17/01/2026
इतिहासकार सूर्यनाथ कामत ने अपनी किताब में विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय के राज्याभिषेक का निरूपण किया है जिसमें इनकी पदवियों का बड़ा सुंदर व्याख्यान है।
श्रृंगेरी पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी विद्यारण्य महाभाग के आशीर्वाद एवं निर्देश पर प्राचीन किष्किंधा नगरी के हम्पी में रामराज्य की परिकल्पना पर जिस महान हिंदू साम्राज्य विजयनगर की आधारशिला रखी गई, सम्राट कृष्णदेव राय उस परंपरा के संवर्धन हेतु वर्ष 1509 में राजपद पर अभिषिक्त हुए।
राजदरबारी और विद्वान छंद बद लय में उद्घोष करते हैं:
" श्रीमत् समस्त भुवनाश्रय, राजाधिराज, राजपरमेश्वर...
पूर्व, पश्चिम, दक्षिण समुद्राधीश्वर...
अरि राजराय गंदर्भ रुंड,
यदुकुल संजात, तुळुव वंशोद्भ
नरस भूपालतनय,
श्री विरूपाक्षपाद पद्माराधक, श्रीतिरुपति पद्माराधक,
हिंदू धर्म प्रतिष्ठापनाचार्य, गो-ब्राह्मण प्रतिपालनाचार्य,
कर्नाटक रत्न सिंहासनाधीश्वर, सम्राट कृष्णदेव राय की जय. .."
इसमें :
" #यदुकुल_संजात_तुळुव_वंशोद्भ_नरस_भूपाल_तनय
का भावार्थ है:
*यदुकुल से उत्पन्न राजा तुळुव के वंश के नरसिंह/नरस के पुत्र*
तथा "श्री विरूपाक्षपाद पद्माराधक, "श्री तिरुपति पद्माराधक"
गो-ब्राह्मण प्रतिपालनाचार्य,"
का अर्थ है:
भगवान शंकर और तिरुपति भगवान के श्रीचरणों के परम् उपासक और गौ ब्राह्मण रक्षक।
वेद मंत्रों का उदघोष हुआ तथा कृष्णदेव ने दिग्देवताओं को प्रणाम कर सिंहासन की परिक्रमा की तथा मंगलवाद्य के साथ सिंहासन पर सुशोभायमान हुए।
धर्मनीति से आजीवन शासन करने वाले सम्राट कृष्णदेवराय की आज 555वी जयंती है।