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बीकानेर की वो परंपरा, जो पूरे देश के लिये सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बन रही है-Sumit Sharma कभी बंगाल में मुर्शिदाबाद ...
20/10/2025

बीकानेर की वो परंपरा, जो पूरे देश के लिये सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बन रही है

-Sumit Sharma

कभी बंगाल में मुर्शिदाबाद घटना, तो कभी यूपी में मुज़फ़्फ़रनगर कांड। जिस दौर में आए दिन मीडिया ऐसी ख़बरों से सराबोर रहती है, उसी दौर में बीकानेर की एक 'परंपरा' पूरे देश के लिए सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बनती जा रही है। यह परंपरा है- मुस्लिम शायरों द्वारा हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ रामायण का उर्दू पाठ।

क्या ?? 'मुस्लिम' शायरों द्वारा 'हिंदुओं' के पवित्र ग्रंथ 'रामायण' का पाठ? वो भी उर्दू में? जी हां ! बीकानेर में साल 2012 से यह परंपरा निभाई जा रही है। जिसमें दीपावली के मौक़े पर मुस्लिम शायर.. हिंदुओं की जाजम पर बैठकर रामायण का उर्दू पाठ करते हैं। इस दौरान धर्म और मज़हब के फासले मिट जाया करते हैं। आज के दौर में ऐसे आयोजन विरले हैं। इस बार भी 19 अक्टूबर को बीकानेर के होटल मरुधर हैरिटेज में इसका आयोजन किया गया। जिसमें वरिष्ठ शायर जाक़िर अदीब और असद अली 'असद' ने रामायण का उर्दू पाठ किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के तौर पर हाजी मक़सूद अहमद और विशिष्ट अतिथि के तौर पर कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने शिरकत की। अध्यक्षता हाफ़िज़ फरमान अली ने की। कार्यक्रम का आयोजन और संचालन डॉ. जिया-उल-हसन क़ादरी ने किया। इस अनूठे पाठ को सुनने के लिये सभी धर्मों के प्रबुद्धजनों ने हिस्सा लिया।

आयोजन की ख़ास बात यह कि इसमें शे'र-औ-शायरी के अंदाज़ में रामायण का पाठ किया जाता है। असद अली.. तुलसीदास की रचना पर राणा लखनवी का लिखा कलमा अपनी जुबां में पेश करते हैं-

किस क़दर पुरलुत्फ़ है अंदाज तुलसीदास का,
ये नमूना है गुसाई के लतीफ़ अहसास का। ♫♪
नक्शा रामायण में किस ख़ूबी से खींचा,
रामचंद्रजी के चौदह साल वनवास का।। ♫♪

तिस पर सामने बैठे लोगों की दाद मिलती है- "वाह ! वाह!"

अब सुनिये, राम-कैकेई के प्रसंग को क्या हरफ दिये गये हैं-

ताज़पोशी की ख़ुशी में एक क़यामत हो गई,
कैकेई को रामचंद्रजी से अदावत हो गई। ♫♪
सुबह होते-होते घर-घर इसका चर्चा हो गया,
जिसने भी किस्सा सुना, उसको अचम्भा हो गया। ♫♪

सामने से प्रतिक्रिया आती है- "क्या बात है ! जीयो असद भाई.."

रंजो हसरत की घटा सीता के दिल पर छा गयी,
गोया जूही की कली थी, ओस से मुरझा गयी। ♫♪
देखने को जाहिरा हनुमान जी की चल गयी,
वर्ना सीता की ये आहें थीं कि लंका जल गयी। ♫♪

कोई बोला- "वाह ! कमाल कर दिया।"

अब ज़रा जाक़िर अदीब की जुबानी राम के 14 साल के वनवास की कहानी सुनिये-

कोई भाई लक्ष्मण सा भाई पा सकता नहीं,
हौसला कोई भरत का सा दिखा सकता नहीं।♫♪
कोई सीता की तरह विपदा उठा सकता नहीं,
मर्तबा तो देखिये, सीता के इस्तकलाल का,
सैल था क्या काटना, जंगल में 14 साल का?♫♪

