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South Haryana सच का दूसरा नाम South Haryana

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जिले के 182 गांव की बीपीएल कॉलोनी में पहुंचेगी बिजली निगम ने ट्रांसफॉर्म और पोल लगाने की शुरू।
01/05/2026

जिले के 182 गांव की बीपीएल कॉलोनी में पहुंचेगी
बिजली निगम ने ट्रांसफॉर्म और पोल लगाने की शुरू।

20/04/2026

डॉ अभय सिंह यादव के चुनाव हारने की समीक्षा कर गए जनता टीवी पर दिए गए इंटरव्यू में राव नरवीर सिंह।

*“ज्ञान के मंदिर पर नामों का कब्ज़ा: दक्षिण हरियाणा में मेडिकल कॉलेज बना श्रेय की जंग का अखाड़ा”**GROUND ZER⭕ विशेष हरवि...
08/04/2026

*“ज्ञान के मंदिर पर नामों का कब्ज़ा: दक्षिण हरियाणा में मेडिकल कॉलेज बना श्रेय की जंग का अखाड़ा”*

*GROUND ZER⭕ विशेष हरविंद्र यादव " प्रजातंत्र की हत्या"*

दक्षिण हरियाणा की उस जमीन पर, जहां बेहतर इलाज और उच्च चिकित्सा शिक्षा का सपना बोया गया था, आज वही सपना नामों की धूल में दबता नजर आ रहा है और हालात ऐसे बन गए हैं कि एक पूरा संस्थान अपने ही अस्तित्व को साबित करने में उलझ गया है। अस्सी एकड़ में फैला परिसर, करोड़ों की लागत, स्वीकृतियां, शिलान्यास, उद्घाटन, विस्तार के दावे और सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे—सब कुछ कागजों और मंचों पर पूरा दिखाया गया, लेकिन जमीन पर जो खड़ा हुआ, वह अब एक नई लड़ाई का केंद्र बन गया है, और वह लड़ाई है नाम की, पहचान की और श्रेय की।

गेट नंबर एक पर एक पहचान उभरती है तो गेट नंबर दो पर दूसरी, अंदर कुछ और लिखा है तो बाहर कुछ और दिखाने की कोशिश हो रही है, जो अस्पताल है वह एक हिस्सा है लेकिन उसे पूरे परिसर की पहचान बनाने का प्रयास चल रहा है और जो मेडिकल कॉलेज मूल है उसकी पहचान को पीछे धकेलने की जुगत साफ दिखाई दे रही है, यह केवल बोर्ड बदलने का मामला नहीं बल्कि सोच बदलने की कोशिश है और वही सोच अब पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर रही है।

अगर आज वे दो महापुरुष, जिनके नाम पर यह पूरा विवाद खड़ा किया गया है, इस दृश्य को देख रहे होते तो शायद सबसे पहले यही सवाल करते कि क्या हमने अपनी विरासत इसलिए छोड़ी थी कि तुम उसे हिस्सों में बांटकर अपने-अपने नाम का झंडा गाड़ो, क्या एक संस्थान की पहचान उसके उद्देश्य से नहीं बल्कि उस पर लिखे गए अक्षरों से तय होगी, क्या यह ज्ञान का केंद्र है या राजनीतिक दांव-पेच का मैदान बन चुका है।

घटनाक्रम साफ कहता है कि पहले स्वीकृति मिली, फिर शिलान्यास हुआ, फिर उद्घाटन हुआ, फिर नए दावे जुड़े, फिर क्षमता बढ़ाने की बातें हुईं, लेकिन उसी के साथ एक और सिलसिला शुरू हुआ—नाम बदलने की मांग, विरोध, धरने, बयान, और फिर नए-नए बोर्ड, यानी काम के साथ-साथ विवाद भी समान गति से बढ़ता रहा और धीरे-धीरे विवाद ही मुख्य विषय बन गया।

यहां सबसे बड़ा कटाक्ष यही है कि जिस जगह डॉक्टर बनने चाहिए थे वहां नेता बन रहे हैं, जहां पढ़ाई की चर्चा होनी चाहिए थी वहां नाम की चर्चा हो रही है, जहां मरीजों के इलाज पर फोकस होना चाहिए था वहां बोर्ड के आकार और स्थान पर बहस हो रही है, और यह सब उन लोगों के सामने हो रहा है जो खुद को इस व्यवस्था का जिम्मेदार बताते हैं।

