21/09/2026
📌 कांग्रेस का ओवैसी संग गठबंधन से इनकार — इंडी गठबंधन को कितना डैमेज करेंगे भाईजान? 📌
यूपी में विधानसभा चुनाव को 150 दिन से भी कम बचे हैं और इसीलिए शह-मात की रणनीति बननी शुरू हो चुकी है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी के मुख्य विपक्षी दलों के आगे गठबंधन की गुहार लगाई लेकिन कांग्रेस ने ओवैसी को सीधा जवाब दे दिया — "न कोई बात है, न कोई गठबंधन।"
❓ लेकिन सवाल है कि क्या यह इनकार इंडी गठबंधन को महंगा पड़ सकता है? आइए आंकड़ों से समझते हैं।
📍 ओवैसी का गंठबंधन प्रस्ताव 📍
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने विपक्षी दलों के सामने गठबंधन का प्रस्ताव रखा है। उनका कहना है कि पार्टी नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी तीसरी बार सरकार बनाए, और अगर विपक्ष सच में बीजेपी को रोकना चाहता है तो AIMIM के साथ आना होगा।
👉 जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने साफ इनकार कर दिया — उनका आरोप है कि ओवैसी सिर्फ मुसलमानों की बात करते हैं, और "बंदूक तानकर" गठबंधन नहीं होता।
❓अब सवाल — यह सिर्फ बयानबाजी है, या इसके पीछे असली सियासी गणित है?
📍 यूपी में मुस्लिम वोट कितना बड़ा फैक्टर?📍
2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी करीब 19.3 प्रतिशत थी। लेकिन ये आंकड़ा वक्त के साथ बदला है — 2024 के लोकसभा चुनावों तक अनुमानों के मुताबिक यह हिस्सेदारी बढ़कर करीब 24% तक पहुंच गई और अब 2027 के चुनाव से ठीक पहले, SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) के बाद के आंकड़ों को लेकर भी बहस तेज है — दावा किया जा रहा है कि SIR से पहले मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 18.6% थी, जो अब बढ़कर 19.5% के आसपास पहुंच गई है, और नए जुड़े मतदाताओं में करीब 35% मुस्लिम बताए जा रहे हैं। हालांकि ध्यान रहे — मतदाता सूची में धर्म के आधार पर आधिकारिक वर्गीकरण नहीं होता, ये सारे आंकड़े दावों और अनुमानों पर आधारित हैं।
👉 यानी संख्या भले ही 19% से 24% के बीच झूलती हो, लेकिन एक बात तय है — यूपी में मुस्लिम वोट किसी भी चुनाव को पलटने का माद्दा रखता है।
📍 कहां-कहां असर डालता है ये वोट?📍
सिर्फ आबादी का प्रतिशत काफी नहीं, असली खेल सीटों पर होता है। यूपी में करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं, जबकि करीब 107 सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मतदाता नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं। इनमें ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई और पूर्वी उत्तर प्रदेश की हैं — यानी मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, बरेली, बिजनौर, मेरठ, रामपुर, संभल जैसे जिले।
👉 2022 में इन इलाकों में SP गठबंधन का दबदबा रहा — कैराना, बेहट, सहारनपुर ग्रामीण जैसी सीटें सपा गठबंधन ने अच्छे मार्जिन से जीतीं।
📍 असली 'डेंजर जोन': वो सीटें जो चंद वोटों से तय हुईं📍
अब आता है सबसे दिलचस्प हिस्सा। 2022 के यूपी चुनाव में कुल 15 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का फैसला 1000 वोटों से भी कम अंतर से हुआ। इनमें से 6 सीटें BJP, 2 RLD और 7 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में गईं।
👉सबसे नजदीकी मुकाबला रहा धामपुर सीट पर, जहां BJP के अशोक कुमार राणा ने सपा के नसीम उल हसन को सिर्फ 203 वोटों से हराया।
🫵सोचिए — अगर इन जैसी सीटों पर एक नया मुस्लिम-केंद्रित विकल्प मैदान में उतरता है, तो चंद हजार वोट भी नतीजा पलटने के लिए काफी हैं।
📍क्या बिहार वाली कहानी यूपी में दोहराएगी?📍
यहीं पर बिहार का उदाहरण याद आता है। 2020 के बिहार चुनाव में AIMIM ने कुल 18 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 5 सीटें जीत लीं, और कई सीटों पर RJD उम्मीदवारों की हार का कारण ओवैसी के उम्मीदवारों को माना गया। सीमांचल की 24 सीटों में से महागठबंधन सिर्फ 7 ही जीत पाया था।
🫵 2025 में भी यही तस्वीर दोहराई गई — AIMIM ने 25 सीटों पर लड़कर फिर 5 सीटें जीतीं और 1.88% वोट हासिल किए, जबकि सीमांचल में महागठबंधन बुरी तरह बिखर गया। और दिलचस्प बात — इस बार अख्तरुल इमान की अगुवाई में AIMIM की बिहार इकाई ने खुद महागठबंधन से जुड़ने का प्रस्ताव भी दिया था, ताकि वोट बंटवारा रुके, लेकिन गठबंधन ने इसे शक और बेरुखी से ही देखा।
👉 यानी सवाल सिर्फ काल्पनिक नहीं — बिहार में यह स्क्रिप्ट एक बार नहीं, दो बार चल चुकी है।
📍अब यूपी में भी वही पैटर्न दिख रहा है — ओवैसी हाथ बढ़ा रहे हैं, कांग्रेस इनकार कर रही है। कांग्रेस का तर्क है कि ओवैसी और बीजेपी की "अंडरस्टैंडिंग" है, और गठबंधन ब्लैकमेल से नहीं बनता।
लेकिन 15 सीटें जो 2022 में 1000 वोटों से कम अंतर से तय हुईं, 107 सीटें जहां अल्पसंख्यक वोट निर्णायक है — इन आंकड़ों के आगे बिहार वाला इतिहास दोहराया गया तो इंडी गठबंधन को यूपी में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।📍