इतना सुनते ही पूरा सदन "वाह-वाह" से गूंज उठा।

इस तरह एक के बाद एक रामायण के सभी प्रसंगों को उर्दू जुबान में सुनाया जाता है। इस आयोजन से जुड़े बीकानेर के डॉ. जिया उल हसन क़ादरी कहते हैं, "यह परंपरा साल 2012 से चली आ रही है। हमें एडवोकेट उपध्यान चंद्र जी कोचर से इसका मार्गदर्शन मिला था। हम सांप्रदायिक सौहार्द की इस परंपरा को और आगे ले जाना चाहते हैं। रामायण का यह उर्दू रूपांतरण रामजी के वनवास, रावण पर विजय और अयोध्या लौटने का जीवंत वर्णन करता है। पूरी उर्दू रामायण को 25 मिनट में पूरा पढ़ा जा सकता है, जिसकी महक पूरे देश तक जाती है।''

असद अली असद का कहना है कि "उर्दू में लिखी रामायण आज ज़्यादा प्रासंगिक है. एक मौलवी ने सालों पहले उर्दू रामायण लिखी और आज भी उसका वाचन.. इस्लाम का कोई अक़ीदतमंद करता है. यह हमारी गंगा-जमुनी तहजीब नहीं तो और क्या है? यह कार्यक्रम हर साल पर्यटन लेखक संघ और महफिल-ए-अदब संयुक्त रूप से किया जाता है। जिसमें 2-3 मुस्लिम शायर रामायण का काव्यात्मक पाठ करते हैं।"

बहरहाल, बीकानेर के इस अनूठे आयोजन की सौंधी ख़ुशबू आहिस्ता-आहिस्ता पूरे देश में फैल रही है। यह परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब और मज़हबी सौहार्द की मिसाल के तौर पर पहचानी जाने लगी है। पूरे देश में भाईचारे का सुंदर संदेश पहुंच रहा है। अगर किसी को 'सर्वधर्म समभाव' के भावों को क़रीब से महसूस करना हो तो उन्हें इस आयोजन में ज़रूर शरीक होना चाहिये।

उर्दू रामायण परंपरा का इतिहास-

मिली जानकारी के अनुसार- बीकानेर महाराजा गंगासिंह के समय.. साल 1913 से 1919 तक उनके यहां एक उर्दू-फारसी अनुवादक हुये- मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी। लखनवी मुग़ल शासकों द्वारा जारी किये आदेशों का फारसी में अनुवाद किया करते थे। साल 1919 में महाराजा गंगासिंह ने उन्हें डूंगर कॉलेज में शिक्षक नियुक्त कर दिया। लखनवी अपने शागिर्द- कश्मीरी पंडित से रामायण की खूब कहानियाँ सुना करते थे। वे रामायण के प्रसंगों से बेहद प्रभावित थे। साल 1935 में गोस्वामी तुलसीदास की जयंती पर बनारस हिंदू विश्विद्यालय में एक प्रतियोगिता रखी गई। उर्दू में रामायण नज्म लिखने की एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता आयोजित। तब लखनवी के कश्मीरी शागिर्द ने लखनवी से उर्दू रामायण लिखने की फरमाइश की। जिसके बाद लखनवी ने 9 पेजों की उर्दू रामायण लिखकर बनारस भेजी। इस रामायण में 27 छंद थे और हर छंद में 6-6 पंक्तियाँ थीं। उस प्रतियोगिता में यह उर्दू रामायण पूरे देश में प्रथम आई और बीएचयू ने इसे गोल्ड मैडल से नवाजा गया। फिर महाराजा गंगासिंह ने भी बीकानेर के नागरी भंडार में एक कार्यक्रम रखा था। लखनवी ने जब उर्दू ज़बान में रामायण सुनाई तो ख़ूब वाहवाही हुई। यहीं पर उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार सर तेज बहादुर सप्रू ने विश्वविद्यालय की तरफ से राणा लखनवी को गोल्ड मैडल पेश किया। गंगासिंह ने भी इसे 8वीं के कोर्स में शामिल कर लिया। बाद में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान ने भी इसे 12वीं के पाठ्यक्रम में शामिल किया। राणा लखनवी के बाद कई सालों तक उर्दू रामायण के पाठ का उल्लेख नहीं मिलता। साल 2012 में बीकानेर में यह परंपरा फिर से शुरु होती है। बीकानेर के एडवोकेट स्व. उपध्यान चंद्र कोचर के कहने पर डॉ. जिया-उल-हसन और असद अली यह जिम्मा उठाते हैं। तब से अब तक हर साल दीपावली के मौके पर बीकानेर में रामायण का ख़ास उर्दू पाठ होता है। हर साल दीपावली से ऐन पहले मुस्लिम शायर उर्दू रामायण का पाठ करते हैं और हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब एक जाजम पर बैठकर सुनते हैं। अब तो दीपावली के अलावा भी कई मौक़ों पर लोग उर्दू रामायण का पाठ करवाते हैं।

