Indian Politics

Indian Politics Let's be the "Change" we wish to see in Indian Politics. Join us, be a part of New India, Young India.

In a country of over a billion people, some whose existence is not even accounted for, where more than 37% of the population lives below the poverty line; where more than 10000 children die of hunger and thirst everyday; where almost 65 farmers commit su***de each day due to inability to till their land and repay their debt ;where corruption is extremely rampant; where nearly a fourth of the India

n parliament members face criminal charges , “including human trafficking, immigration rackets, embezzlement, r**e and even murder” and where terrorism, naxalism , inflation are major problems there is an urgent need for an extremely strong and clean political structure where all parties work together in tandem; fractional fighting is stopped and all leaders with criminal cases against them removed. agree that the youth alone cannot uproot the decades old, system of dirty Indian politics but it is also true that we are the future and we do have the power to change things, if we so desire. So let’s at least make an attempt in that direction by starting to speak our hearts and minds and hopefully one day we will be able to make the India of our dreams,bt atleast Voice yourself

08/02/2025

दिल्ली की शिक्षा क्रांति के जनक परमादरनीय श्री मनीष सिसोदिया जी जंगपुरा से चुनाव हारे 🤣

🚩Jai Śrī Rām 🚩🙏🏽🙏🏽🙏🏽
22/01/2024

🚩Jai Śrī Rām 🚩🙏🏽🙏🏽🙏🏽

29/08/2023

भद्रा नक्षत्र में राखी बनवाने के तुरंत बाद ग्रहों का असरl

Abdul is One and the Same.
31/05/2023

Abdul is One and the Same.

शुभ घड़ी का इन्तेज़ार कर रहीं जनता बेचारी...
17/04/2023

शुभ घड़ी का इन्तेज़ार कर रहीं जनता बेचारी...

Her family's net worth is over ₹35,000,00,00,000!Her son in law is the PM of the UK.A Computer Engineer, an Educator & a...
09/03/2023

Her family's net worth is over ₹35,000,00,00,000!
Her son in law is the PM of the UK.
A Computer Engineer, an Educator & a Padma Bhushan.

But still, look at her simplicity. Cooks along with 1000s of other women at Pongala festival, keeping up the Indian tradition.

🥴👍
24/12/2022

🥴👍

दरअसल आप सच को स्वीकार ही करना नहीं चाहते।   कभी बोरे में, कभी सूटकेस तो कभी फ्रिज में मिलती लड़कियों की लाशों पर लोग यह ...
15/11/2022

