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FolkBrain Creative Chapter of RIRKCLRC. "THIS IS THE DEFINITIVE DESTINATION OF CULTURE; IF IT'S NOT HERE, IT DOESN'T EXIST.

A Secure India Through Technology - A Scientific Initiative Towards Digital Justice #डॉकैलाशकुमारमिश्र In this this most...
18/09/2026

A Secure India Through Technology - A Scientific Initiative Towards Digital Justice
#डॉकैलाशकुमारमिश्र

In this this most intense race of science, it does not seem at all justifiable that any person - irrespective of their society, caste, religion, sect or gender - should perpetrate atrocity upon another.
Based on my personal experience gained through wandering across the length and breadth of India for the last forty years, I have no hesitation in accepting that people belonging to the SC/ST communities are still subjected to discrimination in some regions, and to physical and mental harassment. Such a system has no place in a civilised and democratic society. A comprehensive and equitable remedy for this must indeed be found. But this also does not mean that any innocent person should be falsely implicated. Its solution can be found quite easily through science. The discoveries of science and their honest application are what make society just, equitable and democratic in the present age.
If the government is honest and genuinely wishes to solve the problem, it can guarantee the safety of all citizens across India. You have already witnessed the marvel of UPI and Aadhaar.
By assigning a comprehensive project to scientists from engineering, forensic science and other research institutions of science, every individual can be made secure. By developing a meaningful and investigative scientific app, every activity such as crime and human exploitation can be controlled.
This work can be carried out in different phases. In the first phase, this facility should be given to people belonging to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. They and their surroundings can be linked with hidden camera sensor chips, so that the image and activity of any person doing anything wrong to them would be automatically captured on camera. If such a facility can be installed in public vehicles to ensure the safety of passengers, then why can it not be done for the security of the most marginalised sections of society?
In the second phase, persons with disabilities; in the third phase, all women; in the fourth phase, senior citizens; and in the final phase, the entire public could be included under this safety shield.
Just do this, but do it in a highly scientific manner. Deploy the best minds of the country on this task on a war footing and include legal experts alongside them. See how quickly and at how little cost a solution will emerge. Perhaps this entire system could be established in half the amount of compensation that the government pays in just the first year.
But for this, strong willpower, thinking that rises above politics, the courage to come out of vote-bank thinking, and above all, a spirit of patriotism are essential. This will be honest, democratic and transparent digital justice. This justice will be for everyone. Everyone will have faith in its credibility.
However, for this, the intention must be kept honest. One must come out of the narrow thinking of vote banks. This is the only meaningful and holistic solution to it; otherwise, the country has almost reached a state of civil war.

मैथिली भाषा कोनो भाषा सं बिना तुलना केनो शास्त्रीय भाषा अछि  #डॉकैलाशकुमारमिश्र प्रति दिन दुनिया केर कोनो ने कोनो भाग मे...
10/09/2026