बहरहाल, उर्दू पाठ को फ़क़त एक आयोजन का तमग़ा दे देना काफी नहीं होगा, बल्कि इसे पूरे देश के लिये सांप्रदायिक सौहार्द की नज़ीर का नाम दिया जा सकता है। यह आयोजन साबित करता है कि मज़हबी सौहार्द जाति-धर्म की सब सीमाओं से परे है। शायद एक वजह यह भी रही होगी कि बीकानेर में आज तक एक भी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई। शायद.. इसीलिये जनसत्ता के पूर्व संपादक स्व. प्रभाष जोशी अक्सर कहते सुने गये कि-

"पूरी दुनिया में दो ही ऐसे शहर हैं, जहां आज भी आदमियत, अपणायत और मज़हबी सौहार्द बरकरार है। पहला शहर है- बनारस और दूसरा है- बीकानेर…"

की शुभकामनायें।

मेरी बात : कबीर यात्रा निकालिए, कबीर विचार की ‘अंतिम यात्रा’ नहीं Khabar update 15वीं शताब्दी में एक सूफी कवि हुये- कबीर...
01/10/2025

मेरी बात : कबीर यात्रा निकालिए, कबीर विचार की ‘अंतिम यात्रा’ नहीं Khabar update

15वीं शताब्दी में एक सूफी कवि हुये- कबीर। वे औपचारिक रूप से तो पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन जीवन के अनुभवों ने उन्हें ऐसा संवारा कि संत बना दिया। उनकी वाणी में गहरा आध्यात्मिक ज्ञान था। कालांतर में, यही ज्ञान ‘दोहों’ के रूप में जनमानस के अंतस में उतरा। कबीर की वाणी और उनकी सत्संग परंपरा गांव-गांव, ढाणी-ढाणी तक पहुंचे, इसी उद्देश्य से बीकानेर की लोकायन संस्थान ने ‘राजस्थान कबीर यात्रा’ की शुरुआत की। संगीत की वह यात्रा, जिसमें ग्रामीण परिवेश में.. देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोक गायकों और संगीत रसिकों का कारवां साथ-साथ चलता है।

“सुमित ! हम चाहते हैं कि बीकानेर की धरोहर और कलाओं का संरक्षण-संवर्धन हो। लोकायन संस्थान इसी दिशा में काम करता है। राजस्थान कबीर यात्रा भी इसी तरह का एक सच्चा प्रयास है।” ऐसा कहना था- लोक कला मर्मज्ञ, इतिहासकार कृष्ण चंद्र शर्मा का। जिनसे साल 2012 में एक डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में मेरी मुलाक़ात हुई थी। सफेद झक्क बाल, आंखों पर नज़र का काला चश्मा और मठा'र कर बोलने का अंदाज। वे कृष्ण चंद्र शर्मा ही थे, जिन्होंने साल 1996 में ही लोकायन संस्थान की स्थापना की थी।

साल 2012 में लोकायन ने बीकानेर से पहली राजस्थान कबीर यात्रा निकाली। जिसमें साथ दिया- एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस ने। संगीत का सफर शुरु हुआ ही था कि मीडिया हाउस के साथ किसी बात को लेकर पहली ही 'कबीर यात्रा' विवादों के भेंट चढ़ गई। तब लोकायन से जुड़े गोपाल सिंह पर आरोप लगे थे। थू-थू भी हुई लेकिन कबीर की कृपा रही कि आयोजन की लाज बच गई। फिर प्रह्लाद टिपानिया, शिवजी-बद्री सुथार और पार्वती बाउल जैसे कलाकारों की उम्दा प्रस्तुतियों ने क्राइसिस मैनेजमेंट का काम किया। टीम लोकायन की कोशिशें रंग लाईं। आयोजन लगभग सफल रहा। तब श्रीलाल मोहता ने टीम की हौसलाअफजाई करते हुए एसपी मेडिकल कॉलेज के मंच से कहा था कि “टीम लोकायन और छोटे कद के गोपाल ने बड़े प्रयास किये हैं। सबको बधाई।”

साल 2012 के बाद राजस्थान कबीर यात्रा अपनी वेबसाइट के होमपेज पर चस्पा बस की तरह हिचकोले खाने लगी। साल 2013 से 2015 तक एक भी कबीर यात्रा न हो सकी। 2016 में राजस्थान पुलिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अमनदीप सिंह कपूर का साथ मिला तो ये आयोजन फिर से होने लगा। इसके बाद साल-दर-साल कबीर यात्रा का रंग-रूप, दिखावट-सजावट समेत तमाम चीजें बदलने लगीं। हालांकि इन सबके पीछे पूरी टीम के अपने-अपने हिस्से की मेहनत थी, मगर दीगर है कि कबीर यात्रा के चेहरे के तौर पर सिर्फ गोपाल सिंह का नाम ही स्थापित हुआ। अगले कुछ एडिशंस में तो ज़िला प्रशासन भी इस आयोजन का हिस्सा बनने लगा। इस तरह यात्रा को कभी राजस्थान पुलिस तो कभी प्रशासन का साथ मिला। जिसका आयोजकों को भरपूर फायदा भी मिला। मान-सम्मान, काम-इंतजाम.. सब। इस तरह कुछ ही सालों में कबीर यात्रा का नाम संगीत के उम्दा समारोहों में शुमार हो गया।

साल 2022 में लोकायन के संस्थापक कृष्ण चंद्र शर्मा का निधन हो गया। साल 2023 में भी कबीर यात्रा का आयोजन न हो सका। 2024 में इसका 7वां एडिशन मुकर्रर हुआ। तब आयोजकों में लोकायन के अलावा एक और नाम जुड़ा- मलंग फोक फाउंडेशन। ऐसा होने के साथ ही भीतरखाने से विरोध के सुर उठने लगे। साल 2025 आते-आते ये सुर और तेज़ होने लगे। इस बार कबीर यात्रा 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर तक होनी है। लेकिन इससे ठीक 4 दिन पहले इसके आयोजकों पर आरोपों की झड़ी लग गई। यहां तक कि मामला कोर्ट तक जा पहुंचा।

