19/06/2026
महर्षि मनु ने नास्तिकता की अत्यंत स्पष्ट और सारगर्भित परिभाषा दी है—
“नास्तिको वेद निन्दकः।”
अर्थात् जो वेदों की निन्दा करता है, वही नास्तिक है।
किन्तु समय के साथ इस शब्द का भी अन्य अनेक शब्दों की भाँति दुरुपयोग होने लगा। विभिन्न मत-मतान्तरों के अनुयायियों ने अपने मत को न मानने वालों को ही नास्तिक कहना आरम्भ कर दिया, जिससे इस शब्द का वास्तविक अर्थ धूमिल हो गया।
मनु की यह परिभाषा न केवल तार्किक है, अपितु प्रामाणिक और सार्वभौमिक भी है। ‘वेद’ का सामान्य अर्थ है - ज्ञान। अतः जो व्यक्ति ज्ञान की अवमानना करता है, सत्य के विपरीत आचरण करता है और विवेक का त्याग करता है, वही वास्तविक अर्थ में नास्तिक कहलाने योग्य है।
सत्य कभी भी साम्प्रदायिक नहीं होता। वह सर्वकालिक, सार्वभौमिक और सभी के लिए समान रूप से आचरणीय होता है। इसी प्रकार वेद भी किसी एक समुदाय या मत के लिए सीमित नहीं हैं, और न ही ईश्वर किसी एक वर्ग का है - वह समस्त मानवता का है।
वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं, जिनका आविर्भाव उस समय हुआ जब संसार में किसी प्रकार के मत-मतान्तर अस्तित्व में नहीं थे। अतः यह ज्ञान समस्त मानव जाति के लिए है। ईश्वर सर्वज्ञ है, अतः उसका ज्ञान न कभी पुराना होता है और न ही उसमें संशोधन की आवश्यकता होती है।
किन्तु जब मनुष्य सत्य ज्ञान से दूर हो जाता है, तब वह अपनी सीमित बुद्धि और परिस्थितियों के अनुसार कुछ व्यवस्थाएँ निर्मित करता है और अपने अनुयायियों को उनके अनुसार चलने के लिए प्रेरित करता है। धीरे-धीरे यही व्यवस्थाएँ एक ‘मत’ का रूप ले लेती हैं, और स्वार्थवश कुछ लोग उसे ‘धर्म’ का नाम दे देते हैं।
Tyagi Insight ✍️
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