08/04/2026
*“ज्ञान के मंदिर पर नामों का कब्ज़ा: दक्षिण हरियाणा में मेडिकल कॉलेज बना श्रेय की जंग का अखाड़ा”*
*GROUND ZER⭕ विशेष हरविंद्र यादव " प्रजातंत्र की हत्या"*
दक्षिण हरियाणा की उस जमीन पर, जहां बेहतर इलाज और उच्च चिकित्सा शिक्षा का सपना बोया गया था, आज वही सपना नामों की धूल में दबता नजर आ रहा है और हालात ऐसे बन गए हैं कि एक पूरा संस्थान अपने ही अस्तित्व को साबित करने में उलझ गया है। अस्सी एकड़ में फैला परिसर, करोड़ों की लागत, स्वीकृतियां, शिलान्यास, उद्घाटन, विस्तार के दावे और सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे—सब कुछ कागजों और मंचों पर पूरा दिखाया गया, लेकिन जमीन पर जो खड़ा हुआ, वह अब एक नई लड़ाई का केंद्र बन गया है, और वह लड़ाई है नाम की, पहचान की और श्रेय की।
गेट नंबर एक पर एक पहचान उभरती है तो गेट नंबर दो पर दूसरी, अंदर कुछ और लिखा है तो बाहर कुछ और दिखाने की कोशिश हो रही है, जो अस्पताल है वह एक हिस्सा है लेकिन उसे पूरे परिसर की पहचान बनाने का प्रयास चल रहा है और जो मेडिकल कॉलेज मूल है उसकी पहचान को पीछे धकेलने की जुगत साफ दिखाई दे रही है, यह केवल बोर्ड बदलने का मामला नहीं बल्कि सोच बदलने की कोशिश है और वही सोच अब पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर रही है।
अगर आज वे दो महापुरुष, जिनके नाम पर यह पूरा विवाद खड़ा किया गया है, इस दृश्य को देख रहे होते तो शायद सबसे पहले यही सवाल करते कि क्या हमने अपनी विरासत इसलिए छोड़ी थी कि तुम उसे हिस्सों में बांटकर अपने-अपने नाम का झंडा गाड़ो, क्या एक संस्थान की पहचान उसके उद्देश्य से नहीं बल्कि उस पर लिखे गए अक्षरों से तय होगी, क्या यह ज्ञान का केंद्र है या राजनीतिक दांव-पेच का मैदान बन चुका है।
घटनाक्रम साफ कहता है कि पहले स्वीकृति मिली, फिर शिलान्यास हुआ, फिर उद्घाटन हुआ, फिर नए दावे जुड़े, फिर क्षमता बढ़ाने की बातें हुईं, लेकिन उसी के साथ एक और सिलसिला शुरू हुआ—नाम बदलने की मांग, विरोध, धरने, बयान, और फिर नए-नए बोर्ड, यानी काम के साथ-साथ विवाद भी समान गति से बढ़ता रहा और धीरे-धीरे विवाद ही मुख्य विषय बन गया।
यहां सबसे बड़ा कटाक्ष यही है कि जिस जगह डॉक्टर बनने चाहिए थे वहां नेता बन रहे हैं, जहां पढ़ाई की चर्चा होनी चाहिए थी वहां नाम की चर्चा हो रही है, जहां मरीजों के इलाज पर फोकस होना चाहिए था वहां बोर्ड के आकार और स्थान पर बहस हो रही है, और यह सब उन लोगों के सामने हो रहा है जो खुद को इस व्यवस्था का जिम्मेदार बताते हैं।
जो लोग इस पूरे खेल के केंद्र में हैं, वे शायद यह मान बैठे हैं कि नाम बदल देने से इतिहास बदल जाएगा, लेकिन इतिहास इतना कमजोर नहीं होता, वह काम से बनता है और काम से ही चलता है, नाम केवल पहचान देता है लेकिन यहां पहचान को ही उद्देश्य बना दिया गया है और यही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना है।
अगर पहला स्वर इस दृश्य को देखता तो वह कहता कि तुमने ज्ञान की इमारत को अहंकार की दीवारों से ढक दिया, तुमने उद्देश्य को पीछे धकेल दिया और प्रतीकों को आगे कर दिया, और अगर दूसरा स्वर बोलता तो वह सीधे कहता कि यह संघर्ष नहीं है, यह स्वार्थ है, यह सेवा नहीं है, यह श्रेय की लड़ाई है और इसमें जीतने वाला भी हारता है क्योंकि हार अंततः समाज की होती है।
पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े होते हैं क्योंकि जिसने योजना बनाई उसने क्या सोचा, जिसने निर्माण किया उसने क्या देखा, जिसने उद्घाटन किया उसने क्या समझा, और जो आज इसे चला रहे हैं वे क्या कर रहे हैं—इन सबका जवाब कहीं नजर नहीं आता, केवल एक चीज नजर आती है और वह है नाम को लेकर जिद, और यही जिद अब पूरे संस्थान पर भारी पड़ रही है।
यह भी सच है कि छात्रों को फर्क नहीं पड़ता कि गेट पर क्या लिखा है, उन्हें फर्क पड़ता है कि उन्हें कैसी पढ़ाई मिल रही है, मरीजों को फर्क नहीं पड़ता कि बोर्ड पर किसका नाम बड़ा है, उन्हें फर्क पड़ता है कि इलाज कैसा मिल रहा है, लेकिन यहां प्राथमिकता उलट दी गई है और यही इस पूरे विवाद का सबसे कड़वा सच है।
कटाक्ष अपने चरम पर तब पहुंचता है जब यह महसूस होता है कि जो लोग इस संस्थान को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार थे वही इसे विवाद का विषय बना रहे हैं, जो लोग इसे एक पहचान देना चाहते थे वही इसे कई पहचान में बांट रहे हैं, और जो लोग इसे उदाहरण बनाना चाहते थे वही इसे चेतावनी बना रहे हैं।
अगर अब भी यह नहीं समझा गया तो इतिहास बहुत साफ शब्दों में लिखेगा कि यह वह दौर था जब लोगों ने एक बड़े उद्देश्य को छोटे-छोटे स्वार्थों में बांट दिया, जब नाम को इतना बड़ा कर दिया गया कि काम दिखाई देना बंद हो गया, और जब एक मेडिकल कॉलेज, जो अपने आप में एक संपूर्ण पहचान था, उसे उसके ही हिस्सों के बीच उलझाकर रख दिया गया।
और अंत में वही दो आवाजें जैसे आज भी गूंज रही हैं कि यह विरासत है इसे मत बांटो, यह ज्ञान का स्थान है इसे मत गिराओ, और अगर नाम ही लिखना है तो ऐसा काम करो कि नाम अपने आप अमर हो जाए, क्योंकि जब काम खत्म हो जाता है तो नाम भी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता।