14/10/2026
नागौर जिला परिषद चुनाव में मेड़ता की दो सीटों पर सियासी महासंग्राम
वार्ड 12 में विधायक पुत्र को टिकट नहीं, वार्ड 15 में पूर्व विधायक पर भाजपा का दांव; पांचाराम इंदावड़ और सुखराम मेघवाल की जीत से खुल सकती है जिला प्रमुख की राह
जाट मतदाताओं का रुख, एससी-एसटी वोटों का समीकरण और भाजपा की अंदरूनी एकजुटता—दोनों सीटों पर कई सियासी इम्तिहान
🖋 तेजाराम लाडणवा
नागौर जिला परिषद की 37 सीटों पर भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के प्रत्याशी मैदान में उतरने के साथ मेड़ता विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर 12 और 15 सियासी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इन सीटों पर मुकाबला सिर्फ प्रत्याशियों की जीत-हार का नहीं, बल्कि नेताओं के प्रभाव, सामाजिक समीकरणों, पार्टी के भीतर संभावित नाराजगी और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं का भी है। वार्ड 12 में भाजपा ने विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल के पुत्र को टिकट नहीं देकर उद्योगपति नाथूराम बावरी पर भरोसा जताया, जबकि वार्ड 15 में पूर्व विधायक सुखराम मेघवाल को उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर, कांग्रेस से अलग होकर आरएलपी में पहुंचे पांचाराम इंदावड़ की उम्मीदवारी ने वार्ड 12 के मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
वार्ड 12 : विधायक पुत्र को टिकट नहीं, अब नाथूराम बावरी को जीत दिलाने की चुनौती
पांचाराम इंदावड़ के सामने पुरानी राजनीतिक छवि बदलने और जाट मतदाताओं का भरोसा जीतने का अवसर
वार्ड 12 में भाजपा से उद्योगपति नाथूराम बावरी, कांग्रेस से रामनिवास मेघवाल और आरएलपी से पांचाराम इंदावड़ मैदान में हैं। इस सीट पर भाजपा विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल के पुत्र को टिकट मिलने की चर्चा थी, लेकिन पार्टी ने उनकी दावेदारी स्वीकार नहीं की और नाथूराम बावरी को उम्मीदवार बनाया। अब राजनीतिक हलकों में सवाल है कि विधायक अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में कितने मतदाताओं को जोड़ पाएंगे और टिकट नहीं मिलने से यदि समर्थकों में कोई नाराजगी है, तो उसे किस तरह दूर करेंगे।
पांचाराम इंदावड़ कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे। टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देकर आरएलपी का दामन थाम लिया। वे सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं, सामाजिक संगठनों में प्रदेश स्तर पर पदाधिकारी रहे हैं और समाज के बड़े अधिवेशनों के आयोजन में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। एससी-एसटी मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ को भी उनकी उम्मीदवारी का महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है। कांग्रेस ने इस सीट पर रामनिवास मेघवाल को प्रत्याशी बनाया है। इस तरह मेघवाल समाज के दो प्रत्याशी आमने-सामने हैं, जबकि भाजपा ने नाथूराम बावरी पर दांव लगाया है।
पढ़ा-लिखा नेतृत्व या पारंपरिक राजनीतिक पकड़—पांचाराम के सामने असली परीक्षा
