30/05/2026
#आनंद_मोहन : मकसद किसी नई राजनीतिक पार्टी का गठन करना नहीं, बल्कि समाज जागरण और जनसंवाद के अपने अभियान को आगे बढ़ाना है।
पूर्व सांसद आनंद मोहन एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं। जदयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर दिए गए उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। हालांकि आनंद मोहन ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका मकसद किसी नई राजनीतिक पार्टी का गठन करना नहीं, बल्कि समाज जागरण और जनसंवाद के अपने अभियान को आगे बढ़ाना है।
दरअसल, आनंद मोहन ने सवाल उठाया था कि आखिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राजनीतिक और संगठनात्मक निर्णयों के केंद्र से दूर करने की कोशिश क्यों की गई। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ लोगों ने पार्टी और सत्ता व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया। लेकिन उनके बयान को इस तरह प्रचारित किया गया मानो वे स्वयं नीतीश कुमार या उनके पुत्र इंजीनियर निशांत कुमार के खिलाफ खड़े हो गए हों।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आनंद मोहन का पूरा राजनीतिक व्यवहार इस धारणा का समर्थन नहीं करता। उन्होंने कभी भी सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार या उनके परिवार के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की। बल्कि उनका सवाल सत्ता संचालन और राजनीतिक प्रबंधन को लेकर था।
आनंद मोहन की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी पत्नी लवली आनंद सांसद हैं, पुत्र चेतन आनंद विधायक हैं और स्वयं वे सांसद तथा विधायक रह चुके हैं। लोकसभा चुनाव में लवली आनंद की जीत और नवीनगर से चेतन आनंद की सफलता को राजनीतिक पर्यवेक्षक आनंद मोहन की संगठन क्षमता और जनाधार से जोड़कर देखते हैं।
गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड में सजा पाने के बाद वर्षों तक जेल में रहने वाले आनंद मोहन आज भी बिहार की राजनीति में प्रभावशाली उपस्थिति रखते हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने अपनी सजा पूरी की, जेल में रहते हुए कई पुस्तकें लिखीं और सामाजिक तथा वैचारिक स्तर पर लगातार सक्रिय बने रहे।
बिहार के विभिन्न जिलों में समाज जागरण यात्रा की तैयारी कर रहे आनंद मोहन ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका लक्ष्य राजनीतिक दल बनाना नहीं, बल्कि समाज को संगठित और जागरूक करना है। समर्थकों का कहना है कि किसी समाज या वर्ग के बीच संवाद और जागरण अभियान चलाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसे संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
बिहार की राजनीति में आनंद मोहन समर्थकों के लिए संघर्ष, साहस और जनसरोकारों की आवाज हैं। यही कारण है कि वर्षों बाद भी उनका हर बयान राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। फिलहाल उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—न कोई नई पार्टी बनेगी और न ही समाज जागरण का अभियान थमेगा।