विनोद भावुक Vinod Bhavuk

विनोद भावुक Vinod Bhavuk प्रेरक एवं स्टार्टअप आधारित खबरों का खजाना

21/11/2025
21/11/2025

सिंथेटिक नशे की गर्त से निकल रोल मॉडल बने कुल्लू के पंकी सूद का कबूलनामा

17/11/2025

स्वाद को दाद -
बैजनाथ के युवा शेफ अर्पित अवस्थी

05/11/2025

विशेष कैदी मुद्रा : लंदन की नीलामी में 250 ब्रिटिश पाउंड में बिका योल कैम्प में छ्पा एक आन्ना का नोट

विनोद भावुक। धर्मशाला

दूसरे विश्व युद्ध के दिनों में शांत कांगड़ा घाटी में स्थित योल कैंप एक ऐसा नाम था जो ब्रिटिश भारत में प्रिजनर ऑफ वॉर (POW) की दुनिया से जुड़ा हुआ था। यहीं पर 1941 से 1945 के बीच, युद्धबंदियों के लिए विशेष कैदी मुद्रा (Prisoner-of-War Money) छापी जाती थी।

हाल ही में ऐसी ही एक दुर्लभ मुद्रा ‘1 आन्ना, योल कैंप 25’ लंदन की एक अंतरराष्ट्रीय नीलामी में 250 ब्रिटिश पाउंड में बिकी। यह नोट बैंगनी और पीले रंग की छपाई में है, जिसमें पीछे की तरफ कुछ नहीं लिखा गया। विशेषज्ञ इसे ‘Campbell 5323’ के नाम से पहचानते हैं।

बंदी शिविर के भीतर उपयोग होने वाली करन्सी

योल कैंप उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य का एक बड़ा बंदी शिविर था, जहां इटालियन, जर्मन और जापानी युद्धबंदी रखे गए थे। उन्हें बाहर की आर्थिक व्यवस्था से काटने के लिए अलग मुद्रा दी गई, जिसे सिर्फ कैंप के भीतर ही उपयोग किया जा सकता था।

यह मुद्रा असली रुपये की जगह, केवल सामान खरीदने या आदान-प्रदान में काम आती थी। यानी यह करन्सी कैदियों की एक ‘सीमित अर्थव्यवस्था’ थी। यह मुद्रा असली रुपये नहीं थी और सिर्फ कैदी ही प्रयोग करते थे।

आज यह एक आन्ना का नोट न केवल इतिहास की धरोहर है, बल्कि एक प्रतीक है उस दौर का जब युद्ध के बीच भी प्रशासन, अनुशासन और नियंत्रण की सीमाएँ कागज पर खींच दी जाती थीं। एक आन्ना का यह नोट ब्रिटिश भारत की जंग की कहानी कहता है।

यह दुर्लभ नोट अब संग्राहकों के बीच एक इतिहास का जीवंत टुकड़ा बन चुका है, जो बताता है कि योल का यह छोटा-सा कैम्प, कभी वैश्विक युद्ध के नक्शे पर एक अहम बिंदु था। यहाँ सालों विदेशी युद्धबंदी रखे गए थे।

04/11/2025
26/10/2025

88 साल पहले आया था हिमाचल प्रदेश का पहला ट्रक, कुल्लू के लाला रल्लूमल सोहल थे मालिक

विनोद भावुक। कुल्लू

हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में वर्ष 1937 को एक ऐसा कदम उठाया गया, जिसने उस समय के कठिन परिवहन-परिस्थितियों में बदलाव का बीजारोपण किया। उस समय हिमाचल प्रदेश में पहला ट्रक खरीदा गया था। इस ट्रक के मालिक थे लाला रल्लूमल सोहल। सोहल परिवार ट्रक ट्रांसपोर्ट संचालन करने वाला पहला परिवार बन गया।

कुल्लू उस समय ब्रिटिश पंजाब के कांगड़ा जिला की तहसील सड़कों-पुलों की कमी थी, वाहनों का आना-जाना बहुत सीमित था। कुल्लू के सोहल परिवार ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए 1937 में अपने व्यापार-परिवहन के लिए ट्रक लाने का निर्णय लिया।

1937 मॉडल का शेवरलेट ट्रक

सूत्रों के मुताबिक यह ट्रक 1937 शेवरलेट मॉडल था और इसने कुल्लू की घाटियों में पहाड़ी परिवहन में एक क्रांति के रूप में नई पहल की। जिस दौर में वाहन के तौर पर पैदल सफर अथवा खच्चर उपलब्ध थे, यह ट्रक हिमाचल प्रदेश में पहली मोटर-वाहन पहल का प्रतीक बन गया।

इस ट्रक ने कुल्लू की घाटियों को जोड़ने, मालवाहन को आसान बनाने और आगे बनने वाले रोड नेटवर्क के विकास में भूमिका निभाई। कठिन भौगोलिक परिस्थियां और जोखिम के बीच सोहल परिवार की यह पहल उस समय की उद्यमिता की मिसाल बन गई।

88 साल बाद 97,200 ट्रक

mysterioushimachal.wordpress.com के मुताबिक जब कुल्लू में सड़कें न के बराबर थीं, उस वक़्त एक ट्रक ने संकरे पहाड़ी रास्तों पर अपना दम दिखाया। 1937 में कुल्लू के सोहल परिवार के ट्रक ने यहाँ की घाटियों को हिलाकर रख दिया।

तब क्या किसी ने सोचा होगा कि अगले 88 साल में ट्रक परिवहन माल वाहक के तौर पर इस पहाड़ी प्रदेश में रीढ़ की हड्डी बन जाएगा। साल 2000 के आंकड़ों के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में 97,200 ट्रक पंजीकृत हैं और बिलासपुर और सोलन में ट्रक सबसे ज्यादा हैं।









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