पांचाराम इंदावड़ की उम्मीदवारी का एक पहलू जाट समाज के मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता भी है। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह धारणा सामने आती रही है कि कुछ मतदाता ऐसे प्रतिनिधि को प्राथमिकता देते हैं, जिस पर उनका सीधा प्रभाव बना रहे, जबकि पढ़े-लिखे और अपने विवेक से निर्णय लेने वाले नेतृत्व को लेकर कभी-कभी संदेह भी व्यक्त किया जाता है। हालांकि, इसे पूरे जाट समाज की सोच मानना उचित नहीं होगा। समाज के भीतर मतदाताओं की पसंद अलग-अलग हो सकती है और अंतिम निर्णय स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशी के व्यवहार, व्यक्तिगत संबंधों तथा राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
पिछले चुनाव में पांचाराम को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के पीछे उनकी पढ़ाई-लिखाई या स्वतंत्र निर्णय लेने की छवि को कारण मानने की चर्चा हो सकती है, लेकिन इसकी पुष्टि के बिना इसे हार का वास्तविक कारण नहीं कहा जा सकता। इस बार उनके सामने अपनी पुरानी राजनीतिक छवि से आगे बढ़कर मतदाताओं का विश्वास जीतने की चुनौती है।
आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल का समर्थन और पार्टी से जुड़े युवाओं का संभावित रुझान पांचाराम के लिए अवसर बन सकता है। यदि वे युवाओं के साथ-साथ जाट समाज के विभिन्न वर्गों और अन्य मतदाताओं के बीच भी भरोसा कायम कर पाते हैं, तो उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ सकती है। इससे उनके आगे के राजनीतिक सफर को भी मजबूती मिलने की संभावना बनेगी। लेकिन क्या इस बार मतदाता उनकी शैक्षणिक योग्यता और सामाजिक सक्रियता को ताकत के रूप में देखेंगे, या पुरानी राजनीतिक धारणाएं प्रभावी रहेंगी—यह चुनाव परिणाम ही बताएगा।
एससी-एसटी मतों पर नजर, विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल के सामने भी सवाल
वार्ड 12 में भाजपा प्रत्याशी नाथूराम बावरी की जीत के लिए विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सवाल यह है कि क्या विधायक एससी-एसटी सहित विभिन्न वर्गों के मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में जोड़ पाएंगे? वहीं, कांग्रेस के रामनिवास मेघवाल और आरएलपी के पांचाराम इंदावड़ की मौजूदगी से मेघवाल समाज के मतों का रुख भी चुनावी चर्चा का विषय है।
क्या विधायक पुत्र को टिकट नहीं मिलने की संभावित नाराजगी को पीछे छोड़कर भाजपा प्रत्याशी के लिए पूरी ताकत से काम करेंगे? क्या पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता एकजुट होकर मैदान में उतरेंगे? और क्या आरएलपी का समर्थन पांचाराम इंदावड़ को मजबूत चुनौती देने में मदद करेगा? इन सवालों का जवाब प्रचार, जनसंपर्क और मतदान के दौरान सामने आएगा।
यदि पांचाराम जीतते हैं, तो आरएलपी में उनका राजनीतिक कद बढ़ सकता है और जिला प्रमुख पद की संभावित दौड़ में उनका नाम भी चर्चा में आ सकता है। हालांकि, इस पद का फैसला जिला परिषद में दलों की संख्या, समर्थन और आगे बनने वाले राजनीतिक समीकरणों से तय होगा।
वार्ड 15 : पूर्व विधायक सुखराम मेघवाल पर भाजपा का भरोसा
कांग्रेस के पुरखाराम भंवरिया के सामने सीट बचाने की चुनौती, रामेश्वर छाबा की भूमिका पर भी निगाहें
वार्ड 15 में भाजपा ने मेड़ता के पूर्व विधायक सुखराम मेघवाल को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने वर्तमान जिला परिषद सदस्य एडवोकेट पुरखाराम भंवरिया को दोबारा टिकट देकर भरोसा जताया है, जबकि आरएलपी से विनय कुमार मैदान में हैं। पिछले चुनाव में पुरखाराम भंवरिया ने जीत दर्ज की थी। अब उनके सामने अपनी सीट बचाने की चुनौती है, जबकि सुखराम मेघवाल के लिए जीत हासिल करना राजनीतिक वापसी का महत्वपूर्ण अवसर होगा।
