18/03/2026
■ एक बार……उनकी चुप्पी को सुन लीजिए……
■ शायद……आप एक बच्चे की जिंदगी बचा सकेंगे……!
■ यह पोस्ट नहीं… मेरी जिम्मेदारी है...
■ परिवार से क्यों दूर हो चला जाता था विशाल ■
16 मार्च 2026 को नागपुर के अखबारों में एक दर्दनाक खबर प्रकाशित हुई। 17 साल के 12 वीं कक्षा में पढ़ रहे एक छात्र विशाल (परिवर्तित नाम) ने एक शॉपिंग मॉल के चौथे माले से छलांग लगा दी। 11 मार्च को विशाल की परीक्षा खत्म हो चुकी थी, बावजूद वह हर रोज घर से यह कहकर निकलता था कि-अभी पेपर चल रहे हैं। विशाल झूठ बोलकर घर-परिवार से दूर क्यों चला जाता था? यह बड़ा सवाल है। 14 मार्च को विशाल ने घर में बताया कि वह खेलने जा रहा है, लेकिन उसने तो अपने जीवन का ही अंत कर दिया। प्रकाशित खबरों के अनुसार विशाल ने आत्महत्या की है। यह मात्र एक मामला नहीं है। नागपुर समेत पूरे देशभर में छात्र आत्महत्या अब गंभीर मुद्दा बन चुका है। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस् ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट भी सोचनेपर मजबूर करती है।
■ माफ करना मां, मैंने बहुत कोशिश की थी ■
हां, हर आत्महत्या के पीछे एक चुप्पी होती है, जो कभी सुनी ही नहीं जाती। घर में जब वो पैदा हुआ था तो, तो सबने कहा था- बधाई हो। उस दिन से ही उसके लिए सपनों का एक आसमान बुन दिया गया। जहां, मां उसे सीने से लगाकर सोती थी, वहीं पिता रातें जागकर उसके भविष्य की योजनाएं तैयार करते थे। वो बड़ा हुआ। सब कुछ सीखता चला जा रहा था। लेकिन किसी ने यह नहीं सीखाया कि, जब कमजोर पड़ जाओं तो संभलना कैसे हैं? अब वह बदलने लगा था। उसकी हंसी-ठिठोली खत्म हो चली थी। कमरे में खोया-खोया रहता था। मां पूछती-सब ठीक है ना? वह जवाब देता- हां। जबकि वह भीतर ही भीतर टूट रहा था। फिर एक दिन उसने एक चिठ्ठी लिखी। मां माफ करना, मैंने कोशिश की थी, बहुत कोशिश की थी। लेकिन मैं आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। पापा, आप कहते थे ना-मैं बहुत आगे जाउंगा। मैं कहीं खो गया पापा। अब मैं थक गया हूं। इस दुनिया से नहीं बल्कि खुद से।
■ मन-मस्तिष्क के बीच चलती जंग ■
वो आखिरी रात, वह अपने कमरे में अकेला था। बाहर सब कुछ सामान्य था। लेकिन कमरे के भीतर मन-मस्तिष्क के बीच एक जंग चल रही थी। वह चाहता था कि शायद कोई एक बार आकर दरवाजा खटखटाए। कोई पूछे-क्या हुआ? लेकिन, कोई नहीं आया। और सब खत्म। एक पल में लिया गया एक फैसला, जिसने उसके जीवन को खामोश कर दिया। वही मां अब तस्वीर से लिपटकर रोती है। वही पापा अब चुपचाप आंसू छुपाते हैं। एक छोटा सा सच जो हम नहीं देखना चाहते। हम पूछते हैं- कितने नंबर आए? लेकिन कभी नहीं पूछते-तुम ठीक हो? हम उन्हें कोचिंग भेजते हैं, लेकिन उनके मन के दर्द का एहसास नहीं कर पाते। हम उन्हें जीतना सिखाते हैं, लेकिन हार के बाद कैसे जीना चाहिए, यह नहीं सिखाते। अगर उस दिन किसी ने उससे चंद मिनट बात कर ली होती, अगर किसी ने उसे गले लगाकर कहा होता कि सब ठीक हो जाएगा, अगर उसे ये महसूस कराया जाता कि वो अकेला नहीं है, तो शायद आज वो जिंदा होता।
■ अपेक्षा और दबाव में खत्म होती खुशियां ■
घर में जब एक बच्चे का जन्म होता है, तो सिर्फ एक नई जिंदगी नहीं आती, साथ में आते हैं हजारों सपने, उम्मीदें, दुआएं और एक पूरा संसार। मां उसकी पहली मुस्कान पर अपना सबकुछ भूल जाती है। पिता उसकी छोटी-सी उंगली पकड़कर भविष्य के बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगता है। वो बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता है। स्कूल की पहली यूनिफॉर्म पहनता है। कॉपी के पहले पन्ने पर अपना नाम लिखता है। और हर बार मां-बाप के चेहरे पर एक नई चमक छोड़ जाता है। लेकिन कब वो मासूम बच्चा ‘उम्मीदों का बोझ’ बन जाता है, कब ‘खुश रहने वाला बच्चा’ ‘चुप रहने वाला ‘किशोर’ बन जाता है, कब उसकी हंसी ‘अपेक्षा व दबाव’ के नीचे दब जाती है, किसी को पता ही नहीं चलता।