दरअसल आप सच को स्वीकार ही करना नहीं चाहते।
कभी बोरे में, कभी सूटकेस तो कभी फ्रिज में मिलती लड़कियों की लाशों पर लोग यह मान लेते हैं कि लड़की उदण्ड थी, परिवार की बात नहीं सुनी सो अपनी करनी का फल पा गयी। वस्तुतः यह 99% मामलों में गलत आकलन होता है।
सच यह है कि लड़की फँसती नहीं, फँसाई जाती है। उसके चारों ओर इतना मजबूत जाल बनाया जाता है कि अंततः उसे फंसना ही होता है। लड़के का सहयोग करने वाले हजार होते हैं, पर लड़की को किसी ने बताया तक नहीं होता है कि इन लुटेरों से दूर रहना है।
गाँव में मैट्रिक इंटर में पढ़ने वाली अधिकांश लड़कियां ना तो सोशल मीडिया से जुड़ी हैं, ना ही अखबार पढ़ती या समाचार देखती हैं। जो सोशल मीडिया में हैं भी, वे अपनी सहेलियों, दोस्तों से जुड़ी गीत, गजल शायरी में डूबी हैं। परिवार के लोगों ने कभी ढंग से समझाया तक नहीं होता कि ऐसे लड़कों से दूर रहना है। भरोसा नहीं होता तो अपने पड़ोस की किसी इंटरमीडिएट की स्टूडेंट से पूछिये कि क्या वह इस तरह की सूटकेस वाली घटनाओं को जानती है। आपको उत्तर 'नहीं' में ही मिलेगा।
लड़की का क्या दोष? वह टीवी देखती है, वहाँ प्यार पसरा हुआ है। इंस्टा, फेसबुक पर भी लभ वाली शायरी पसरी हुई है। गार्जियन उससे मिलते भी हैं तो रिजल्ट पर बात करते हैं। धर्म तो कभी बातचीत का हिस्सा ही नहीं होता। वैसी लड़की किसी शिकारी के जाल से कहाँ बच पाएगी?
टीवी पर, स्कूल-कॉलेज में, खेलकूद में, अखबार पत्रिका में, कोर्स की किताबों तक में सेक्युलरिज्म की महिमा गायी जा रही है। ऐसे समय में यदि परिवार भी बच्चों से धर्म को लेकर बात नहीं करे तो फिर बच्ची कैसे समझेगी? ऐसी लड़की को कोई आफताब मिलता है जिसने अपनी फेसबुक आईडी तक में धर्म के कॉलम में "मानवता" लिखा है, और प्रेम की मूर्ति बना उसकी दुनिया बदल देने के दावे करता है, तो उसके लिए बचना आसान है क्या? उसे तो सब सामान्य ही लगेगा न?
और जब लड़की फँस जाती है तो लोग उसे ही गाली देने लगते हैं। लोग भूल जाते हैं कि वह "शिकार" है। जो विरोध शिकारी का होना चाहिये, वह शिकार का होने लगता है। सच यह है कि एक बार फँस जाने के बाद बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता लड़की के पास। एक ओर से इमोशनल ब्लैकमेलिंग तो दूसरी ओर से फोटो वीडियो वायरल करने का भय। कुछ भी कीजिये, वह नहीं निकल पाती।
सूटकेस या फ्रीज में लाश बन कर पड़ी लड़कियों पर हँस कर आप मुद्दे का मजाक भले बना लें, इस भयावह बीमारी को दूर नहीं कर सकेंगे। इसे दूर करने के लिए आपको पीड़ित का नहीं, शिकारी का विरोध करना होगा।
इस भयावह बीमारी पर बात कीजिये, अपने अड़ोस-पड़ोस में चर्चा कीजिये, बच्चियों को बताइये कि वे टारगेट पर हैं। तब बीमारी खत्म हो पाएगी। हँस कर आप शिकारी का मनोबल ही बढ़ा रहे हैं।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

22/10/2022

पिछले दिनों तेलंगाना से एक खबर आई कि एक ही परीक्षा में प्रवेश के लिए हिन्दू लडकियों को अपने गहने, घड़ी, मंगलसूत्र तक उतारने पड़े, और मुस्लिम लड़कियां बुर्का के साथ प्रवेश पा गईं। मैं इस बहस में नहीं पड़ रहा कि परीक्षा में बुर्का के साथ प्रवेश दिया जाना सही है, या मंगलसूत्र तक उतरवा लिया जाना सही है। पर इन दोनों में कोई एक ही सही हो सकता है। लेकिन तेलंगाना में दोनों बातें एक ही साथ हुईं, और इस दोगलेपन पर न वहाँ की सरकार लज्जित हुई, न ही सिस्टम।
किसी देश की शासन व्यवस्था यदि धार्मिक आधार पर इस तरह का भेदभाव कर रही है, तो मुझे नहीं लगता कि उस शासन प्रणाली को लोकतंत्र कहा जाना चाहिये। हिन्दुओं के साथ इस तरह का भेदभाव पाकिस्तान और बंग्लादेश में आम है, पर क्या भारत में भी उन्हें यही व्यवहार भुगतना होगा?
हम पिछले सत्तर वर्षों से यह ढिंढोरा पीट रहे हैं कि हमारा संविधान देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, और धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करता है। तो क्या तेलंगाना में सरकारी परीक्षा में धार्मिक आधार पर हो रहा यह भेदभाव संविधान द्वारा तय किये गए "मौलिक अधिकार" की हत्या नहीं है? और यदि मैं कहूँ कि तेलंगाना की सरकार सीधे सीधे संविधान की ही हत्या कर रही है, तो सही नहीं होगा क्या?
आप सोच कर देखिये, इस सरकारी दोगलेपन को देख कर उन हिन्दू लड़कियों के मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, जिन्होंने न चाहते हुए भी अपना मंगलसूत्र उतारा होगा। सेंटर पर खड़े सुरक्षाकर्मियों, जिन्होंने लड़कियों से मंगलसूत्र उतरवाए, उनमें भी अधिकांश हिन्दू ही होंगे। उन्हें इस असभ्य व्यवस्था का हिस्सा बनते कैसा लगा होगा?
वस्तुतःयह एक बहुत बड़े वर्ग में हीनभावना भरने का उसी तरह का कुत्सित प्रयास है, जो मिशनरियों के दलाल दशकों से करते रहे हैं। अब जबकि ऐसा घिनौना व्यवहार अब सरकारें खुल कर करने लगी हैं, तो यकीन कीजिये आप सन 1947 से ठीक पन्द्रह साल पहले 1932 की स्थिति में जी रहे हैं। 1932 में जीने का अर्थ तो समझ ही रहे होंगे आप।
सच कहिये तो संसार के किसी अन्य देश की राजनीति में इतना विरोधाभास नहीं, जितना इस "इंडिया, दैट इज भारत" में है। यहाँ आजादी के समय से ही भेदभाव को समानता बता कर लागू किया जाता रहा है। समानता का अर्थ एक वर्ग के लिए कर्तव्य की चिंता किये बगैर केवल अपना हक नोंचना है, तो दूसरे वर्ग के लिए समानता का अर्थ चुपचाप त्याग करते रहना है। इस असभ्य मानसिकता की पोषक व्यवस्था स्वयं को कैसे विकसित बता लेती है, यह समझ नहीं आता...
तेलंगाना में हुए इस असंवैधानिक कुकर्म पर पूरे देश में थू थू होनी चाहिये। यह घिनौना है, लोकतंत्र के साथ दुर्व्यवहार है।


सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

04/09/2022

आज देश में आटा 40 रूपये लीटर बिक रहा है - श्री राहुल गांधी जी.

क्या भारत का पाकिस्तान को इस तरह हराना भारत की बेरोज़गारी की समस्या हल कर देगा ?
28/08/2022

क्या भारत का पाकिस्तान को इस तरह हराना भारत की बेरोज़गारी की समस्या हल कर देगा ?

07/08/2022

ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक लाश मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने लाश से बार बार पूछा- "लाश! कौन हो तुम?"
लाश का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्दे लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी लाश थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।
किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से लाश को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- "ऐसी नौकरी तो साली दुश्मन को भी न मिले..."
पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक लाश से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।
इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब लाश बोलने लायक हुई। लाश जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो लाश सुगबुगाई। पुलिस को बल मिला, इंस्पेक्टर ने पूछा- "बुढ़िया बता! किसकी लाश है तू?"
लाश बोली- "वीणा दास को जानते हो दारोगा साहब?"
"कौन वीणा दास? मैं नहीं जानता किसी वीणा वीणा को..."
"पद्मश्री वीणा दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री वीणा दास। वही वीणा, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। जिसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।"
"हैं?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना..." इंस्पेक्टर झुंझला गया था।
लाश ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- "कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये..."
"अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में..." सब एक साथ चीखे।
लाश हँसी। बोली, " सुनो! वीणा के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।"
सबकी निगाह लाश पर जम गई थी। वह बोलती गयी, "कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में उसके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।
विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर उठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए..."
सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, " उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी..."
"फिर?"
"फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो वीणा ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि अब सुखी जीवन जीने के दिन हैं... पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! वीणा ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।"
"फिर?"
"फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया... और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी... वहीं से निकल ली।"
"ओह... हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?"
" हाँ जी! पर दुखी मत होवो आपलोग! जब मैं दुखी नहीं तो तुमलोग क्यों हो रहे हो? मुझे मेरा देश बहुत प्रिय है। मैं यहाँ मर कर भी बहुत प्रसन्न हूँ।"
"लेकिन सरकार को तो आपकी व्यवस्था करनी चाहिये थी। इतनी बुरी मृत्यु... उफ्फ!"
"सरकार तो सरकार ही होती है जी, वह अंग्रेजों की हो या भारतीयों की हो... कुछ नहीं बदलता! जिसे देश की जनता भूल जाय उसे सरकारें क्या याद रखेंगी।"
भीड़ छंटने लगी। सब अपने अपने काम में लगे। लाश भी जला दी गयी। पर इंस्पेक्टर के साथ कुछ गड़बड़ हो गया। वह जब भी अपने कार्यालय में टंगा भारत का नक्शा देखता तो उसे उसमें लाश की तस्वीर दिखती, और तब उसकी आँखों में केवल लज्जा होती थी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

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