लोकायन संस्था के चन्द्र कुमार और रोहित बोड़ा ने बताया कि- वाद में संस्थान के कोषाध्यक्ष और कार्यकारिणी सदस्य द्वारा सचिव गोपाल सिंह चौहान और अध्यक्ष महावीर स्वामी समेत अन्य पर आरोप लगाये गये हैं। जिसमें, आपसी मिलीभगत द्वारा गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, कूटरचित दस्तावेज़ों से चुनाव करवाने का जिक्र है। आरोप यह भी सचिव गोपाल सिंह अपने वित्तीय लाभ के लिए लोकायन को ‘राजस्थान कबीर यात्रा’ से दरकिनार कर अपने ‘मलंग फोक फाउंडेशन’ द्वारा अनाधिकृत रुप से आयोजित करवाने जा रहे हैं। इतना ही नहीं, लोकायन में वित्तीय पारदर्शिता, नैतिकता और लोक कलाकारों को उचित रॉयल्टी देने को लेकर सवाल उठ रहे थे। गोपाल इन सवालों से बचने की कोशिश कर रहे थे। उनका यह भी कहना था कि "ये नाक की नहीं, न्याय की लड़ाई है। हम कतई नहीं चाहते कि इसमें लोक संगीत और संगीत प्रेमियों का रत्तीभर भी नुक़सान हो। हमारी प्रमुख मांग यही है कि राजस्थान कबीर यात्रा के आयोजकों में लोकायन संस्थान का नाम भी जुड़ा रहे।"

सोमवार को ज़िला न्यायालय में इस मामले पर सुनवाई हुई तो न्यायसंगत फैसला आया। जिला न्यायाधीश अतुल कुमार सक्सेना ने निर्णय सुनाया कि कबीर यात्रा अब लोकायन और मलंग फोक फाउंडेशन के संयुक्त आयोजन में ही आयोजित की जाएगी। इस आदेश पर दोनों पक्षों की सहमति बन गई। वाद में दायर अन्य बिंदुओं पर सुनवाई अब 30 अक्टूबर को होगी।

कुल मिलाकर पहले विवाद, फिर वाद और आख़िर में कोर्ट के साथ संवाद। 3 दिनों के 3 रंग। लगा जैसे- संगीत की यह सुंदर यात्रा हक़ और वर्चस्व के कोलाहाल में तब्दील हो गई हो। भले ही ये लड़ाई ‘लोकायन संस्थान’ बनाम ‘मलंग फोक फाउंडेशन’ की थी, लेकिन इसका थोड़ा-थोड़ा खमियाजा सबको भुगतना पड़ा। सबसे ज्यादा नुकसान कबीर प्रेमियों और संगीत रसिकों का हुआ। फिर राजस्थान पुलिस, बीकानेर ज़िला प्रशासन और इसके मंच पर नज़र आने वाले नेताओं और मंत्रियों का भी। राजस्थान, बीकानेर और ख़ुद संत कबीर के नाम का नुक़सान तो होता ही जा रहा है। आगे भी होता रहेगा, जब तक यह मामला चलेगा।

उपरोक्त प्रकरण के बाद चर्चाएं हैं कि संत-वाणी की परंपराओं को फैलाने का दावा करने वाले लोग ‘कबीर' के नाम के लिये झगड़ रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि कबीर की वाणी और ‘कबीर’ यात्रा के आयोजकों के विचारों में इतना विरोधाभास क्यों है? कबीरदास के दोहों में तो ऐसी सीख कहीं नहीं है। कबीर तो कहते थे कि-

लोभी सदा दुखी रहा, जो चाहा सो ना होय।
धन के पाछे फिरत है, भवसागर में खोय।।

फिर क्यों ‘कबीर’ यात्रा के आयोजकों पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के सवाल उठ रहे हैं?

संत कबीर तो चेताते हुए कहते थे कि-

माया को लुटि लई, माया गई सताय।
कहत कबीर चेत रे, अब क्यों पछिताय॥

फिर क्यों आयोजकों पर बिना अनुमोदन और अनुशंसा के.. अनाधिकृत रूप से कबीर यात्रा आयोजित करवाने के आरोप लग रहे हैं?

कवि कबीर तो कहते-कहते रुखसत हो गये कि-

अहंकार से कोई न बचे, चाहे हो गुणवान।
कह कबीर यह जानिये, घमंड करे नुकसान।।

फिर क्यों आयोजकों पर एकतरफा और मनमर्जी से निर्णय लेने के आरोप लग रहे हैं?