मैथिली भाषा कोनो भाषा सं बिना तुलना केनो शास्त्रीय भाषा अछि
#डॉकैलाशकुमारमिश्र

प्रति दिन दुनिया केर कोनो ने कोनो भाग मे इतिहास केर नव परत खुजि रहल छैक । जे पुरान छल से पछुआ रहल अछि आ दोसर देश आ संस्कृति आब अधिक पुरान स्थापित भ रहल अछि । ताहिं भाषा संस्कृति के प्रति साकांक्ष रहक चाही ।
एक मानव विज्ञान केर विद्वान भेलाह सर एडवर्ड एवांस प्रित्चार्ड (Sir Edward Evans-Pritchard)। ओ सूडान केर नुएर जनजाति मे लगातार दू वर्ष धरि रहैत ओकर संस्कृति आ भाषा सिखलनि। जखन भेलनि जे सभ किछु सिखा गेल तखन इंग्लैंड लेल विदा भेलाह । जहिया जेबाक छलनि ताहि सं एक राति पहिने एक नुएर जनजाति केर वैद्य जे ओझा सेहो छल हुनका लग आबि जिज्ञासा केलकनि: "अपने जा रहल छी?"
"जी" सर उत्तर देलथिन्ह।
"अपने हमर नुएर समाज केर सभ बात आ शब्द केर अर्थ बुझि गेलहुं?"
"जी! सभ किछु विस्तार स। एक - एक बात आ विधान केर जानकारी लिख लेने छी। ओकर स्केच बना लेने छी। हमर काज आब संपूर्ण भेल" इवांस-प्रिचार्ड उत्तर देलथिन। हुनक उत्तर मे हुनक आत्मविश्वास देखा रहल छलनि।
हुनक एहि बात पर मुश्की दैत न्यूर ओझा पुछलकनि: "हमरा लग तीन शब्द अछि, तकर अर्थ कने बता देब?"
एवांस-प्रित्चार्ड महोदय लग तकर उत्तर नहि छलनि। अर्थ भेल, अहाँ कोनो भाषा भले ओकर लिखित साहित्य न्यून छैक, ओकर अपन लिपि नहि छैक, हड़बड़ी मे नव अथवा पुरान नहि कहि सकैत छी। तीन चारि साल साल ओहि समाज मे रहला सं अहाँ ओहि भाषा केर विशेषज्ञ नहि भ सकैत छी। अपन अंतिम निष्कर्ष देब सं पहिने दोसर लोक केर लेल स्कोप रह दियौक । सर जॉर्ज अब्राहम ग्रिएरसन किछु दिन बिहारी भाषा लेल काज केलनि। नीक काज केलाह । मुदा हुनक काज अंतिम नहि छलनि। बहुत विशेषता ओ मैथिली भाषा केर नहि क' सकलाह । भाषा केर सभ पक्ष केर जानकारी भाषा विज्ञान सं संभव नहि छैक । ओहि लेल जरुरी छैक जे फोकलोर (लोक विद्या), समाजशास्त्र, इतिहास, संस्कृति केर आन-आन पक्ष, एथनोग्राफी, एथनोलोजी आदि पर विचार करैत ओकर संपूर्णता के बुझी।
सभ सं जरुरी छैक जे अपन भाषा, ओकर इतिहास, साहित्यकार, सभ किछु पर गर्वित अवश्य होई । बाल बच्चा के अपन भाषा अवश्य सिखाबी आ बताबी जे हमर भाषा (मैथिली) कतेक उन्नत आ प्रांजल भाषा अछि । एक सावधानी अवश्य राखी - कखनो अपन भाषा के नीक कहक क्रम मे दोसर कोनो भाषा केर उपहास नहि करी। सभ भाषा केर अपन उन्नत संस्कार होइत छैक । सभ भाषा केर लिखित अथवा मौखिक वा लौकिक इतिहास आ इतिहास केर गौरवबोध होइत छैक । तखन ओहि भाषा के निम्न अथवा तुच्छ कहबाक की प्रयोजन?
आब अबैत छी मैथिली भाषा पर । मैथिली बहुत विकसित आ गर्वित भाषा अछि । मिथिला भूमि सदैव तीर्थक्षेत्र रहल अछि। ज्ञान क्षेत्र त रहले अछि । ताहिं मैथिली निर्विवाद रूप सं शास्त्रीय भाषा केर श्रेणी मे अछि। सरकार अथवा संस्थान अगर कोनो राजनीती सं एकरा शास्त्रीय भाषा नहि घोषित क'' रहल अछि त ई सरकार अथवा संस्थान वा तंत्र केर दोष भेल । हमरा सभके मैथिली केर स्थान शास्त्रीय भाषा मे हो ताहि लेल सभ तरहक प्रयास करक चाही। मुदा कोनो भाषा संग तुलना करैत ई भाषा पैघ त ई भाषा छोट केर राजनीति सं दूर रहक चाही। स्पष्ट करैत चली जे इ हमर अपन मान्यता आ अपन सोच अछि । अगर किनको एहि सोच सं दिक्कत छनि त ओ स्वतंत्र छथि - जेना इच्छा होनि तेना करथि।
एक चीज देखैत छी जे हमरा लोकनि मैथिली पुरान की तमिल पुरान? एहि तरहक त्वंचाहंच मे लागल रहैत छी । हमरा जनैत भाषा कोन पुरान छैक - तमिल की मैथिली , ई महत्व केर चीज नहि छैक। शास्त्रीय भाषा केर दर्जा भेटबाक लेल भाषा के बहुत पुरान रहब अनिवार्य नहि छैक।
मलयालम के सेहो शास्त्रीय भाषा केर दर्जा भेटल छैक। तमिल जकां मलयालम के अपन शब्द नहिए जका छैक। अगर तमिल केर शब्दावली स सभ संस्कृत केर शब्द हटा देबैक तखनों तमिल भाषा जीबैत रहतैक मुदा मलयालम मे स संस्कृत हटा लेबैक त छुच्छे तमिल आ एक आध कन्नड़ भाषा केर शब्द रहि जेतेक। एकर की मतलब? एकर अर्थ भेल जे भाषा के जाहि स्वरूप केर लेखन आ साहित्य फॉर्मेट मे हम अहा देख रहल छी से पुरान अथवा नव होइत छैक। भाषा लोक केर आवागमन, नव विचार केर उत्पत्ति केर संग, एक समाज स दोसर समाज केर लोक केर आवागमन, व्यापर, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि स अपन स्वरूप बदलैत रहैत छैक।
लिपि से अनेक बेर बदलि जाइत छैक। नेपाली एकर जीवंत प्रमाण अछि। नेपाली छह स अधिक लिपि मे लिखल जा चुकल अछि। बांग्ला से एक समय मे गौरीय लिपि मे लिखल जाइत छल, आब अपन बंगलाक्षर लिपि छैक। संस्कृत अनेक काल खंड मे अनेक भौगोलिक क्षेत्र मे अलग-अलग लिपि मे लिखल जा रहल अछि। आई धरि संस्कृत केर एक स्पष्ट लिपि नहि भ सकल अछि। अनेक जनजातीय भाषा लग ने लिपि छैक आ ने लिखित साहित्य मुदा ओ भाषा बहुत प्राचीन छैक। ओकर साहित्य मौखिक आ लौकिक केर डेग धेने बढ़ि रहल छैक।
विद्यापति मैथिली केर महान साहित्यकार छथि। हुनका स मैथिली भाषा अधिक प्रखर होइत अछि मुदा मैथिली के विद्यापति आ ज्योतिरीश्वर धरि रोकि देब उचित नहि।
नोट: ई नागा मिरचाई छैक , अपन मिथिला केर लौंगिया मिरचाई केर जेठ भाई। मतलब भेल जे ई करु आ रूप दूनू मे अपना सभक मिरचाई स चारि गुणा पैघ छैक। ई छवि फेसबुक स लेल गेल छैक।