■ कमरे में होती रौशनी और मन में अंधेरा ■
बचपन छिनने के बाद किशोरावस्था आती है, तो उस दौर में मन बहुत नाजुक होता है। जहां हर छोटी बात दिल को चीर देती है। पढ़ाई में नंबर कम आए तो डर, दोस्तों से तुलना करनेपर हीन भावना, माता-पिता की उम्मीदें बढ़े तो दबाव, सोशल मीडिया के जाल से नकली परफेक्शन का बोझ, गेमिंग, साइबर जाल या गलत संगत तो भटकाव आदि किशोरावस्था में ही होता है। और इन सबके बीच वो बच्चा अकेला हो जाता है। उसके कमरे में रौशनी होती है, लेकिन उसके मन में अंधेरा भर जाता है। कोई नहीं जानता उसने कितनी रातें बिना सोए चिंता करते-करते बिताई होंगी। कितनी बार रोते-रोते खुद को संभाला होगा। कितनी बार ‘मैं ठीक हूं’ कहकर अपने दर्द को छुपाया होगा। शायद उसने उस दिन आखिरी बार अपने मां-बाप को देखा होगा और सोचा होगा- काश कोई मुझे एक बार समझ पाता। लेकिन उसे नहीं समझा गया । और फिर एक पल में सब खत्म । उसके जाने के बाद, जिस घर में कभी उसकी हंसी गूंजती थी, वहां सन्नाटा चीखता है। मां अब भी दरवाजे की ओर देखती है। जैसे वो अभी आएगा और कहेगा- मां मैं आ गया। पिता अब भी उसकी पुरानी किताबें खोलते हैं। जैसे उसमें कहीं उसका सपना मिल जाएगा। उसका कमरा अब भी वैसा ही है, लेकिन उसमें रहने वाला अब कभी नहीं लौटेगा।
■ अधूरा जीवन छोड़ गए बच्चों की चीखें ■
कुछ घटनाएं, जो दिल को झकझोर कर रख देती हैं। एक छात्र सिर्फ इसलिए चला गया क्योंकि वो टॉपर नहीं बन पाया । एक छात्र इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा था। घरवालों के सपनों के बोझ तले इतना दब गया कि उसने अपनी जिंदगी खत्म कर दी। एक लड़की सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और बॉडी शेमिंग से इतनी टूट गई कि उसने दुनिया छोड़ दी। एक किशोर ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसकर कर्ज और मानसिक दबाव में आ गया। एक दिन उसने खुद को खत्म कर लिया। ये सिर्फ खबरें नहीं हैं। ये परिवारों के टूटे हुए सपने हैं और अधूरा जीवन छोड़ चले गए बच्चों की चीखें हैं।
■ यह चंद सवाल जो समाज से हैं ■
चंद सवाल, जो समाज से है- क्या सिर्फ उस बच्चे की गलती थी? क्या हमने कभी उससे पूछा- तुम खुश हो? क्या हमने कभी नंबरों से ज्यादा उसकी भावनाओं को अहमियत दी थी? क्या हमने उसकी दूसरों से तुलना नहीं की थी? क्या हमने कभी उसे यह भरोसा दिलाया कि- हारना भी जीवन का सहज हिस्सा है? या फिर… हमने उसे सिर्फ एक परफेक्ट रिजल्ट देने की मशीन बनाकर रख दिया था?
■ समय है, बच्चों को जीना सिखाइए ■
अब भी समय है। हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या टॉपर नहीं बन सकता, लेकिन हर बच्चा ‘जिंदा’ रह सकता है। अगर हम उसे जीने दें। बच्चों से बात कीजिए, उन्हें सुनिए, उन्हें समझिए। उन्हें ये मत सिखाइए कि- हारना शर्म की बात है। उन्हें ये सिखाइए कि-जिंदगी बहुत बड़ी है, इसे हर मोड़ पर, हर हालात में जीना है। उन्हें खोने से पहले ही संभाल लीजिए। हर मां-बाप, हर शिक्षक और पूरे समाज ने इस बात काे समझने की आवश्यकता है। अगर आज आपका बेटा-बेटी आपके पास आपके साथ है तो आज ही उसे गले लगाकर कहिए- बेटा तुम अकेले नहीं हो, हम साथ-साथ है। उनसे पूछो-तुम खुश हो ना? ऐसा न हो कि मां-बाप,परिजन जीवनभर दरवाजे की ओर ताकते रहें अौर वह कभी न लौटे। उनके कंधों से उम्मीदों का बोझ आज ही कम कर दीजिए। (न्यूज पोस्ट- बुधवार 18 मार्च 2026 फोटो साभार- Pinterest)
■ चंद्रकांत चावरे, वरिष्ठ पत्रकार, नागपुर. 97304 63351.