12/12/2025
सदा-ए-भारत: वंदे मातरम्, ‘लब पे आती है दुआ’ और धर्मनिरपेक्षता: निष्पक्ष दृष्टि
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। संविधान के अनुसार, राज्य किसी धर्म को प्राथमिकता नहीं दे सकता और सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है।
ऐसे में अगर राज्य के संचालक मुखिया अपनी धार्मिक मान्यताओं को जबरन दूसरे लोगों पर थोप रहे हैं तो संविधान के रक्षक को क्या करना चाहिए?
लब पे आती है दुआ एक उर्दू कविता है, जिसमें “अल्लाह” का उल्लेख होने से यह धार्मिक प्रार्थना हो जाती है। इसी कारण 2022 दिसंबर उत्तर प्रदेश बरेली के स्कूल में पढ़ने पर जेल और निलंबन की कार्रवाई की गई। जबकि सालों तक यह स्कूलों के पाठ्यक्रम में रही है।
इसका उद्देश्य बच्चों को नैतिकता वतन से मोहब्बत और नेक रास्ते की शिक्षा देना था।
कविता की यह लाइन
'' हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की जीनत...
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ''
इस में देश प्रेम नहीं तो क्या है?
वहीं
वंदे मातरम् एक राष्ट्रगीत है। जो आजादी से पहले अंग्रेजों से आजादी हासिल करने के लिए हिंदू धर्म में विश्वास रखने वालों में जोश भरने के लिए लिखी गई। ठीक उसी प्रकार जैसे मुस्लिम में जोश भरने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फतवा जारी किया गया। और नारे तकबीर बुलंद किया गया?
मगर आज इसकी अनिवार्यता क्यों???
वंदे मातरम गीत में भारत को देवी-रूपक के माध्यम से चित्रित किया गया है। इसमें हिंदू धार्मिक (देवी-देवता, मूर्तियाँ) का प्रयोग है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे सभी स्कूलों में अनिवार्य करने का निर्णय लिया। इसे लेकर संसद में 10 घंटे बहस हुई ।
वंदे मातरम गीत की आखिरी पंक्तियां... (हिंदी अनुवाद)
तू ही मेरा ज्ञान, तू ही मेरा धर्म है,
तू ही मेरा अन्तर्मन, तू ही मेरा लक्ष्य,
तू ही मेरे शरीर का प्राण,
तू ही भुजाओं की शक्ति है,
मन के भीतर तेरा ही सत्य है,
तेरी ही मन मोहिनी मूर्ति
एक-एक मन्दिर में,
5.
तू ही दुर्गा दश सशस्त्र भुजाओं वाली,
तू ही कमला है, कमल के फूलों की बहार,
तू ही ज्ञान गंगा है, परिपूर्ण करने वाली,
मैं तेरा दास हूँ, दासों का भी दास,
दासों के दास का भी दास,
अच्छे पानी अच्छे फलों वाली मेरी माँ,
मैं तेरी वन्दना करता हूँ।
क्या कोई मुसलमान जो एक ईश्वरवाद पर यकीन करता है इन पंक्तियों को पढ़ सकता है?
अगर मुस्लिम भी हिन्दू धार्मिक मान्यताओं को स्वीकार कर लें और कण कण में भगवान दुर्गा लक्ष्मी जैसी देवी देवताओं को पुजने लगें तो वह मुसलमान कहलाएंगे?
यहां मुख्य बिंदु यह हैं कि:
राष्ट्रीय भावना बढ़ाना ठीक है।
धार्मिक मान्यताओं वाले गीत को अनिवार्य करना संवैधानिक रूप से विवादास्पद है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत के खिलाफ है।
देशभक्ति को केवल किसी एक गीत या प्रार्थना से नापना सही नहीं। “जन गण मन” और “सारे जहाँ से अच्छा” जैसे गीत पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष और सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य हैं।
किसी भी समुदाय पर सांस्कृतिक या धार्मिक दबाव डालना संवैधानिक और लोकतांत्रिक है ??
देशभक्ति का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसे किसी विशेष धर्म की धार्मिक मान्यताओं के स्वरूप के अनुसार अनिवार्य करना भार जैसे धर्म निरपेक्ष देश में न्यायसंगत या संवैधानिक है??
सभी नागरिकों के लिए धर्मनिरपेक्ष और समावेशी दृष्टिकोण ही उचित है....???
( अ. कवी)
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