मनुस्मृति बाजार और विकृति  #डॉकैलाशकुमारमिश्र मानसिक विकृति को त्यागने की आवश्यकता है। यदि आप किसी ग्रंथ को, जिसकी रचना ...
07/09/2026

मनुस्मृति बाजार और विकृति
#डॉकैलाशकुमारमिश्र
मानसिक विकृति को त्यागने की आवश्यकता है। यदि आप किसी ग्रंथ को, जिसकी रचना प्राचीन काल में हुई है, केवल इस कारण जलाते हैं या उसका अपमान करते हैं कि उसमें कुछ बातें आज के अनुकूल नहीं हैं, तो फिर सभी धर्मों के ग्रंथों को जलाना पड़ेगा। क्योंकि प्रत्येक धार्मिक ग्रंथ की रचना देश-काल को ध्यान में रखकर की जाती है। समय के प्रवाह में स्वाभाविक है कि उसका कोई अंश वर्तमान संदर्भ में सटीक न बैठे।

फिर इसका समाधान क्या है? समाधान यही है कि वर्तमान को ध्यान में रखकर उसमें परिवर्तन कर लिया जाए। ग्रंथ का संशोधन किया जाए। जो अंग आज अप्रासंगिक हो गया है, उसमें सुधार किया जाए — पूरे ग्रंथ को जला देना कहाँ तक उचित है? जलाने का कार्य जाहिल, निरंकुश, पागल और आक्रांताओं का है।

अभी कहीं पढ़ा कि भारतीय बाज़ार में अचानक मनुस्मृति की बिक्री बढ़ गई है। समाचार माध्यम खुश हो रहे थे कि लोगों ने मनुस्मृति पढ़ना शुरू कर दिया है। मुझे लगता है, यह भ्रम है, एक गलत धारणा है। सच तो यह है कि घृणित मानसिकता वाले लोग मनुस्मृति की इन पोथियों को जलाने और अपवित्र करने के लिए खरीद रहे हैं। इन पोथियों को जलाकर उनके अहंकार को शांति मिलती है।

जो लोग संस्कृत के विद्वान हैं, जो तुलनात्मक अध्ययन करना चाहते हैं, वे मनुस्मृति नहीं पढ़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि आज के समय में मनुस्मृति की जो पांडुलिपियाँ अथवा ग्रंथ उपलब्ध हैं, वे अलग-अलग प्रकार के हैं। अर्थात मूल ग्रंथ में अनेक प्रकार के छेड़छाड़ किए गए हैं। उसकी प्रामाणिकता की गारंटी देने को कोई तैयार नहीं है। फिर आप जला किसे रहे हैं?