जो लोग इस पूरे खेल के केंद्र में हैं, वे शायद यह मान बैठे हैं कि नाम बदल देने से इतिहास बदल जाएगा, लेकिन इतिहास इतना कमजोर नहीं होता, वह काम से बनता है और काम से ही चलता है, नाम केवल पहचान देता है लेकिन यहां पहचान को ही उद्देश्य बना दिया गया है और यही इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना है।

अगर पहला स्वर इस दृश्य को देखता तो वह कहता कि तुमने ज्ञान की इमारत को अहंकार की दीवारों से ढक दिया, तुमने उद्देश्य को पीछे धकेल दिया और प्रतीकों को आगे कर दिया, और अगर दूसरा स्वर बोलता तो वह सीधे कहता कि यह संघर्ष नहीं है, यह स्वार्थ है, यह सेवा नहीं है, यह श्रेय की लड़ाई है और इसमें जीतने वाला भी हारता है क्योंकि हार अंततः समाज की होती है।

पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े होते हैं क्योंकि जिसने योजना बनाई उसने क्या सोचा, जिसने निर्माण किया उसने क्या देखा, जिसने उद्घाटन किया उसने क्या समझा, और जो आज इसे चला रहे हैं वे क्या कर रहे हैं—इन सबका जवाब कहीं नजर नहीं आता, केवल एक चीज नजर आती है और वह है नाम को लेकर जिद, और यही जिद अब पूरे संस्थान पर भारी पड़ रही है।

यह भी सच है कि छात्रों को फर्क नहीं पड़ता कि गेट पर क्या लिखा है, उन्हें फर्क पड़ता है कि उन्हें कैसी पढ़ाई मिल रही है, मरीजों को फर्क नहीं पड़ता कि बोर्ड पर किसका नाम बड़ा है, उन्हें फर्क पड़ता है कि इलाज कैसा मिल रहा है, लेकिन यहां प्राथमिकता उलट दी गई है और यही इस पूरे विवाद का सबसे कड़वा सच है।

कटाक्ष अपने चरम पर तब पहुंचता है जब यह महसूस होता है कि जो लोग इस संस्थान को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार थे वही इसे विवाद का विषय बना रहे हैं, जो लोग इसे एक पहचान देना चाहते थे वही इसे कई पहचान में बांट रहे हैं, और जो लोग इसे उदाहरण बनाना चाहते थे वही इसे चेतावनी बना रहे हैं।

अगर अब भी यह नहीं समझा गया तो इतिहास बहुत साफ शब्दों में लिखेगा कि यह वह दौर था जब लोगों ने एक बड़े उद्देश्य को छोटे-छोटे स्वार्थों में बांट दिया, जब नाम को इतना बड़ा कर दिया गया कि काम दिखाई देना बंद हो गया, और जब एक मेडिकल कॉलेज, जो अपने आप में एक संपूर्ण पहचान था, उसे उसके ही हिस्सों के बीच उलझाकर रख दिया गया।

और अंत में वही दो आवाजें जैसे आज भी गूंज रही हैं कि यह विरासत है इसे मत बांटो, यह ज्ञान का स्थान है इसे मत गिराओ, और अगर नाम ही लिखना है तो ऐसा काम करो कि नाम अपने आप अमर हो जाए, क्योंकि जब काम खत्म हो जाता है तो नाम भी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता।

07/04/2026

दो हल्कों से आवाज़ आई ,घुटने तो क्या नाक रगड़ना शुरू कर दिया उन्होंने जो अपने आप को महलों के राजा समझते थे,जनता के बीच जाना तो दूर बात की बपौती समझते थे दक्षिणी हरियाणा को। अच्छा लगता है ऐसे घुटनों के बल चलना और चाय पीना हमारे अपनो के यहां वरना तो मिलना भी दूभर था।
बदलाव मतलब अहीरवाल जिंदाबाद

07/04/2026

स्वास्थ्य मंत्री आरती राव का नांगल चौधरी दौरा छोड़ गया राजनैतिक दादागिरी का संदेश !