इस सीट पर भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश सचिव रामेश्वर छाबा को टिकट नहीं मिलने का मुद्दा भी चर्चा में है। छापा को विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के करीबी नेताओं में गिना जाता है। वे पहले भी जिला परिषद चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन उस समय कांग्रेस के पुरखाराम भंवरिया से हार गए थे। इस बार भाजपा ने छाबा के बजाय पूर्व विधायक सुखराम मेघवाल को उम्मीदवार बनाया है।
अब सवाल है कि युवा नेता रामेश्वर छाबा टिकट नहीं मिलने की संभावित नाराजगी को पीछे छोड़कर पार्टी प्रत्याशी के लिए पूरी ताकत से जुटेंगे या उनकी भूमिका सीमित रहेगी। संगठन में उनकी सक्रियता और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को देखते हुए उनकी भूमिका पर निगाहें बनी रहेंगी। हालांकि, उनकी वास्तविक रणनीति को लेकर बिना पुष्टि कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
सुखराम मेघवाल की जीत से जिला प्रमुख की दौड़ में नाम आने की चर्चा
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी नेताओं में गिने जाने वाले सुखराम मेघवाल की जीत से जिला प्रमुख पद की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं तेज हो सकती हैं। लेकिन जिला प्रमुख पद की दावेदारी केवल एक सीट जीतने से तय नहीं होगी। जिला परिषद में किस दल को कितनी सीटें मिलती हैं, किसे कितना समर्थन मिलता है और चुनाव के बाद क्या राजनीतिक समीकरण बनते हैं—यही अंतिम तस्वीर तय करेंगे।
यदि पुरखाराम भंवरिया दोबारा जीतते हैं, तो कांग्रेस अपनी सीट बचाने में सफल रहेगी और भाजपा के लिए यह परिणाम राजनीतिक चुनौती बन सकता है। वहीं, सुखराम मेघवाल की जीत भाजपा के लिए पूर्व विधायक की वापसी के साथ जिला स्तर पर नए समीकरणों की संभावना भी पैदा कर सकती है।
दो सीटें, कई सवाल : मेड़ता की राजनीति किस करवट बैठेगी?
टिकट की नाराजगी, सामाजिक समर्थन और नेताओं की साख—मतदाताओं के फैसले पर टिकी निगाहें
वार्ड 12 और 15 के चुनाव में तीनों दलों के लिए अलग-अलग चुनौतियां हैं। वार्ड 12 में भाजपा को विधायक के प्रभाव और संगठन की एकजुटता साबित करनी होगी। पांचाराम इंदावड़ को आरएलपी के समर्थन, युवा मतदाताओं के संभावित रुझान और अपनी सामाजिक सक्रियता को वोटों में बदलने की चुनौती होगी। कांग्रेस के रामनिवास मेघवाल भी अपने समाज और क्षेत्र के मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे।
वार्ड 15 में भाजपा के पूर्व विधायक सुखराम मेघवाल, कांग्रेस के मौजूदा जिला परिषद सदस्य पुरखाराम भंवरिया और आरएलपी के विनय कुमार के बीच मुकाबला है। यहां रामेश्वर छाबा की भूमिका और पार्टी कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर भी राजनीतिक निगाहें रहेंगी।
क्या विधायक लक्ष्मण राम मेघवाल भाजपा प्रत्याशी को जीत दिलाकर अपने राजनीतिक प्रभाव का संदेश देंगे? क्या पांचाराम इंदावड़ पुरानी धारणाओं को पीछे छोड़कर व्यापक समर्थन जुटा पाएंगे? क्या रामेश्वर छापा पार्टी प्रत्याशी के साथ पूरी ताकत से खड़े होंगे? और क्या सुखराम मेघवाल की जीत जिला प्रमुख पद की संभावनाओं को हवा देगी?
इन सवालों के जवाब फिलहाल चुनावी चर्चाओं में तलाशे जा रहे हैं। असली फैसला मतदाता करेंगे। इतना तय है कि मेड़ता की ये दोनों सीटें नागौर जिला परिषद चुनाव के महत्वपूर्ण मुकाबलों में शामिल हो चुकी हैं और इनके परिणाम जिला परिषद की आगे की राजनीति को समझने में अहम संकेत दे सकते हैं।