इसीलिए आवश्यकता है कि जो भी पांडुलिपि या पुस्तक उपलब्ध है, उसमें क्षीर-नीर विवेक से काम लीजिए। जो अच्छे बिंदु, विचार और भाव हैं, उन्हें स्वीकार कीजिए, जो गलत है उसे छोड़ दीजिए, उसका संशोधन कीजिए। ज्ञान ग्रहण कीजिए, लड़िए मत, विनम्र रहिए।

03/09/2026

आरक्षण हटाओ आंदोलन और सवर्ण नेताओं का भविष्य
#डॉकैलाशकुमारमिश्र

आरक्षण हटाओ आंदोलन ने सभी दलों के सवर्ण नेताओं की नींद उड़ा दी है।
जो तथाकथित कोचिंग गुरु यह सोचते हैं कि यह कह देने से कि "ब्राह्मण तीन हजार साल से आरक्षण ले रहे हैं", उनके पास हिंदी माध्यम के छात्र पढ़ने आएंगे और उनकी मोटी कमाई होती रहेगी, उनकी भी स्थिति अब ठीक नहीं है। उनके आँकड़े ध्वस्त हो रहे हैं, उनका डेटा माइनिंग बिखर रहा है और उनकी विश्वसनीयता का अंत निकट है।
यदि इस देश की 85 प्रतिशत से अधिक आबादी ओबीसी, आदिवासी और दलित है और वही वर्ग आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर है, तो फिर आरक्षण आर्थिक आधार पर दीजिए। जाति की आवश्यकता ही क्यों है?
जिस प्रकार मुफ्त राशन, गैस सिलेंडर, बिजली, घर, शौचालय, वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं का सबसे अधिक लाभ इन वर्गों को मिलता है, उसी प्रकार आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण का लाभ भी उन्हें मिलेगा।
अब सवर्ण नेताओं को न चाहते हुए भी सवर्णों के हक में बोलना ही पड़ेगा। आखिर वे जाएंगे कहाँ?
जब दलित, आदिवासी, मुसलमान और ओबीसी नेता अपने समाज के लिए खुलकर बोल रहे हैं, जब देश के प्रधानमंत्री को अपने ओबीसी होने पर गर्व है, तो फिर सवर्ण नेताओं को अपने समाज के लिए बोलने में क्या आपत्ति है?

01/08/2026
मैथिली मरसिया : एक परिचय  #डॉकैलाशकुमारमिश्र जब मैं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में कार्य कर रहा था, तब एक कार्यक्...
27/06/2026

मैथिली मरसिया : एक परिचय
#डॉकैलाशकुमारमिश्र

जब मैं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में कार्य कर रहा था, तब एक कार्यक्रम का आयोजन किया था — _अक़ीदत के रंग!_ इस कार्यक्रम के अंतर्गत इस्लामिक परंपरा में गायन और परफॉर्मेटिव परंपरा के लोक-पक्षों पर कार्य करना था। विद्वानों के विचार, स्थानीय विशेषताएँ, अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक भू-भागों में उनके जो स्वरूप हैं, उन्हें जानना और कलाकारों को बुलाकर उनके कार्यक्रम करवाना भी इसका लक्ष्य था। अनेक भाषाओं और क्षेत्रों को शामिल करने का प्रयास किया गया था। यह एक संयोग ही था कि हम इस परंपरा के अंतर्गत मूलतः मुसलमान आबादी तक, वह भी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और कुछ अन्य भागों तक ही सीमित रह पाए। यह कमी हमारी थी। अनेक विधाओं में एक महत्वपूर्ण विधा का नाम मरसिया था।

मरसिया का अर्थ होता है शोक-गीत। इसमें शहादत, वीरता, सौंदर्य, पौरुष और त्याग की गाथा छंद के माध्यम से कही जाती है। जहाँ तक मुझे याद है, उस समय यह उर्दू, अवधी, हिंदी, मालवी, फ़ारसी आदि भाषाओं में गाया गया। मरसिया में महिला कलाकारों ने भी हिस्सा लिया। जब मैं मरसिया-कलाकारों को सुन रहा था, तब मुझे लगा कि मिथिला में मुसलमान मरसिया मैथिली भाषा में गाते हैं। मैंने अपनी फील्ड डायरी खोलनी शुरू की तो अनेक गीत मिले जो मरसिया-गीत थे। कई गीतों का संकलन मैंने स्वयं 1986 से 1999 तक किया था। कुछ गीत संकलित पुस्तकों से थे, जो अब 50 साल से अधिक पुराने हैं।