स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव का नांगल चौधरी हल्के का आज का दौरा एक ऐसा संदेश छोड़ गया जिससे सामाजिक समझ रखने वालों को असहजता महसूस हुई। उनके मुख्य रूप से बलाह कला, भोजावास, नांगल चौधरी और कोरियावास मेडिकल कॉलेज चार जगह प्रोग्राम थे। पिछली रात से ही सत्ता का सरूर दिखाई देने लगा था जब रातोंरात महर्षि च्यवन का नाम मेडिकल कॉलेज के मुख्य द्वार से हटाकर उनकी जगह राव तुलाराम के नाम का स्थाई बोर्ड लगाया गया। यद्यपि नामकरण पर हुए विवाद को सौहार्दपूर्ण हल करते हुए मुख्यमंत्री ने मेडिकल कॉलेज का नाम महर्षि च्यवन के नाम रखते हुए इसके अंदर बनाए गए अस्पताल का नाम राव तुलाराम के नाम करने की घोषणा की थी। इस फ़ैसले से समाज के सभी लोग लगभग संतुष्ट थे। यदि थोड़ी सी समझदारी से काम लिया जाता तो कालेज के मुख्य द्वार के साथ छेड़-छाड़ न करके अस्पताल के मुख्य द्वार पर राव तुलाराम का नाम लिखा जा सकता था । जिससे सामाजिक सौहार्द भी विचलित नहीं होता और दोनो महापुरूषों की गरिमा को भी ठेस नहीं पहुँचती। परंतु रात को ही जिस तरह से तोड़ फोड़ की गई और जिस तरह से नया नाम लगाया गया और उसके बाद में जिस तरह से सोशल मीडिया पर “सिर हटाने और घुटने टिकाने” जैसी भाषा का प्रयोग किया गया यह राजनीतिक दंभ की पराकाष्ठा थी ।
इसके बाद में बची हुई कसर स्वयं स्वास्थ्य मंत्री ने अपने भाषण में निकाल दी। राजनीति में विरोध प्रतिरोध सामान्य सी प्रक्रिया है, परंतु भाषा की गरिमा की मर्यादा जब लाँघी जाए तो आम आदमी को महसूस होता है। आरती राव जी के चार प्रोग्रामों में से तीन में स्वयं या उनके समर्थकों द्वारा विरोधियों के “पेट में दर्द” की बात कही है। उनकी बातों से यह तो नहीं पता कि उनका संकेत किसी व्यक्ति विशेष की तरफ़ था अथवा व्यक्तियों की तरफ़ था। परंतु जिसके लिए भी था बार बार निम्न भाषा का प्रयोग एक महिला कैबिनेट मंत्री के स्तर की भाषा नहीं है। वैसे वह यह भूल रही थी कि अब तक अहीरवाल में उनके पिताजी के विरोधी कहे जाने वाले नेताओं ने भी कभी उनको सीधा टारगेट नहीं किया। चाहे उनके पिता के बारे में किसी ने कुछ भी कहा हो लेकिन स्वास्थ्य मंत्री के बारे कभी किसी ने कोई छोटी बात नहीं कही। परंतु आज उनकी अपनी भाषा ने विरोधियों को लक्ष्मण रेखा लाँघने का मौक़ा दे दिया। और यदि भविष्य में स्वयं उनके बारे में कोई छोटी बात कही गई तो यह भाषा की गरिमा और इस इलाक़े की संस्कृति दोनों का अपमान होगा। स्वास्थ्य मंत्री को स्वयं यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके बारे में एक बार निम्न भाषा का प्रयोग होने लग गया तो संभालना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि निर्लज्जता की कभी कोई सीमा नहीं होती ।
अतः यह ठीक है कि रामपुरा हाउस के सितारे बुलंद है बाप बेटी दोनों मंत्री है परन्तु उन्हें यह भूलना नहीं चाहिए कि समय किसी का भी बराबर नहीं होता अतः सत्ता के साथ होश को भी संभाले रखना चाहिए।

अगर वास्तव में इलाके को मेडिकल कॉलेज का रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट सुपुर्द किया जा रहा है तो मंत्री महोदय आज सार्वजनिक रूप स...
06/04/2026

