14/05/2026
जब दुनिया में इक्नॉमिक्स की बात हो रही है तो भारत में
MODINOMICS की बात हो रही है
₹3,00,000 Cr का खेल ?
COAL-GATE 2.0
IIT बॉम्बे की हालिया रिसर्च रिपोर्ट और सरकार की हालिया कैबिनेट घोषणाओं (जहां ₹37,500 करोड़ की प्रत्यक्ष सहायता और ₹3,000,000 करोड़ तक के निजी निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य है) के संदर्भ में तैयार की गई एक विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट नीचे दी गई है
भारत सरकार ने देश की तेल आयात निर्भरता को कम करने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन की शुरुआत की है, जिसके तहत 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, IIT बॉम्बे की रिसर्च रिपोर्ट और आर्थिक विश्लेषकों ने इस मिशन के आर्थिक और तकनीकी पहलुओं पर गंभीर चिंताएं जताई हैं। आलोचक इसे 'Coalgate 2.0' का नाम दे रहे हैं, जहां मध्यम वर्ग के टैक्स के पैसे का उपयोग करके बड़े कॉर्पोरेट घरानों (विशेषकर अडानी ग्रुप) को भारी वित्तीय सब्सिडी और लाभ पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं।
भारतीय कोयले की संरचना वैश्विक कोयले से बहुत भिन्न है।राख की उच्च मात्रा (High Ash Content): भारतीय कोयले में 35% से 50% तक राख (Ash) पाई जाती है।तकनीकी असफलता का जोखिम: अधिकांश वैश्विक गैसीकरण तकनीकें (जैसे चीन या अमेरिका की) कम राख वाले कोयले के लिए बनी हैं। IIT बॉम्बे की अंडरग्राउंड कोल गैसीकरण (UCG) लैब रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक राख के कारण थर्मल मॉर्फोलॉजी और चट्टानों की संरचना प्रभावित होती है, जिससे गैस उत्पादन की दक्षता बेहद कम हो जाती है।पर्यावरणीय प्रभाव: उच्च राख वाले कोयले से अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और विषाक्त उप-उत्पाद (Tar/Slag) निकलते हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
सरकार ने इस पूरे मिशन में करीब ₹3 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान लगाया है, जिसके लिए भारी वित्तीय रियायतें दी जा रही हैं।
कैबिनेट की भारी छूट: हाल ही में कैबिनेट ने बुनियादी ढाँचे और मशीनों की खरीद पर 20% तक की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (Subsidy) देने की नीति बनाई है, जिसमें प्रति इकाई ₹12,000 करोड़ तक की अधिकतम सीमा तय की गई है।अडानी ग्रुप का एकाधिकार: उद्योग जगत की रिपोर्टों के अनुसार, अडानी समूह नागपुर (कलमेश्वर) के पास ₹70,000 करोड़ के बड़े निवेश के साथ एक एकीकृत कोयला गैसीकरण संयंत्र स्थापित करने की योजना पर काम शुरू कर चुका है। आलोचकों का आरोप है कि सब्सिडी नीतियों के मानदंड इस तरह तैयार किए गए हैं जिससे चुनिंदा बड़े कॉर्पोरेट घरानों को सीधा लाभ मिले।30 साल का लिंकेज: सरकार ने गैर-नियमित क्षेत्र के लिए कोयला लिंकेज की अवधि बढ़ाकर 30 वर्ष कर दी है, जो इन कॉर्पोरेट्स को दीर्घकालिक कोयला खदानों पर नियंत्रण देती है।
यह परियोजना आर्थिक रूप से कितनी व्यावहारिक है, इस पर बड़े सवाल हैं। टैक्सपेयर्स के पैसे का दांव: जहां एक तरफ वित्तीय घाटे को पाटने के लिए मध्यम वर्ग पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स बढ़ाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ₹37,500 करोड़ का प्रत्यक्ष बजटीय पैकेज ऐसी तकनीक को प्रमोट करने में लगाया जा रहा है जो अभी भारत में पूरी तरह प्रमाणित (Proven) नहीं है।महंगी बिजली और ऊर्जा: वर्तमान में भारत में सौर ऊर्जा की दरें लगभग ₹2.5 प्रति यूनिट तक गिर चुकी हैं। इसके विपरीत, कोयला गैसीकरण से बनने वाली ऊर्जा या सिंथेटिक गैस (Syngas) की लागत अत्यधिक ऊंची होने का अनुमान है। ऐसे में यह घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
पुराने कोल घोटाले (2012) में कैग (CAG) ने बिना प्रतिस्पर्धी बोली के कोयला ब्लॉक आवंटन पर सवाल उठाए थे। वर्तमान परिदृश्य में निम्नलिखित कारणों से इसे 'Coalgate 2.0' कहा जा रहा है
1 संसाधनों का अपारदर्शी हस्तांतरण: स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर कोयले का उपयोग करने वाली निजी कंपनियों को भारी वित्तीय मदद देना।
2 सार्वजनिक धन का जोखिम: यदि अत्यधिक राख के कारण ये अरबों रुपये के संयंत्र तकनीकी रूप से विफल होते हैं, तो बैंकों के कर्ज (NPA) डूबेंगे, जिसका अंतिम बोझ आम जनता पर पड़ेगा
IIT बॉम्बे और वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत को बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक आवंटन और सब्सिडी देने से पहले पायलट प्रोजेक्ट स्तर पर गहन परीक्षण करने चाहिए। सार्वजनिक धन (Public Money) का उपयोग निजी कॉर्पोरेट्स को सब्सिडी देने के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के स्वदेशी अनुसंधान में किया जाना चाहिए ताकि मध्यम वर्ग के टैक्स का सही उपयोग हो सके।
आप का इस पर क्या कहना है नीचे कमेंट में जरूर बताइए 👇🏻