों के अधिकार सुनिश्चित करना लगभग असंभव है।
जनहित अभियान के व्यापक अभियान के बावजूद यूपीए सरकार ने एक चाल चली और जनगणना में जाति को शामिल करने के बजाय जाति संबंधी विवरण एकत्र करने के लिए अलग से सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया। लेकिन सरकार के इस नकारात्मक रवैये से जनहित अभियान निराश नहीं हुआ है। वह सर्वेक्षण के आँकड़े जारी करवाने तथा अगली जनगणना के प्रपत्रों में जाति का कॉलम शामिल करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का अपना अभियान जारी रखेगा।
The HINDU
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