अगर वास्तव में इलाके को मेडिकल कॉलेज का रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट सुपुर्द किया जा रहा है तो मंत्री महोदय आज सार्वजनिक रूप से उन रेडियोलॉजिस्ट की सूचना भी देकर जाए कि कौन कौन डॉक्टर सिटी और MRI स्कैन करेंगे।

05/04/2026

एक बार फिर नांगल चौधरी में कांग्रेस समर्थकों के घर चाय की चुस्की लेंगे
केन्द्र और प्रदेश के भाजपा मंत्रीगण।

05/04/2026

यह भी कैसी विडंबना है कि राव इंद्रजीत सिंह और उनकी बेटी आरती राव को नांगल चौधरी हलके में केवल कांग्रेस के समर्थकों की चाय ही मीठी लगती है। कम से कम एक कप चाय तो किसी BJP समर्थक के पास भी पीनी चाहिए थी।

🔥 *कोरियावास मेडिकल कॉलेज में नामकरण पर फिर सियासी घमासान*!महेंद्रगढ़ जिले के कोरियावास स्थित महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज ...
05/04/2026

🔥 *कोरियावास मेडिकल कॉलेज में नामकरण पर फिर सियासी घमासान*!
महेंद्रगढ़ जिले के कोरियावास स्थित महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज एक बार फिर विवादों में आ गया है। इस बार मामला नामकरण और बोर्ड/फ्लेक्स लगाने को लेकर गरमा गया है।
👉 *क्या है पूरा मामला?*
कॉलेज के मुख्य गेट नंबर-1 पर जहां स्पष्ट रूप से महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज का नाम होना चाहिए, वहीं उसके ऊपर राव तुलाराम अस्पताल का फ्लेक्स लगाया गया है।
👉 *उठ रहे हैं बड़े सवाल:*
जब अस्पताल, मेडिकल कॉलेज परिसर के अंदर स्थित है, तो फिर मुख्य गेट पर अस्पताल का नाम प्रमुखता से क्यों?
क्या यह जानबूझकर कॉलेज की पहचान को पीछे धकेलने की कोशिश है?
क्या इस कदम के जरिए नामकरण के पुराने विवाद को फिर से हवा दी जा रही है?
👉 *राजनीतिक एंगल की चर्चा तेज*
स्थानीय लोगों और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि इस फ्लेक्स के जरिए एक बार फिर मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। पहले भी इस संस्थान के नाम को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही हैं।
👉 *जिम्मेदारी तय कौन करेगा?*
सबसे बड़ा सवाल यही है कि:
यह फ्लेक्स किसके निर्देश पर लगाया गया?
क्या यह प्रशासनिक स्तर पर लिया गया निर्णय है या राजनीतिक दबाव का परिणाम?
क्या मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने बिना उच्च स्तर की अनुमति के यह कदम उठाया?
👉 *मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर सवाल*
अगर यह निर्णय कॉलेज प्रशासन ने लिया है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि
👉 क्या प्रशासन अब सरकार से ऊपर फैसले लेने लगा है?
👉 जनता की मांग
स्थानीय लोगों की मांग है कि:
पूरे मामले की जांच हो
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो
संस्थान की पहचान के साथ किसी तरह का खिलवाड़ न हो
📌 *निष्कर्ष:*
एक फ्लेक्स बोर्ड ने फिर से यह साफ कर दिया है कि कोरियावास मेडिकल कॉलेज सिर्फ स्वास्थ्य सुविधा का केंद्र ही नहीं, बल्कि राजनीति का भी अखाड़ा बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं।

महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज के नाम को हटाकरराव तुलाराम अस्पताल कोरियावास नारनौल लिखा जा रहा है।आमजन को अब समझ जाना चाहिए क...
05/04/2026

महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज के नाम को हटाकर
राव तुलाराम अस्पताल कोरियावास नारनौल लिखा जा रहा है।

आमजन को अब समझ जाना चाहिए कि इस मेडिकल कॉलेज के साथ कैसी राजनीति की जा रही है।
नामदारों को बस नाम से मतलब है।
आमजन के लिए सुविधाओं से कोई लेनादेना नहीं।

05/04/2026

अहीरवाल में विरासत बनाम विकास की सियासी जंग तेज, राव इंद्रजीत और अभय सिंह के बीच बढ़ता टकराव

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