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राज्य में प्रसव पूर्व जांच की बढ़ती पहुंच से सुरक्षित मातृत्व और नवजात जीवन रक्षा को मिली नई मजबूती-राज्य में पीएमएसएमए ...
20/06/2026

राज्य में प्रसव पूर्व जांच की बढ़ती पहुंच से सुरक्षित मातृत्व और नवजात जीवन रक्षा को मिली नई मजबूती

-राज्य में पीएमएसएमए के तहत 10 सालों में 77 लाख से अधिक गर्भवतियों की हो चुकी है जांच
-तीसरी और चौथी तिमाही में प्रसव पूर्व जांच से टल सकता है स्टिलबर्थ
पटना।

पटना। जिले के रेमा पंचायत की 23 वर्षीय टोनी ने अपनी गर्भावस्था चार महीने कोई स्वास्थ्य जांच नहीं कराई थी। आशा ममता के लगातार संपर्क के बाद उनका पंजीकरण हुआ, नियमित एएनसी जांच शुरू हुई और जांच के दौरान एनीमिया का पता चला। समय पर आयरन उपचार, पोषण परामर्श और संस्थागत प्रसव की तैयारी की गई। नौ महीने पूरे होने पर उसका बच्चा सुरक्षित और सामान्य वजन में जन्म लिया। गर्भवती माताओं की ऐसी न जाने कितनी कहानियां बताती हैं कि गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली गुणवत्तापूर्ण देखभाल केवल मां को नहीं, बल्कि नवजात के जीवन को भी बचाती है।
आईजीआईएमएस में शिशु रोग विभाग में प्रोफेसर डॉ रिजवान अहमर कहते हैं कि बच्चे के स्वस्थ जीवन की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, बल्कि मां के गर्भ से ही हो जाती है। बिहार के संदर्भ में द लैंसेट के शोध जर्नल्स के निष्कर्ष भी यही साबित करते हैं कि जो माताएं अपनी 4 एएनसी जांचें पूरी करती हैं, वे वास्तव में अपने बच्चे को कुपोषण और समय से पहले जन्म जैसी गंभीर बीमारियों से बचा रही होती हैं। गर्भावस्था के आखिरी महीनों में की गई तीसरी और चौथी जांच से हमें गर्भ के अंदर शिशु के वजन और उसकी धड़कन की सटीक जानकारी मिलती है, जिससे 'स्टिलबर्थ' (बच्चे का पेट में ही दम तोड़ देना) के खतरे को टाला जा सकता है। इसके अलावा, जिन बच्चों की माताओं को एएनसी के दौरान सही पोषण और टिटनेस के टीके मिलते हैं, वे जन्म के बाद संक्रमणों से लड़ने में अधिक सक्षम होते हैं। यदि हम बिहार में शिशु मृत्यु दर को पूरी तरह रोकना चाहते हैं, तो शत-प्रतिशत महिलाओं तक कम से कम 4 एएनसी की पहुंच सुनिश्चित करनी ही होगी। वहीं अगर महिला उच्च जोखिम गर्भवतियों मे शामिल है तो चिकित्सक के परामर्श के अनुसार समय पर उसकी प्रसव पूर्व जांच होनी चाहिए।

स्टिलबर्थ को रोकने में तीसरी और चौथी एएनसी जांच महत्वपूर्ण
हेल्थ मैनेजमेंट इनफार्मेशन सिस्टम के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2025 — 26 में कुल 31 लाख 91 हजार 517 ऐसे गर्भवतियों की जांच हुई जिन्होंने चार या उससे अधिक प्रसव पूर्व जांच कराए थे। वहीं विभागीय आंकड़ों के अनुसार जून 2016 से अप्रैल 2026 तक 77 लाख 5 हजार 820 गर्भवती महिलाएं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत प्रसव पूर्व जांच का लाभ ले चुकी हैं। वर्तमान में राज्य में 1277 स्वास्थ्य संस्थानों में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 6 के मुताबिक चार या उससे अधिक बार प्रसव पूर्व जांच कराने का प्रतिशत 37.6 हो गया है। यह आंकड़े नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 के 25.2 से अच्छे स्तर पर है।
बिहार ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित जर्नल आफ ग्लोबल हेल्थ के शोध के मुताबिक गर्भावस्था के तीसरी और चौथी तिमाही में की गयी एएनसी जांच स्टिलबर्थ के मामलों को रोकने में सबसे ज्यादा प्रभावी पाई गई हैं। इस दौरान रक्तचाप की निगरानी और शिशु की धड़कन की जांच से प्री—एक्लिप्सिया जैसी घातक स्थितियों की पहचान समय रहते हो जाती है। जिससे मां और बच्चे दोनों की जान बचाई जा सकती है।

राष्ट्रीय औसत से बेहतर है राज्य का नवजात मृत्यु दर
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम 2023 के आंकड़े बताते हैं कि नवजात एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में बिहार ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। राज्य की नवजात मृत्यु दर 18 प्रति 1,000 जीवित जन्म रही, जो राष्ट्रीय औसत 20 प्रति 1,000 जीवित जन्म से बेहतर है। यह उपलब्धि ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब बिहार देश में सर्वाधिक जन्म दर वाले राज्यों में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार पूर्ण प्रसवपूर्व जांच , संस्थागत प्रसव में वृद्धि, विशेष नवजात देखभाल इकाइयों , नवजात स्थिरीकरण इकाइयों , गृह आधारित नवजात देखभाल तथा आशा कार्यकर्ताओं की सक्रिय निगरानी ने नवजात मृत्यु में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह संकेत है कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में किए गए निवेश का सकारात्मक प्रभाव अब नवजातों के जीवित रहने की संभावना में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

बदलाव की असली ताकत, समुदाय और स्वास्थ्यकर्मी
बिहार में इस बदलाव की सबसे मजबूत कड़ी गांवों में काम करने वाली आशा कार्यकर्ता हैं। पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के सगुनी गांव की आशा कार्यकर्ता ममता कहती हैं कि वे गर्भवती महिलाओं की पहचान करती हैं, उनका पंजीकरण कराती हैं, जांच के लिए प्रेरित करती हैं और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने में मदद करती हैं।
राज्य के कई जिलों में अब उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की अलग से पहचान की जा रही है। वित्तीय वर्ष 2025—26 में राज्य में 1 लाख 5 हजार उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों की पहचान की गयी वहीं 83 हजार 416 उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों को सही रेफरल व प्रबंधन मिला। मातृ स्वास्थ्य दिवस, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और रेफरल सेवाओं ने भी इस प्रक्रिया को मजबूत बनाया है। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है परिवारों का जागरूक होना। कई बार महिलाएं गर्भावस्था को बीमारी नहीं मानकर जांच की आवश्यकता को नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि नियमित जांच ही जटिलताओं को रोकने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

10/02/2026

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