मरसिया में करबला की कथा है। इससे पहले हसन और हुसैन की कथा है, उनके स्वरूप का वर्णन है। उनका बाल-सुलभ स्वरूप है, उनकी शौर्य-गाथा है। फिर उनका युद्ध में जाना और शहादत की गाथा है।

कुछ मरसिया तो उदासी और _समदाउन_ फॉर्मेट में भी गाए जाते थे। उनके शब्द और शैली भी वही थे। हाँ, बीच-बीच में _‘हाय जी! हाय जी!’_ की बारंबारता से सामूहिक कारुणिक स्वरूप दिया जाता था। गाते समय महिलाएँ आँखों से झर-झर आँसू बहाती रहती हैं, इसीलिए मैथिली में इसे _‘झड़नी’_ भी कहा जाता है।

नैरेटिव बेजोड़ होता है। जैसे राम और लक्ष्मण का वर्णन किया जाता है, वैसे ही बाल-स्वरूप में महिलाएँ हसन और हुसैन का वर्णन करती हैं। अयोध्या की तरह मक्का और मदीना का वर्णन मिलता है। दोनों भाइयों की तुलना _‘सुगबा’_ अर्थात् सुंदर तोते से की जाती है। कुछ शब्द याद आ रहे हैं:

_"हाय जी कहमा जनम लेल लाल एक सुगबा_
_कहमा जनम दूनू भइये हाय।।_
_मक्का जनम लेल लाल एक सुगबा_
_मदीना जनम दूनू भइये हाय।।"_

इसी तरह के अनेक गीत हैं जो ठेठ मैथिली में हैं और इस कथा-गाथा का कारुणिक बखान करते हैं। सामूहिक गान की विशेषता यह है कि गायक भले ही मुसलमान महिला या अन्य लोग हों, उनके श्रोता हिंदू महिलाएँ, पुरुष और बच्चे होते हैं। वे न केवल गीत सुनते हैं, कथा के साथ रोते हैं, कथा की यात्रा करते हैं, अपने को उत्सव का साक्षी बनाते हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं के साथ छाती पीटकर गीत के बोल भी पीछे-पीछे दोहराते रहते हैं।

खैर! इस पर फिर कभी।
एक बात और स्पष्ट करना जरूरी है कि मैंने 1981 से 1990 तक मिथिला के मुसलमानों, विशेष रूप से कुजरा समुदाय — जो मेरे गाँव अरेड़ और बगल के गाँव नागदह और रहिका में रहते हैं — को हिंदुओं की तरह धोती पीछे से खोंसकर पहनते देखा है। नागदह में मेरी माता जी के गाँव की एक मुसलमान महिला _कुजरनी_ थीं, रेशमा नाम था उनका। मेरी माँ से उम्र में बहुत बड़ी थीं। सप्ताह में एक-आध बार हरी सब्ज़ी की टोकरी सिर पर लेकर बेचने चली आती थीं। रेशमा मेरे दरवाजे पर आते ही मेरी माँ को आवाज़ देतीं: _"हमर गामक बहिनिया"_। मेरी माँ भावुक हो उठतीं। जो भी घर में बना होता, खिलातीं। माँ हम लोगों को निर्देश देतीं कि "इन्हें रेशमा मौसी बोलो!" हम लोग भी माँ के वचन का पालन करते। एक बार रेशमा बोलीं कि उनके यहाँ भी विवाह में कोहबर बनता है और वे लोग गीत गाती हैं। एक गीत के कुछ शब्द गाकर भी सुनाए। उस समय न तो मैं उस गीत को रिकॉर्ड कर सका, न ही उसके बोल लिख सका। बाद में जब एक साल बाद गाँव गया तो पता चला कि रेशमा का इंतकाल हो गया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि वहाँ जो मुसलमान एक अलग तरह की मैथिली बोलते हैं, उस पर भी काम हो। यद्यपि कुछ साहित्यकारों ने इस दिशा में न्यून मात्रा में कार्य किया है, लेकिन इस पर विस्तार देने की आवश्यकता है। प्रो. विभूति आनंद जी ने कुछ काम किया है, जिसकी जानकारी मुझे है। और लोगों ने अगर काम किया है तो जानने की उत्सुकता है।

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