सवाल यह भी कि- क्या 1 दशक से कबीर यात्रा निकालने वालों के हृदय में थोड़ी मात्रा में भी कबीर के विचार नहीं उतरे? ..और अगर उतरे हैं तो उन्हें उपरोक्त सवालों पर मंथन ज़रूर करना चाहिये। उन्हें कुछ ऐसा करना चाहिये, जिससे संत कबीर, लोक संगीत, सत्संग रसिकों और बीकानेर के हुये नुक़सान की भरपाई हो सके। उन्हें नहीं भूलना चाहिये कि इस आयोजन में बीकानेर ज़िला प्रशासन, राजस्थान पुलिस, अमनदीप सिंह कपूर और देश के क़ानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल जैसे नाम भी जुड़ते आये हैं। समाज में इन सबकी अपनी-अपनी साख और जिम्मेदारियां हैं। इससे उनके लिये अच्छा संदेश नहीं जायेगा। आयोजकों को ‘कबीर यात्रा’ निकालनी चाहिये, 'कबीर-विचार' की ऐसी ‘अंतिम यात्रा’ कतई नहीं। पहली कबीर यात्रा (2012) से लेकर अब तक (2025) यह यात्रा भीतरी-बाहरी विवादों से घिरती रही है। अब आयोजकों को विवादों से पीछा छुड़ाने और संवादों को जुड़ने की ज़रुरत है। कबीर का नाम पाने के लिये.. मलंग बनाम लोकायन का समर नहीं रचा जाना चाहिये। बल्कि वाकई ‘मलंग’ (बेफिक्र, मस्त) होकर ‘लोकायन’ (लोगों से संगीत रूपी संवाद/यात्रा) करना चाहिये। धन, लोभ, मद और नाम के मोह जैसी सीमाओं को तोड़ना ही तो असली कबीर होना है।

हद हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर
हद अनहद दोउ टपे सो वाको नाम फ़कीर
कबीरा, सो वाको नाम फ़कीर !

और ऐसा 'असली कबीर' होकर ही असली ‘कबीर यात्रा’ निकाली जा सकती है। मोह-माया में फंसने वाले का हृदय कभी शांत नहीं होता। असली मलंग बनकर, माया को त्यागकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है। जैसा कि कबीर संदेश भी देते थे कि-

जाका माया मोह में, ताका हिय न अधीर।
कह कबीर तजि माया, पावै राम सरीर॥

बहरहाल.. जाते-जाते पहली 'राजस्थान कबीर यात्रा' में शबनम विरमानी का गाया गीत ख़ूब याद आ रहा है। कबीर यात्रा के ऑफिसियल यूट्यूब चैनल पर ढूंढने की कोशिश की, मगर मिला नहीं। इसका कारण पता किया तो फिर एक विवाद की बात सामने आई- चैनल की कमाई में लोक कलाकारों की रायल्टी पर विवाद। उफ्फ... ! चलिये, मैं उस गीत के बोल ही चस्पा करके विदा लेता हूं। कबीर यात्रा के सफल आयोजन (साफ-स्वच्छ और विवादरहित) की शुभकामनाओं के साथ।

मत कर माया को अहंकार
मत कर काया को अभिमान
काया गार से काची
काया धूल हो जासी
ओ काया तेरी धूल हो जासी...

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'द चेंजमेकर' के आज के एपिसोड में बात, भीनासर की उन महिलाओं की, जो दशकों से गोचर भूमि में पशु-पक्षियों के लिये पानी डालने जाती रही हैं. इस नेक काम के एवज में इन्होंने न तो कभी तारीफ चाही और न ही कभी ईनाम की ख्वाहिश की. बेजुबानों के लिये पानी डालने को हमेशा अपना धर्म समझा। देखा जाए तो ये महिलाएं ही असल नायिकाएं हैं।

आपसे गुजारिश है कि इन नि:स्वार्थ महिलाओं के सम्मान में इस News Story को ज्यादा से ज्यादा Share करें।

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